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कांग्रेस को जिताने के बाद भी डीके शिवकुमार CM क्यों नहीं बन पाए? वजह उनकी कहानी में छिपी है

अगस्त 2017 से लेकर हाल में संपन्न हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव तक, कई मौकों पर डीके शिवकुमार ने कांग्रेस की नैया पार लगाई है.

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Story of DK Shivakumar
डीके शिवकुमार आठ बार विधायक चुने जा चुके हैं. (फोटो- पीटीआई)
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साकेत आनंद
18 मई 2023 (अपडेटेड: 18 मई 2023, 04:38 PM IST)
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अगस्त 2017. कांग्रेस के दिग्गज नेता अहमद पटेल गुजरात से राज्यसभा का चुनाव लड़ रहे थे. उन्हें राज्यसभा भेजने से रोकने के लिए अमित शाह ने पूरा जोर लगा दिया था. विधायकों की हॉर्स ट्रेडिंग शुरू हो चुकी थी. चुनाव से पहले कई कांग्रेस विधायकों ने पार्टी छोड़ दी थी. कई भाजपा की तरफ हो गए. बाकी विधायकों को सुरक्षित जगह पर पहुंचाना था. तो हुआ ये कि 44 विधायकों को गांधीनगर से करीब 1500 किलोमीटर दूर बेंगलुरु के ईगलटन रिजॉर्ट में भेजा गया. राज्यसभा चुनाव होने तक विधायकों को इसी रिजॉर्ट में रखा गया. इस रिजॉर्ट के मालिक हैं, डोड्डालाहल्ली केम्पेगौड़ा शिवकुमार. यानी डीके शिवकुमार.

इसी डीके शिवकुमार की चर्चा कर्नाटक चुनाव से पहले और नतीजों के बाद बार-बार हुई. वही शिवकुमार, जो चुनाव के पहले से ही मुख्यमंत्री बनने का हसरत पाले थे, लेकिन अब बनते-बनते रह गए. वही शिवकुमार, जिन्होंने चुनाव नतीजों के बाद बेंगलुरु में मीडिया से कहा था कि वे पार्टी के अध्यक्ष हैं और उनकी अध्यक्षता में ही कांग्रेस राज्य में 135 सीटें जीती है. और वही शिवकुमार, जिन्होंने आखिर में कांग्रेस अध्यक्ष को दिल्ली में कह दिया कि सिद्दारमैया को दोबारा मौका क्यों दिया जाए, 2019 में गठबंधन सरकार सिद्दा की वजह से गिरी. डीके ने ये भी दावा किया कि 2019 में हुई टूट के बाद उन्होंने खुद पार्टी को बनाया है.

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चुनाव के बाद पार्टी आलाकमान के बुलाने पर दिल्ली पहुंचे डीके शिवकुमार (फोटो- पीटीआई)

डीके शिवकुमार के कई किरदार हैं. जब हम कहें कि भारत के सबसे अमीर नेताओं का नाम बताएं तो डीके का नाम आप जरूर लेंगे. या कहें कि कर्नाटक में कांग्रेस का 'संकटमोचक' कौन है या कर्नाटक में वोक्कलिगा समुदाय से कांग्रेस का सबसे बड़ा नेता कौन है तो डीके का नाम जरूर लेंगे.

शिवकुमार की पूरी कहानी

15 मई 1962 को कनकपुरा में शिवकुमार का जन्म हुआ. शुरुआती पढ़ाई-लिखाई कनकपुरा में ही हुई. कॉलेज की पढ़ाई के लिए बेंगलुरु गए. शिवकुमार की मां गौरम्मा उन्हें इंजीनियर या सरकारी बाबू बनाना चाहती थीं, लेकिन बेटे का मन कहीं और लग गया. आरसी कॉलेज में पढ़ने के दौरान ही यूथ कांग्रेस से जुड़ गए. साल 1983 से 85 तक कर्नाटक यूथ कांग्रेस के महासचिव पद पर रहे. डीके शिवकुमार और उनके सांसद भाई डीके सुरेश राज्य में "डीके ब्रदर्स" के नाम से मशहूर हैं. डीके सुरेश बेंगलुरु ग्रामीण से लोकसभा सांसद हैं.

