जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने स्विट्ज़रलैंड से श्याम जीकृष्ण वर्मा की अस्थियां मंगवाईं थीं. इस चीज को 'देशभक्ति वोट बैंक' ने काफी सराहाथा. कहा गया कि जो काम हिंदुस्तान की सरकारें 60 साल में नहीं कर पायीं वो नरेन्द्रमोदी ने तुरंत कर दिया. फिर तुरंत ही हिंदूवादी ग्रुप्स ने श्याम जी को लपक लिया.हिन्दुओं के स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उनकी इमेज बनायी जाने लगी. पर श्याम जीएक सेक्युलर और बेहद सुलझे हुए इंसान थे. उस दौर में ब्रिटेन में इंडिया हाउस बनाकरक्रांति की ऐसी नींव रखी थी जो प्रथम विश्व-युद्ध के दौरान ही ब्रिटिश राज को उखाड़फेंकने का प्लान कर चुका था. ये खतरनाक प्लान हिन्दू, मुस्लिम, सिख सबके सहयोग सेतैयार हुआ था. प्लान फेल हो गया. पर श्याम जी ने ग़दर का बिगुल तो बजा ही दिया था.आज श्याम जी का जन्मदिन है. बिगुल तो बजना ही था.गांधी, लेनिन इस क्रांतिकारी के हॉस्टल को देखने भी आए थे4 अक्टूबर 1857 को जन्म हुआ था. 1857 क्रांति की कहानी सुन ही बड़े हुए होंगे. बम्बईसे स्कूल ख़त्म करके ऑक्सफ़ोर्ड चले गए थे. वहां लंदन में घर खोजते हुए उनको रेसिज्मका सामना करना पड़ा. लोग इंडियन कह लौटा देते थे. पर ये लोग हार मानने वाले थोड़ी थे.श्याम जी ने लंदन में ही इंडिया हाउस बना दिया. इंडियन स्टूडेंट्स के लिए हॉस्टल.और ये हॉस्टल बड़ा ही पॉपुलर हुआ. इस हॉस्टल में गांधी, लेनिन, लाला लाजपत राय,गोपाल कृष्ण गोखले, सावरकर, मदन लाल धींगरा सभी आये थे. भयानक डिस्कशन होता थास्वतंत्रता संग्राम के प्लान को लेकर. इस हॉस्टल ने भारत को कई क्रांतिकारी दिए.इसके पहले 1875 में श्याम जी का कांटेक्ट स्वामी दयानंद सरस्वती से हुआ. दयानंद नेउनको बड़ा प्रभावित किया. उसी दौरान उनको देश भर में घूमने का मौका मिला. काशी केपंडितों के साथ मिलकर इन्होेने 1905 में इंडियन होम रूल सोसाइटी और एक अख़बार TheIndian Sociologist शुरू किया.ब्रिटिशों से विश्वास उठा तो छोड़ दी दीवान की नौकरीबी. ए. की पढ़ाई के बाद श्यामजी कृष्ण वर्मा 1885 में भारत लौट आये. और वकालत करनेलगे. एक दिन रतलाम के राजा ने उनको बुलाया. और कहा ‘आप हमारे यहां दीवान का कामकरो.’ फिर श्यामजी वहां दीवान का काम करने लगे. पर ख़राब हेल्थ की वजह से उन्होंनेदीवान का काम छोड़ना पड़ा. मुंबई में कुछ वक़्त बिताने के बाद वो अजमेर में बस गए.अजमेर के ब्रिटिश कोर्ट में अपनी वकालत जारी रखी. इसके बाद उन्होंने उदयपुर के राजाके यह 1893 से 1895 तक काम किया और फिर जूनागढ़ राज्य में भी दीवान के तौर पर कामकिया लेकिन सन 1897 में एक ब्रिटिश अधिकारी से विवाद के बाद ब्रिटिश राज से उनकाविश्वास उठ गया और उन्होंने दीवान की नौकरी छोड़ दी.मोदी ने धांसू स्ट्रेटेजी तैयार की और वर्मा को भगवा रंग डालाश्यामजी कृष्ण वर्मा और उनकी पत्नी की राख जिनेवा में सहेज के रखी थी. नरेंद्र मोदी2003 में जब चीफ मिनिस्टर थे तो जिनेवा गए और वर्मा की राख को वापस भारत लेकर आए.