7 लाख के इनामी डकैत को पकड़ने गया पुलिस का जवान बिना पानी के तड़प-तड़प कर मर गया
इस शहादत का ज़िम्मेदार किसे माना जाए?
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सांकेतिक फोटो (इनसेट में इनामी डकैत बबुली कोल)
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बबुली कोल. पुलिस हो, नेता हो, आदमी-औरत हों या बच्चे, सब उसकी परछाईं से भी बचना चाहते हैं. उम्र मात्र 35 साल है और सरकार की ओर से उस पर 7 लाख रुपये का इनाम घोषित किया गया है. इस वक्त इतना इनाम किसी डकैत पर नहीं है.
डाकू बलखड़िया के मरने के बाद बबुली ने गैंग की कमान संभाली थी. बबुली की टीम में 18 सदस्य हैं. कई राज्यों में वॉन्टेड 60,000 रुपये का इनामी लवलेश कोल और 22,000 रुपये का इनामी राजोला चौधरी भी गैंग के मुख्य सदस्यों में से एक हैं. यह गैंग चित्रकूट जिले के थाना कर्वी, मारकुंडी, मानिकपुर और थाना बहिलपुरवा समेत कई इलाकों में सक्रिय है.
अब एक तो बीहड़ जंगल दूसरा जून की गर्मी में दूर-दूर तक पैदल चलना, टीमों की हालत खराब होती चली गयी. इस सब टीमों में से सबसे दयनीय मझगवां थाना पुलिस की टुकड़ी की थी क्यूंकि बताया जाता है कि उनके पास पानी और खाना भी नहीं उपलब्ध था.

पुलिस थाना - मझगवां (फाइल फोटो)
गर्मी में बेहाल मझगवां थाना पुलिस की टुकड़ी ने कोई रास्ता न देखकर नयागांव थाने से मदद मांगी. नयागांव थाने से मदद पहुंची भी. लेकिन वो मदद अपर्याप्त थी. क्यूंकि वहां से केवल तीन जवान पहुंचे थे. वो तीन जवान जैसे-तैसे मझगवां के थानाध्यक्ष सीएल पांडेय को तो चित्रकूट के जानकीकुंड अस्पताल ले आए, लेकिन थानाध्यक्ष के साथ जंगलों में गए 4 अन्य जवानों को वहीं रुकने के लिए कहा गया. उनको इस बात का आश्वासन दिया गया कि जल्द ही उनको भी बचाने आएंगे.
यानी अब जंगल में मझगवां थाना के चार जवान भूखे प्यासे मदद का इंतज़ार कर रहे थे.
उधर जब मझगवां के थानाध्यक्ष को रेसक्यू करने के बाद पुलिस की टुकड़ी फिर से उसी जगह पर पहुंची तो चारों जवान वहां से लापता थे. उन चारों के गायब होने से कई आशंकाएं जन्म लेने लग गईं. जैसे शायद डाकुओं के गैंग ने उन्हें पकड़ लिया हो, या उन्हें मार डाला हो.
बहरहाल चारों में से तीन जवान खुद ही रास्ता ढूंढते-ढूंढते मझगवां थाने पहुंच गए. लेकिन चार में से केवल तीन. ये एक और अनहोनी की तरफ इशारा था. मझगवां थाने पहुंचे तीनों जवानों ने बताया कि जब काफी देर तक मदद नहीं पहुंची तो उन चारों ने खुद ही आबादी की तरफ चलने का फैसला कर लिया. लेकिन इस दौरान चारों जवानों में से एक – सचिन की हालत बिगड़ गई. वो बाकी तीनों के साथ चल तो पड़ा लेकिन उसने अपनी रायफल, वर्दी की शर्ट व बेल्ट अपने साथियों को देकर कहा था कि इन्हें संभालना मुश्किल है.
यहां तक भी सब ठीक था, चारों लोग अंधेरे में छोटे-छोटे थके कदमों से आगे बढ़ रहे थे. और यूं वे लोग मुख्य सड़क तक पहुंचे और राहत की सांस ली. लेकिन उन्होंने देखा कि उनका एक साथी कम है. और जो कम था उसका नाम सचिन था. सचिन, वही जिसने अपना सारा सामान बाकी साथियों को पकड़ा दिया था.

