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हैदराबाद ओस्मानिस्तान बनने वाला था?

1930 के दशक में जब पहली बार पाकिस्तान की मांग शुरू हुई तो हैदराबाद को ओस्मानिस्तान के नाम से पाकिस्तान का हिस्सा बनाने की बात भी उठी.

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हैदराबाद की कहानी बागनगर से शुरू होकर हैदराबाद और फिर भागनगर तक है (तस्वीर: Wikimedia Commons)
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कमल
18 नवंबर 2022 (अपडेटेड: 16 नवंबर 2022, 09:26 PM IST)
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विलियम शेक्स्पियर के एक बड़ा ही मशहूर नाटक लिखा. रोमियो और जूलियट. नाटक में एक जगह जूलियट कहती है, नाम में क्या रखा है? गुलाब को गुलाब न कहें तो भी उसकी खुशबू बरक़रार रहेगी. लेकिन न तो जूलियट को और न ही शेक्सपियर को मालूम था कि राजनीति एक शय है, जिसमें नाम का भी उतना ही महत्व है, जितना काम का. इसलिए दुनियाभर में जब-जब सत्ताएं बदलीं, शहरों, सड़कों और इमारतों के नाम बदले. ऐसा भारत में भी हुआ. बॉम्बे, मुम्बई हो गया, कलकत्ता बन गया कोलकाता. 

कोलकाता से कुछ नीचे जाएं तो हैदराबाद की भी कुछ ऐसी ही कहानी है. हालांकि हैदराबाद (Hyderabad) का नाम तो बदला नहीं है. लेकिन चंद लोगों का मानना है कि नाम बदला जाना चाहिए. मोतियों के इस शहर को कुछ लोग चाहते हैं कि भाग्यनगर (Bhagyanagar) बुलाया जाना चाहिए. आप पूछेंगे भाग्यनगर क्यों. तो इसके पीछे है एक लम्बी कहानी. कहानी जो बताती है कि हैदराबाद (Hyderabad History) शहर की नींव कैसे पड़ी. 

किस्सा रानी भागमती का 

तो जैसा कि आमतौर पर होता है, इस कहानी की शुरूआत भी होती है एक राजा-रानी से. 16 वीं शताब्दी की शुरुआत में गोलकोण्डा सल्तनत पर सुल्तान इब्राहिम क़ुतुब शाह का राज़ था. उनके बड़े बेटे और शहजादे का नाम था कुली क़ुतुब शाह. शहज़ादा एक रोज़ शिकार पर निकला. शिकार के दौरान उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी. लड़की का नाम भागमती था. शहजादे को भागमती से इश्क़ हो गया. और वो रोज़ भागमती से मिलने जाने लगा. भगमाती चिचलम नाम के गांव की रहने वाली थी. राजमहल और चिचलम के बीच एक नदी पड़ती थी, मूसी नदी. जिसे पार कर चिचलम जाना पड़ता था. एक रोज़ यूं हुआ कि नदी पार करते हुए शहजादे ने ध्यान नहीं दिया कि मुसी का पानी बड़ा हुआ है. उसने जैसे ही नदी में कदम रखा, नदी की तेज़ धारा उसे बहाने लगी. शाही सेवकों ने किसी तरह शहजादे की जान बचाई. 

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रानी भागमती की लोककथा (तस्वीर: Wikimedia Commons)

इस पूरे घटनाक्रम से हुआ ये कि ये खबर सुल्तान तक पहुंच गई. उसने शहजादे को बुलावा भेजा और उससे रात को नदी पार करने का कारण पूछा. शहजादे ने पूरी कहानी बताई. शहजादा एक आम लड़की के इश्क में है, ये सुनकर सुल्तान बहुत नाराज़ हुआ. उसने शहजादे को गोलकोण्डा के किले में नजरबन्द करवा दिया. सालों तक शहजादा और भागमती मिल न सके. कई साल बाद जब सुलतान की मौत हुई तो कुली कुतिब शाह खुद सुल्तान बना. और उसने भागमती से शादी कर ली. कहते हैं कि उसने भागमती के लिए एक नया शहर बनाया. उसी जगह पर, जहां कभी चिचलम गांव हुआ करता था. 

