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न्युक्लियर हादसे की स्थिति में दुनिया के सामने बचाव का रास्ता क्या होगा?

एक परमाणु आपदा की सूरत कैसी होगी?

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26 अगस्त 2022 (अपडेटेड: 26 अगस्त 2022, 11:08 PM IST)
एक परमाणु आपदा की सूरत कैसी होगी? (AFP)
एक परमाणु आपदा की सूरत कैसी होगी? (AFP)
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The World Narrowly Avoided Radiation Accident
दुनिया एक अकल्पनीय रेडिएशन हादसे से बाल-बाल बच गई है.

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेन्स्की का ये बयान 26 अगस्त की सुबह इंटरनैशनल मीडिया की सुर्खियों में छाया हुआ था. ज़ेलेन्स्की के बयान में चेतावनी का पुट था. उन्होंने ऐसा कहा क्यों?

दरअसल, 25 अगस्त को एक ऐसा मौका आया, जब यूक्रेन का जेपोरज़िया न्युक्लियर प्लांट बेहिसाब तबाही का केंद्र बनने की कगार पर पहुंच गया था. ज़ेपोरजिया यूरोप का सबसे बड़ा न्युक्लियर प्लांट है. ये फिलहाल रूसी सैनिकों के क़ब्ज़े में है. इस प्लांट का कूलिंग सिस्टम बाहर से आने वाली बिजली से चलता है. रूस के क़ब्ज़े से पहले प्लांट को चार कनेक्शन मिले हुए थे. युद्ध के दौरान तीन कनेक्शन पहले ही कट चुके हैं. 25 अगस्त को पड़ोस के कोल प्लांट में आग लग गई. इसके चलते चौथा कनेक्शन भी टूट गया. इसके बाद कूलिंग सिस्टम को बैकअप लाइन पर शिफ़्ट करना पड़ा. अगर ये भी फ़ेल हो जाता तो डीजल जनरेटर का इस्तेमाल करना होता. अगर जनरेटर्स भी फ़ेल हो जाए, उसके बाद इंजीनियर्स के पास आपदा को टालने के लिए सिर्फ़ 90 मिनट का समय होगा. हालिया घटना में तो पावर ग्रिड को फिर से बहाल कर दिया गया, लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच एक सवाल अक्सर चर्चा के केंद्र में आता रहता है, वो ये कि अगर बचाने की सारी कोशिशें फ़ेल हो गईं तो क्या होगा?

तो, आज हम जानेंगे,
- एक परमाणु आपदा की सूरत कैसी होगी?
-  न्युक्लियर हादसे की स्थिति में दुनिया के सामने बचाव का रास्ता क्या होगा?
- और, तमाम आशंकाओं के बावजूद भी न्युक्लियर पावर प्लांट सबसे सुरक्षित क्यों माने जाते हैं?

आज बात इसपर होगी कि न्युक्लियर हादसे की सूरत में दुनिया कैसी दिखेगी?

शुरुआत श से. यानी चैप्टर वन से.

पहले कुछ कहानियां सुनिए.

नंबर एक.

“मैंने कभी नर्क को अपनी आंखों से नहीं देखा. इसलिए, मैं नहीं बता सकती कि वो जगह कैसी दिखती है. लेकिन हम जिस यातना से गुजरे, शायद नर्क भी वैसा ही होता होगा.”

अगस्त 1945 में तेरुको युएनो 15 बरस की थी. वो हिरोशिमा रेड क्रॉस हॉस्पिटल में नर्सिंग की स्टूडेंट थी. क़यामत के रोज़ वो क्लास जाने की तैयारी में जुटी थी. वो यूनिफ़ॉर्म पहनकर बस्ता टांग रही थी. इतने में आसपास का तापमान सैकड़ों गुणा बढ़ गया. कमरे के शीशे टूटकर बिखरने लगे. पेड़, पक्षी, जानवर, घर सब जल रहे थे. युएनो के सामने उसके कई दोस्त धुआं बनकर उड़ गए. वो किसी तरह ज़िंदा बच गई. 75 बरस बाद तेरुको युएनो ने बीबीसी को अपनी कहानी सुनाते हुए कहा था,
‘ऐसा दोबारा कभी नहीं होने देना चाहिए.’

कहानी नंबर दो.