जानकार बताते हैं कि डीके शुरुआत से ही काफी अच्छे ऑर्गेनाइजर रहे हैं. जब भी कांग्रेस के भीतर कोई संकट आया, उसे संभालने के लिए डीके को आगे किया गया. 1989 में, डीके शिवकुमार सथानूर सीट से चुनाव जीते. तब उनकी उम्र सिर्फ 27 साल थी. उनके चमकते सियासी करियर की यह शुरुआत थी. बाद में एस बंगारप्पा की सरकार में मंत्री भी बनाए गए.

इस बीच शिवकुमार का राजनीतिक रसूख खूब बढ़ा और संपत्ति भी. कर्नाटक के वरिष्ठ पत्रकार एनएस शंकर के मुताबिक, डीके शिवकुमार किसी एक धंधे में नहीं हैं. जब वे ज्यादा चर्चित नहीं थे तब ग्रेनाइट माइनिंग के बिजनेस में घुसे थे. 90 के दशक में इसी से खूब पैसा बनाया. बाद में अलग-अलग बिजनेस में घुसे. अभी उनका रियल एस्टेट का बहुत बड़ा कारोबार है. कई सारे डेवलपर्स के साथ उनका टाई-अप है. बेंगलुरु के आसपास खूब प्रॉपर्टी बनाई है. अपना सुपरमार्केट बनाया हुआ है. इसके अलावा माइनिंग, ट्रांसपोर्ट, एजुकेशन के बिजनेस से भी जुडे़ हैं. लेकिन ज्यादातर संपत्ति रियल एस्टेट से ही बनाई है.

एक तरफ शिवकुमार संपत्ति बना रहे थे, दूसरी तरफ अपने क्षेत्र में कांग्रेस को मजबूत करने में जुटे थे. उनका सियासी कद तब और बढ़ गया जब वो 1999 में बनी एसएम कृष्णा सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर बन गए. उन्हें शहरी विकास जैसा जरूरी मंत्रालय मिला. एसएम कृष्णा भी वोक्कलिगा समुदाय से आते हैं. वो शिवकुमार को 'आंखों का तारा' मानते थे. जानकारों की मानें तो शिवकुमार ने इस कार्यकाल के दौरान रियल एस्टेट कारोबार से खूब संपत्ति बनाई. 2017 में कृष्णा बीजेपी में शामिल हो गए. इसके बावजूद उनका रिश्ता नहीं टूटा. बल्कि मजबूत हुआ. 2021 में शिवकुमार की बेटी एश्वर्या की शादी एसएम कृष्णा के पोते से हुई.

एसएम कृष्णा सरकार के दौरान ही शिवकुमार की पार्टी के भीतर एक मजबूत छवि बनी. साल 2002 की घटना है. एक और 'रिजॉर्ट पॉलिटिक्स' की. जब महाराष्ट्र में विलासराव देशमुख की सरकार को अविश्ववास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा. विधायकों को सुरक्षित रखने की कवायद शुरू हुई. पहली बार डीके शिवकुमार से संपर्क किया गया. उन्होंने सभी कांग्रेस विधायकों को अपने बेंगलुरु रिजॉर्ट में ठहराया. करीब एक हफ्ते तक. इसके बाद विधायकों को टूटने से रोका गया और देशमुख की सरकार भी बची.

