दुनिया के 7 अजूबों में एक ताजमहल कैसे 'वाह ताज' से 'आह ताज' बन गया
पर अब भी ताज को बचाया जा सकता है...
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ताजमहल की दुर्दशा कैसे बढ़ती चली जा रही है.
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'एक अश्रुमोती... समय के गाल पर, सदा सर्वदा के लिए'.
रबीन्द्रनाथ टैगोर ने ये बात एक बार ताज महल का वर्णन करते हुए लिखी थी. मगर ताज महल का आज जो हाल हो गया है उसे देखकर आंखों में आंसू आते हैं. 11 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने ताज की दुर्दशा पर एक सख्त टिप्पणी करते हुए कहा -
आप ताज महल को बंद कर सकते हैं. आप चाहें तो उसे ध्वस्त भी कर सकते हैं. आप उससे पल्ला भी झाड़ सकते हैं.
जिम्मेदारों को आइना दिखाती कोर्ट की इस टिप्पणी ने इस धरोहर के संरक्षण को लेकर चल रही बात को आगे बढ़ाने का काम किया. दिखाया कि कोर्ट ताज को लेकर कितना सीरियस है. कोर्ट में 31 जुलाई से इस मामले की नियमित सुनवाई भी शुरू होनी है.

ताजमहल पर 31 जुलाई से शुरू होनी है सुनवाई.
बहस के केंद्र में एक बार फिर से पर्यावरणविद् और वकील एम.सी. मेहता हैं जिनकी 1980 के दशक में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद ही अदालत ने ताज महल के आसपास की आबोहवा को प्रदूषित करने के लिए मथुरा तेलशोधक कारखाने को फटकार लगाई थी. तब से सुप्रीम कोर्ट ने ताज महल के आसपास 10,400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ताज ट्रैपेज़ियम जोन (टीटीजेड) घोषित कर दिया और इस क्षेत्र में प्रदूषण वाली इकाइयों को बंद करने या फिर कहीं और स्थानांतरित करने का आदेश दिया था.
अब एक नए आवेदन में मेहता ने आरोप लगाया है कि ताज महल के रखरखाव में घोर लापरवाही बरती जा रही है. संगमरमर का रंग मटमैला हो रहा है, दरारें दिख रही हैं, मीनारें झुकने लगी हैं, पच्चीकारी उखड़ने लगी है, झूमर झड़ने लगे हैं, सीसीटीवी काम नहीं करते, ताज महल के चारों ओर की नालियां जाम पड़ी हैं, करीब के इलाकों में अतिक्रमण बढ़ा है, आसपास के क्षेत्र में उद्योगों और कारखानों की भरमार हो गई है. लगातार मरती यमुना ताज की नींव कमजोर कर रही है और कई तरह के कीट-पतंगे पैदा हो रहे हैं.
पिछले एक साल से इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट के चार नंबर कोर्टरूम में गहमागहमी चल रही है. जस्टिस मदन बी. लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता ने ताज के "बदरंग'' होने पर चिंता जताई थी. साथ ही इसे एक चेतावनी के रूप में लेने को कहा. अगस्त 2017 में भी, न्यायाधीशों ने केंद्र और उत्तर प्रदेश की नौकरशाही के रवैये पर उंगली उठाई और कहा, "यह विश्वप्रसिद्ध स्मारक है और आप इसे नष्ट करना चाहते हैं?'' नवंबर 2017 में उन्होंने संगमरमर के इस बेमिसाल स्मारक की खस्ताहाली की ओर सबका ध्यान खींचा था.
मई में अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को आड़े हाथों लेते हुए टिप्पणी की थी -
एक और जज ने ताज महल की दुर्दशा पर सवाल खड़े किए थे. सितंबर 2015 में जब जस्टिस जोसेफ कुरियन परिवार के साथ ताज महल देखने गए तो अचानक उन्हें काला धुआं उठता दिखा. यह धुआं ताजमहल और आगरा किले के बीच स्थित एक श्मशान मोक्षधाम से निकल रहा था. जस्टिस जोसफ ने प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दखल की मांग की. लेकिन श्मशान स्थल को स्थानांतरित करने के प्रयासों का कोई नतीजा नहीं निकला.