कुमिको अराकावा नागासाकी जिला प्रशासन के दफ़्तर में काम करतीं थी. 09 अगस्त 1945 को सायरन की तेज़ आवाज़ गूंजी. अराकावा और उनके दोस्त उत्सुकता में भरकर दफ़्तर की छत पर पहुंचे. तभी उनके सामने तेज़ रौशनी चमकी और फिर पूरा शहर आग की लपटों में घिर गया. अराकावा जिस घर में रहतीं थी, वो धमाके से महज 500 मीटर दूर था. जब तक लपटें शांत हुईं और वो अपने घर पहुंचीं, तब तक उनके माता-पिता और चार भाई-बहन काल के गाल में समा चुके थे. 2012 में टाइम मैगज़ीन ने उनकी कहानी पब्लिश की थी. अराकावा उस समय 92 साल की हो चुकीं थी.

जब उनसे भविष्य की पीढ़ी को संदेश लिखने के लिए कहा गया, उन्होंने बस इतना कहा, नानी मो ओमुसुकानाई. यानी, मेरे पास ऐसा कुछ नहीं बचा है.

कहानी नंबर तीन.

10 अगस्त 1945 को योशिरो यामावाकी के घरवाले परेशान थे. यामावाकी के पिता पावर-स्टेशन में काम करते थे. शिफ़्ट ख़त्म होने के बाद भी वो वापस नहीं लौटे थे. यामावाकी 11 साल का था. घरवालों ने उसको खोज-ख़बर लाने के लिए भेजा. साथ में उसके दो भाई भी थे. रास्ते में उन्हें जलते, पिघलते इंसानों का ढेर दिखा. हर तरफ़ बिखरे मांस दिखे. यामावाकी को अपने पिता की तलाश करनी थी. वो अपने भाईयों के साथ किसी तरह पावर स्टेशन पहुंचा. वहां गिनती के लोग दिख रहे थे. वे मलबा साफ़ करने आए थे. यामावाकी ने अपने पिता के बारे में पूछा. उन लोगों ने सामने की इमारत की तरफ़ इशारा कर दिया. इमारत ज़मींदोज हो चुकी थी. यामावाकी ने किसी तरह अपने पिता को ढूंढ लिया. मगर तब तक वो बाकियों की तरह लाश हो चुके थे. उनका शरीर आधा जला हुआ था. यामावाकी के पास दो विकल्प थे, या तो वहीं पर अंतिम-संस्कार कर दे या लाश को उठाकर घर ले जाए. फिर उन्होंने आस-पास से लकड़ी जमा की और पिता का अंतिम-संस्कार कर दिया. अगली सुबह वो राख लेने आया. लेकिन लाश पूरी तरह से जली नहीं थी. तब उन्होंने सोचा कि सिर्फ़ खोपड़ी लेकर चलते हैं. उन्होंने लकड़ी की मदद से उठा भी ली. लेकिन बीच रास्ते में ही खोपड़ी फूट गई. ये दृश्य देखकर तीनों भाई भयानक डर गए. वे वापस कभी उस फ़ैक्ट्री की तरफ़ नहीं गए.

इस घटना को दर्ज़ कर रहे फ़ोटोग्राफ़र हारुका साकागुची ने लिखा,

मैं यामावाकी और उनके भाईयों की हिम्मत की कहानी सुनकर दंग रह गया. कम उम्र और बेहिसाब तबाही के बीच उन्होंने अपने पिता को सम्मानजनक विदाई देने की कोशिश की. वो असाधारण था.

सच ही कहा गया है, मुश्किल वक़्त सख़्त इंसानों का निर्माण करते हैं. अगस्त 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए दो परमाणु बमों ने पूरे शहर को विनाश के कगार पर ला दिया. अनुमान है कि दोनों हमलों में पांच लाख से अधिक लोग मारे गए. जो ज़िंदा बच गए, वे आज भी उस सदमे को भूल नहीं पाए हैं.

हिरोशिमा परमाणु हमले के बाद का एक दृश्य (AFP)

इस बात के उदाहरण थे कि इंसानों को क्या नहीं करना चाहिए. एक सीख ये मिली थी कि परमाणु हथियारों से दूर रहने में ही भलाई है. लेकिन दुनिया ने इससे सीख नहीं ली. दूसरे विश्वयुद्ध के तुरंत बाद कोल्ड वॉर शुरू हो गया था. हथियारों की रेस चलने लगी. ताक़तवर देश परमाणु हथियारों का स्टॉक तैयार करने लगे. ताइवान स्ट्रेट क्राइसिस हो या क्युबन मिसाइल क्राइसिस, कई बार ऐसा हुआ कि दुनिया न्युक्लियर वॉर के मुहाने पर पहुंचकर वापस लौटी है.