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भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी के साथ डीके शिवकुमार (फोटो- पीटीआई)

महाराष्ट्र में सरकार बचाने में योगदान ने उन्हें गांधी परिवार की नजरों में ले आया. वो कर्नाटक में कांग्रेस के 'ट्रबलशूटर' कहलाने लगे. कद बढ़ने के बाद 2009 में शिवकुमार को कर्नाटक कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया. हालांकि पार्टी के भीतर एक धड़ा उनके काम के स्टाइल को पसंद नहीं करता है. वही धड़ा अब भी सिद्दारमैया को मुख्यमंत्री बनाने का समर्थन कर रहा है. कई लोग मानते हैं कि डीके पॉलिटिकल मैनेजमेंट में माहिर आदमी हैं. संकट की घड़ी में काम आते हैं. लेकिन कुछ इलाकों को छोड़ दिया जाए तो अपने समुदाय से ही वोट जुटाना शिवकुमार के बस की बात नहीं है.

वोक्कलिगा समुदाय पर वर्चस्व और देवेगौड़ा से अदावत

इस बात में आज कोई विवाद नहीं है कि कर्नाटक में वोक्कलिगा समाज का एकमुश्त वोट जनता दल सेक्यूलर यानी JDS के हिस्से जाता है. इसकी एक मात्र वजह हैं एचडी देवगौड़ा. उन्होंने दशकों की मेहनत से समुदाय के लोगों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई. राज्य में इनकी आबादी 12 से 15 फीसदी तक बताई जाती है. दक्षिण कर्नाटक वोक्कलिगा समुदाय का गढ़ है. इसलिए डीके शिवकुमार लंबे समय से इस समुदाय पर JDS के बने वर्चस्व को तोड़ने की कोशिश में हैं.

डीके शिवकुमार और देवेगौड़ा परिवार के बीच पहली सीधी चुनावी टक्कर 1999 में हुई. जब उन्होंने एचडी कुमारस्वामी को सथनूर से हराया था. उनके और देवेगौड़ा के बीच दशकों तक चलने वाली सियासी रंजिश की नींव, इस चुनाव ने रख दी थी. रंजिश, जिसके केंद्र में थे बेंगलुरु और वोक्कालिगा. यह एचडी कुमारस्वामी की लगातार तीसरी हार थी. इससे पहले दो चुनाव वो हार चुके थे. 1999 में कुमारस्वामी के चुनाव हारने के बाद दोनों गुटों की रंजिश अपने चरम पर थी. डीके शिवकुमार इस वक्त देवेगौड़ा पर भारी पड़ते दिखाई दे रहे थे. वजह थी उनकी बढ़ती सियासी हैसियत.

दूसरी टक्कर हुई 2004 में. इस साल कर्नाटक विधानसभा के चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ-साथ हो रहे थे. देवेगौड़ा फिर से, दो सीट पर लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे- हासन और कनकपुरा. एसएम कृष्णा ने शिवकुमार के साथ मिलकर कनकपुरा सीट पर देवेगौड़ा का गेम सेट कर दिया. कृष्णा के कहने पर यहां से तेजस्विनी गौड़ा को टिकट दिया गया. राजनीति में आने से पहले वो कन्नड़ न्यूज़ चैनल उदया टीवी में एंकर हुआ करती थीं.

तेजस्विनी ने कनकपुरा सीट से बड़ा उलटफेर कर दिया. वो चुनाव में अव्वल रहीं. बीजेपी के रामचंद्र गौड़ा दूसरे नंबर पर रहे. और देवेगौड़ा को तीसरे नंबर पर खिसकना पड़ा. तब देवेगौड़ा पूर्व-प्रधानमंत्री थे और ये एक शर्मनाक हार थी. हालांकि वे हासन से जीत गए थे. लेकिन ये सियासत है. यहां कोई दोस्ती या दुश्मनी स्थाई नहीं होती. इसका उदाहरण साल 2018 के चुनाव के बाद दिखा था.

विधानसभा चुनाव के बाद बीएस येदियुरप्पा ने 17 मई 2018 को कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. बीजेपी के पास 104 सीटें थीं जबकि बहुमत का आंकड़ा 112 था. पार्टी बहुमत से दूर थी और इसे जुटाने की तमाम कोशिशों के बाद भी नहीं जुटा सकी. कांग्रेस और JDS के विधायकों को खींचने की कोशिश हुई, लेकिन सफलता नहीं मिली. तब भी कांग्रेस की तरफ से विधायकों की बाड़ेबंदी का पूरा इंतजाम डीके शिवकुमार ने ही किया.