ऐसे ही कई और कारण हैं जो ताज को बदरंग कर रहे हैं, जिन पर इंडिया टुडे ने विस्तार से रिपोर्ट की है. आइये एक-एक करके आपको उनके बारे में भी बताते हैं -
1. एक सूखती हुई नदी
ये सूखती हुई नदी है यमुना. अपने उद्गम स्थल यमुनोत्री ग्लेशियर से निकलने वाला यमुना का पारदर्शी नीला पानी आगरा पहुंचते-पहुंचते एक गंदे नाले का पानी बन जाता है. वैसे भी हरियाणा के हथिनीकुंड बराज पर यमुना का 99 प्रतिशत पानी हड़प लिया जाता है. पानीपत और आगरा के बीच कई नालों का काला गंदा पानी नदी में गिरता है. दिल्ली में यमुना सबसे ज्यादा प्रदूषित होती है. यहां 17 सीवेज से 3,296 एमएलडी नालों का पानी यमुना में गिरता है. उसके बाद रही सही कसर आगरा में पूरी हो जाती है. जिले में 122 किमी के सफर में इसमें करीब 90 नालों का पानी गिरता है, जिनमें केवल 29 नालों में ही पानी छानने वाले जाले हैं. यही वजह है कि ताज से अगर यमुना को देखें तो उसकी बड़ी भयावह सूरत दिखती है. आगरा में यमुना को एक तरह से मर चुकी नदी कहा जा सकता है. अब समस्या ये है कि ताज की नींव इसी नदी के नीचे तले में है. शोध बताते हैं जलस्तर लगातार घट ही रहा है. ऐसे में डरावना सवाल ये है कि क्या अगर यमुना ने दम तोड़ा तो यह मुगल का मकबरा भी धंस जाएगा?
ताज की नीव वैसे भी बड़ा पेचीदा मसला है. आईआईटी-रुड़की के पूर्व डायरेक्टर प्रोफेसर एस.सी. हांडा कहते हैं, "ताज की नींव की प्रोफाइल का कोई ऐतिहासिक रिकॉर्ड भी मौजूद नहीं है. न ही सरकार ने इस जगह बोरहोल बनाने की कभी कोई कोशिश की, ताकि इसका विश्लेषण किया जा सके और कोई खतरा पैदा हो तो उससे निबटा जा सके. कई विशेषज्ञ 1980 के दशक से ही एएसआई से मांग करते आ रहे हैं कि ताज का भू-तकनीकी सर्वे करवाया जाए. मगर कुछ ऐसा नहीं हुआ है.

यमुना की हालत आगरा में बहुत खराब है.
2. प्लास्टिक का कहर
3 जून 2018. केंद्रीय संस्कृति और वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री डॉ. महेश शर्मा तमाम नेताओं और अधिकारियों के साथ ताज के आसपास के 500 मीटर के क्षेत्र को प्लास्टिक मुक्त करने का संकल्प ले रहे थे. लेकिन ताज में, पानी की बोतलें, पॉलीथीन बैग, जूते के कवर और पर्यटकों के फेंके स्नैक्स के रैपर दिखना आम बात है. एएसआइ के अधिकारियों के मुताबिक, यहां हर दिन फेंकी गई 12,000-20,000 बोतलें हटाई जाती हैं. इतना ही नहीं, शहर प्रति माह लगभग 180 टन प्लास्टिक अपशिष्ट पैदा करता है.
जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर में केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर एच.के. थापक और पी. राजाराम ने एक शोध के जरिए दिखाया कि विघटित प्लास्टिक कचरा मीथेन गैस पैदा करता है जो ताज के संगमरमर के रंग के पीला पड़ने में योगदान देता है. यह सब तब है जब 2014 से ही शहर में प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है.

