रंडुआ. यानी वो पुरुष जिसकी पत्नी मर चुकी हो. लेकिन हर बार नहीं. 'रंडुआ' शब्द कोगांवों में उन मर्दों के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है, जिनकी एक बड़ी उम्र तक शादीनहीं होती.एक लंबे समय तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश गुंडई का गढ़ रहा है. जमीन-जायदाद के लिए एकाधलोगों को निपटा देना कोई बड़ी बात नहीं रही है. खेती के दम पर जीने वाले हम लोग,खेती बचाने के लिए कुछ भी करते हैं. चाहे वो घूस देना हो, धोखा देना, किसी की जानलेनी हो या अपनी पत्नी का बंटवारा करना हो.हां, सही पढ़ा आपने. पत्नी का बंटवारा.ये आज की नहीं, कुछ साल पहले की बात है. लगभग 20 साल पहले की. 65 साल का जयचंदइंडिया टुडे मैगजीन से बात कर रहा है. ये का शामली जिला है. जयचंद पिछले 40 सालोंसे अपने छोटे भाई महिपाल के साथ रह रहा है.जयचंद और महिपाल इतने अमीर नहीं थे कि जमीन का बंटवारा कर दोनों भाई अपने-अपनेपरिवारों को पाल सकें. इसलिए जयचंद ने फैसला लिया कि वो शादी नहीं करेगा. इस तरहउसकी मौत के बाद कोई वारिस नहीं बचेगा. और जमीन महिपाल के परिवार का अच्छे सेभरण-पोषण कर सकेगी.जयचंद का ये बलिदान बहुत बड़ा था. इसलिए महिपाल ने फैसला लिया कि वो अपनी पत्नीसमुद्री को जयचंद के साथ बांट लेगा. और महिपाल अपने परिवार और जयचंद के साथ आराम सेरहेगा. जयचंद की पूरे घर में ठीक उसी तरह इज्जत होगी, जिस तरह परिवारों में पिता कीहोती है.इसी तरह मुजफ्फरनगर के राजबीर सिंह और राम निवास के पास 25-25 बीघा जमीन थी. दोनोंकी जमीन बची रहे, इसलिए राम निवास ने फैसला लिया कि वो शादी नहीं करेगा. रामनिवाससेना में नायब सूबेदार था. पोस्टिंग मध्य प्रदेश में थी. जब भी घर आता, राजबीर औरउसकी पत्नी रज्जो उसकी सेवा करते हैं. तीनों को साथ रहने में कोई तकलीफ नहीं होती.दो भाई, पत्नी और 4 बच्चे ख़ुशी से रहते हैं. राजबीर ने इंडिया टुडे मैगजीन को बतायाथा: 'मुझे अपनी बीवी को अपने भाई के साथ बांटने में कोई समस्या नहीं है. जिस भाई नेपरिवार के लिए इतना बड़ा बलिदान दिया है, उस भाई के लिए इतना तो कर ही सकता हूं'इंडिया टुडे के 1999 के एक संकलन के मुताबिक उत्तर प्रदेश के मेरठ, बागपत औरमुज़फ्फरनगर में ये प्रथा थी. जिसे या तो रंडुआ प्रथा कहते थे. या द्रौपदी प्रथा.एक जाट लीडर कुलदीप सिंह के मुताबिक, 'रंडुए पुरुष को भाई की पत्नी के साथ सेक्सकरने की सुविधा देना आम बात है. परिवार इसी अरेंजमेंट के साथ रहते हैं.'कहते थे जब तक रंडुआ परिवार के साथ प्रेम से रहे तब तक ठीक है. लेकिन परिवार से खारखाकर अगर वो अपनी जमीन किसी बाहरी के नाम करना चाहे, तो परिवार इसी रंडुए का दुश्मनबन जाता था. ऐसा कई बार देखा गया है कि जायदाद के चक्कर में दो भाइयों में लड़ाईहुई, और गैर-शादीशुदा भाई को मार डाला गया. कई बार इन रंडुओं को बस इसलिए मार डालाजाता था कि सारी प्रॉपर्टी दूसरे भाई के हाथ जल्द से जल्द आ जाए. या मात्र इसलिए किवो किसी से ब्याह करने का फैसला न ले ले. 1994 के पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक एकमहीने में हुए 65 में से 40 मर्डर अधेड़ उम्र के गैर-शादीशुदा मर्द थे. ये वो समय हैजब पुलिस ने 'रंडुआ रजिस्टर' मेंटेन करना शुरू कर दिया था. और उस वक्त उस रिकॉर्डके हिसाब से इन तीनों जिलों (मेरठ, बागपत और मुज़फ्फरनगर) में कुल 1500 रंडुए रह रहेथे.और यही रंडुआ अगर परिवार के साथ रहे, तो भले ही वो परिवार का छोटा भाई हो, उसे पिताजैसी इज्जत मिलती थी. अगर परिवार का शादीशुदा भाई मर जाए, तो पत्नी पर नैसर्गिक रूपसे रंडुए भाई का हक हो जाता था. दोनों को एक सेक्शुअल रिश्ते में होने के लिए किसीतरह की शादी या पारंपरिक रिश्ते में बंधने की जरूरत नहीं होती थी. ऐसे में औरत केपास कोई विकल्प नहीं होता. उसे अपने रंडुए देवर या जेठ के साथ रहकर उसकी देखभालकरनी होती थी.आज से 20 साल पहले जब बनत गांव का विजय पाल सिंह टीबी से मर गया, उसका रंडुआ भाईमहक सिंह भाई की पत्नी के साथ रहने लगा था. उनकी कोई फॉर्मल शादी नहीं हुई थी. महककी मानें तो इस तरह घर की जमीन घर में रही, बंटने से बच गई.क्या रंडुए अब भी होते हैं?हां, अब भी होते हैं. लेकिन परिवार की व्यवस्था में इनकी वो भूमिका नहीं होती,जिसकी हमने ऊपर बात की है. बिहार में भी देखा गया है कि कुछ परिवार एक बेटे को'बागी' की तरह बड़ा करते थे. ये बागी लड़का बिगड़ैल, हिंसक और पौरुष से भरा हुआ होताथा. ताकि अगर किसी मसले में कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने पड़ें, तो ये लड़का काम आए.माना जाता है कि लड़का अगर शादी कर लेगा तो घरेलू हो जाएगा, जिम्मेदारियों से पटजाएगा. ऐसे में जरूरी है कि वो रंडुआ ही रहे, जिससे मौका पड़ने पर गुंडई कर सके. औरअगर बुरी से बुरी सूरत में ये लड़का मर भी जाए, तो इसके पीछे कोई अनाथ बच्चे याविधवा पत्नी न छूटे.खैर, बदलते समय के साथ जैसे-जैसे औरतें पढ़-लिख पा रही हैं, रंडुआ प्रथाजैसी व्यवस्था होना नामुमकिन हो गया है.हालांकि इंटरनेट पर चल रही कुछ डिस्कशन थ्रेड्स पर पढ़ें तो लोगों का मानना है कि येव्यवस्था कभी थी ही नहीं. और कुछ पत्रकारों ने जाटों के प्रति बुरी भावनाएं रखने कीवजह से ऐसा लिखा है. लेकिन पुरानी मैगजीन के पीले पन्नों से निकली पत्रकार सुभाषमिश्र की ये रिपोर्ट अलग ही कहानी कहती है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:100 औरतों का रेप हुआ, मिले ब्रा के दस किलो चीथड़े!