फिर से डीके का ईगलटन रिजॉर्ट कांग्रेस के लिए लकी साबित हुआ. कांग्रेस के सभी विधायकों को यहीं रखा गया था. कांग्रेस में कोई टूट नहीं हुई और येदियुरप्पा को ढाई दिन में बहुमत परीक्षण से पहले इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा. बाद की कहानी सबको पता है. एक-दूसरे के विरोधी रहे डीके और कुमारस्वामी विधानसभा में हाथों में हाथ डाल जश्न मनाते दिखे. कांग्रेस-JDS की सरकार बन गई.

मुख्यमंत्री बनने की ख्वाहिश

2013 में राज्य में कांग्रेस की वापसी हुई थी. कई नेता मुख्यमंत्री पद की लालसा लिए बैठे थे. लेकिन कुर्सी मिली सिद्दारमैया को. डीके शिवकुमार उस वक्त भी सीएम पद पर दावा ठोक रहे थे. राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि सिद्दारमैया ने डीके शिवकुमार को अपने कैबिनेट में शामिल करने से ही इनकार कर दिया था. सिद्दा ने कहा था कि वो दागी को अपने मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करेंगे. भारी मान मुनव्वल और आलाकमान के लगातार बढ़ते दबाव के कारण किसी तरह डीके को 6 महीने बाद सिद्दारमैया ने अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया.

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चुनाव परिणामों के बाद सिद्दारमैया के साथ डीके शिवकुमार (फोटो- पीटीआई)

मार्च 2020 में शिवकुमार को सोनिया गांधी ने कर्नाटक कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया था. जुलाई में पद संभालने के बाद शिवकुमार ने मैसूर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की. तब उन्होंने साफ-साफ कहा कि वोक्कलिगा लोगों के लिए समय आ गया है कि वे 18 साल बाद अपने समुदाय से नेता चुनें. उनका इशारा साफ था. 2023 के विधानसभा चुनाव और मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पर. इससे पहले वोक्कलिगा समुदाय से एसएम कृष्णा मुख्यमंत्री बने थे.

चुनाव के बाद डीके के समर्थक उनको सीएम बनाने की मांग करने लगे. कर्नाटक से लेकर दिल्ली तक समर्थकों ने नारेबाजी की. शिवकुमार के समर्थक ने राज्य में कई जगहों पर पोस्टर भी चिपका दिए. वोक्कलिगा समुदाय के लोगों ने कर्नाटक में कई जगहों पर रैली निकाली. मल्लिकार्जुन खरगे के घर पहुंचकर शिवकुमार के भाई डीके सुरेश ने कह दिया कि वो चाहते हैं कि उनके भाई ही मुख्यमंत्री बनें. खुद डीके ने भी कई बार खुलकर बोला. साथ में ये भी जोड़ते रहे कि वे पार्टी आलाकमान के फैसलों को मानेंगे. लेकिन अब उन्हें मानना ही पड़ेगा.

इन सबके बीच अवैध संपत्ति बनाने और जांच एजेंसियों की कार्रवाई ने उनकी छवि को तोड़ा भी है. अवैध खनन की एक जांच में उनसे जुड़ी दो कंपनियों और उनके भाई और डीके सुरेश से जुड़ी एक कंपनी का नाम था. इसके अलावा शिवकुमार और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार के खूब आरोप लगे हैं. डीके के खिलाफ दर्ज केस उनका पीछा नहीं छोड़ रहे.

मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जेल गए

वापस थोड़ा पीछे जाते हैं. अगस्त 2017 में. जब शिवकुमार के रिजॉर्ट में गुजरात के विधायकों को रखा जा रहा था. तभी शिवकुमार से जुड़े कई ठिकानों पर आयकर विभाग के छापे शुरू हो चुके थे. दिल्ली, बेंगलुरु, मैसूर, चेन्नई और शिवकुमार के अपने शहर कनकपुरा में छापे पड़े. उस ईगलटन रिजॉर्ट पर भी छापे पड़े, जहां गुजरात के विधायकों को रखा गया था. रिजॉर्ट से कुछ नहीं मिला. लेकिन आयकर विभाग ने दावा किया था कि शिवकुमार के दिल्ली वाले घर से 8 करोड़ रुपये और दूसरी जगहों से 2 करोड़ रुपये मिले. ये छापेमारी तीन दिनों तक चली थी. आयकर विभाग ने इस सर्च ऑपरेशन के पीछे की वजह आय से अधिक संपत्ति मामले में डीके के खिलाफ शिकायत बताई थी.

प्रवर्तन निदेशालय ने सितंबर 2018 में डीके शिवकुमार के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग केस दर्ज किया था. ये केस आयकर विभाग की चार्जशीट के आधार पर दर्ज किया गया था. शिवकुमार पर टैक्स चोरी और हवाला कारोबार का आरोप लगा था. 31 अगस्त 2019 को ईडी ने डीके शिवकुमार को पूछताछ के लिए दिल्ली बुलाया. चार दिन बाद उनकी गिरफ्तारी हो गई. करीब 50 दिन तिहाड़ जेल में बिताने के बाद जमानत पर बाहर आए. पिछले साल मई में ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून (PMLA) के तहत उनके खिलाफ चार्जशीट फाइल की.

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डीके शिवकुमार (फोटो- पीटीआई)

डीके के खिलाफ सिर्फ यही मामला नहीं है. साल 2015 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने रामनगर जिले में अवैध माइनिंग के मामले में उन्हें नोटिस जारी किया था. इसके अलावा शिवकुमार और उनके भाई डीके सुरेश पर दलितों और गरीबों के 66 एकड़ जमीन हड़पने का आरोप लगा. लेकिन तब सरकार में शिवकुमार खुद थे. सरकार पर आरोप लगा कि इस मामले में उन्हें क्लीन चिट दे दी गई.

शिवकुमार का हलफनामा बताता है कि उनके खिलाफ 19 केस दर्ज हैं. इनमें से 10 केस प्रदर्शन करने और रैली निकालने के दौरान दर्ज हुए. वहीं चार मामले इनकम टैक्स से जुड़े हुए हैं. दो केस मनी लॉन्ड्रिंग कानून के तहत दर्ज हैं. एक केस कथित रूप से घूस लेने का है. वहीं आय से अधिक संपत्ति के आरोप में सीबीआई और लोकायुक्त ने एक-एक केस दर्ज किया हुआ है. डीके के खिलाफ इनमें से 13 केस बीते तीन साल में दर्ज हुए हैं.

आय से अधिक संपत्ति की बात आई है तो डीके की संपत्ति की भी बात कर लेते हैं. शिवकुमार ने अपने चुनावी हलफनामे में 1413 करोड़ की संपत्ति बताई है. पिछले चुनाव (2018) में उनकी घोषित संपत्ति 840 करोड़ थी. यानी बीते पांच सालों में शिवकुमार ने करीब पौने 600 करोड़ की संपत्ति बनाई. 2013 में डीके के पास 251 करोड़ की संपत्ति थी.

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट बताती है कि ईडी ने अपनी चार्जशीट में दावा किया कि शिवकुमार की 200 करोड़ की बेहिसाब संपत्ति का पता लगा है. ईडी के अनुसार, शिवकुमार के 20 बैंकों में 317 अकाउंट हैं. जांच एजेंसी का ये भी दावा है कि उसने कई डॉक्यूमेंट्स बरामद किए हैं, जिनमें 800 करोड़ से ज्यादा की बेनामी संपत्ति का पता लगा है. कहा जा रहा है कि ये सारे आपराधिक केस भी उनके मुख्यमंत्री बनने की राह में रोड़ा बनी है.

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