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क़तर में होने वाले फीफा फुटबॉल विश्व कप पर क्या बवाल हो गया?

फ़ीफ़ा की पूरी कहानी क्या है?

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फीफा फुटबॉल विश्व कप की तैयारी करता मजदूर (AFP)
फीफा फुटबॉल विश्व कप की तैयारी करता मजदूर (AFP)
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साजिद खान
14 नवंबर 2022 (अपडेटेड: 14 नवंबर 2022, 09:11 PM IST)
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20 नवंबर 2022 का दिन मिडिल-ईस्ट के देश क़तर के लिए एक ऐतिहासिक सौगात लेकर आने वाला है. 20 नवंबर से इस साल के फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप की शुरुआत होने वाली है. क़तर इसकी मेज़बानी कर रहा है. इस मेज़बानी के पीछे कई सारे कड़वे आरोप छिपे हैं. मसलन, मेज़बानी जीतने को लेकर घूसखोरी, मानवाधिकार उल्लंघन, बुनियादी अधिकारों पर पाबंदियां आदि. पिछले दिनों फ़ीफ़ा के पूर्व अध्यक्ष सैप ब्लेटर ने ये बयान देकर चौंका दिया था कि क़तर को फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप की मेज़बानी देना एक बड़ी भूल थी. दिलचस्प ये है कि क़तर की मेज़बानी का ऐलान 2010 में ब्लेटर ने ही किया था.

फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप को दुनिया के सबसे बड़े और सबसे महंगे खेल आयोजनों में गिना जाता है. इसकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि 2018 के फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप फ़ाइनल को 112 करोड़ लोगों ने टीवी पर लाइव देखा. ये दुनिया की कुल आबादी का लगभग 14 प्रतिशत था. यानी, ये इवेंट दुनिया के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करता है. क़तर के आयोजन पर पूरी दुनिया की नज़र बनी रहेगी. क्योंकि ये एक ऐसे देश में हो रहा है, जिसे इस तरह के खेल आयोजन का कोई अनुभव नहीं रहा है. और तो और, उसके ऊपर तमाम तरह के मानवता-विरोधी आरोप भी हैं.

तो, आज हम जानेंगे,

- फ़ीफ़ा की पूरी कहानी क्या है?
- फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप 2022 की मेज़बानी क़तर को कैसे मिली?
- और, क़तर की मेज़बानी को लेकर इतना बवाल क्यों मच रहा है?

शुरुआत इतिहास से,

ईसा के जन्म से करीबन दो सौ बरस पहले की बात है. चीन में कुजू नाम के एक खेल का ज़िक्र मिलता है, इस खेल में लोग अपने पैरों का इस्तेमाल करके गेंद को नेट में पहुंचाते थे. इसमें हाथों का इस्तेमाल वर्जित होता था. इसे चीन में मिलिट्री ट्रेनिंग में इस्तेमाल किया जाता था. बाद में चीन में ही सका विकास हुआ. ये गेम खुले में नहीं खेला जाता था. कुजू खेलने के लिए बड़े-बड़े कोर्ट बनाए गए. जिसे जू चांग कहा जाता था. इसमें 6 कोनों में आधे चांद की शेप में गोल हुआ करते थे.

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चीन में खेला गया कुजू खेल (AFP) 

कट टू 1904.

इस साल 21 मई को 7 नेशनल एसोसिएशंस ने मिलकर फ़ीफ़ा की स्थापना की. फ़ीफ़ा का फ़ुल फ़ॉर्म होता है, फ़ेडरेशन इंटरनेशनेल डि फ़ुटबॉल एसोसिएशन. इस एसोसिएशन में सात देश शामिल हुए थे - बेल्जियम, डेनमार्क, फ्रांस, नीदरलैंड, स्पेन, स्वीडन और स्विटजरलैंड. 1904 के पहले फुटबॉल का इतिहास इसलिए नहीं बता रहे क्योंकि इस खेल और इसके नाम में बहुत कम-कम समय में बदलाव आते रहे हैं. फीफा की स्थापना का एक मकसद ये भी था कि अमेरिकी फुटबॉल को सवर्मान मान लिया गया था, वहीं रग्बी गेम का चलन भी बढ़ रहा था, लेकिन दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी फुटबॉल खेली जा रही थी. लेकिन उसे उतनी अहमियत नहीं दी जा रही थी.

