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इज़रायल ने सीरिया पर हमला किया!

इज़रायल, सीरिया पर हमले करता क्यों है?

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2 जनवरी 2023 (अपडेटेड: 2 जनवरी 2023, 07:48 PM IST)
इज़रायल, सीरिया पर हमले करता क्यों है? (Representative image: AP/PTI)
इज़रायल, सीरिया पर हमले करता क्यों है? (Representative image: AP/PTI)
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01 जनवरी को सीरिया की राजधानी दमिश्क के इंटरनैशनल एयरपोर्ट पर मिसाइल से हमला हुआ. हमले के कारण एयरपोर्ट को बंद करना पड़ा. पहले से तय उड़ानों को रद्द कर दिया गया. एक हमला दमिश्क के दक्षिण में सेना के एक बेस पर भी हुआ. इसमें दो सीरियाई सैनिकों की मौत हो गई. मीडिया रपटों के मुताबिक, ये हमले 01 और 02 जनवरी की दरम्यानी रात को हुए. सीरियन आर्मी ने इस हमले के लिए इजरायल को ज़िम्मेदार ठहराया है. अभी तक इजरायल की तरफ़ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है. हालांकि, इज़रायल, सीरिया में इस तरह के हमले पहले भी करता रहा है.

आइए समझते हैं,

इज़रायल सीरिया पर हमले करता क्यों है?

और, दोनों देशों के संबंधों का इतिहास क्या रहा है?

पहले, संबंधों का इतिहास जान लेते हैं.

साल 1947 की बात है. UN में ब्रिटेन के अधीन आने वाले फिलिस्तीन के बंटवारे की बात चल रही थी. पेशकश रखी गई कि आधा फिलिस्तीन यहूदियों और आधा फिलिस्तीन अरबों को दिया जाए. सीरिया ने इस प्रस्ताव का विरोध किया. 1947 में जब ब्रिटेन की हुकूमत खत्म हुई तब उस जगह पर यहूदियों ने कब्ज़ा कर लिया. 14 मई 1948 को यहूदियों के लिए एक अलग मुल्क़ की स्थापना हुई. नाम रखा गया, इज़रायल. 

इज़रायल की स्थापना के अगले ही दिन पांच अरब देशों ने मिलकर उस पर हमला बोल दिया. हमला करने वाले देशों में सीरिया भी था. इस लड़ाई को इतिहास में पहले अरब-इज़रायल वॉर के तौर पर जाना जाता है. इज़रायल ने न केवल ये युद्ध जीता बल्कि उसने पार्टिशन प्लान में तय ज़मीन से ज़्यादा हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया. कब्ज़े के बाद भी छिटपुट झडपें चलती रहीं. फिर जुलाई 1949 में दोनों पक्षों के बीच युद्धविराम पर समझौता हुआ. 

लेकिन ये समझौता सिर्फ नाम भर का था. अंदर ही अंदर दोनों पक्ष एक-दूसरे को बर्बाद करने के मंसूबे रच रहे थे. युद्धविराम के बाद भी अरब देश इज़रायल के प्रति आक्रामक बने रहे. यही हाल सीरिया का भी था. सीरिया ने इज़रायल को कभी मान्यता नहीं दी. एक दूसरे को तबाह करने की चिंगारी लंबे समय से दबी हुई थी. लेकिन ये चिंगारी 1967 में फूट गई. इज़रायल और अरब देश जिसमें सीरिया, मिस्र और जॉर्डन शामिल थे. इनके बीच भयंकर जंग हुई. इस जंग में इज़रायल ने सीरिया के हिस्से में जाकर गोलन हाइट्स पर कब्ज़ा कर लिया. अरब देशों और इज़रायल के बीच चली इस जंग को इतिहास में ‘सिक्स डे वॉर’ नाम से जाना जाता है. इस जंग में भी इज़रायल ने अरब देशों को मात दी. 

सिक्स डे वॉर के दौरान मैदान पर सैनिक (AFP)

1973 में सीरिया ने गोलन हाइट्स की वापसी के मंसूबे से इज़रायल पर फिर हमला कर दिया. इस हमले में उसका साथ मिस्र ने दिया था. लेकिन सीरिया इसमें फिर विफल रहा. पूरी दुनिया ये खेल देख रही थी. अमेरिका ने अगले ही साल माने 1974 में सीरिया और इज़रायल के बीच एक शांति समझौता करवाया. UN सिक्योरिटी काउंसिल ने गोलन हाइट्स पर कब्ज़ा करने के लिए इज़रायल की आलोचना की. लेकिन इज़रायल अपनी अड़ी पर अड़ा रहा. 