3. कीड़े-मकोड़ों का तांडव
ताज के संगमरमर पर हरे दाग-धब्बों देखे जा सकते हैं. विशेषज्ञ बताते हैं कि ये दाग-धब्बे बहुत ही छोटे-छोटे कीड़ों या मच्छरों की देन हैं, जो काटते नहीं हैं और जिन्हें काइरोनोमस कहा जाता है. ये नर और मादा कीड़े शाम 6 से 8 बजे के बीच लाखों की तादाद में यमुना से निकलते हैं, हवा में सहवास और मैथुन करते हैं और फिर ताज महल के चमकदार संगमरमर से आकर्षित होकर उसकी दीवारों पर बैठ जाते हैं. वे 2-3 दिन जिंदा रहते हैं और मरने से पहले अधपचे क्लोरोफिल को हरे रंग की विष्ठा या मल की शक्ल में छोड़ जाते हैं. ताज के संगमरमर पर इसी के दाग-धब्बे होते हैं. इन कीड़ों के पैदा होने के पीछे यमुना के पानी में हो रहे बदलाव और गंदगी जिम्मेदार है.

ताजमहल की एक पुरानी तस्वीर जब यमुना में अच्छा खासा पानी था.
4. काले दाग कैसे पड़ रहे हैं?
एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने 2014 से 2017 के बीच कानपुर आईआईटी के विशेषज्ञों के साथ मिलकर ताज महल में और उसके आसपास परिवेश की हवा की जांच-पड़ताल शुरू की. इससे पता चला कि ताज महल के बदरंग होने की वजह बारीक कणों—काला कार्बन (कजली), भूरा कार्बन और धूल की परतों—का भारी जमाव था.
ये सबसे ज्यादा शहर में लोगों की गतिविधियों से — खास तौर पर बायोमास जलाने, या शहर के ठोस कचरे को खुले में जलाए जाने, लकड़ी और गोबर के कंडे जलाने और फसलों की पराली जलाने—से आ रहे थे और इसके अलावा डीजल उत्सर्जन और धुआं उगलने वाले वाहन तो थे ही. एक नए शोध से पता चलता है कि हवा में घुले कार्बन कण संगमरमर को बदरंग करके ताज पर कहर बरपा रहे हैं. आगरा वैसे भी दुनिया का आठवां सबसे प्रदूषित शहर है. यहां की हवा में राष्ट्रीय औसत से दोगुने से अधिक और डब्ल्यूएचओ मानक के आठ गुने से ज्यादा, प्रदूषण के कण मौजूद हैं. आगरा की हवा में 2.5 पीएम के कुल पदार्थ कण मौजूद हैं. जिनकी वजह से ताज महल बदरंग हो रहा है.

ताजमहल का जीर्णोद्धार की एक तस्वीर.
5. संगमरमर पर लग रहे मिट्टी के लेप पर भी बहस
मुल्तानी मिट्टी, अनाज, दूध और चूने को एक दूसरे में मिला लें. इसका लेप लगाएं, सुखाएं, धोएं और चमका दें. पारंपरिक तौर पर हिंदुस्तानी औरतें इस फेस-पैक का इस्तेमाल करती रही हैं. 1994 से इसे ताज महल की वायु प्रदूषण की कालिख और धूल धूसरित संगमरमर की दीवारों पर लगाया जा रहा है. हालांकि कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि इस मड पैक से ताज और भी पीला पड़ा हो सकता है. वे बताते हैं कि मुल्तानी मिट्टी ब्लीचिंग एजेंट है, यह बस इतना करती है कि संगमरमर की मूल पॉलिश को उतार देती है और छिद्रों को खोल देती है और इस तरह संगमरमर को पर्यावरण से होने वाले नुक्सान के प्रति और ज्यादा कमजोर और लाचार बना देती है.
6. गायब होती हरियाली
2006 में सुप्रीम कोर्ट ने एएसआई को ताज धरोहर गलियारा विकसित करने का निर्देश दिया था. यह आगरा के किले और ताज महल के बीच की जगह पर विकसित किया जाना था, ताकि ताज महल को वायु प्रदूषण, खास तौर पर रेत के कणों से सुरक्षित किया जा सके. उन रेत के कणों से जो मई-जुलाई के महीनों में यमुना की सूखी तलहटी से और साथ ही राजस्थान के भरतपुर से आम तौर पर 30-45 किलोमीटर प्रति घंटे और धूल-भरी आंधियों के दिनों में 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से ताज की दीवारों से टकराती हैं. और समय के साथ उसकी दीवारों पर दाग छोड़ जाती हैं. इस धूल से बचने के लिए ही रास्ते में पेड़ लगाने थे. मई 2018 में ये काम शुरू हो सका है.

