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कांग्रेस की सबसे प्रचंड जीत को आडवाणी ने 'शोकसभा' क्यों कहा था?

1984 में कांग्रेस के हिस्से वो जीत आई जिसकी बराबरी अभी तक कोई नहीं कर सका

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29 दिसंबर 2021 (अपडेटेड: 28 दिसंबर 2021, 04:16 AM IST)
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इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव ने कांग्रेस को वो ऊंचाई दी जिसे तक फिर कोई नहीं पहुंचा (फोटो सोर्स -इंडिया टुडे)
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‘मुझे चिंता नहीं है कि मैं जीवित रहूं या न रहूं, मेरी लंबी उम्र रही है, लेकिन अगर मुझे किसी चीज़ पर गर्व है तो इस पर है कि मेरा सारा जीवन सेवा में गया है. और जब मेरी जान जाएगी मेरे खून का एक-एक कतरा भारत को जीवित करेगा.’
उड़ीसा के भुवनेश्वर में ये भाषण देने के बाद इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) अपना दौरा बीच में ही छोडकर दिल्ली लौट आईं. खबर आई थी कि उनके घर की एक गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया है जिसमें उनके पोते और पोती सवार थे. अगले दिन 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा का एक इंटरव्यू था, उस वक़्त के जाने माने लेखक और अभिनेता पीटर उत्सिनोव के साथ. सुबह के सवा नौ बजने में एक दो मिनट कम थे. इंदिरा तैयार होकर अपने आवास 1, सफदरजंग रोड से निकलकर उसी परिसर के एक दूसरे बंगले 1, अकबर रोड के लिए निकलीं. ये इंदिरा का ऑफिस था. ऑफिस पहुंचती इससे पहले दरोगा बेअंत सिंह रास्ते में तैनात मिला. इंदिरा उसे देखकर मुस्कराईं, हाथ जोड़ लिए, उन्हें लगा कि बेअंत भी हमेशा की तरह अभिवादन करेगा, लेकिन बेअंत ने हाथ नहीं जोड़े. अपनी सर्विस रिवाल्वर निकाली और इंदिरा की तरफ़ तानकर पांच गोलियां चला दीं. सतवंत सिंह ने भी अपनी स्टेनगन की 25 गोलियों वाली पूरी मैगजीन इंदिरा की तरफ़ टारगेट की और खाली कर दी. इंदिरा की सुरक्षा में तैनात रहे दोनों सिख सुरक्षाकर्मियों ने पांच महीने पहले सेना के ऑपरेशन ब्लू स्टार का बदला ले लिया था.
आज 29 दिसंबर है और आज की तारीख़ का संबंध है इंदिरा गांधी की मौत के बाद हुए उस लोकसभा चुनाव से जिसे आडवाणी ने कांग्रेस का शोकसभा चुनाव कहा था. #इंदिरा जब पहली बार प्रधानमंत्री बनीं जवाहर लाल नेहरु की बेटी यूरोप में पढ़ाई के दौरान अपने पिता को ख़त लिखकर बताती थीं, मैं कल बाल कटा आई, मेरा जूड़ा खुल जाता था और यूरोपीय कपड़ों के साथ ये बिल्कुल फ़बता भी नहीं था.’
ये 11 साल की इंदु है, जो अपने पिता से दोस्तों की तरह बात करती है, और जब वो 22 साल की होती है तो पार्टी के अंदर की खींचतान पर अपने उदास पिता को किसी अभिभावक की तरह ढाढस बंधाती है, उसकी बातों में दुलार टपकता है. दार्शनिकता भी झलकती है.
इंदिरा लिखती हैं,
‘यदि मैं आपका उदासी से भी कुछ अधिक उदास वाला चेहरा नहीं देखती रहूं, तो यह इतनी बुरी बात भी नहीं होगी, दुलारे पापू मेरे लाडले इतने पराजयवादी तो न बनिए. खुद के अलावा आपको कोई और नहीं हरा सकता. भारतीय राजनीति में घुसती जा रही इन छुद्रताओं को जड़ें जमाते देख बहुत दुःख होता है. इन से आप बहुत ऊपर हैं. लेकिन इस सबसे आप खुद पर कुछ भी फर्क न पड़ने दीजिएगा. ऐसा दुनिया भर में होता है. और ये दौर भी हमेशा बीत जाते हैं.’
नेहरू के पत्रों ने इंदिरा को समाज और राजनीति की बेहतर समझ दी थी (फोटो सोर्स -इंडिया टुडे)
नेहरू के पत्रों ने इंदिरा को समाज और राजनीति की बेहतर समझ दी थी (फोटो सोर्स -इंडिया टुडे)

