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'मुफ्त बिजली, मकान, रोजगार जैसे वादे घूस नहीं', 'रेवड़ी कल्चर' पर सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में कहा था

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि लोगों के जीवन के लिए क्या 'जरूरी' है, ये समय-समय पर बदलता रहता है.

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23 अगस्त 2022 (अपडेटेड: 23 अगस्त 2022, 11:44 PM IST)
Supreme court on revdi culture
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो- पीटीआई)
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देश में इन दिनों ‘रेवड़ी कल्चर’ काफी चर्चा में है. यानी मुफ्त में दी जाने वाली योजनाओं का चलन. जैसे फ्री बिजली, फ्री पानी या चुनाव के दौरान लैपटॉप, कैश या दूसरी चीजों को दिए जाने की घोषणा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 16 जुलाई को इस शब्द का इस्तेमाल किया था. बिना किसी का नाम लिए उन्होंने कहा था कि कुछ पार्टियां देश में 'रेवड़ी कल्चर' को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही हैं. पीएम ने कहा कि हमें मिलकर रेवड़ी कल्चर की सोच को हराना है, ये रेवड़ी कल्चर देश के विकास के लिए बहुत घातक है. इसके बाद देश में एक बहस छिड़ गई कि मुफ्त योजनाओं का दायरा क्या हो. कौन-सी योजनाएं या चुनावी घोषणाएं इसमें शामिल हो सकती हैं या नहीं हो सकती हैं.

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी

जब प्रधानमंत्री ने दूसरे दलों पर निशाना साधा, तो विपक्ष ने भी बीजेपी की योजनाओं को लेकर जवाब दिया. कुछ लोगों ने यहां तक कहा कि कॉरपोरेट के लाखों करोड़ रुपये के टैक्स को माफ करना 'रेवड़ी कल्चर' में आता है या नहीं. जिस 'रेवड़ी कल्चर' पर बहस छिड़ी है, उसपर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई हो रही है. बीजेपी नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में 22 जनवरी 2022 को एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की थी. इसमें राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त की घोषणाओं और वादों पर रोक लगाने की मांग की गई थी. साथ ही 'अतार्किक मुफ्त वादे' करने वाले राजनीतिक दलों का रजिस्ट्रेशन रद्द करने या उनके चुनाव चिह्नों को सीज करने की मांग की गई.

CJI एनवी रमणा की अध्यक्षता वाली बेंच इसकी वैधता और दायरे को लेकर सुनवाई कर रही है. पिछले हफ्ते 17 अगस्त को सुनवाई के दौरान बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि राजनीतिक दलों को चुनावी वादे करने से रोका नहीं जा सकता है, लेकिन 'फ्रीबीज' और 'असल कल्याणकारी योजनाओं' के बीच के अंतर को समझना होगा. बेंच ने ये भी कहा कि क्या यूनिवर्सल हेल्थकेयर और पीने के पानी की उपलब्धता को फ्रीबीज माना जा सकता है? मामले पर बहस जारी है. 23 अगस्त को भी इस मुद्दे पर सुनवाई हुई.

2013 में सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

यह पहली बार नहीं है, जब इस तरह का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा हो. इससे पहले साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने 'मुफ्त की घोषणाओं और वादों' को लेकर एक अहम फैसला सुनाया था. इस संबंध में 'सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु' केस काफी चर्चित रहा. साल 2006 का तमिलनाडु विधानसभा चुनाव जीतने के बाद डीएमके ने मुफ्त में कलर टीवी बांटने का वादा किया था. डीएमके सरकार के इसी फैसले को याचिकाकर्ता ने चुनौती दी थी.

इसपर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राजनीतिक पार्टियों द्वारा कलर टीवी, साइकिल, मुफ्त मकान, बिजली या रोजगार देने के वादों को घूस या भ्रष्टाचार नहीं माना जा सकता है. दरअसल सुप्रीम कोर्ट में 'फ्रीबीज' को लेकर कई सवाल थे. एक सवाल ये था कि क्या राजनीतिक दलों के ऐसे वादों को जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा-123 के तहत 'भ्रष्ट कार्यप्रणाली' माना जाना चाहिए.