फ़रवरी 2022 में शुरू हुए रूस-यूक्रेन युद्ध में भी कई बार न्युक्लियर अटैक का अंदेशा जताया गया है. कहा जाता है कि जिस रफ़्तार से रूस बढ़त गंवा रहा है, राष्ट्रपति पुतिन परमाणु हथियार चलाने का आदेश दे सकते हैं. अभी तक ये आशंकाओं के पिटारे में बंद है.

भले ही न्युक्लियर अटैक की बात कोसों दूर हो, फिर भी हादसे की गुंज़ाइश पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. ख़तरा कायम है. ये ख़तरा है, न्युक्लियर पावर प्लांट्स के फ़ेल होने का. कूलिंग सिस्टम के बंद पड़ जाने का. रिएक्टर के बिगड़ जाने का.

25 अगस्त को ये स्थिति बन भी रही थी. रूस के नियंत्रण वाले जेपोज़िया न्युक्लियर प्लांट का कूलिंग सिस्टम जिस बिजली कनेक्शन पर चल रहा था, वो कनेक्शन अचानक से कट गया. बिजली तो वापस बहाल कर दी गई. लेकिन आशंका बाकी रह गई. दुआ यही रहेगी कि ऐसा कभी ना हो, फिर भी अगर हादसा हो जाए तो क्या होगा? ये समझने के लिए हमें इतिहास का रुख करना होगा.

जेपोज़िया न्युक्लियर प्लांट (AFP)

साल 1939. दुनिया को न्युक्लियर फ़िशन यानी परमाणु विखंडन के बारे में पता चला. इसके तहत, यूरेनियम या प्लूटोनियम के एटॉमिक न्युक्लियस को दो बराबर टुकड़ों में तोड़ा जाता है. इस प्रोसेस के दौरान बेहिसाब ऊर्ज़ा रिलीज़ होती है, रेडियोएक्टिव चीजें बनतीं है और कई न्यूट्रॉन्स भी बाहर आते हैं. फिर ये न्यूट्रॉन्स इस प्रोसेस को आगे बढ़ाते हैं और इससे चेन रिएक्शन क्रिएट होता है. अगर इसको न्युक्लियर रिएक्टर में कंट्रोल किया जाए तो इस चेन रिएक्शन से बिजली मिल सकती है. और, अगर इसको अनियंत्रित छोड़ दिया जाए तो ये परमाणु बम बनकर दुनिया को तबाह कर सकता है.

न्युक्लियर फ़िशन का पता चलने के तुरंत बाद दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो गया था. इसी समय अल्बर्ट आइंस्टीन ने अमेरिका के राष्ट्रपति फ़्रैंकलिन डी रूजवेल्ट को एक चिट्ठी भेजी. उन्होंने एटम बम की तैयारी शुरू करने का सुझाव दिया था. रूजवेल्ट ने चिट्ठी बात मान ली. उन्होंने एक सीक्रेट मिशन शुरू किया. मैनहटन प्रोजेक्ट. इसके तहत परमाणु बम के साथ-साथ न्युक्लियर रिएक्टर की संभावनाओं पर भी रिसर्च शुरू हुई. 16 जुलाई 1945 को अमेरिका ने पहला सफ़ल परीक्षण किया. और, तीन हफ़्ते बाद जापान पर इसका अमल भी कर दिया.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद न्युक्लियर टेक्नोलॉजी पर रिसर्च तेज़ हुई. वैज्ञानिकों को लगा कि फ़िशन से मिलने वाली हीट का सही इस्तेमाल किया जाए तो इससे बिजली की कमी पूरी की जा सकती है. उस दौर में दुनिया में बस दो महाशक्तियां बची थी. अमेरिका और सोवियत संघ. दोनों जगहों पर काम शुरू हुआ.
1951 में अमेरिका को पहली सफ़लता मिली. इदाहो के रेगिस्तान में बना एक्सपेरिमेंटल ब्रीडर रिएक्टर - वन (EBR-1) बिजली बनाने वाला पहला न्युक्लियर रिएक्टर बन गया. 1953 में अमेरिका के राष्ट्रपति आइज़नहॉवर ने ‘एटम्स फ़ॉर पीस’ की शुरुआत की. इसके तहत परमाणु तकनीक के ज़रिए लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने पर ज़ोर दिया गया.