ताजमहल की कलाकृतियां काली पड़ती जा रही हैं.
7. विशाल झुंडों का धावा
सबसे आखिरी और सबसे बड़ी वजह हैं आप और हम यानी पर्यटक. एक आम दिन में कोई 40,000 सैलानी ताज देखने आते हैं. वीकेंड में ये तादाद 70,000 तक पहुंच जाती है. नेशनल एन्वायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट की 2015-16 की एक एन्वायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिपोर्ट कहती है, "सैलानी मुख्य मकबरे की संगमरमर की सफेद दीवारों के सबसे नजदीक होते हैं जो उनके लगातार हाथों से छूने और रगड़ने की वजह से बदरंग होती जा रही हैं. एएसआई पर्यटकों को कम करने के लिए भी तमाम जुगाड़ कर रही है. मगर उससे कोई खास फायदा होता नहीं दिख रहा है.
बड़ी तादाद में लोगों की मौजूदगी से आती सीलन इसके लिए खासी नुक्सानदेह है. पर्यटकों का पसीना, तेल और धूल मिट्टी वगैरह संपर्क में आने पर संगमरमर सोख ले रहा है. जितनी ज्यादा देर होगी जमावट को हटाने में उतनी मुश्किल होगी. इसके अलावा आने वाले पर्यटकों का दीवारों पर गोदा-गादी करना जारी है.

ताजमहल में रोजाना हजारों लोग आते हैं.
ये तो हो गई समस्याएं. अब मुद्दा ये है कि क्या ताजमहल को वापस उसकी खूबसूरती नहीं दी जा सकती? जवाब है - हां, दी जा सकती है. पहली बार ताजमहल की मरम्मत का काम उसके बनने के चार साल के भीतर 1652 में ही शुरू हो गया था. अतीत में इसे कितनी बार लूटा गया, लगभग बर्बाद कर दिया गया और तकरीबन नीलामी पर चढ़ा दिया गया. नादिर शाह के फौजियों, भरतपुर के जाटों, ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारियों—सभी ने इसके हीरे-जवाहरात, कालीनों, कंदीलों, चांदी के दरवाजों और सोने के जंगलों पर हाथ साफ किए. पंजाब और कश्मीर के उग्रवादियों ने इसे उड़ा देने की धमकी दी. मगर ताज अडिग अपनी जगह खड़ा हुआ है.
जब ये इतने दिन बचा रहा तो आगे भी बचा रह सकता है. बस जिम्मेदारों को ठानना होगा कि इसे बचाना है. लोगों को खुद से सवाल पूछना होगा कि जो ताज पिछली 12 पीढ़ियों से हमारे साथ है, क्या हम इसे अगली 12 पीढ़ियों के लिए महफूज बना सकते हैं? हमें समझना होगा कि यह एक अद्भुत धरोधर है जिसे हमें संरक्षित करना होगा. अगर हम ऐसा नहीं करते, तो यह दुनिया हमें माफ नहीं करेगी.
देश को दूसरे देशों से सीखने की जरूरत
केंद्र से लेकर योगी सरकार भी ताज के लिए तमाम प्रयास करने के दावे कर रही हैं. करने भी चाहिए. इसमें उनका ही तो फायदा है. ताज महल सही से बना रहेगा तो पर्यटक आते रहेंगे. पैसा आता रहेगा. लोगों को रोजगार मिलता रहेगा. अपने देश को अन्य देशों से काफी कुछ सीखने की जरूरत है. उदाहरण के लिए इंग्लैंड, जहां विरासत पर्यटन अर्थव्यवस्था के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में विकसित हुआ है और यह देश की जीडीपी में 20.2 अरब पाउंड का योगदान करता है और 3,86,000 नौकरियां भी पैदा कर रहा है. अब बताइये भारत में कम संभावनाएं हैं क्या?