इंदिरा दिलो-दिमाग में वैचारिकता का तूफ़ान लिए बड़ी हुईं, वो मानसिक तौर पर इतनी मजबूत हो गईं थीं कि भारत की तीसरी प्रधानमंत्री बनीं. और वो निर्णय लेने में इतनी कठोर हो गईं कि साल 1975 में भारत का पहला और आखिरी आपातकाल लगा दिया. आपातकाल की व्यथा-कथा, 25 जून 1975 की उस रात की कहानी, समसामयिक कारण, सब हम आपको पहले भी बता चुके हैं, इससे आगे बढ़ते हैं. #आपातकाल के बाद आपातकाल का असर उल्टा हुआ था. इंदिरा को भी इसका अंदाजा था. इसीलिए लोकसभा का कार्यकाल नवंबर में ख़त्म होता इसके पहले ही इंदिरा गांधी ने 18 जनवरी 1977 को चुनाव की घोषणा कर दी. जनता और विपक्ष भौचक्का था और इधर इंदिरा गांधी ने चुनाव प्रचार शुरू कर दिया. हज़ारों किलोमीटर की यात्रा की. जम्मू कश्मीर और सिक्किम छोड़कर हर राज्य में गईं और करीब ढाई सौ चुनावी जनसभाएं कीं. लेकिन इंदिरा को ये समझ आ गया था कि इस बार जनता बिफर चुकी है.
आलम ये था कि कांग्रेस को जनसभा में भीड़ जुटाने के लिए दूरदर्शन पर साल 1973 की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘बॉबी’ चलानी पड़ रही थी और अटल बिहारी की जनसभा में लोग उनके पढ़े शे’रों की एक-एक लाइन पर मिनटों ताली बजा रहे थे.

‘बाद मुद्दत के मिले हैं दीवाने

कहने सुनने को बहोत हैं अफ़साने

खुली हवा में ज़रा सांस तो ले लें

कब तक रहेगी आज़ादी कौन जाने’

अटल के भाषण जो कमाल कर रहे थे, वो बॉबी फिल्म का प्रसारण नहीं कर पा रहा था (फोटो सोर्स - इंडिया टुडे और ट्विटर)
अटल के भाषण जो कमाल कर रहे थे, वो बॉबी फिल्म का प्रसारण नहीं कर पा रहा था (फोटो सोर्स - इंडिया टुडे और ट्विटर)

