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क्या है RDE, जो सीमा पर निगरानी कर देश को परमाणु बम के खतरे से बचाएगा?

भारत सरकार, रेडिएशन डिटेक्शन इक्विपमेंट के जरिए एटॉमिक बम और दूसरी एटॉमिक डिवाइसेज में इस्तेमाल होने वाले रेडियोएक्टिव पदार्थ की तस्करी की जांच करेगी.

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16 अक्तूबर 2023 (पब्लिश्ड: 03:47 PM IST)
radioactive detection equipment nuclear device
सांकेतिक तस्वीर (आजतक)
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इंसानियत के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक है- परमाणु बम (Nuclear Bomb) . इसे इंसान ने खुद खोजा है. इससे बचने की कवायदें जारी हैं. जरूरी भी हैं. भारत सरकार (Government of India), पड़ोसी देशों से लगी सीमाओं पर रेडिएशन डिटेक्शन इक्विपमेंट (Radiation Detection Equipment) डिवाइसेज़ लगाने वाली है. इनके जरिए एटॉमिक बम और दूसरे एटॉमिक डिवाइसेज में इस्तेमाल होने वाले रेडियोएक्टिव पदार्थों की तस्करी की जांच की जाएगी. ये डिवाइसेज कहां लग रही हैं, रेडियोएक्टिव मटेरियल को कैसे डिटेक्ट करेंगी और देश की सुरक्षा के लिहाज से ये कितना जरूरी है, पांच पॉइंट में सारी बातें जानेंगे.

कहां लगेगी RDE डिवाइस?

आजतक की एक खबर के मुताबिक, अधिकारियों ने कहा है कि परमाणु उपकरण बनाने में रेडियोएक्टिव मटेरियल की तस्करी की आशंका है. इसलिए पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार और नेपाल की सीमाओं पर कुल आठ लैंड क्रांसिंग पॉइंट तय हुए हैं. जहां पर RDE उपकरण लगाए जाएंगे. लैंड क्रॉसिंग पॉइंट माने दो देशों की सीमा पर वो जगह जहां से दोनों तरफ सामान और लोगों की आवाजाही होती है. इंडो-पाकिस्तान बॉर्डर पर अटारी में, नेपाल बॉर्डर पर रक्सौल और जोगबनी में, म्यांमार से लगी सीमा पर मोरेह में और भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर पेट्रापोल, अगरतला, डावकी और सुतारकांडी में RDE लगाए जाएंगे.

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कब तक इंस्टॉल होंगे RDE?

इकॉनमिक टाइम्स की एक खबर के मुताबिक, 21 अगस्त 2020 को सरकार ने RDE डिवाइसेज़ के लिए RFI (यानी रिक्वेस्ट ऑफर इंटरेस्ट) जारी की थी. यानी RDE बनाने और इसके इस्तेमाल का काम देखने वाली कंपनियों को इसकी तकनीकी जानकारी, कीमत और दूसरी जरूरतें साझा करने के लिए प्रस्ताव दिया था. इसके तहत बोली लगाने वाली कंपनियों से उनके इस डिवाइस को इंस्टॉल करने के अनुभव की जानकारी भी मांगी गई थी. अमेरिका का न्यूक्लियर एनर्जी विभाग, कई देशों को रेडियोएक्टिव मटेरियल की तस्करी की जांच करने के मामले में मदद करता रहा है. अफगानिस्तान और उज्बेकिस्तान की सीमा पर भी उसके इस तरह के उपकरण इस्तेमाल किए गए हैं.

अगस्त 2021 में, इस प्रोजेक्ट से जुड़ा RPE (रिक्वेस्ट फॉर प्रोपोजल) जारी किया गया. यानी टेंडर जारी किया गया. तब कहा गया था कि ऑर्डर मिलने के तीन महीने बाद RDE का इंस्टॉलेशन शुरू हो जाएगा.

तब सरकार की तरफ से कहा गया था,

"बॉर्डर क्रॉसिंग्स, चेक पोस्ट्स और बंदरगाहों पर RDE लगाया जाना जरूरी है क्योंकि इन रास्तों का इस्तेमाल न्यूक्लियर डिवाइस या रेडियोलॉजिकल डिस्पर्सल डिवाइसेज़ के लिए जरूरी मटेरियल की स्मगलिंग के लिए किया जा सकता है."