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रबीन्द्रनाथ टैगोर ने ये बात एक बार ताज महल का वर्णन करते हुए लिखी थी. मगर ताज महल का आज जो हाल हो गया है उसे देखकर आंखों में आंसू आते हैं. 11 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने ताज की दुर्दशा पर एक सख्त टिप्पणी करते हुए कहा -
आप ताज महल को बंद कर सकते हैं. आप चाहें तो उसे ध्वस्त भी कर सकते हैं. आप उससे पल्ला भी झाड़ सकते हैं.
जिम्मेदारों को आइना दिखाती कोर्ट की इस टिप्पणी ने इस धरोहर के संरक्षण को लेकर चल रही बात को आगे बढ़ाने का काम किया. दिखाया कि कोर्ट ताज को लेकर कितना सीरियस है. कोर्ट में 31 जुलाई से इस मामले की नियमित सुनवाई भी शुरू होनी है.

ताजमहल पर 31 जुलाई से शुरू होनी है सुनवाई.
बहस के केंद्र में एक बार फिर से पर्यावरणविद् और वकील एम.सी. मेहता हैं जिनकी 1980 के दशक में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद ही अदालत ने ताज महल के आसपास की आबोहवा को प्रदूषित करने के लिए मथुरा तेलशोधक कारखाने को फटकार लगाई थी. तब से सुप्रीम कोर्ट ने ताज महल के आसपास 10,400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ताज ट्रैपेज़ियम जोन (टीटीजेड) घोषित कर दिया और इस क्षेत्र में प्रदूषण वाली इकाइयों को बंद करने या फिर कहीं और स्थानांतरित करने का आदेश दिया था.
अब एक नए आवेदन में मेहता ने आरोप लगाया है कि ताज महल के रखरखाव में घोर लापरवाही बरती जा रही है. संगमरमर का रंग मटमैला हो रहा है, दरारें दिख रही हैं, मीनारें झुकने लगी हैं, पच्चीकारी उखड़ने लगी है, झूमर झड़ने लगे हैं, सीसीटीवी काम नहीं करते, ताज महल के चारों ओर की नालियां जाम पड़ी हैं, करीब के इलाकों में अतिक्रमण बढ़ा है, आसपास के क्षेत्र में उद्योगों और कारखानों की भरमार हो गई है. लगातार मरती यमुना ताज की नींव कमजोर कर रही है और कई तरह के कीट-पतंगे पैदा हो रहे हैं.
पिछले एक साल से इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट के चार नंबर कोर्टरूम में गहमागहमी चल रही है. जस्टिस मदन बी. लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता ने ताज के "बदरंग'' होने पर चिंता जताई थी. साथ ही इसे एक चेतावनी के रूप में लेने को कहा. अगस्त 2017 में भी, न्यायाधीशों ने केंद्र और उत्तर प्रदेश की नौकरशाही के रवैये पर उंगली उठाई और कहा, "यह विश्वप्रसिद्ध स्मारक है और आप इसे नष्ट करना चाहते हैं?'' नवंबर 2017 में उन्होंने संगमरमर के इस बेमिसाल स्मारक की खस्ताहाली की ओर सबका ध्यान खींचा था.
मई में अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को आड़े हाथों लेते हुए टिप्पणी की थी -
अगर ताज तबाह हो गया तो आप इसे फिर नहीं बना सकेंगे. आप के अनुसार, आप ताज की अच्छी तरह से देखभाल कर रहे हैं और कुछ करने की जरूरत नहीं है? आप तो यह स्वीकार करने तक को तैयार नहीं कि कोई समस्या भी है?श्मशान स्थल पर जज ने जताई थी चिंता
कोर्ट ने ताज को लेकर सख्त रुख अपनाया है.
एक और जज ने ताज महल की दुर्दशा पर सवाल खड़े किए थे. सितंबर 2015 में जब जस्टिस जोसेफ कुरियन परिवार के साथ ताज महल देखने गए तो अचानक उन्हें काला धुआं उठता दिखा. यह धुआं ताजमहल और आगरा किले के बीच स्थित एक श्मशान मोक्षधाम से निकल रहा था. जस्टिस जोसफ ने प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दखल की मांग की. लेकिन श्मशान स्थल को स्थानांतरित करने के प्रयासों का कोई नतीजा नहीं निकला.