जनता ने अटल की सुनाई पंक्तियों में इमरजेंसी का काला प्रेत पहचान लिया था. भला वापस उसे जगाने की भूल कौन करता. 16 से 19 मार्च तक चुनाव हुए. और 22 मार्च 1977 को परिणाम आ गया. ये पहला मौका था कि कांग्रेस भारत में बुरी तरह हारी थी. कांग्रेस गठबंधन को मात्र 153 सीटें मिलीं. और जनता पार्टी गठबंधन को 295 सीटें. मोरारजी देसाई इस गठबंधन के नेता थे. सूरत से जीते थे. इंदिरा गांधी रायबरेली से राजनारायण के हाथों हारीं. संजय गांधी भी हार गए.
लेकिन ये इंदिरा की आख़िरी बाजी नहीं थी. जिस भरोसे के साथ जनता ने जनता पार्टी की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई थी. उस भरोसे पर जनता पार्टी खरी नहीं उतर पाई. गुटबाजी शुरू हो गई. प्रधानमंत्री पद के लिए तीन प्रबल दावेदार थे. मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह और बाबू जगजीवन राम. आखिर में मोरारजी देसाई के नाम पर सहमति बनी. मोरार जी प्रधानमंत्री भी बने. इसी बीच इंदिरा को गिरफ्तार भी किया गया. 40 लाख के जीप घोटाले के आरोप में. आरोप और भी कई थे, लेकिन सबसे बड़ा यही था. होता क्या जो केस लगाए गए थे उनमें दम नहीं थी. इमरजेंसी में महीनों जेल में रहने वाले नेता चाहते थे कि इंदिरा भी कुछ दिन जेल में रहें. लेकिन कमज़ोर आरोपों के चलते इंदिरा सिर्फ 17 घंटे में रिहा हो गईं. इधर जनता पार्टी में भी रार बढ़ चुकी थी. इंदिरा इसी ताक में थीं. इमरजेंसी वाले एसिड पर इंदिरा की गिरफ्तारी ने भी थोड़ा-बहुत बेस का काम किया था.
इंदिरा ने चरण सिंह को समर्थन दिया लेकिन सिर्फ़ चार महीने के लिए. चरण सिंह की सरकार भी गिर गई. जनवरी 1980 में फिर चुनाव हुए और इस बार जनता पार्टी को करारी हार मिली. खासतौर से उत्तर भारत में जहां 1977 में जनता पार्टी ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया गया था. इंदिरा एक बार फिर बाजी जीत चुकी थीं. इस बार कांग्रेस को कुल 353 सीटें मिलीं थीं. #ऑपरेशन ब्लू स्टार साल 1984. भोपाल गैस त्रासदी का साल, ऑपरेशन ब्लू स्टार और इंदिरा गांधी की ह्त्या का साल. केंद्र में इंदिरा की सरकार चल रही थी. लेकिन पंजाब की राजनीति अस्थिर थी. यूं तो पंजाब में खींचतान साल 1970 से ही चल रही थी. लेकिन असली समस्या शुरू हुई साल 1978 में. जब अकाली दल ने आनंदपुर प्रस्ताव पारित किया. इसमें केंद्र सरकार से मांग की गई थी कि उसका हस्तक्षेप सिर्फ रक्षा और विदेश नीति जैसे मुद्दों में रहे, बाकी मामलों में राज्य को ही निर्णय लेने का अधिकार हो. और यही मांगें आगे चलकर रोष और बगावत में बदल गईं. इस बगावत का चेहरा बना जरनैल सिंह भिंडरावाले. सिख चरमपंथ की शुरुआत हो चुकी थी. खालिस्तान की मांग उठ रही थी और हो रही थी हिंसा जिसमें आम लोग मारे जा रहे थे, पुलिसकर्मी, CRPF के जवान और पत्रकार मारे जा रहे थे. साल 1984 तक अकाली दल ने भी अपने मोर्चे का विलय भिंडरावाले के साथ कर लिया था.
इंदिरा ने कई बार अकालियों से वार्ता की कोशिश की, लेकिन आख़िरी चरण की बातचीत फ़रवरी 1984 में तब टूट गई जब हरियाणा में सिखों के ख़िलाफ़ हिंसा हुई. अप्रैल 1984 में इंदिरा ने पंजाब में दरबारा सिंह की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त कर दिया और राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया. अब तक हुई हिंसक घटनाओं में करीब 300 लोग मारे जा चुके थे.
पंजाब में हिंसा के दौरान का एक चित्र
पंजाब में हिंसा के दौरान का एक चित्र

