'सही पते पर न पहुंचने वाली चिट्ठियां लिखना जरूरी होता है'
संडे वाली चिट्ठी, सड़क किनारे बैठे 'पागलों' के नाम.
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फोटो क्रेडिट: AP, Symbolic image
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दिव्य प्रकाश दुबे
पागल कौन है? सड़क किनारे बढ़ी दाढ़ी, मैले कुचैले कपड़े पहने बैठे लोग. या बड़े दफ्तरों में कांय-कांय चिल्लाते लोग. जवाब की हर कोई अपनी सहूलियत के हिसाब से व्याख्या कर सकता है. हम जो कर सकते हैं वो ये कि आपको संडे वाली चिट्ठी पढ़ा सकते हैं. एक पागल के नाम लिखी चिट्ठी. अब क्योंकि ये संडे वाली चिट्ठी है तो दिव्य प्रकाश दुबे ने ही लिखी है. ये लाइन लिखना एक लाइन घेरने जैसा है. पर क्योंकि दिव्य ने लिखी है तो ये बताना भी बनता है. खैर, आप पढ़िए संडे वाली चिट्ठी.
सुनो यार पागल आदमी,
तुमसे ही बात कर रहा हूं. तुम जो सड़क के किनारे फटे कपड़े, बढ़ी हुई दाढ़ी, उलझे बालों के साथ हर मौसम में पड़े रहते हो. ज़ाहिर है तुम ऐसे पैदा तो नहीं हुए होगे. मुझे मालूम है ये चिट्ठी तुम तक कभी नहीं पहुंचेगी. इसीलिए वो सारी चिट्ठियां लिखना सबसे ज़रूरी होता है, जो कभी अपने सही पते पर नहीं पहुंचती.
रोज़ ऑफ़िस से जब लौट रहा होता हूं तो तुम पर ऐसे हो नज़र जाती है जैसे दांत टूटने के बाद की ख़ाली जगह में जीभ जाती है. जिस दिन नहीं दिखते तो चिंता होती है कि कहीं मर तो नहीं गए.
जब मैं लोगों को सुसाइड करते हुए देखता हूं तो लगता है कि साला तुमसे जीना सीखना चाहिए, घिसट घिसट के ही सही. मैं समझ नहीं पाता तुम खाते क्या हो. तुम्हारे रिश्तेदार कौन हैं. बरसात में तुम्हारे पास बरसाती कहां से आ जाती है. तुम्हें भूख लगती है तो क्या महसूस होता है. तुम्हें ग़ुस्सा आता है तो क्या सोचते हो.
कई बार तुम ज़ोर ज़ोर से मां बहन की गाली देखते हुए देखता हूं तो लगता है कि मां और बहन के रिश्तों की जड़ हमारे कितने अंदर तक है कि अपने नाम पते का ठिकाना न होने के बाद भी आदमी के अंदर मां बहन की गाली बच जाती है. मुझे कभी कभी बहुत जलन होती है तुमसे. मैं भी इस दुनिया से बेचैन होकर ज़ोर ज़ोर से चिल्लाकर गाली देना चाहता हूं लेकिन थोड़ा बहुत पढ़ लिख गया हूं न तो दुनिया की सही ग़लत की लाइन से डरता हूं.यार एक दिन के लिए तुम मेरी ज़िंदगी ले लो. मैं एक दिन के लिए तुम्हारे जैसे पागल हो जाना चाहता हूं ताकि मैं इस दुनिया को भूलने के लिए कहीं पहाड़ या समंदर न जाऊं. यहीं बीच शहर में सबसे ज़्यादा भीड़ भाड़ वाली रोड पर अपनी नयी दुनिया बना लूं और इस दुनिया पर जी भर थूकूं. लोग मुझे पगला बोलकर पत्थर मार मार कर अधमरा छोड़ दें. तब जाकर शायद मुझे शांति मिले.
रोज़ थोड़ा थोड़ा पागल होते चले जाना अब मुझसे झेला नहीं जा रहा.
दिव्य प्रकाश दुबे
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