उधर, सोवियत संघ ने 1946 में ही काम शुरू कर दिया था. उन्हें पहली बड़ी सफ़लता 1954 के साल में मिली. जून 1954 में ओबलिंस्क न्युक्लियर रिएक्टर ने पावरग्रिड को बिजली पहुंचानी शुरू कर दी. ये पहली बार था, जब बिजली रिएक्टर से बाहर की ज़रूरतों को पूरा करने में सफ़ल रही. इसके बाद दुनिया के कई देशों ने न्युक्लियर रिएक्टर्स की स्थापना की. भारत में पहला न्युक्लिर रिएक्टर 1969 में महाराष्ट्र के तारापुर में बना. फिलहाल, देश में कुल 22 न्युक्लियर रिएक्टर्स काम कर रहे हैं.

मार्च 2019 की नेशनल जियोग्राफ़िक की एक रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया में लगभग 450 न्युक्लियर रिएक्टर्स थे. इनमें दुनिया की कुल ज़रूरत की 11 प्रतिशत बिजली बन रही थी. ये ग्राफ़ समय के साथ ऊपर जा रहा है. इसकी वजह क्या है? दरअसल, ये ऊर्जा के पारंपरिक स्रोतों की तुलना में अधिक सुरक्षित और स्वच्छ है. कुछ उदाहरणों से समझते हैं.

- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल दुनियाभर में 70 लाख से अधिक लोग एयर पॉल्युशन का शिकार होते हैं. इस प्रदूषण का एक बड़ा हिस्सा जीवाश्म ईंधनों से चलने वाले रिएक्टर्स से निकलता है.

- ग्रीन एनर्जी की बात की जाए तो पानी से बनने वाली बिजली सबसे अधिक ख़तरनाक मानी जाती है. हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावरप्लांट में हुई दुर्घटनाओं से लाखों लोगों की जान जा चुकी है. 1975 में चीन के हेनान प्रांत में बेनचियाओ बांध टूटने के कारण दो लाख से अधिक लोग मारे गए थे. पनबिजली परियोजनाओं में बाढ़ का ख़तरा हमेशा बना रहता है.

- अगर न्युक्लियर प्लांट्स में हुए हादसों की बात करें तो अभी तक ऐसे लगभग दस हादसे हो चुके हैं. सबसे पॉपुलर उदाहरण चेर्नोबिल और फुकुशिमा का है.
अप्रैल 1986 में यूक्रेन के चेर्नोबिल डिजाइन में गड़बड़ी और प्रशिक्षित लोगों की कमी के कारण रिएक्टर में ब्लास्ट हुआ. इसके बाद रेडियोएक्टिव फैलने लगी. सरकारी आकंड़ों के अनुसार, हादसे में 46 लोगों की मौत हुई. इस आंकड़े की सत्यता पर कई सवाल उठते हैं.

चेर्नोबिल हादसे के कारण साढ़े तीन लाख लोगों को बाहर निकाला गया. रेडियोएक्टिविटी के कारण लगभग पांच हज़ार लोगों को कैंसर हुआ और वे बाद में उसी वजह से जल्दी मर गए. चेर्नोबिल में धीरे-धीरे जीवन लौट रहा है. रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत में रूसी सैनिकों ने रिएक्टर पर क़ब्ज़ा कर लिया था. आशंका जताई जा रही थी कि वे न्युक्लियर वेस्ट को रिलीज़ कर सकते हैं. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. वो ख़तरा फिलहाल के लिए टल गया है.

जहां तक फुकुशिमा की बात है. ये जापान में है. 2011 में जापान में सुनामी आई थी. सुनामी के कारण तीन रिएक्टर्स को मिल रही पावर सप्लाई बंद पड़ गई. इससे कूलिंग सिस्टम ठप हो गया. इसका नतीजा ये हुआ कि तीन दिनों के भीतर कोर पिघल गए. दिसंबर 2011 में प्लांट को बंद करना पड़ा. इसके बाद प्रदूषित पानी को साफ़ करके ठिकाने लगाने का काम शुरू हुआ. ये आज तक चल रहा है.

हादसे के कारण एक लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना पड़ा. जापान सरकार कहती है कि इस हादसे में रिएक्टिविटी के कारण एक भी मौत नहीं हुई. जो लोग मारे गए, वे सुनामी के कारण हताहत हुए.

फ़ुकुशिमा हादसे के बाद जापान ने अपने सभी न्युक्लियर रिएक्टर्स को लगभग बंद कर दिया. सरकारें नए न्युक्लियर रिएक्टर्स की बात करने से कतराती रही. इस वजह से जापान को ऊर्जा ज़रूरतों के लिए जीवाश्म ईंधन पर शिफ़्ट होना पड़ा. हालांकि, 25 अगस्त को जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा ने इसमें बदलाव की बात कही है. रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण दुनियाभर में तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई. इसका असर जापान पर भी पड़ा है. किशिदा ने अत्याधुनिक न्युक्लियर रिएक्टर्स बनाने और बंद पड़े रिएक्टर्स को चालू करने के लिए एक सरकारी कमिटी बनाई है. जापान 2050 तक कार्बन न्यूट्रल बनने की योजना बना रहा है. इसमें न्युक्लियर रिएक्टर्स की अहम भूमिका होगी. जापान की जनता इस फ़ैसले को किस तरह से लेती है, ये देखने वाली बात होगी.