फिर 1982 में इज़रायल ने लेबनान पर हमला किया. तब सीरिया ने लेबनान की मदद करने की ठानी. इज़रायल से उसकी खुन्नस तो पहले ही चल रही थी. सीरिया ने इज़रायल से लड़ने के लिए हेज़बोल्लाह का सपोर्ट किया. उसने इस युद्ध में इज़रायल के ख़िलाफ़ अपनी सेना उतार डाली. लेकिन एक बार फिर से इज़रायल ने सीरिया को पटक दिया.
1990 के दशक में दोनों देशों के बीच शांति की कई कोशिशें हुईं. लेकिन बातचीत बीच में टूटती रही. जून 2007 में इज़रायल ने सीरिया के साथ समझौते का एक ऑफर रखा. उस समय सीरिया के राष्ट्रपति थे बशर अल-असद. इज़रायल ने कहा अगर सीरिया, ईरान, हेज़बोल्लाह और हमास से रिश्ता तोड़ देता है तो हम उसकी ज़मीन लौटा देंगे. लेकिन सीरिया ने इससे इनकार कर दिया.

इसी साल 6 सितंबर को इज़रायल ने सीरिया के परमाणु रिएक्टर पर हमला कर दिया. और उसे नष्ट कर दिया. सीरिया, उत्तर कोरिया की मदद से ये परमाणु रिएक्टर बना रहा था. लेकिन परमाणु रिएक्टर वाली बात सीरिया ने नकार दी. उसने कहा कि हमने कभी कोई हथियार खूफ़िया तौर पर नहीं बनाया है.  2010 आते-आते दोनों देश के बीच हालात और बिगड़ चुके थे. सीरिया के नेता इज़रायल पर हमलावर थे. सीरिया के विदेशमंत्री ने धमकी दी कि अगर जंग हुई तो इज़रायल तबाह हो जाएगा. इसपर इज़रायल भड़का. उसने कहा कि अगर जंग हुई तो असद परिवार को सिर छिपाने की जगह नहीं मिलेगी. इन्हीं बयानबाजियों के बीच मिडिल-ईस्ट में अरब स्प्रिंग की शुरुआत हुई. साल 2011 में. कई देशों में सरकारें बदली. तानाशाहों की छुट्टी हुई. सीरिया भी इसकी ज़द में आया. राष्ट्रपति असद का विरोध हुआ, असद ने आलोचकों को सुनने की बजाय बलप्रयोग का रास्ता चुना. नतीजा ये हुआ कि सीरिया सिविल वॉर की भेंट चढ़ गया. और ऐसी भेंट चढ़ा कि वहां सिविल वॉर आज तक खत्म नहीं हुई है. 

अरब स्प्रिंग के दौरान इजिप्ट में प्रोटेस्ट करती एक महिला 

ये रहा दोनों देशों के रिश्तों का इतिहास. अब हाल की घटना पर थोड़ा नज़र डालते हैं. 

नए साल के पहले ही दिन रात के 2 बजे सीरिया के एयरपोर्ट पर मिसाइली हमले हुए.सीरियन आर्मी ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि हमले इज़रायल की तिबरियास झील की तरफ से हुए थे. हवाई-अड्डे को कुछ देर के लिए बंद किया गया था, लेकिन अगली सुबह 9 बजे उसे वापस खोल दिया गया. 

इस हमले पर इज़रायल ने आधिकारिक तौर से कोई रिएक्शन नहीं दिया है. पिछले साल 10 जून को भी इज़रायल ने सीरिया के इसी एयरपोर्ट पर कई हवाई हमले किए थे. इस हमले में एयरपोर्ट के रनवे सहित बुनियादी ढांचे को काफी नुकसान पहुंचा था. हालांकि, मरम्मत करने के बाद इसे दो फिर से खोल दिया गया था. ऐसे हमले इज़रायल, सीरिया पर करते रहता है. कभी वो हमले की ज़िम्मेदारी लेता है तो कभी इसपर चुप्पी साध लेता है.

ऐसे में एक सवाल ये उठता है कि इज़रायल, सीरिया के साथ आखिर ये सुलूक करता क्यों है?
पहली वजह है कि सीरिया का आतंकी समूहों को शय देना.
इज़रायल, सीरिया पर आरोप लगाता है कि सीरिया ऐसे आतंकी समूहों को शरण देता है जो इज़रायल को नेस्तनाबूद करने की मंशा रखते हैं. 

अगली वजह ईरान से जुडी हुई है. इज़रायल कहता है कि ईरान के रेवॉल्युशनरी गार्ड्स और हेज़बोल्लाह का सीरिया में अपना बेस है. ईरान और इज़रायल की दुश्मनी तो जगजाहिर है ही. ये भी हमले की एक बड़ी वजह है. हाल ही में नेतान्याहू की लीडरशिप में इज़रायल की नई सरकार का गठन हुआ है. इसे इज़रायल के इतिहास की सबसे कट्टर सरकार माना जा रहा है. जानकारों का कहना है कि फिलिस्तीन समेत अरब मुल्कों के साथ इज़रायल की तकरार इस सरकार में बढ़ सकती हैं. आगे जो भी होगा उसकी अपडेट आपको लल्लनटॉप पर मिलती रहेगी.

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