फीफा के पहले अध्यक्ष रॉबर्ट गुएरिन बने. फिर 1906 में बर्ली वूलफॉल ने इनकी जगह ले ली. दो साल बाद साल 1908 में फीफा ने अपना पहला टूर्नामेंट लंदन में 1908 ओलंपिक के लिए आयोजित किया. इस आयोजन में दुनिया भर के लोग शामिल हुए थे. इसलिए फीफा की लोकप्रियता बढ़ी. अब फीफा से दूसरे देश भी जुड़ना चाहते थे. 1909 में साउथ अफ्रीका, 1912 में अर्जेंटीना , 1913 में कनाडा और चिली और 1914 में अमेरिका ने भी फीफा की सदस्यता ले ली. अभी फीफा बड़े आयोजन नहीं कर रहा था, धीरे-धीरे फल-फूल ही रहा था कि दुनिया में संकट के बादल मंडराने लगे. 1914 में पहला विश्वयुद्ध शुरू हो गया. इससे फ़ीफ़ा के अस्तित्व पर ख़तरा मंडराने लगा. विश्वयुद्ध के दौरान किसी भी तरह का आयोजन नहीं हुआ था.

युद्ध खत्म होने के बाद फ़ीफ़ा की वापसी हुई. 1930 में संगठन ने पहला वर्ल्ड कप आयोजित किया. उरुग्वे में हुए इस आयोजन में 13 टीमों ने हिस्सा लिया. पहले विश्वयुद्ध को मेज़बान उरुग्वे ने अपने नाम किया. तब से हर चार साल पर फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप आयोजित हो रहा है. सिर्फ 1942 और 1946 में दूसरे विश्वयुद्ध के कारण वर्ल्ड कप का आयोजन नहीं हो पाया. मौजूदा समय में वर्ल्ड कप की ट्रॉफ़ी फ़्रांस के पास है. उसने 2018 के फ़ाइनल में क्रोएशिया को हराया था.

अब फ़ीफ़ा की संरचना समझ लेते हैं.

- फ़ीफ़ा के छह संघ हैं. ये दुनिया के अलग-अलग महाद्वीपों और इलाकों में संगठन का काम देखते हैं. ये छह क्षेत्र हैं - अफ़्रीका, एशिया, यूरोप, नॉर्थ एंड सेंट्रल अमेरिका एंड द कैरेबियन और साउथ अमेरिका. फ़ीफ़ा का मुख्यालय स्विट्ज़रलैंड के ज़्यूरिख में है. इसी वजह से इसे स्विट्जरलैंड के कानून के तहत काम करना होता है.

- दुनिया के दो सौ से अधिक फ़ुटबॉल संघ फ़ीफ़ा के सदस्य हैं. इसके अलावा, महिलाओं की 129 नेशनल टीमें भी इस संगठन से जुड़ी हुईं है.

- फ़ीफ़ा दुनिया का सबसे अहम फ़ुटबॉल संगठन है. लेकिन इसके पास अकेले दम पर खेल से जुड़े नियम तय करने का अधिकार नहीं है. ये काम इंटरनैशनल फ़ुटबॉल एसोसिएशन बोर्ड का है. फ़ीफ़ा इस बोर्ड का एक सदस्य मात्र है.

- फ़ीफ़ा का सबसे अहम अंग है - फ़ीफ़ा कांग्रेस. इसमें सभी सदस्यों का प्रतिनिधित्व होता है. कांग्रेस सालाना रिपोर्ट को अप्रूव करती है. नई टीमों की एंट्री पर भी वे ही फ़ैसला लेते हैं. इसके अलावा, कांग्रेस फ़ीफ़ा के अध्यक्ष, जनरल सेक्रेटरी और फ़ीफ़ा काउंसिल का भी चुनाव करती है.

- फ़ीफ़ा काउंसिल को पहले फ़ीफ़ा एग्जीक्यूटिव कमिटी के नाम से जाना जाता था. जब फ़ीफ़ा कांग्रेस का सत्र नहीं चल रहा होता है, तब यही कमिटी डिसिजन लेती है. एग्जीक्यूटिव कमिटी ही ये निर्णय लेती है कि आगे होने वाले वर्ल्ड कप की मेज़बानी किस देश को मिलेगी?

फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप की मेज़बानी कई मायनों में महत्वपूर्ण होती है. इस आयोजन के ज़रिए संबंधित देश को ग्लोबल प्लेटफ़ॉर्म का छाने का मौका मिलता है. फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप देखने के लिए दुनियाभर के लोग आते हैं. इससे टूरिज्म के क्षेत्र में कमाई बढ़ती है. और भी कई तरह के राजनैतिक और आर्थिक फायदे मिलते हैं. इसी वजह से फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप की मेज़बानी को लेकर काफ़ी टफ़ कंपटीशन चलता है. इसी मेज़बानी के झगड़े ने 2015 में खेलों के इतिहास के अब तक के सबसे बड़े स्कैंडल को उजागर किया था.

वो कहानी क्या है?

02 दिसंबर 2010 के दिन ज़्यूरिख के फ़ीफ़ा हेडक़्वार्टर में काफी गहमागहमी मची थी. उस दिन 2018 और 2022 के लिए मेज़बान देशों के नाम का ऐलान होने वाला था. इसमें दावेदारी पेश कर रहे देशों के गणमान्य लोग मौजूद थे. मसलन, ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरुन और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से लेकर फ़ुटबॉल स्टार डेविड बेकहम तक.

तय समय पर कार्यक्रम शुरू हुआ. माना जा रहा था कि 2018 की मेज़बानी इंग्लैंड और 2022 की मेज़बानी अमेरिका को मिलेगी. लेकिन अचंभा तब हुआ, जब फ़ीफ़ा के उस समय के प्रेसिडेंट सैप ब्लेटर ने लिफ़ाफ़े से रूस और क़तर का नाम बाहर निकाला. रूस को 2018, जबकि क़तर को 2022 की मेज़बानी का अधिकार मिला. ये आश्चर्यजनक था.
इस अचंभे की तीन बड़ी वजहें थीं.

- पॉइंट वन, रूस और क़तर दोनों पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लग रहे थे. 2014 में क्रीमिया पर अवैध क़ब्जे़ के बाद से पश्चिमी देश रूस पर प्रतिबंध लगा रहे थे. क़तर पर धार्मिक कट्टरता के आरोप लग रहे धे.

- पॉइंट टू. क़तर में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस के बीच में रहता है. क़तर को इससे पहले इस स्तर के किसी आयोजन का अनुभव नहीं था. उनके यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम्स नहीं थे. और तो और, उस समय तक क़तर के पास अपनी ढंग की फ़ुटबॉल टीम भी नहीं थी.

- पॉइंट थ्री, क़तर खुले तौर पर समलैंगिकों का विरोध करता है. जबकि फ़ीफ़ा में शामिल कई देशों में समलैंगिकों को संवैधानिक अधिकार मिले हुए हैं. खेल आयोजन के तौर पर फ़ीफ़ा भी खुले विचारों का समर्थन करता है. ऐसे में ये उनकी विचारधारा के बिलकुल उलट था.

रूस और क़तर के नामों की घोषणा के बाद थोड़ा विरोध हुआ. कुछ दिनों के बाद मामला शांत पड़ गया. फिर साल आया 2015 का. जून महीने में अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट ने फ़ीफ़ा के सात अधिकारियों को गिरफ़्तार किया. इसके कुछ घंटे बाद स्विट्ज़रलैंड में वर्ल्ड कप की मेज़बानी को लेकर जांच शुरू हुई.

शुरुआती जांच के बाद जस्टिस डिपार्टमेंट ने आरोप लगाया कि, मार्केटिंग एजेंट्स ने ब्रॉडकास्ट राइट्स हासिल करने के लिए 12 सौ करोड़ रुपये से अधिक की रकम घूस में दी. इसके बाद तो गिरफ़्तारियों का सिलसिला शुरू हो गया.

इसी बीच फ़ीफ़ा के एक अधिकारी ने गवाही की पेशकश की. चक ब्लेज़र को नॉर्थ अमेरिका में फ़ुटबॉल बिजनेस का गॉडफ़ादर कहा जाता था. वो 1996 से 2013 तक फ़ीफ़ा की एग्जीक्यूटिव कमिटी के सदस्य रहे. इस नाते उनके पास मेज़बानी के अधिकार के लिए वोट डालने का अधिकार था. उन्होंने 1998 में फ़्रांस और 2010 में साउथ अफ़्रीका के पक्ष में वोटिंग करने के एवज़ में पैसे खाने का आरोप स्वीकार लिया.