भागमती के नाम पर इस शहर का नाम पड़ा, भाग्यनगर. आगे चलकर भागमती ने इस्लाम कबूल कर लिया और वो हैदर बेगम के नाम से जाने जाने लगी. जिसके बाद शहर का नाम भी बदलकर हैदराबाद रख दिया गया. हैदराबाद से हैदर, हैदर से भागमती और भागमती से भाग्यनगर. यही वो इक्वेशन है जिसके दम पर दावा किया जाता है कि हैदराबाद का असली नाम भाग्यनगर था. लेकिन बाकी इक्वेशंस की तरह इस इक्वेशन का हल भी इतना सिंपल नहीं हैं. भागमती की कहानी हैदराबाद की लोकथाओं का हिस्सा तो है, लेकिन इतिहासकार नहीं मानते कि भागमती नाम की कोई रानी थी. क्योंकि न तो ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में उसका नाम दर्ज़ है, ना ही उसके नाम का कोई मकबरा या इमारत बनी है, जैसा कि उस जमाने में राजा रानियों के मरने पर बनाया जाता था. एक दूसरी कहानी जरूर है, जिससे हैदराबाद के इतिहास का कुछ प्रमाण मिलता है.

हैदराबाद का नाम कैसे पड़ा? 

दरअसल 14 वीं शताब्दी के आसपास गोलकोण्डा दुनिया में हीरों का एकमात्र स्त्रोत था. ये हीरे कृष्णा नदी की तलहटी में मिलते थे. और इन हीरों के चक्कर में दुनिया भर से व्यापारी गोलकोण्डा आते थे. गोलकोण्डा ट्रेड और कॉमर्स का हब बन गया था. आने वाली सदियों में दुनिया भर के लोग आकर गोलकोण्डा में बसे और शहर की जनसंख्या लगातार बढ़ती गई. लोगों की संख्या बढ़ी तो बीमारियां भी बढ़ीं. ऐसे में शहर के रइसों ने शहर से बाहर अपने लिए बाग़ बनाने शुरू किए. ये बाग मूसी नदी के पार, मछलीपट्टनम के रास्ते पर बनाए गए थे. मछलीपट्टनम गोलकोण्डा का मुख्य बंदरगाह हुआ करता था. यानी ट्रेड आदि के लिए एकदम मुफीद. जल्द ही बागों का ये इलाका एक नए शहर के रूप में तब्दील होने लगा. जिसे बागनगर या बागों का शहर कहा जाता था. 

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आसफ जाह नवाब मीर उस्मान अली खान बहादुर (तस्वीर: Wikimedia Commons)

गोलकोण्डा की घनी आबादी से तंग आकर 1580 में सुल्तान कुली कुतिब शाह ने अपने लिए एक नई राजधानी बनाने की सोची. तब उन्हें किसी ने सलाह दी कि बागनगर में नई राजधानी बनाई जानी चाहिए. उन्होंने अपने वजीर मीर मोमिन अस्त्राबादी से नए शहर का नक्शा बनाने को कहा और 1591 में जब राजधानी बनकर तैयार हुई, तो उन्होंने इसे नाम दिया, हैदराबाद. अब सवाल ये कि हैदराबाद नाम क्यों दिया?

दरअसल गोलकोण्डा की कुतुबशाही, इस्लाम के शिया पहलू को मानने वाली थी. इसलिए उन्होंने नए शहर का नाम हरजत अली के नाम पर रखा, जिनका एक नाम हैदर भी था. इसलिए नए शहर का नाम हैदराबाद पड़ गया. भागमती का किस्सा हैदराबाद के साथ सालों से जोड़ा गया है. लेकिन इसे प्रमुखता मिली 1920 के दशक में. क्या हुआ था तब?

हैदराबाद को ओस्मानिस्तान बनाने की मांग 

हैदाबाद में निजाम का शासन था. खिलाफत और बाद के दिनों में आजादी की मुहीम तेज हुई तो निजाम के खिलाफ भी विद्रोह बड़ने लगा. और जल्द ही इस संघर्ष ने धार्मिक विद्वेष का रूप ले लिया. गलती निज़ाम की भी थी. उन्होंने सरकार के सभी महत्वपूर्ण पदों पर अपने समुदाय के लोगों को बिठा रक्खा था. जिसके चलते बहुसंख्यक जनता गुस्से में थी. निजाम को हटाकर लोकतंत्र लाने की मांग जोर पकड़ रही थी. जिसके जवाब में निजाम ने कहा कि हैदराबाद एक आदर्श राज्य का उदाहरण है, जहां लोग दो हिस्सों में बंटे हैं. एक ‘हुकूमती कौम’ जो शासन चलाती है, दूसरी आम जनता. 