मोदी ने इस तरह से वर्मा की भारत में दफनाए जाने की आखिरी विश पूरी की. मोदी अपनेCM के कार्यकाल में श्यामजी कृष्ण वर्मा की अपने भाषणों में खूब चर्चा करते थे.2010 में मोदी ने मांडवी जहां श्यामजी कृष्ण वर्मा पैदा हुए थे वहां पर क्रांतितीर्थ मेमोरियल भी बनवाया था. इस मेमोरियल हाउस में इंडिया हाउस की नकल भी बनवाई गईथी. वही इंडिया हाउस जो वर्मा ने एक सेंचुरी पहले बनवाया था.श्यामा प्रसाद मुखर्जी और श्यामजी कृष्ण वर्मा में कंफ्यूज हो जाते हैं मोदी2003 में भुज की कच्छ यूनिवर्सिटी का नाम भी वर्मा के नाम पर कर दिया गया था. हरसाल 4 अक्टूबर को मोदी श्यामजी कृष्ण वर्मा के बर्थडे पर विश किया करते थे. हां बसये है कि 2014 के चुनावों के दौरान बस मोदी जी ने जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसादमुखर्जी को मिला दिया था. मोदी बोले थे - 'जब भारत को 1947 में आजादी मिली. तोनेहरू को जो पहला काम करना चाहिए था कि वो भारत से एक रिप्रजेंटेटिव भेजते जोश्यामा प्रसाद मुखर्जी की अस्थियां लेकर आता. मुखर्जी देश के लिए जिंदगी भर लड़े.पर नेहरू ने ऐसा नहीं किया. ये काम 2003 तक नहीं किया गया था. वो 1930 में ही गुजरगए थे. उनके मरने के 73 साल बाद तक भारत ये काम नहीं कर पाया था. जबकि उसको आजादहुए भी 50 साल गुजर चुके थे. उनकी अस्थियां भारत आने का इंतजार कर रहीं थीं. PMसाहब आपकी पार्टी ने कभी ये काम नहीं किया. बस इतिहास को दबाने की कोशिश की गईं.'पर सच्चाई तो यहां छिपी बैठी हैजब मोदी 12 नवंबर को यूके की यात्रा पर गए थे तो उन्होंने वहां भी वर्मा की तारीफकी. मोदी के इस कदम का वर्मा को जानने वाले विरोधी करते हैं. वो कहते हैं कि मोदीवर्मा के नाम का प्रयोग कच्छ के इलाके में अपना वोट बैंक बनाने के लिए करते हैं.मांडवी के श्यामजी कृष्ण वर्मा सोशल सेंटर के चेयरमैन रहे सुरेंद्र ढोलकिया ने एकप्रेस कांफ्रेस रिलीज के दौरान कहा था, 'भले ही मोदी का 2003 उठाया गया कदम वर्माकी लिगेसी को कब्जाने और एक मिलिटेंट हिंदू के रूप में पेश करने की कोशिश हो परवर्मा बड़े पैमाने पर एक सोशलिस्ट और सेक्यूलर थे. गुजरात के लोगों को ये जान लेनाचाहिए कि श्यामजी सेक्यूलर, डेमोक्रेटिक और नॉन-फासिस्ट इंडिया चाहते थे. संघपरिवार ने उनके रूप में बस एक फ्रीडम फाइटर पाया और उसे अपने रंग में रंगने लगे. नही वर्मा संकुचित देशभक्त थे और न ही हिंदू एक्स्ट्रीमिस्ट. फिर भी संघ परिवारउन्हें भुनाने में लगा है.'--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें -इनके चलते हो गया हिंदी और उर्दू का ब्रेक-अपVIDEO: करण जौहर ने डीडीएलजे से भी पहले इस टीवी शो में एक्टिंग की थीभारत में बोलने की आजादी के ये 8 खतरे बताए रामचंद्र गुहा नेवो 30 साल जेल में रहा और कोई पाकिस्तानी पॉलिटीशियन जिसे देखना नहीं चाहता था