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पाक-अफ़गान सीमा विवाद की पूरी कहानी क्या है?

क्या तालिबान पाकिस्तान के रिश्तों में खटास आ रही है?

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23 दिसंबर 2021 (अपडेटेड: 23 दिसंबर 2021, 01:26 PM IST)
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मेक्सिको में एक लोकोक्ति चलती है. Love is blind - but not the neighbors. यानी, प्यार अंधा हो सकता है, लेकिन पड़ोसी नहीं. आज की कहानी दो पड़ोसियों की है. पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान. बड़े-बुजुर्ग कहते आए हैं कि पड़ोसी के घर में आग लगी हो तो अपने बचाव की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए. लेकिन पाकिस्तान इस सीख को लगातार नज़रअंदाज करता रहा है. वो अफ़ग़ानिस्तान के घरेलू मसलों में टांग अड़ाता रहा. उस पर गर्व करता रहा. अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सरकार आ चुकी है. तालिबान ने पाकिस्तान के घरेलू मसलों में टांग अड़ाने की शुरुआत कर दी है. तालिबान ने पाकिस्तानी सेना को बॉर्डर पर फ़ेंस लगाने से रोक दिया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों तरफ़ से मोर्टार भी दागे गए हैं. पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच जारी सीमा विवाद की पूरी कहानी क्या है? क्या तालिबान, पाकिस्तान के हाथ से निकल चुका है? और, इस विवाद का असर क्या होगा? सब हले इतिहास की बात. 19वीं सदी के शुरुआती सालों की बात है. ब्रिटिश और रूसी साम्राज्य में खींचतान चल रही थी. अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़े को लेकर. उस समय तक भारत का विभाजन नहीं हुआ था. अविभाजित भारत पर ब्रिटेन का नियंत्रण था. अफ़ग़ानिस्तान बिल्कुल बीच में फंसा हुआ था. ब्रिटेन और रूस, दोनों को लगता था कि अगर अफ़ग़ानिस्तान हाथ से निकला तो उनका साम्राज्य ख़तरे में पड़ जाएगा. इससे बचने के लिए 1839 में ब्रिटेन ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया. ब्रिटेन को शुरुआती बढ़त भी मिली. लेकिन कुछ ही समय में पता चल चुका था कि उन्होंने ग़लत बटन दबा दिया है. वे बोरिया-बिस्तर बांधकर निकलने लगे. अफ़ग़ानों ने रास्ते में ही उन्हें गाजर-मूली की तरह काट दिया. साढ़े सोलह हज़ार लोगों में से कुछ सौ ही ज़िंदा बच पाए. ब्रिटेन तीन दशक बाद वापस लौटा. इस बार वो पूरी तैयारी के साथ आया था. दूसरे एंग्लो-अफ़ग़ान वॉर में ब्रिटेन की जीत हुई. उसने अफ़ग़ानिस्तान में कठपुतली सरकार बिठा दी. अब्दुर रहमान ख़ान अफ़ग़ानिस्तान का नया शासक बना. अफ़ग़ानिस्तान पर नियंत्रण के बावजूद ब्रिटेन का डर खत्म नहीं हुआ था. वो भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी सत्ता की सुरक्षा को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं था. इसलिए, उसने एक औपचारिक बाउंड्री खींचने का प्लान बनाया. 12 नवंबर 1893 के दिन समझौता हुआ. अब्दुर रहमान ख़ान और ब्रिटिश भारत के फ़ॉरेन सेक्रेटरी सर हेनरी मोर्टिमेर डूरंड के बीच. सर डूरंड के नाम पर इस सीमा रेखा को डूरंड लाइन के नाम से जाना जाता है. जिस समय समझौता हुआ था, उस समय भारत और पाकिस्तान एक ही थे. इसलिए, 1893 के समझौते ने भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच सीमा का निर्धारण किया था. अफ़ग़ानिस्तान 1919 के साल में ब्रिटेन के नियंत्रण से निकल गया. 1947 में भारत को आज़ादी मिली. आज़ादी विभाजन के साथ आई थी. पाकिस्तान नाम का नया मुल्क़ बना. इसके बाद डूरंड लाइन भारत की बजाय पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच की सीमा बन गई. डूरंड लाइन के आस-पास के इलाकों में दो जाति समूह रहते हैं. पंजाबी और पश्तून. डूरंड लाइन से पहले पश्तून पंजाबियों के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए लड़ रहे थे. जैसे ही लाइन खींची गई, पश्तून दो हिस्सों में बंट गए. आधे अफ़ग़ानिस्तान वाले हिस्से में रह गए. जो बचे वो पहले ब्रिटिश भारत और बाद में पाकिस्तान के अधीन आ गए. इससे उनकी नाराज़गी बढ़ने लगी. 1947 के बाद से अफ़ग़ानिस्तान ने डूरंड लाइन को कभी मान्यता नहीं दी. उसका कहना है कि ये दो भाईयों के बीच खड़ी नफ़रत की एक दीवार है. डूरंड समझौते में ये बात दर्ज़ थी कि भारत सरकार अफ़ग़ानिस्तान के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी. 