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मोदी से भिड़ने वाले इलेक्शन कमिश्नर की कहानी!

जेम्स माइकल लिंगदोह साल 2001 से 2004 तक भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रह चुके हैं.

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James Michael Lyngdoh & Modi
जेम्स माइकल लिंगदोह जून 2001 में चीफ इलेक्शन कमिशनर बनाए गए (तस्वीर-Indiatoday)
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कमल
8 फ़रवरी 2023 (अपडेटेड: 6 फ़रवरी 2023, 10:29 PM IST)
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भारत- इस देश के होने में जो नमक है, उसे लोकतंत्र कहते हैं. भारत लोकतंत्र है , ये सिर्फ इस बात से तय नहीं होता कि यहां चुनाव होते हैं. लेकिन ये भी सच है कि निष्पक्ष चुनाव भारत को भारत बनाने में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं. ये जिम्मेदारी होती है इलेक्शन कमीशन के पास. भारतीय इतिहास में एक से एक लेजेंडरी इलेक्शन कमिश्नर हुए. इनमें से एक TN शेषन की कहानी हम आपको तारीख के एक एपिसोड में बता चुके हैं. आज बात करेंगे एक और पूर्व इलेक्शन कमिश्नर की. जिस प्रकार शेषन को नेताओं द्वारा अलसेशन की उपाधि मिली हुई थी. उसी प्रकार इन्हें मिनी शेषन या छोटा शेषन कहकर बुलाया जाता था. हम बात कर रहे हैं. भारत के 12 वें चीफ इलेक्शन कमिश्नर - JM लिंगदोह(James Michael Lyngdoh) की.

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भारत वो पहला देश था जहां आज़ादी मिलते ही सभी लोगों को वोट का अधिकार मिल गया. हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में औरतों को वोट का अधिकार मिला 1956 में. यहां तक कि बहुत से पश्चिमी देशों में भी औरतों को वोट का अधिकार भारत के काफ़ी बाद मिला. भारत में पहले चुनाव 1951 में हुए(1951–52 Indian general election). लेकिन इन चुनावों को लेकर माथापच्ची काफी पहले शुरू हो गई थी. 1947 में. आजादी के तुरंत बाद. सबसे बड़ा सवाल था कि वोटर लिस्ट में कौन जुड़ेगा, कौन नहीं? वैसे तो जवाब ये था कि जो भारत का नागरिक होगा वो जुड़ेगा. लेकिन याद रखिए कि नागरिक होने का अधिकार हमें संविधान देता है. और उसे बनकर पास होने में अभी 3 साल बाकी थे.

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भारत के पहले चीफ इलेक्शन कमिश्नर सुकुमार सेन (तस्वीर-Wikimedia commons)

इसलिए वोटर लिस्ट में रजिस्ट्रेशन के लिए क्राइटीरिया सिंपल रखा गया. आप एक ही जगह पर 6 महीने से रह रहे हों तो वोटर लिस्ट में जुड़ सकते हो. रजिस्ट्रेशन कराना और चुनाव की तैयारी का काम इलेक्शन कमीशन का था.पहले तय हुआ कि हर राज्य के लिए अलग इलेक्शन कमीशन होगा. लेकिन जब वोटर लिस्ट बनी. तो एक नई लड़ाई शुरू हो गई. क़स्बों गांवों में जाति और धर्म के आधार पर लोगों को वोटर लिस्ट में जुड़ने नहीं दिया गया. तब बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर ने सभा के आगे कहा कि ऐसा ना हो, इसके लिए एक सेंट्रल इलेक्शन कमीशन होना चाहिए. इसके बाद 1949 में संविधान के ड्राफ़्ट में संसोधन हुआ और एक सेंट्रल इलेक्शन कमीशन की स्थापना हुई.

भारत के पहले चुनाव 

चुनाव कैसे होंगे, इलेक्शन कमीशन के पास क्या-क्या शक्तियां होंगी, ये सब बातें संविधान के आर्टिकल 324 में दर्ज़ की गई. इसी आर्टिकल के तहत चीफ इलेक्शन कमिश्नर का पद भी नियुक्त किया गया. जिसे हम आगे सुविधा के लिए CEC कहकर बुलाएंगे. 1950 में जब पहली बार इलेक्शन कमीशन(The Election Commission of India) का गठन हुआ, तब इस संस्था में सिर्फ एक कमिश्नर हुआ करता था. 1989 के बाद दो और अडिश्नल कमिश्नर बनाए जाने की शुरुआत हुई. जिसके बाद कमीशन का कोई भी फैसला बहुमत से तय होने लगा. इसके बावजूद इलेक्शन कमीशन में चीफ इलेक्शन कमिशनर का पद सर्वोच्च होता है. क्योंकि इस पद को संवैधानिक सुरक्षा मिली हुई है. आर्टिकल 324 ये तय करता है कि CEC पर बैठे किसी व्यक्ति को हटाने के लिए उस पर महाभियोग चलाया जाएगा. जिसके लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों में दो तिहाई मतों की जरुरत होती है.