कोर्ट ने फैसले में इन वादों लेकर कहा था कि जन प्रतिनिधित्व कानून उम्मीदवारों के बारे में बात करता है ना कि राजनीतिक पार्टी के बारे में. साथ ही कोर्ट ने कहा था कि इलेक्शन मेनिफेस्टो किसी राजनीतिक दल की अपनी नीतियों का एक स्टेटमेंट होता है. ये नियम बनाना कोर्ट के दायरे में नहीं है कि कोई राजनीतिक पार्टी चुनावी घोषणापत्र में किस तरह के वादे कर सकती है या नहीं कर सकती है.

‘फ्रीबीज समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं’

ये फैसला सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पी सदाशिवम और जस्टिस रंजन गोगोई की बेंच ने सुनाया था. दोनों बाद में देश के चीफ जस्टिस बने. कोर्ट के सामने एक सवाल ये भी था कि क्या ऐसे वादे समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं करते हैं. बेंच ने कहा था कि राजनीतिक दलों द्वारा किए गए ऐसे वादों से लोगों के जीवनस्तर में सुधार होगा और ये राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के अनुरूप ही हैं. हालांकि, कोर्ट ने ये भी कहा था कि लोगों के जीवन के लिए क्या 'जरूरी' हैं, ये समय-समय पर बदलता रहता है. इसलिए कोर्ट राज्य को ये नहीं कह सकता है कि कलर टीवी पब्लिक गुड है या नहीं. सुप्रीम कोर्ट सिर्फ उन मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है, जहां राज्य कुछ असंवैधानिक कर रहा हो.

याचिकाकर्ता ने डीएमके के कई वादों को लेकर सवाल उठाया था. जिनमें, राशन कार्ड धारकों को मुफ्त में पंखे और ग्राइंडर मशीन देने की घोषणा भी थी. इसपर कोर्ट ने कहा था कि ये समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है. अंग्रेजी वेबसाइट 'द न्यूज मिनट' की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने कहा था, 

"ये सरकार पर निर्भर है कि वो नीति-निर्देशक तत्वों को लागू करते समय लोगों की जरूरतों और अपने वित्तीय खजाने का ध्यान रखे. अगर कोई खास लाभ किसी खास वर्ग को मिल रहा है, तो राज्य का सीमित संसाधन हो सकता है. सभी कल्याणकारी योजनाएं एक बार में सभी नागरिकों के लिए लागू नहीं की जा सकती हैं. राज्य धीरे-धीरे इन योजनाओं को आगे बढ़ा सकता है और सुप्रीम कोर्ट ने भी कई फैसलों में ऐसा कहा है."

सुप्रीम कोर्ट ने 2013 के इस फैसले में एक अहम टिप्पणी CAG को लेकर भी की थी. कोर्ट ने कहा था कि कैग का काम ऑडिट करना है, वो ये नहीं बता सकता कि सरकारों को किस तरीके से पैसे खर्च करने चाहिए. हालांकि, कोर्ट ने उस वक्त चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों के साथ बातचीत कर इलेक्शन मेनिफेस्टो की गाइडलाइंस तय करने का भी सुझाव दिया था.

DMK और AAP ने याचिका का विरोध किया

इस बार कोर्ट में जो सुनवाई हो रही है, उसमें केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों से जवाब मांगे गए हैं. आम आदमी पार्टी याचिका का विरोध कर चुकी है. AAP ने कोर्ट में कहा कि जरूरतमंद लोगों के सामाजिक-आर्थिक कल्याण के लिए लागू योजनाओं को ‘रेवड़ी कल्चर’ नहीं कहा जा सकता है. इसी तरह डीएमके ने भी कहा कि कल्याणकारी योजनाएं कमजोर वर्गों को सशक्त करने में मदद करती हैं, इसलिए इन्हें 'मुफ्त की योजनाए' नहीं कह सकते. डीएमके ने याचिका को राजनीति से प्रेरित बताया. 'मुफ्त की योजनाओं' को लेकर सबकी अपनी परिभाषा है. दायरे भी अलग-अलग हैं. बहरहाल, इस मुद्दे पर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के निष्कर्ष का इंतजार है.

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