1947 के बाद ये समझौता पाकिस्तान के नाम पर शिफ़्ट हो गया. पाकिस्तान ने इसका कभी पालन नहीं किया. सोवियत युद्ध के दौरान उसने मुजाहिदीनों को अपने यहां पनाह दी. फिर तालिबान को खड़ा किया. और, 1996 में काबुल की गद्दी पर पहुंचने में पूरी मदद की. एक तरह से पाकिस्तान तालिबान का रहनुमा है. इस रिश्ते के बावजूद तालिबान डूरंड लाइन को मान्यता देने के लिए तैयार नहीं है. उसका कहना है कि मुस्लिमों के बीच कोई सीमा नहीं होनी चाहिए. अफ़ग़ानिस्तान में जो भी सरकार आती है, वो पाकिस्तान के पश्तूनों को अलग स्टेट की मांग के लिए उकसाती रहती है. दोनों पक्ष एक-दूसरे के इलाके में आतंकी हमले कराने का आरोप लगाते रहते हैं. 2017 में जब डूरंड लाइन के आस-पास आतंकी घटनाएं बढ़ने लगीं, तब पाकिस्तान ने सीमाबंदी करने का फ़ैसला किया. डूरंड लाइन की लंबाई लगभग 27 सौ किलोमीटर है. पाकिस्तान ने 13 फ़ुट ऊंची फ़ेंसिंग लगाने की योजना बनाई. बॉर्डर पर एक हज़ार से अधिक वॉचटावर्स लगाए जाने थे. इसके अलावा, सर्विलांस कैमरों और इंफ़्रारेड डिटेक्टर्स लगाने का प्लान भी था. अगस्त 2021 की शुरुआत में अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की जीत तय हो चुकी थी. तालिबान अफ़ग़ान प्रांतों को एक-एक कर क़ब्ज़े में कर रहा था. उसी दौरान पाकिस्तान सेना का एक बयान आया. न्यूज़ एजेंसी एपी की चार अगस्त की रिपोर्ट है. पाकिस्तान आर्मी के एक सीनियर अधिकारी कर्नल रिज़वान नाज़िर ने बताया कि सीमा पर बाड़ लगाने का काम लगभग पूरा हो चुका है. सिर्फ़ दस फीसदी काम बचा है. वो भी ज़ल्दी ही पूरा कर लिया जाएगा. चार अगस्त को ये बयान आया. 15 अगस्त को तालिबान ने काबुल पर क़ब्ज़ा कर लिया. राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी पहले ही देश छोड़कर भाग चुके थे. तालिबान को कोई चुनौती नहीं मिली. अमेरिकी सैनिकों के निकलने के हफ़्ते भर बाद तालिबान ने अंतरिम सरकार का ऐलान कर दिया. तालिबान के प्रवक्ता ज़बीउल्लाह मुजाहिद ने डूरंड लाइन पर बयान जारी किया. कहा कि फ़ेंसिंग से लोग और परिवार बंट गए हैं. हम सीमा पर शांतिपूर्ण माहौल बनाना चाहते हैं. इसलिए, बैरियर्स की कोई ज़रूरत नहीं है. तालिबान फ़ेंसिंग का विरोध करेगा. ये वो तालिबान था, जिसकी तारीफ़ में इमरान ख़ान कसीदे गढ़ रहे थे. आज भी उनके सुर बदले नहीं हैं. लेकिन तालिबान ने आंख दिखाना शुरू कर दिया है. आज हम ये सब क्यों सुना रहे हैं? पाकिस्तान आर्मी ने फ़ेंसिंग का बचा काम पूरा करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें इस बार ज़बरदस्त विरोध का सामना करना पड़ रहा है. न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, तालिबान के लड़ाकों ने पाक सेना को तार लगाने से रोक दिया. ये घटना नांगरहार के पास की है. वहां पर आस-पास जो फ़ेंसिंग हो रखी थी, उन्होंने उसे भी उखाड़ दिया. इसके अलावा, वे फ़ेंसिंग का सारा सामान ज़ब्त करके अपने साथ ले गए. एक तालिबानी अधिकारी ने पाक सेना को धमकी भी दी. कहा कि अगर अगली बार तार लगाया तो युद्ध होगा. दोनों तरफ़ से मोर्टार दागे जाने की ख़बर भी आ रही है. पाकिस्तान और अफ़ग़ान मिलिटरी के हेलिकॉप्टर्स  इलाके में गश्त लगा रहे हैं. अफ़ग़ानिस्तान की डिफ़ेंस मिनिस्ट्री ने कहा कि पाक आर्मी अवैध काम कर रही थी. हालांकि, उसने पूरी जानकारी नहीं दी. बस इतना ही बताया कि हालात सामान्य हैं. पाक आर्मी ने अभी तक इस घटना पर कोई बयान जारी नहीं किया है. तालिबान और पाकिस्तान के बीच सीमा विवाद उस दिन हुआ, जब इस्लामाबाद में अफ़ग़ान संकट पर ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉपरेशन (OIC) की बैठक चल रही थी. पाकिस्तान हर वैश्विक मंच पर तालिबान को सपोर्ट दे रहा है. एक तरह से उसने अन-ऑफ़िशियल प्रवक्ता की ज़िम्मेदारी उठा रखी है. इसके बावजूद तालिबान डूरंड लाइन के मसले पर पीछे हटने को तैयार नहीं है. इससे ज़ाहिर होता है कि तालिबान डूरंड लाइन को लेकर कितना गंभीर है. उसने साफ़ कर दिया है कि वो डूरंड लाइन को नहीं मानेगा. तालिबान में पश्तून समुदाय की बहुतायत है. वे किसी भी क़ीमत पर बंटवारा नहीं चाहेंगे. अब गेंद पाकिस्तान के पाले में है. तालिबान से कट्टी या क्रॉस-बॉर्डर आतंकवाद. दो विकल्प हैं. दोधारी तलवार. पाकिस्तान के लिए इस पर चलना खासा मुश्किल होने वाला है.

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