इलेक्शन कमीशन के इतिहास में जिस एक शख्स का जिक्र बार बार होता है. वो हैं TN शेषन(T. N. Seshan). जिनके कार्यकाल की चर्चा लगातार होती है. लेकिन इस संस्था के दांत तीखे करने का असली श्रेय जाता है सुकुमार सेन को. भारत के पहले चीफ इलेक्शन कमिश्नर. ये सेन ही थे जिन्होंने एक मजबूत, निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया की नींव रखी थी. तब से लेकर साल 2023 तक भारत में 25 CEC नियुक्त हो चुके हैं. इनमें से एक, JM लिंगदोह का जन्म आज ही के दिन यानी 8 फरवरी 1939 को हुआ था.

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भारत के पहले लोकसभा चुनाव साल 1951 में हुए. चुनाव की प्रक्रिया 25 अक्टूबर 1951 को शुरू हुई और 25 फरवरी 1952 को संपन्न हुई थी (तस्वीर-Indiatoday)

लिंगदोह की पैदाइश शिलॉन्ग मेघालय में हुई थी. 1961 में उनका चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा में हुआ. विभिन्न सरकारी पदों पर काम करते हुए फरवरी 1997 में लिंगदोह कैबिनेट सेक्रेटरी के पद से रिटायर हुए. 1997 में राष्ट्रपति की सिफारिश से उन्हें इलेक्शन कमिश्नर बनाया गया. और 2001 में वो चीफ इलेक्शन कमिश्नर बन गए. लिंगदोह की छवि एक शख्स प्रशासक की थी. वो नियम कायदों का बड़ा ध्यान रखते थे. इसकी बानगी दिखी साल 1997 में जब देवेगौड़ा सरकार में उन्हें कैबिनेट सेक्रेटरी का पद ऑफर हुआ, लेकिन अपने सीनियर कलीग, TSR सुब्रमण्यम के लिए उन्होंने इस ऑफर से इंकार कर दिया. लिंगदोह के बैच मेट रहे IC कुमार बताते हैं कि पुरनिया बिहार का जिला मजिस्ट्रेट रहते हुए उन्होंने जमींदारों पर नकेल कसनी शुरू की थी. जिसके कारण उनका ट्रांसफर करा दिया गया.

उनके एक और कलीग RU सिंह बताते हैं कि लिंगदोह ने एक बार बहस के दौरान अपने सीनियर पर फ़ाइल फेंक दी थी. अपनी सख्त छवि के कारण उनके कम दोस्त थे. और नेताओं से उनकी खास नहीं बनती थी. जैसा कि पहले बताया लिंगदोह 2001 में चीफ इलेक्शन कमिशनर बने. 2002 में उन्होंने पहली बड़ी चुनौती का सामना किया. 

15 साल बाद जम्मू कश्मीर में चुनाव 

साल 2002 में जम्मू कश्मीर में लगभग एक 15 साल बाद चुनाव कराए गए(2002 Jammu and Kashmir Legislative Assembly election). 1987 चुनावों में धांधली के बाद कश्मीर के हालात बिगड़े थे. इसलिए 2002 में जब चुनाव की घोषणा हुई, तो हिंसा और पक्षपात के बिना चुनाव करवाना एक बड़ी चुनौती थी. अलगाववादी नेताओं ने चुनावों के बहिष्कार का ऐलान किया. वहीं आतंकी हमलों का भी लगातार खतरा मंडरा रहा था. ऐसे में कई तरफ से कश्मीर में अंतर्राष्ट्रीय निरिक्षक भेजे जाने की भी मांग उठी. लिंगदोह ने ऐसे एक सवाल का जवाब देते हुए कहा,

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तमाम शकाओं के बीच लिंगदोह कश्मीर में चुनाव कराने में सफल रहे. चाहे वो चुनाव EVM से कराने का सवाल रहा हो, या 30 हजार से ज्यादा इलेक्टोरल रोल्स को उर्दू में ट्रांसलेट करवाना, लिंगदोह के प्रयासों का नतीजा था कि तब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अध्यक्ष के. सुदर्शन ने उन्हें बधाई दी. और उन्हें सच्चा देशभक्त कहा. इसके बाद लिंगदोह के सामने आई गुजरात की चुनौती. और इस बार उनके सामने थे गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और भविष्य में प्रधानमंत्री बनने वाले नरेंद्र मोदी. गुजरात विधानसभा का कार्यकाल 2003 में पूरा होना था. लेकिन गुजरात दंगों के बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी(Narendra Modi) ने वक्त से पहले ही विधानसभा भंग कर दी. मोदी चाहते थे कि अक्टूबर 2002 में विधानसभा चुनाव करवा लिए जाएं. इस दौरान केंद्र में भी उन्हीं की पार्टी की सरकार थी. लेकिन लिंगदोह ने मुख्यमंत्री की इस मांग से इंकार कर दिया.