फ़ुकुशिमा परमाणु संयंत्र (फोटो-ट्विटर)

अप्राकृतिक कारणों से हुई एक भी मौत दुखद है. ये कतई नहीं होना चाहिए. लेकिन अगर हम बड़े स्तर पर और तुलनात्मक नज़रिए से देखें तो न्युक्लियर रिएक्टर्स से नुकसान कम है. मगर पेच अभी भी बाकी है. अभी तक न्युक्लियर रिएक्टर्स में जो हादसे हुए हैं, उन्हें बहुत जल्दी कंट्रोल कर लिया गया. ऐसा इसलिए कि ये हादसे अनियंत्रित नहीं हुए. समस्या की जड़ का जल्दी पता लगा लिया गया था.

अगर हम परिस्थिति को बदल दें तो क्या होगा? मान लीजिए कि कोई दुश्मन देश साइबर अटैक कर दे या जान-बूझकर न्युक्लियर रिएक्टर्स पर बम गिरा दे तो क्या हो सकता है?
यूक्रेन के जेपोज़िया में यहीं आशंका बढ़ रही है. अगर कभी उसमें अनियंत्रित हादसा हुआ तो क्या होगा?

जे़पोज़िया दुनिया का नौवां सबसे बड़ा न्युक्लियर पावर प्लांट है. यूरोप में ये पहले नंबर पर आता है. इसमें छह संयंत्र है. हर एक संयंत्र में 950 मेगावाट बिजली बनती है. पूरे प्लांट से 5700 मेगावाट. इतनी बिजली 40 लाख घरों को रौशन करने के लिए काफी है.

जानकारों का कहना है कि हादसे का असर इस बात पर निर्भर करेगा कि हादसा हुआ कैसे? रिएक्टर्स को हमेशा ठंडा रखना होता है. अगर किसी वजह से कूलिंग सिस्टम रुका तो फ़्यूल पिघलने लगेगा. ऐसे में प्रेशर बढ़ेगा और रिएक्टर में धमाका हो सकता है.

धमाके के बाद हवा में रेडियोएक्टिविटी फैलेगी. ये इंसानों के लिए ख़तरनाक होगी. जेपोज़िया के आसपास रहने वाले लोगों को इलाका खाली करना पड़ेगा. रेडिएशन का असर सालों तक रह सकता है. इसलिए, ये इलाका कई वर्षों तक रिहाइश के काबिल नहीं रह जाएगा.

जो लोग रेडिएशन की जद में आएंगे, अगर वे तुरंत बीमार नहीं भी पड़ते हैं. तो कुछ समय बाद उनमें कैंसर या स्कीन से जुड़ी दूसरी बीमारियां देखी जा सकतीं है.
रेडिएशन कहां तक फैलेगा, इसके बारे में अनुमान लगाना मुश्किल है. ये पूरी तरह से मौसम पर निर्भर करेगा. जेपोज़िया की लोकेशन के मुताबिक, रेडिएशन पूरे यूरोपीय महाद्वीप तक फैल सकता है.

रेडिएशन की स्थिति में बचाव का रास्ता क्या है?

पहला रास्ता है, बाहर निकलना. लोग रेडिएशन के केंद्र से जितनी दूर जाएंगे, वे उतने सुरक्षित होंगे. हालांकि, वॉर ज़ोन से लोगों को सुरक्षित निकालना अपने आप में मुश्किल होगा.
दूसरी बात, लोगों को ख़ुद पर काबू रखना होगा. डॉक्टर्स का मानना है कि रेडिएशन से ज़्यादा रेडिएशन का डर लोगों को बीमार कर सकता है.
एक तरफ़ युद्ध की वीभीषिका है, दूसरी तरफ़ रेडिएशन का ख़तरा. ये दोहरी मार होगी. शारीरिक नुकसान से अधिक ख़तरा मानसिक नुकसान का होगा.

हम उम्मीद करते हैं कि दुनियाभर की ताक़तवर संस्थाएं और देश मिलकर इस तरह की किसी भी आपदा को रोकने की पूरी कोशिश करेंगी.

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