तारीख़ 1 जून 1984. स्वर्ण मंदिर परिसर और उसके बाहर तैनात CRPF के बीच गोलीबारी हुई. जरनैल सिंह भिंडरावाले, कोर्ट मार्शल किए गए मेजर जनरल सुभेग सिंह और सिख सटूडेंट्स फ़ेडरेशन ने स्वर्ण मंदिर परिसर के चारों तरफ़ ख़ासी मोर्चाबंदी कर ली थी. भारी मात्रा में आधुनिक हथियार औ्रर गोला-बारूद भी जमा कर लिया था. साल 1985 ई. में होने वाले आम चुनाव से ठीक पहले इंदिरा गांधी इस समस्या को सुलझाना लेना चाहती थीं. दो जून को मंदिर परिसर में हज़ारों श्रद्धालुओं की आवक शुरू हो गई थी. क्योंकि तीन जून को गुरु अर्जुन देव का शहीदी दिवस था. इंदिरा गांधी ने देश को संबोधित किया. साफ़ हो गया कि सरकार स्थिति को गंभीरता से ले रही है और कोई भी कार्रवाई कर सकती है. पंजाब से आने-जाने वाली रेलगाड़ियों और बसों पर रोक लगा दी गई, फ़ोन कनेक्शन काट दिए गए और विदेशी मीडिया को राज्य से बाहर कर दिया गया. तीन जून को भारतीय सेना ने अमृतसर पहुंचकर स्वर्ण मंदिर परिसर को घेर लिया. शाम को शहर में कर्फ़्यू लगा दिया गया. चार जून को सेना ने गोलीबारी शुरु कर दी ताकि मंदिर में मोर्चा बनाए चरमपंथियों के हथियारों और असलहों का अंदाज़ा लगाया जा सके. चरमपंथियों की ओर से इसका इतना तीखा जवाब मिला कि पांच जून को बख्तरबंद गाड़ियों और टैंकों को इस्तेमाल करने का निर्णय किया गया और पांच जून की रात को सेना और चरमपंथियों के बीच असली भिड़ंत शुरु हुई.
इंदिरा के मुंह से निकला, ‘हे भगवान् मुझे तो बताया गया था कि सब कंट्रोल हो जाएगा. किसी की जान नहीं जाएगी.’
लेकिन जानें गईं. भीषण ख़ून-ख़राबा हुआ. अकाल तख़्त पूरी तरह तबाह हो गया. अकाल तख्त सिखों के लिए धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था. ये पहली बार था जब स्वर्ण मंदिर से छह, सात और आठ जून को पाठ नहीं हो पाया. सिर्फ गोलियों की आवाजें आईं थी. भारत सरकार के श्वेतपत्र के मुताबिक 83 सैनिक मारे गए और 249 घायल हुए. 493 चरमपंथी और आम नागरिक मारे गए, 86 घायल हुए और करीब 1600 को गिरफ़्तार किया गया. लेकिन ये आंकड़े विवादित माने जाते हैं. अलग-अलग स्रोतों के मुताबिक हजारों सैनिकों और सिख चरमपंथियों की मौतें हुईं थीं, हालांकि आपरेशन ब्लू स्टार काफी हद तक सफल रहा, भिंडरावाले को मार गिराया गया. लेकिन ये इंदिरा की कूटनीतिक हार थी. और अब इंदिरा को इसके बदले का शिकार होना था.
स्वर्ण-मंदिर परिसर में जमा भिंडरावाले और उसके साथी चरमपंथी