ऐसे ही कई और कारण हैं जो ताज को बदरंग कर रहे हैं, जिन पर इंडिया टुडे ने विस्तार से रिपोर्ट की है. आइये एक-एक करके आपको उनके बारे में भी बताते हैं -
1. एक सूखती हुई नदी
ये सूखती हुई नदी है यमुना. अपने उद्गम स्थल यमुनोत्री ग्लेशियर से निकलने वाला यमुना का पारदर्शी नीला पानी आगरा पहुंचते-पहुंचते एक गंदे नाले का पानी बन जाता है. वैसे भी हरियाणा के हथिनीकुंड बराज पर यमुना का 99 प्रतिशत पानी हड़प लिया जाता है. पानीपत और आगरा के बीच कई नालों का काला गंदा पानी नदी में गिरता है. दिल्ली में यमुना सबसे ज्यादा प्रदूषित होती है. यहां 17 सीवेज से 3,296 एमएलडी नालों का पानी यमुना में गिरता है. उसके बाद रही सही कसर आगरा में पूरी हो जाती है. जिले में 122 किमी के सफर में इसमें करीब 90 नालों का पानी गिरता है, जिनमें केवल 29 नालों में ही पानी छानने वाले जाले हैं. यही वजह है कि ताज से अगर यमुना को देखें तो उसकी बड़ी भयावह सूरत दिखती है. आगरा में यमुना को एक तरह से मर चुकी नदी कहा जा सकता है. अब समस्या ये है कि ताज की नींव इसी नदी के नीचे तले में है. शोध बताते हैं जलस्तर लगातार घट ही रहा है. ऐसे में डरावना सवाल ये है कि क्या अगर यमुना ने दम तोड़ा तो यह मुगल का मकबरा भी धंस जाएगा?
ताज की नीव वैसे भी बड़ा पेचीदा मसला है. आईआईटी-रुड़की के पूर्व डायरेक्टर प्रोफेसर एस.सी. हांडा कहते हैं, "ताज की नींव की प्रोफाइल का कोई ऐतिहासिक रिकॉर्ड भी मौजूद नहीं है. न ही सरकार ने इस जगह बोरहोल बनाने की कभी कोई कोशिश की, ताकि इसका विश्लेषण किया जा सके और कोई खतरा पैदा हो तो उससे निबटा जा सके. कई विशेषज्ञ 1980 के दशक से ही एएसआई से मांग करते आ रहे हैं कि ताज का भू-तकनीकी सर्वे करवाया जाए. मगर कुछ ऐसा नहीं हुआ है.

यमुना की हालत आगरा में बहुत खराब है.
2. प्लास्टिक का कहर
3 जून 2018. केंद्रीय संस्कृति और वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री डॉ. महेश शर्मा तमाम नेताओं और अधिकारियों के साथ ताज के आसपास के 500 मीटर के क्षेत्र को प्लास्टिक मुक्त करने का संकल्प ले रहे थे. लेकिन ताज में, पानी की बोतलें, पॉलीथीन बैग, जूते के कवर और पर्यटकों के फेंके स्नैक्स के रैपर दिखना आम बात है. एएसआइ के अधिकारियों के मुताबिक, यहां हर दिन फेंकी गई 12,000-20,000 बोतलें हटाई जाती हैं. इतना ही नहीं, शहर प्रति माह लगभग 180 टन प्लास्टिक अपशिष्ट पैदा करता है.
जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर में केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर एच.के. थापक और पी. राजाराम ने एक शोध के जरिए दिखाया कि विघटित प्लास्टिक कचरा मीथेन गैस पैदा करता है जो ताज के संगमरमर के रंग के पीला पड़ने में योगदान देता है. यह सब तब है जब 2014 से ही शहर में प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है.