दूसरी तरफ़, स्विस अधिकारी 2018 और 2022 की दावेदारी की जांच कर रहे थे. तत्कालीन फ़ीफ़ा अध्यक्ष सैप ब्लेटर पर दबाव बढ़ रहा था. उन्होंने बीच में ही कुर्सी छोड़ दी. उनके अलावा UEFA के अध्यक्ष मिशेल प्लातिनी को भी अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.

कालांतर में और भी कई अधिकारियों को लपेटे में लिया गया. सैप ब्लेटर को भी जांच का हिस्सा बनाया गया. ब्लेटर पर आठ बरस का प्रतिबंध लगाया गया. मार्च 2021 में प्रतिबंध को छह बरस के लिए बढ़ा दिया गया. वो 2027 तक फ़ीफ़ा की किसी गतिविधि में हिस्सा नहीं ले सकते हैं.

इस कांड ने फ़ुटबॉल की दुनिया को शर्मसार किया था. लेकिन फ़ीफ़ा ने रूस और क़तर से मेज़बानी छीनने की संभावना सिरे से खारिज कर दी. 2018 में रूस में आयोजन संपन्न हो चुका है. इस साल क़तर मेज़बान है. उसके ऊपर किस तरह के आरोप लग रहे हैं?

क़तर में मानवाधिकार को लेकर फिर एक बार बहस तेज़ हो चुकी है, और इसी बहस में फीफा फिर सुर्खियों में आ गया है, क़तर में विश्व कप के आयोजन के लिए इंफ़्रास्ट्रक्चर का विकास किया गया. बहुत सारे स्टेडियम बनाए गए, बाहर से आने वाले दर्शकों के लिए ख़ूब सारे होटल्स भी बने. लेकिन इस चमक के पीछे का सच अंधकार से भरा रहा. क़तर पर आरोप लगे कि इंफ़्रास्ट्रक्चर को बनाने वाले मजदूरों के साथ घपलेबाजी हुई, आरोप ये भी लगे कि इन प्रोजेक्ट्स में काम करने के लिए जिन मजदूरों की भर्ती की गई है उनसे बेवजह की मोटी फीस वसूली गई.

पांच पॉइंट्स में पूरी बात जान लेते हैं.

- पहला नंबर. मजदूरों के अधिकारों का हनन.

क़तर में 20 लाख से ज़्यादा ऐसे लोग हैं जो दूसरे देशों से वहां काम करने आते हैं. जब फीफा ने 2022 विश्वकप की मेजबानी कतर को सौंपी तो इस बात पर कोई चर्चा नहीं हुई कि तपते रेगिस्तान में खेल के लिए स्टेडियम, होटल्स और दूसरे कंस्ट्रकशन कैसे होंगे? तब से लेकर अब तक बेशुमार ऐसी रिपोर्ट्स सामने आई हैं जिनमें मजदूरों के मानव अधिकार के हनन की बात कही गई है. इनमें कई केस ऐसे हैं जिनमें मजदूरों को उनकी महनत का पैसा नहीं दिया गया, या कम पैसा दिया गया हो, कई मामलों में पेमेंट डिले की बात कही गई. मजदूरों को तय समय से बढ़कर काम करवाया गया और उन्हें उसका पैसा नहीं दिया गया. आरोप हैं कि इस दौरान हज़ारों मज़दूरों की मौत हुई, लेकिन क़तरी अधिकारियों ने इसकी कोई सुध नहीं ली.मजदूरों की मौत की बाद क़तर के कानून के मुताबिक उनके परिवारों को मुआवज़ा दिया जाना था लेकिन उसमें भी घपलेबाजी के आरोप हैं. क़तर ने मजदूर अधिकारों के लिए कई रिफॉर्म्स की बात कही है. लेकिन उसके पुख़्ता सबूत नहीं मिलते हैं.

- नंबर दो, कफ़ाला सिस्टम.

कफाला ऐसा नियम है जिससे कोई प्राइवेट कंपनी किसी प्रवासी मज़दूर पर अपना अधिकार स्थापित कर सकती है. उससे अपनी मर्ज़ी के मुताबिक काम ले सकती है. कफाला सिस्टम ज़्यादातर अरब देशों में चलन में है. सीधे शब्दों में कहें तो दूसरे देश से आकर यहां नौकरी करने वाले मजदूर के पास उत्पीड़न से बचने का कोई रास्ता नहीं होता. वे अपनी मर्जी से नौकरी नहीं छोड़ सकते, देश से बाहर जाने के लिए भी उन्हें अपनी कंपनी से अनुमति लेना अनिवार्य होता है. अनुमति के बिना वे ना तो नौकरी बदल सकते हैं और न ही वापस जा सकते हैं.