दस्यु बबुली कोल की ये शुरुआती तस्वीर है. इसके बाद की कोई फोटो पुलिस के दस्तावेज में उपलब्ध नहीं है.
इन तीनों ने सचिन का काफी देर तक इंतज़ार किया, आवाज़ें भी लगाईं, लेकिन सचिन की तरफ से कोई उत्तर नहीं आया. हार कर ये लोग अपनी मंज़िल - मझगवां थाने पहुंच गए और वहां मौज़ूद बाकी लोगों को आपबीती सुनाई.
अब दस्यु को पकड़ने से बड़ा मुद्दा सचिन को खोजना था. लेकिन सचिन को खोजने में भी पुलिस की टुकड़ी को उसी मुसीबत का सामना करना पड़ा – भीषण गर्मी और बीहड़ जंगल.
पुलिस की एक टीम कैंप लगाकर जवान की तलाश में लगी रही. लेकिन फिर भी सचिन की कोई खोज खबर नहीं मिली.
अंततः एक चरवाहे ने पुलिस को एक लाश मिलने की सूचना दी. उसके अनुसार लाश पुलिस की वर्दी में थी. ये शव सचिन का ही था. सचिन की मौत गर्मी और डिहाइड्रेशन से हुई बताई जा रही है. सबसे दुःख की बात ये है कि सचिन था तो पुलिस का जवान लेकिन उसकी उम्र 48 साल थी. जब कोई युवा ही उन जंगलों में और उस गर्मी में मुश्किल से सर्वाइव कर पाता तो 48 की उम्र में सचिन के लिए कितनी मुश्किलें पेश आईं होंगी. और सोचिए ये हालात तो तब थे जब बबुली कोल गैंग से उनका सामना नहीं हुआ था.
दिक्कत एक और भी है – जब कोई स्पेशल कॉम्बिंग के लिए जवान भेजे जाते हैं तो सारी विपरीत परिस्थितयों को ध्यान में रखा जाता है, लेकिन जैसा बताया जा रहा है कि मझगांव के पुलिस कर्मियों के पास खाने पीने का सामान भी पूरा नहीं था.

मध्य प्रदेश पुलिस एकेडमी की मीटिंग लेते मुख्यमंत्री (सांकेतिक फोटो)
सचिन की शहादत रोकी जा सकती थी. अव्वल तो उसे और उस जैसे उम्रदराज़ जवान को ऐसे खतरनाक ऑपरेशन में न भेज के. फिर उसके और उसके अन्य साथियों के लिए जंगल और गर्मी के हिसाब से पूरी व्यवस्था करवा के और अंततः उसे सही समय पर सही मदद मुहैया करवा के. यानी एक जगह भी लापरवाही कम होती तो आज सचिन के परिवार में मातम का माहौल न होता.
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डाकू बलखड़िया के मरने के बाद बबुली ने गैंग की कमान संभाली थी. बबुली की टीम में 18 सदस्य हैं. कई राज्यों में वॉन्टेड 60,000 रुपये का इनामी लवलेश कोल और 22,000 रुपये का इनामी राजोला चौधरी भी गैंग के मुख्य सदस्यों में से एक हैं. यह गैंग चित्रकूट जिले के थाना कर्वी, मारकुंडी, मानिकपुर और थाना बहिलपुरवा समेत कई इलाकों में सक्रिय है.
पढ़ें: देश का सबसे बड़ा डकैत, जिस पर 7 लाख रुपये का इनाम है
22 जून को मध्य प्रदेश पुलिस को जब बबुली गैंग के जंगल में होने की सूचना मिली तो पुलिस से कॉम्बिंग अभियान चलाया. इसमें बरौंधा, नयागांव, मझगवां, कोठी, धारकुंडी व सभापुर थाने की पुलिस टीमें और मध्य प्रदेश सशस्त्र पुलिस बल शामिल हुए.अब एक तो बीहड़ जंगल दूसरा जून की गर्मी में दूर-दूर तक पैदल चलना, टीमों की हालत खराब होती चली गयी. इस सब टीमों में से सबसे दयनीय मझगवां थाना पुलिस की टुकड़ी की थी क्यूंकि बताया जाता है कि उनके पास पानी और खाना भी नहीं उपलब्ध था.