3. कीड़े-मकोड़ों का तांडव
ताज के संगमरमर पर हरे दाग-धब्बों देखे जा सकते हैं. विशेषज्ञ बताते हैं कि ये दाग-धब्बे बहुत ही छोटे-छोटे कीड़ों या मच्छरों की देन हैं, जो काटते नहीं हैं और जिन्हें काइरोनोमस कहा जाता है. ये नर और मादा कीड़े शाम 6 से 8 बजे के बीच लाखों की तादाद में यमुना से निकलते हैं, हवा में सहवास और मैथुन करते हैं और फिर ताज महल के चमकदार संगमरमर से आकर्षित होकर उसकी दीवारों पर बैठ जाते हैं. वे 2-3 दिन जिंदा रहते हैं और मरने से पहले अधपचे क्लोरोफिल को हरे रंग की विष्ठा या मल की शक्ल में छोड़ जाते हैं. ताज के संगमरमर पर इसी के दाग-धब्बे होते हैं. इन कीड़ों के पैदा होने के पीछे यमुना के पानी में हो रहे बदलाव और गंदगी जिम्मेदार है.

ताजमहल की एक पुरानी तस्वीर जब यमुना में अच्छा खासा पानी था.
4. काले दाग कैसे पड़ रहे हैं?
एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने 2014 से 2017 के बीच कानपुर आईआईटी के विशेषज्ञों के साथ मिलकर ताज महल में और उसके आसपास परिवेश की हवा की जांच-पड़ताल शुरू की. इससे पता चला कि ताज महल के बदरंग होने की वजह बारीक कणों—काला कार्बन (कजली), भूरा कार्बन और धूल की परतों—का भारी जमाव था.
ये सबसे ज्यादा शहर में लोगों की गतिविधियों से — खास तौर पर बायोमास जलाने, या शहर के ठोस कचरे को खुले में जलाए जाने, लकड़ी और गोबर के कंडे जलाने और फसलों की पराली जलाने—से आ रहे थे और इसके अलावा डीजल उत्सर्जन और धुआं उगलने वाले वाहन तो थे ही. एक नए शोध से पता चलता है कि हवा में घुले कार्बन कण संगमरमर को बदरंग करके ताज पर कहर बरपा रहे हैं. आगरा वैसे भी दुनिया का आठवां सबसे प्रदूषित शहर है. यहां की हवा में राष्ट्रीय औसत से दोगुने से अधिक और डब्ल्यूएचओ मानक के आठ गुने से ज्यादा, प्रदूषण के कण मौजूद हैं. आगरा की हवा में 2.5 पीएम के कुल पदार्थ कण मौजूद हैं. जिनकी वजह से ताज महल बदरंग हो रहा है.

ताजमहल का जीर्णोद्धार की एक तस्वीर.
5. संगमरमर पर लग रहे मिट्टी के लेप पर भी बहस
मुल्तानी मिट्टी, अनाज, दूध और चूने को एक दूसरे में मिला लें. इसका लेप लगाएं, सुखाएं, धोएं और चमका दें. पारंपरिक तौर पर हिंदुस्तानी औरतें इस फेस-पैक का इस्तेमाल करती रही हैं. 1994 से इसे ताज महल की वायु प्रदूषण की कालिख और धूल धूसरित संगमरमर की दीवारों पर लगाया जा रहा है. हालांकि कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि इस मड पैक से ताज और भी पीला पड़ा हो सकता है. वे बताते हैं कि मुल्तानी मिट्टी ब्लीचिंग एजेंट है, यह बस इतना करती है कि संगमरमर की मूल पॉलिश को उतार देती है और छिद्रों को खोल देती है और इस तरह संगमरमर को पर्यावरण से होने वाले नुक्सान के प्रति और ज्यादा कमजोर और लाचार बना देती है.
6. गायब होती हरियाली
2006 में सुप्रीम कोर्ट ने एएसआई को ताज धरोहर गलियारा विकसित करने का निर्देश दिया था. यह आगरा के किले और ताज महल के बीच की जगह पर विकसित किया जाना था, ताकि ताज महल को वायु प्रदूषण, खास तौर पर रेत के कणों से सुरक्षित किया जा सके. उन रेत के कणों से जो मई-जुलाई के महीनों में यमुना की सूखी तलहटी से और साथ ही राजस्थान के भरतपुर से आम तौर पर 30-45 किलोमीटर प्रति घंटे और धूल-भरी आंधियों के दिनों में 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से ताज की दीवारों से टकराती हैं. और समय के साथ उसकी दीवारों पर दाग छोड़ जाती हैं. इस धूल से बचने के लिए ही रास्ते में पेड़ लगाने थे. मई 2018 में ये काम शुरू हो सका है.