स्वर्ण-मंदिर परिसर में जमा भिंडरावाले और उसके साथी चरमपंथी
#इंदिरा की मौत 23 जून 1980 की भोर इंदिरा के चहेते बेटे और इमरजेंसी के निर्णय में अपनी मां के साथ बराबर के हिस्सेदार संजय गांधी की भी असमय मृत्यु हो चुकी थी. एयरक्राफ्ट के साथ कलाबाजियां करते वक़्त हुए क्रैश में. और अब तारीख़ थी 31 अक्टूबर 1984. ये दूसरी बार था जब 1, सफदरजंग रोड के पते पर सुबह-सुबह मातम पसरने वाला था. हर दिन की तरह इंदिरा सुबह 6 बजे सोकर उठीं, योग और एक्सरसाइज की, तैयार हुईं, डॉक्टर माथुर प्रोटोकॉल के तहत रोज़ आते थे, लेकिन 67 बरस की हो चुकीं इंदिरा कभी ख़ास बीमार नहीं पड़ी थीं, डॉक्टर माथुर से थोड़ी बतकही हुई, और पीटर उत्सिनोव को इंटरव्यू देने के लिए इंदिरा अपने ऑफिस की तरफ़ निकल पड़ीं. कहीं दूर नहीं जाना था, बस परिसर में बनी एक बिल्डिंग से दूसरी तक. इसीलिए आज बुलेटप्रूफ जैकेट भी नहीं पहनी थी. लगा कि बाहर जाना नहीं है, सिर्फ इंटरव्यू देना है, और कैमरे के सामने बुलेट प्रूफ जैकेट में अच्छी भी नहीं लगेंगीं. इंदिरा आधे रास्ते ही पहुंचीं. पीछे-पीछे दिल्ली पुलिस का एक कॉन्स्टेबल. मैडम के ऊपर छाता ताने हुए. उनसे कुछ फीट पीछे इंदिरा के निजी सचिव राजेंद्र कुमार धवन. उनके ठीक पीछे चपरासी और एक दरोगा.
इंदिरा अभी लकड़ी के उस छोटे गेट तक पहुंची ही थीं कि सामने से दरोगा बेअंत सिंह नमूदार हुआ. बेअंत पिछले 9 साल से उनके सुरक्षा अमले का हिस्सा था. कई बार साथ में विदेश भी गया था. कुछ महीने पहले उसे पीएम की सिक्योरिटी से एडवाइज़र और पूर्व रॉ चीफ आरएन काव के कहने पर हटा दिया गया था. लेकिन बेअंत ने सीधे मैडम से अपील की. धवन साहब और इंदिरा ने उसके ट्रांसफर ऑर्डर कैंसल कर दिए. इंदिरा का कहना था कि मुझे अपने सिख सुरक्षाकर्मियों पर पूरा भरोसा है. भरोसे का सवाल इसलिए उठ रहा था क्योंकि ऑपरेशन ब्लू स्टार को अभी सिर्फ 5 महीने हुए थे.
लेकिन बेअंत तो मैडम की ह्त्या के इरादे से ही दोबारा उनकी सिक्योरिटी में शामिल हुआ था, दूसरे हत्यारे सतवंत सिंह ने भी आज दस्त का बहाना करके अपनी ड्यूटी भीतरी हिस्से में लगवाई थी. और इरादा पूरा कर लिया गया. पहले बेअंत सिंह और फिर सतवंत सिंह दोनों ने ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर इंदिरा से ऑपरेशन ब्लू स्टार का बदला ले लिया था.
इंदिरा गांधी की हत्या करने वाले बेअंत सिंह और सतवंत सिंह
इंदिरा गांधी की हत्या करने वाले बेअंत सिंह और सतवंत सिंह