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हैदराबाद निज़ाम की सेना (तस्वीर: Wikimedia Commons)

1930 के बाद जब पहली बार अलग पाकिस्तान की मांग उठना शुरू हुई, तो उसमें एक प्रस्ताव ये भी था कि हैदराबाद पाकिस्तान का हिस्सा बनेगा. और इसका नाम ओस्मानिस्तान होगा. इसी तरह जिसे आज हम बांग्लादेश कहते हैं, उसे बंगिस्तान का नाम दिया गया. निज़ाम की एक खास प्राइवेट मिलिट्री, जिनका नाम रजाकार था, वो लोगों को डराया धमकाया करते थे. कांग्रेस, लेफ्ट और आर्य समाजियों ने हैदराबाद के पाकिस्तान में विलय का भरपूर विरोध किया. और उसी दौर में हैदराबाद के इतिहास को इस्लामिक देश की धारणा से तोड़ने के लिए भाग्यनगर की कहानी को खूब फैलाया गया. 

ऐसी किताबें और पर्चे छापे गए, जिनमें निजाम के खिलाफ विद्रोह को भाग्यनगर सत्याग्रह का नाम दिया गया. आजादी के बाद निज़ाम ने रजाकारों की मदद से हैदराबाद को भारत से दूर रखने की कोशिश की. 1947 में उन्होंने भारत के साथ एक स्टैंड स्टिल एग्रीमेंट साइन किया. और पीछे से पाकिस्तान से बात करने लगे. सरदार पटेल ने सही समय पर निजाम के इरादों को भांपते हुए सेना को हैदराबाद भेजा. और सितम्बर 1948 में सेना ने ऑपरेशन पोलो के तहत हैदराबाद में एंट्री की, और उसका भारत में विलय करा दिया. 

भाग्यलक्ष्मी का मंदिर 

निजामशाही ख़त्म हुई लेकिन भाग्यनगर की कहानी जिन्दा रही. आजादी के बाद इस कहानी में एक नया चैप्टर जुड़ा. आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार साल 1959 में अचानक चारमीनार के पास एक छोटा सा मंदिर बना दिया गया. ये मंदिर देवी भाग्यलक्ष्मी का था. यहां से हैदराबाद के भाग्यनगर होने की कहानी में एक नया अध्याय जुड़ गया. इस मंदिर को लेकर दावा किया गया कि ये मंदिर हजारों सालों से वहां मौजूद था और देवी भाग्यलक्ष्मी के नाम पर इस शहर का नाम भाग्यनगर हुआ करता था. हालांकि ASI ने एक RTI के जवाब में इस मंदिर की तीन तस्वीरें पेश की, जो 1959, 1980 और 2003 में ली गई थीं. आजादी के बाद ये मंदिर कई बार धार्मिक विद्वेष की चपेट में आया.

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चारमीनार के पास देवी भाग्यलक्ष्मी का मंदिर (तस्वीर: इंडिया टुडे  )

1979 में जब सऊदी अरब में कुछ लोगों ने मक्का की मस्जिद पर कब्ज़ा किया तो नतीजे में पूरे हैदराबाद बंद का ऐलान हो गया. उसी समय दिवाली के दिन कुछ लोगों ने भाग्यलक्ष्मी मंदिर जाने की कोशिश की. उन्हें रोका गया और इसी चक्कर में दंगे शुरू हो गए. इन दंगों में मंदिर को भी काफी नुकसान हुआ. इसके कुछ साल बाद, साल 1983 में गणेश महोत्सव के मौके पर मंदिर में कुछ बैनर लगाए गए. जिसके चलते माहौल तनावपूर्ण हो गया था. और तब से लेकर नाम का ये विवाद लगातार बना हुआ है. 

अंत में जैसा कि जूलियट ने कहा था नाम हैदराबाद हो या भाग्यनगर, चार मीनार और गोलकोंडा फोर्ट की खूबसूरती, हैदराबादी बिरयानी का जायका, और ईरानी चाय की महक. जैसी है वैसी ही रहेगी, चाहे फिर हम इसे किसी भी नाम से बुलाएं. 

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