पुलिस थाना - मझगवां (फाइल फोटो)
गर्मी में बेहाल मझगवां थाना पुलिस की टुकड़ी ने कोई रास्ता न देखकर नयागांव थाने से मदद मांगी. नयागांव थाने से मदद पहुंची भी. लेकिन वो मदद अपर्याप्त थी. क्यूंकि वहां से केवल तीन जवान पहुंचे थे. वो तीन जवान जैसे-तैसे मझगवां के थानाध्यक्ष सीएल पांडेय को तो चित्रकूट के जानकीकुंड अस्पताल ले आए, लेकिन थानाध्यक्ष के साथ जंगलों में गए 4 अन्य जवानों को वहीं रुकने के लिए कहा गया. उनको इस बात का आश्वासन दिया गया कि जल्द ही उनको भी बचाने आएंगे.
यानी अब जंगल में मझगवां थाना के चार जवान भूखे प्यासे मदद का इंतज़ार कर रहे थे.
उधर जब मझगवां के थानाध्यक्ष को रेसक्यू करने के बाद पुलिस की टुकड़ी फिर से उसी जगह पर पहुंची तो चारों जवान वहां से लापता थे. उन चारों के गायब होने से कई आशंकाएं जन्म लेने लग गईं. जैसे शायद डाकुओं के गैंग ने उन्हें पकड़ लिया हो, या उन्हें मार डाला हो.
बहरहाल चारों में से तीन जवान खुद ही रास्ता ढूंढते-ढूंढते मझगवां थाने पहुंच गए. लेकिन चार में से केवल तीन. ये एक और अनहोनी की तरफ इशारा था. मझगवां थाने पहुंचे तीनों जवानों ने बताया कि जब काफी देर तक मदद नहीं पहुंची तो उन चारों ने खुद ही आबादी की तरफ चलने का फैसला कर लिया. लेकिन इस दौरान चारों जवानों में से एक – सचिन की हालत बिगड़ गई. वो बाकी तीनों के साथ चल तो पड़ा लेकिन उसने अपनी रायफल, वर्दी की शर्ट व बेल्ट अपने साथियों को देकर कहा था कि इन्हें संभालना मुश्किल है.
यहां तक भी सब ठीक था, चारों लोग अंधेरे में छोटे-छोटे थके कदमों से आगे बढ़ रहे थे. और यूं वे लोग मुख्य सड़क तक पहुंचे और राहत की सांस ली. लेकिन उन्होंने देखा कि उनका एक साथी कम है. और जो कम था उसका नाम सचिन था. सचिन, वही जिसने अपना सारा सामान बाकी साथियों को पकड़ा दिया था.

दस्यु बबुली कोल की ये शुरुआती तस्वीर है. इसके बाद की कोई फोटो पुलिस के दस्तावेज में उपलब्ध नहीं है.
इन तीनों ने सचिन का काफी देर तक इंतज़ार किया, आवाज़ें भी लगाईं, लेकिन सचिन की तरफ से कोई उत्तर नहीं आया. हार कर ये लोग अपनी मंज़िल - मझगवां थाने पहुंच गए और वहां मौज़ूद बाकी लोगों को आपबीती सुनाई.
अब दस्यु को पकड़ने से बड़ा मुद्दा सचिन को खोजना था. लेकिन सचिन को खोजने में भी पुलिस की टुकड़ी को उसी मुसीबत का सामना करना पड़ा – भीषण गर्मी और बीहड़ जंगल.
पुलिस की एक टीम कैंप लगाकर जवान की तलाश में लगी रही. लेकिन फिर भी सचिन की कोई खोज खबर नहीं मिली.
अंततः एक चरवाहे ने पुलिस को एक लाश मिलने की सूचना दी. उसके अनुसार लाश पुलिस की वर्दी में थी. ये शव सचिन का ही था. सचिन की मौत गर्मी और डिहाइड्रेशन से हुई बताई जा रही है. सबसे दुःख की बात ये है कि सचिन था तो पुलिस का जवान लेकिन उसकी उम्र 48 साल थी. जब कोई युवा ही उन जंगलों में और उस गर्मी में मुश्किल से सर्वाइव कर पाता तो 48 की उम्र में सचिन के लिए कितनी मुश्किलें पेश आईं होंगी. और सोचिए ये हालात तो तब थे जब बबुली कोल गैंग से उनका सामना नहीं हुआ था.
दिक्कत एक और भी है – जब कोई स्पेशल कॉम्बिंग के लिए जवान भेजे जाते हैं तो सारी विपरीत परिस्थितयों को ध्यान में रखा जाता है, लेकिन जैसा बताया जा रहा है कि मझगांव के पुलिस कर्मियों के पास खाने पीने का सामान भी पूरा नहीं था.

मध्य प्रदेश पुलिस एकेडमी की मीटिंग लेते मुख्यमंत्री (सांकेतिक फोटो)
सचिन की शहादत रोकी जा सकती थी. अव्वल तो उसे और उस जैसे उम्रदराज़ जवान को ऐसे खतरनाक ऑपरेशन में न भेज के. फिर उसके और उसके अन्य साथियों के लिए जंगल और गर्मी के हिसाब से पूरी व्यवस्था करवा के और अंततः उसे सही समय पर सही मदद मुहैया करवा के. यानी एक जगह भी लापरवाही कम होती तो आज सचिन के परिवार में मातम का माहौल न होता.
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