इंदिरा ज़मीन पर गिर गईं. तब तक सोनिया आ चुकी थीं. मुंह से निकला, ‘मम्मी ओह माई गॉड, मम्मी.’ सोनिया और धवन ही इंदिरा को आनन-फानन में एम्स ले गए. जहां डॉक्टर कुछ घंटों तक नाकामयाब कोशिश करते रहे. ओ नेगेटिव ब्लड ग्रुप कम था. लोगों से अपील की गई. इतने लोग आ गए कि अस्पताल के गेट बंद करने पड़े. पर कोई फायदा नहीं. दोपहर 2 बजकर 20 मिनट पर इंदिरा गांधी के निधन की औपचारिक घोषणा कर दी गई. बेटे राजीव गांधी को भी खबर कर दी गई. खबर मौत की.
बेअंत सिंह ने भागने कीं कोशिश की, लेकिन मौके पर ही मार गिराया गया. सतवंत सिंह और इंदिरा की ह्त्या की साजिश में शामिल एक और शख्स केहर सिंह को बाद में फांसी दे दी गई. #सिख दंगे और अगले लोकसभा चुनाव खालिस्तान की मांग, स्वर्ण मंदिर की दीवारों पर खून के धब्बे, और उसके बदले में इंदिरा गांधी की ह्त्या, लेकिन सिलसिला अभी थमने वाला नहीं था. ज़मीन अभी भी खून की प्यासी थी. इंदिरा की मौत के बाद दिल्ली, फिरोजाबाद और कानपुर सहित तमाम जगह सिख विरोधी दंगे शुरू हो गए.
दिल्ली में नारे लगाए जा रहे थे,
'इंदिरा गांधी अमर रहें, इन सरदारों को मारो इन्होंने हमारी मां को मारा है.'
भीड़ चिल्ला रही थी, 'इसे मारो ये सांप का बच्चा है.'
इन दंगों में मरने वाले सिखों की संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा थी, लगभग 5 हज़ार. कानपुर में 127 सिख मार दिए गए थे. शुरुआत में जिसकी FIR तक दर्ज नहीं हुई. और बाद में पुख्ता सबूतों की कमी बताकर कोर्ट ने केस ख़त्म कर दिया.
साल 1984 के सिख दंगों के जख्म कई हिंसात्मक घटनाओं की शक्ल में उभरते रहते हैं (फोटो सोर्स -आज तक)
साल 1984 के सिख दंगों के जख्म कई हिंसात्मक घटनाओं की शक्ल में उभरते रहते हैं (फोटो सोर्स -आज तक)
#आम चुनाव और कांग्रेस की जीत इंदिरा गांधी की ह्त्या के समय राजीव अमेठी से सांसद हुआ करते थे. ये सीट संजय गांधी की मौत के बाद खाली हुई थी. जिस पर जून 1981 में उपचुनाव हुआ और राजीव जीतकर संसद पहुंचे. 1983 में राजीव कांग्रेस के महासचिव भी बन गए थे. जब इंदिरा की मौत की खबर मिली तब राजीव बंगाल दौरे पर थे. बंगाल से दिल्ली आ गए. राजीव को बताया गया कि कैबिनेट और पार्टी चाहती है कि प्रधानमंत्री का पद वह संभालें. कहा जाता है कि सोनिया इसके खिलाफ़ थीं. लेकिन राजीव प्रधानमंत्री बने.
प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने तय चुनाव कार्यक्रम को दरकिनार कर दिया और वक़्त से पहले ही देश में आम चुनाव की घोषणा कर दी. इधर पंजाब में अलगाववादी आंदोलन अभी भी चल रहा था. खालिस्तान की मांग की जा रही थी. राजीव के चुनाव अभियान का ब्लूप्रिंट भी इसी के इर्द-गिर्द तैयार किया गया. हिंदू बहुसंख्यकों में असुरक्षा का भाव था, और चुनाव प्रचार में कांग्रेस की तरफ़ से जताया जा रहा था कि हम ही बहुसंख्यकों की सुरक्षा में सक्षम हैं.
चुनाव प्रचार के 25 दिनों में राजीव ने कार, हेलिकॉप्टर व हवाई जहाज से करीब 50 हजार किलोमीटर से ज्य़ादा की यात्रा की. इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या से मिली सहानुभूति और राजीव गांधी का मेहनतकश चुनाव प्रचार बेहद कामयाब हुआ. कहा ये भी जाता है कि राजीव गांधी और तत्कालीन RSS प्रमुख बाला साहब देवरस के बीच गुप्त बैठक हुई थी. और इस चुनाव में RSS ने कांग्रेस की मदद की थी. हालांकि आज भाजपा इसे नकारती है.
1984 में 24 दिसंबर से 28 दिसंबर तक आठवीं लोकसभा के चुनाव हुए. 542 में से 515 सीटों पर. 29 दिसंबर यानी आज ही के दिन अनौपचारिक तौर पर साफ़ हो गया कि राजीव गांधी की अगुवाई में कांग्रेस ने बड़ी जीत दर्ज की है. असम की 14 और पंजाब की 13 सीटों पर चुनाव 1 साल बाद सितंबर 1985 में हुए. कांग्रेस ने कुल 542 में से 415 सीटों पर जीती. ये भारत के इतिहास में पहली और आख़िरी सबसे बड़ी जीत थी. कांग्रेस ने कुल 49.1 प्रतिशत वोट हासिल किए थे. दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी. N.T. रामाराव की तेलुगु देशम पार्टी. TDP ने 30 सीटें जीतीं. ये पहली बार था जब कोई क्षेत्रीय पार्टी सदन में विपक्ष में बैठी.
राजीव गांधी ने सियासत का हवाई जहाज भी बखूबी उड़ाया और कांग्रेस के हिस्से वो जीत आई जिसकी बराबरी अभी तक कोई नहीं कर सका
राजीव गांधी ने सियासत का हवाई जहाज भी बखूबी उड़ाया और कांग्रेस के हिस्से वो जीत आई जिसकी बराबरी अभी तक कोई नहीं कर सका