- नंबर तीन, मजदूरी में कटौती और अवैध भर्ती फीस –

एकदम आसान भाषा में बताएं तो जिन मजदूर को कतर में काम करने पर बुलाया गया था और जितना उनसे वादा किया था उन्हें उतना पे नहीं किया जा रहा है. साथ ही विश्व कप के आयोजन के चलते लाखों ऐसे लोग थे जिन्हें लगा कि क़तर में बेहतर रोजगार मिलेगा, इसी अवसर को पाने के लिए कई लोग फर्जीवाड़े का शिकार हुए. काम की तालाश में क़तर आने के लिए फ़र्ज़ी एजेंट्स के जाल में फंसे, कई कंपनियों ने तो काम करने के लिए उनसे अवैध भर्ती फीस ली.

- नंबर चार, मजदूरों की मौत और प्रदर्शन –

क़तर के ऐडवांस हेल्थ केयर सिस्टम के बावजूद वहां की सरकार मजदूरों की मौत पर कोई स्पष्ट डाटा नहीं पेश कर पाई है. जो डाटा मौजूद है वो बहुत कन्फ्यूज़ करने वाला है. साल 2021 में गार्डियन ने एक रिपोर्ट पब्लिश की थी. इस रिपोर्ट में बताया गया था कि 2010 से 2020 के बीच क़तर में रहने वाले साउथ एशियन कंट्रीज़ के साढ़े 6 हज़ार लोगों की मौत हुई है. लेकिन सरकार ने इसका सिसिलेवार ढंग से डाटा पेश नहीं किया, मसलन वो कहां काम करते थे क्या काम करते थे? वगैरह वगैरह.. रिपोर्ट में ये भी सामने आया कि इन मौतों में 69 फीसदी लोग भारत नेपाल और बांग्लादेश से हैं. पिछले वर्षों में हुई मौतों की स्पष्ट वजह भी सरकार पेश नहीं कर पाई है. क़तर की सरकार ने मजदूरों के प्रदर्शन पर रोक लगाई हुई है. साथ ही ये फरमान भी जारी किया है कि कोई भी मजदूर किसी भी तरह की यूनियन ज्वाइन नहीं कर सकता है.

- नंबर पांच, करप्शन के आरोप.

साल 2011 में अमेरिका का इंटरनल रेवेन्यू सर्विस (IRS) फीफा से जुड़े एक अधिकारी चक ब्लेज़र की जांच कर रहा था. IRS ने पाया कि ब्लेज़र ने अपनी आय का टेक्स पे नहीं किया है, बाद में FBI भी इस जांच में शामिल हुआ. जब दोनों ने मिलकर जांच की तो भ्रष्टाचार के एक बड़े जाल का पता चला. इन एजेंसियों ने दुनियाभर की 33 देशों की पुलिस से संपर्क साधा, इसमें सामने आया कि फीफा के कई अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त थे. साल 2015 में फीफा के 14 अधिकारियों को अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ़ जस्टिस ने आरोपित किया. इनमें से कईयों को स्विट्जरलैंड में गिरफ्तार किया गया और अमेरिका में प्रत्यर्पित कर केस चलाए गए. जांच में पता चला कि इन लोगों ने 12 सौ करोड़ रुपयों से ज़्यादा की हेरा फेरी की है. और इस हेराफेरी में अमेरिका के बैंक का ही इस्तेमाल किया गया है.

तमाम आरोपों से इतर, क़तर एक समृद्ध देश है. उसके पास नेचुरल गैस का पर्याप्त भंडार मौजूद है. क़तर से ही अल-जज़ीरा चैनल भी चलता है. ये मिडिल-ईस्ट के सबसे प्रभावशाली मीडिया संगठनों में से है. दावा किया जा रहा है कि क़तर फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप का सफ़लतापूर्वक आयोजन पूरा कर लेगा. लेकिन अगर उसने इंसानों के बुनियादी अधिकारों पर गौर नहीं किया तो ये खेल के साथ-साथ इंसानियत की भी हार होगी.

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