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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ (तस्वीर-Indiatoday)

उन्होंने अपनी टीम के साथ गुजरात का दौरा कर ये निष्कर्ष निकाला कि वहां अभी हालात ऐसे नहीं थे कि चुनाव कराए जा सकें. लाखों लोग अपने घरों से विस्थापित होकर कैम्पस में रह रहे थे. ऐसे में इन लोगों का वोट न दे पाना एक बड़ा मुद्दा था. साथ ही दंगों के बाद जमीन पर स्थित नाजुक बनी हुई थी. दौरे के बाद अगस्त 2002 में इलेक्शन कमीशन ने एक रिपोर्ट जारी कर कहा कि अभी इलेक्शन कराना ठीक नहीं होगा. जल्द ही इस मुद्दे ने संविधानिक संकट का रूप ले लिया. जिसे लेकर मोदी और बीजेपी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए. मुद्दा था संविधान के दो आर्टिकल्स का, आर्टिकल 174 और 324. आर्टिकल 174 कहता है कि किसी राज्य में विधानसभा भंग होने के 6 महीनों के भीतर चुनाव हो जाने चाहिए. वहीं 324 कहता है कि चुनाव कराने की ताकत इलेक्शन कमीशन के पास है.

मोदी ने लिंगदोह का पूरा नाम क्यों लिया? 

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तब निर्णय इलेक्शन कमीशन पर छोड़ दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने तब निर्णय दिया था कि इलेक्शन विधानसभा भंग होने के 6 महीने भीतर करा लिए जाने चाहिए. सरकार के अनुसार ये वक्त मार्च 2002 से शुरू होना चाहिए था. क्योंकि तब ही विधानसभा की आखिरी बैठक हुई थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 6 महीने का वक्त जुलाई से गिना जाएगा, क्योंकि तब विधानसभा के भंग होने की आधिकारिक घोषणा की गई थी. कोर्ट के भीतर जहां ये बहस चल रही थी. वहीं कोर्ट के बाहर मोदी लिंगदोह पर हमलावर बने हुए थे. आपने ध्यान दिया होगा, कि हमने अभी तक आपको लिंगदोह का पूरा नाम नहीं बताया है. वो इसलिए कि उनके नाम का इस किस्से से एक खास रिश्ता है. 

अगस्त 2002 की बात है. वड़ोदरा में मोदी एक रैली के सामने भाषण देते हुए लगातार इलेक्शन कमीशन पर निशाना साध रहे थे. एक जगह मोदी बोलते हैं,

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मैंने कहा,

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इसके आगे मोदी कहते हैं,

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मैंने जवाब दिया,

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इस भाषण में मोदी ने कई बार लिंगदोह का नाम लिया. और हर बार उन्होंने उनका पूरा नाम कहा, जेम्स माइकल लिंगदोह. तब मोदी के इस बयान पर काफी हो हल्ला मचा था. क्योंकि इससे पहले काफी कम लोग लिंगदोह का पूरा नाम जानते थे. और मोदी के बयान से जाहिर हो रहा था कि वो लिंगदोह के ईसाई होने को लेकर उन पर निशाना साध रहे हैं. लिंगदोह से जब इस बयान पर पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया,

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इस मुद्दे की आंच केंद्र सरकार तक भी पहुंची. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी(Atal Bihari Vajpayee) को बयान जारी करना पड़ा. वाजपेयी ने कहा,

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2002 में हुए जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के दौरान JM लिंगदोह ने ज़बरदस्त चुनाव व्यवस्था कराई (तस्वीर-Wikimedia commons)

लिंगदोह फरवरी 2004 तक चीफ इलेक्शन कमिश्नर के पद पर रहे. 2003 में उन्हें रमन मैग्सेसे अवार्ड से नवाजा गया था. रिटायर होने के बाद साल 2006 में उन्हें लिंगदोह समिति का हेड बनाया गया. इस समिति ने छात्रसंघ चुनावों को लेकर सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी. लिंगदोह समिति से पहले जब छात्रसंघ चुनाव किसी मिनी विधानसभा चुनाव की तर्ज़ पर लड़ा जाता था. कॉलेज के चुनाव के पोस्टर पूरे शहर में चस्पा किए जाते थे. गाड़ियों से प्रचार होता था. लिंगदोह समिति ने इन सभी पर रोक लगाने का सुझाव दिया और इस समिति की सिफारिशें लागू होने के बाद छात्रसंघ चुनावों में कई बदलाव किए गए. मसलन प्रिंट किए हुए पम्पलेट पोस्टर बैनर पर रोक लगाई गयी. प्रचार में लाउड स्पीकर का यूज़ बैन कर दिया गया.

साल 2004 के कई सालों बाद तक लिंगदोह चुनाव सुधारों को लेकर अपनी बात रखते रहे और इस दौरान नेताओं के प्रति अपनी निराशा जाहिर करने से भी पीछे नहीं हटे. फरवरी 2004 में द हिन्दू अखबार को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा

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