अब जानकारी आई है कि उपकरणों की आपूर्ति, इंस्टॉलेशन और मेंटेनेंस के लिए एग्रीमेंट के बाद ऑर्डर दिया जा चुका है. और जल्द ही डीलर, RDE की डिलीवरी देंगे, जिसके बाद इन्हें लैंड क्रांसिंग पॉइंट्स पर इंस्टॉल किया जाएगा. माना जा रहा है कि सरकार ने अमेरिका सहित कुछ और विदेशी एजेंससियों से इस प्रोजेक्ट में मदद ली है.

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एटॉमिक रेडिएशन क्या है?

परमाणु हथियारों और उपकरणों में रेडियोएक्टिव तत्वों का इस्तेमाल होता है. ये तत्व कई तरह के रेडिएशन (विकिरण) छोड़ते हैं. मसलन- रेडियोएक्टिव प्रदार्थ का डिके (क्षरण) होना. न्यूक्लियर फिजन (नाभिकीय विखंडन) होना, या आयनाइज्ड रेडिएशन होना जैसे अल्फ़ा, बीटा पार्टिकल्स, गामा किरणों या न्यूट्रॉन का उत्सर्जन. ये रेडिएशन कितना ताकतवर हो सकता है, इसे ऐसे समझिए कि एक गामा किरण, काफी मोटी सीमेंट की परत को भी भेद सकती है. इन रेडियोएक्टिव तत्वों की इसी अपार ऊर्जा को एक एटॉमिक वेपन या किसी दूसरे उपकरण (मेडिकल या इंडस्ट्रियल यूज़) में ख़ास तरीके से इस्तेमाल किया जाता है. इस एनर्जी का इस्तेमाल अच्छे काम, मसलन- बिजली बनाने के लिए भी होता है, और बुरे काम, जैसे- तबाही लाने वाले बम विस्फोट के लिए भी होता है.

RDE तकनीक कैसे जांच करेगी?

अब बात इनके डिटेक्शन की. रेडियोएक्टिव पदार्थों के डिटेक्शन के लिए एक पूरी साइंस है- डोसीमेट्री (Dosimetry). यानी विज्ञान की वो शाखा या तकनीक जिसके रेडियोएक्टिव रेडिएशन को जांचा जाता है. मेटल डिटेक्टर या X-Ray डिटेक्टर रेडियोएक्टिव पदार्थों को नहीं पकड़ पाते. इसके लिए RDE जैसे ख़ास उपकरणों की जरूरत होती है. ये उपकरण, हवा या किसी सतह पर रेडियोएक्टिव रेडिएशन की मात्रा को मापते हैं. एक और बात, जैसा हमने आपको अभी बताया, रेडियोएक्टिव रेडिएशन इतने तरह के होते हैं कि किसी एक अकेली डिटेक्शन डिवाइस के लिए सभी तरह के रेडियोएक्टिव पदार्थों की जांच कर पाना बहुत मुश्किल है. लेकिन कहा जा रहा है कि RDE डिवाइस, अलग-अलग तरह के रेडिएशन को पकड़ सकती है. इसमें गामा और न्यूट्रॉन रेडिएशन अलार्म सिस्टम है. और इसमें जांच के दौरान संदिग्ध दिखने वाली चीजों की वीडियोफ्रेमिंग करने की तकनीक भी है.
एक अधिकारी ने बताया है कि, RDE डिवाइस, कई तरह के रेडिएशन में फर्क कर सकता है. ये जांच सकता है कि कोई रेडिएशन किसी खास एटॉमिक मटेरियल का है, या फिर फ़र्टिलाइजर्स या सेरेमिक्स से प्राकृतिक रूप से निकलने वाला रेडिएशन है या फिर रेडियोएक्टिव तत्व, यूरेनियम से निकलने वाले हाई-एनर्जी गामा आइसोटोप का रेडिएशन है.

RDE की जरूरत क्यों?

अभी जिन आठ ICPs यानी इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट्स पर RDE को लगाया जाना है, वहां से बड़ी तादाद में सामान और लोगों की सीमापार आवाजाही होती है. खबर के मुताबिक, एक दूसरे अधिकारी ने कहा कि रेडियोएक्टिव मटेरियल की तस्करी भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है. हालांकि भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय संबंध अच्छे नहीं हैं. सीमा पार उतनी आवाजाही भी नहीं है लेकिन दूसरे चेक पोस्ट्स पर काफ़ी चहल-पहल रहती है. RDE को ड्राइव-थ्रू मॉनिटरिंग स्टेशंस में लगाया जाएगा. बिल्कुल वैसे ही जैसे शॉपिंग मॉल वगैरह में मेटल डिटेक्टर लगे होते हैं. और इन स्टेशंस से आने-जाने वाले ट्रकों और सामान वगैरह की जांच होगी.

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