ताजमहल की कलाकृतियां काली पड़ती जा रही हैं.
7. विशाल झुंडों का धावा
सबसे आखिरी और सबसे बड़ी वजह हैं आप और हम यानी पर्यटक. एक आम दिन में कोई 40,000 सैलानी ताज देखने आते हैं. वीकेंड में ये तादाद 70,000 तक पहुंच जाती है. नेशनल एन्वायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट की 2015-16 की एक एन्वायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिपोर्ट कहती है, "सैलानी मुख्य मकबरे की संगमरमर की सफेद दीवारों के सबसे नजदीक होते हैं जो उनके लगातार हाथों से छूने और रगड़ने की वजह से बदरंग होती जा रही हैं. एएसआई पर्यटकों को कम करने के लिए भी तमाम जुगाड़ कर रही है. मगर उससे कोई खास फायदा होता नहीं दिख रहा है.
बड़ी तादाद में लोगों की मौजूदगी से आती सीलन इसके लिए खासी नुक्सानदेह है. पर्यटकों का पसीना, तेल और धूल मिट्टी वगैरह संपर्क में आने पर संगमरमर सोख ले रहा है. जितनी ज्यादा देर होगी जमावट को हटाने में उतनी मुश्किल होगी. इसके अलावा आने वाले पर्यटकों का दीवारों पर गोदा-गादी करना जारी है.

ताजमहल में रोजाना हजारों लोग आते हैं.
ये तो हो गई समस्याएं. अब मुद्दा ये है कि क्या ताजमहल को वापस उसकी खूबसूरती नहीं दी जा सकती? जवाब है - हां, दी जा सकती है. पहली बार ताजमहल की मरम्मत का काम उसके बनने के चार साल के भीतर 1652 में ही शुरू हो गया था. अतीत में इसे कितनी बार लूटा गया, लगभग बर्बाद कर दिया गया और तकरीबन नीलामी पर चढ़ा दिया गया. नादिर शाह के फौजियों, भरतपुर के जाटों, ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारियों—सभी ने इसके हीरे-जवाहरात, कालीनों, कंदीलों, चांदी के दरवाजों और सोने के जंगलों पर हाथ साफ किए. पंजाब और कश्मीर के उग्रवादियों ने इसे उड़ा देने की धमकी दी. मगर ताज अडिग अपनी जगह खड़ा हुआ है.
जब ये इतने दिन बचा रहा तो आगे भी बचा रह सकता है. बस जिम्मेदारों को ठानना होगा कि इसे बचाना है. लोगों को खुद से सवाल पूछना होगा कि जो ताज पिछली 12 पीढ़ियों से हमारे साथ है, क्या हम इसे अगली 12 पीढ़ियों के लिए महफूज बना सकते हैं? हमें समझना होगा कि यह एक अद्भुत धरोधर है जिसे हमें संरक्षित करना होगा. अगर हम ऐसा नहीं करते, तो यह दुनिया हमें माफ नहीं करेगी.
देश को दूसरे देशों से सीखने की जरूरत
केंद्र से लेकर योगी सरकार भी ताज के लिए तमाम प्रयास करने के दावे कर रही हैं. करने भी चाहिए. इसमें उनका ही तो फायदा है. ताज महल सही से बना रहेगा तो पर्यटक आते रहेंगे. पैसा आता रहेगा. लोगों को रोजगार मिलता रहेगा. अपने देश को अन्य देशों से काफी कुछ सीखने की जरूरत है. उदाहरण के लिए इंग्लैंड, जहां विरासत पर्यटन अर्थव्यवस्था के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में विकसित हुआ है और यह देश की जीडीपी में 20.2 अरब पाउंड का योगदान करता है और 3,86,000 नौकरियां भी पैदा कर रहा है. अब बताइये भारत में कम संभावनाएं हैं क्या?
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