भाजपा के लिए ये पहला चुनाव था. 1980 में ही पार्टी बनी थी. अटल बिहारी बाजपेयी की अध्यक्षता में. भाजपा ने  224 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे लेकिन सिर्फ 2 सीटों पर जीत मिली. आंध्रप्रदेश की हनमकोंडा सीट से पीवी नरसिंह राव को हराकर सी. जंगा रेड्डी और गुजरात की मेहसाणा सीट से A.K. पटेल जीते. भाजपा के आधे से ज्यादा उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई. वोट शेयर रहा सिर्फ़ 7.74.
भाजपा के दिग्गज नेता भी हारे. अटल बिहारी वाजपेयी को ग्वालियर से माधवराव सिंधिया ने हरा दिया, वहीं यूपी के दिग्गज नेता हेमवती नंदन बहुगुणा को अमिताभ बच्चन ने धूल चटाई. बेशक ये इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति का नतीजा था. चुनावी सभाओं में अमिताभ याद दिलाते थे-‘जब मैंने इंदिरा जी के शरीर को इन्हीं दोनों हाथों में उठाया.’
यूं तो लाल कृष्ण आडवाणी ने खुद पहला लोकसभा चुनाव साल 1989 में लड़ा था. लेकिन 1984 के लोकसभा चुनाव को आडवाणी शोकसभा चुनाव बताते थे. कांग्रेस के लिए. जबकि असलियत ये थी कि ये भाजपा के लिए सबसे बुरी हार थी.
अटल 1984 का चुनाव हार गए थे जबकि आडवाणी ने अपना पहला लोकसभा चुनाव 1989 में लड़ा
अटल 1984 का चुनाव हार गए थे जबकि आडवाणी ने अपना पहला लोकसभा चुनाव 1989 में लड़ा

इंदिरा की मृत्यु के ठीक दो महीने बाद यानी 31 दिसंबर को राजीव गांधी ने अगली कैबिनेट की घोषणा कर दी. रिकॉर्ड बहुमत वाली ये सरकार पूरे 5 साल चली. 1989 तक. लेकिन देश के अंतिम दक्षिणी छोर पर कुछ ऐसा चल रहा था, जिसे राजीव न समझ पाए और न संभाल पाए.
इतिहासकार Paul R. Brass अपनी किताब ‘The Politics of India since Independence’ में लिखते हैं,

'नेहरु तालमेल की राजनीति करते थे. जबकि इंदिरा ने इस तालमेल को लगभग ख़त्म करके एक ऑटोक्रेट की तरह शासन चलाया. लेकिन राजीव के पास कोई ख़ास लीडरशिप नहीं थी. और इसीलिए वो नेहरू और इंदिरा के तरीकों के बीच झूलते रहे. और आगे चलकर उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा.'


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