नेटो और रूस में सीधी जंग की धमकी! पूरा मामला क्या है?
चर्चा है कि नेटो देश यूक्रेन को रूस के अंदर मारक हथियार चलाने की परमिशन दे सकते हैं. ऐसे में पुतिन ने चेतावनी दी है कि नेटो देशों से ऐसा करना सीधी जंग का आमंत्रण होगा. नेटो और लॉन्ग रेंज मिसाइलों का खेल क्या है? और व्लादिमीर पुतिन की धमकी में कितना दम है?

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने साफ-साफ कहा कहा है कि अगर नेटो ने यूक्रेन को लंबी दूरी की मिसाइलें इस्तेमाल करने की इजाज़त दी तो अंज़ाम बुरा होगा. उस स्थिति में नेटो, अमेरिका और यूरोप के साथ सीधी जंग होगी. पुतिन की धमकी ऐसे समय पर आई है, जब पश्चिमी देश यूक्रेन जंग में दखल बढ़ाने की फ़िराक़ में हैं. चर्चा है कि नेटो देश यूक्रेन को रूस के अंदर मारक हथियार चलाने की परमिशन दे सकते हैं. अभी ज़्यादातर सैन्य मदद डिफ़ेंस के लिए दी जा रही है. रूस के अंदर घातक लंबी दूरी की मिसाइलों और दूसरे घातक हथियार चलाने की छूट नहीं दी है.
दरअसल, अगस्त 2024 से यूक्रेन की फ़ौज रूस के अंदर घुसकर हमला कर रही है. कुर्स्क और बेलोग्रोद प्रांत में बढ़त भी बनाई है. यूक्रेन चाहता है कि पश्चिमी देश उसको ढील दें. ताकि रूस पर और दबाव बनाया जा सके. पिछले कुछ दिनों में पश्चिमी देशों ने हिंट दिया है कि वे यूक्रेन को रियायत दे सकते हैं. मसलन, जब 11 सितंबर को अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन से सवाल पूछा गया. उन्होंने कहा कि हम इस पर विचार कर रहे हैं. इसके कुछ घंटे बाद अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन का बयान आया. बोले, हम उनकी मांग को ध्यान से सुन रहे हैं. जल्दी ही कोई फ़ैसला लिया जाएगा. फिर 12 सितंबर को पोलैंड ने लंबी दूरी की मिसाइलों पर प्रतिबंध हटाने की मांग की. अब 13 सितंबर को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर अमेरिका में हैं. वो राष्ट्रपति बाइडन से मिलने वाले हैं. इस मुलाक़ात में लॉन्ग-रेंज मिसाइलों का मुद्दा भी उठ सकता है.
आख़िर लॉन्ग-रेंज मिसाइलों का मसला क्या है? और पश्चिमी देश यूक्रेन को ढील देने से बच क्यों रहे हैं? और व्लादिमीर पुतिन की धमकी में कितना दम है? आइए विस्तार से समझते हैं.
नेटो क्या है?नेटो का फ़ुल फ़ॉर्म है - नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन (NATO). स्थापना 1949 में हुई. मकसद था - सोवियत संघ के विस्तार को रोकना. कुल सदस्य हैं – 32. सोवियत यूनियन के पतन के बाद नेटो का मकसद बदल गया.
नेटो को लेकर दो बातें जाननी ज़रूरी हैं. पहली, नेटो का आर्टिकल फ़ाइव कहता है कि किसी एक सदस्य देश पर हुआ हमला पूरे नेटो पर हमला माना जाएगा. उस स्थिति में सब मिलकर उस हमले का जवाब देंगे. अभी तक के इतिहास में सिर्फ़ एक बार आर्टिकल फ़ाइव का इस्तेमाल हुआ है. वो मौका था, 9/11 का आतंकी हमला. दूसरी बात, नेटो के पास अपनी ख़ुद की सेना नहीं है. सदस्य देशों की सेनाओं को जोड़कर नेटो की शक्ति को आंका जाता है.
कौन कितना ताक़तवर? क्या नेटो की तुलना रूस से की जा सकती है? कुछ आंकड़ों से समझते हैं,
- नेटो के पास लगभग 76 लाख सैनिक हैं. वहीं रूस के पास 35 लाख से कुछ ज़्यादा सैनिक हैं.
- नेटो के पास लगभग 8 लाख पैरामिलिटरी फ़ोर्स है. जबकि रूस के पास लगभग ढाई लाख.
- नेटो देशों के पास लगभग 22 हज़ार एयरक्राफ्ट्स हैं. जबकि रूस के पास लगभग 5 हज़ार.
- नेटो के पास लगभग 9 हज़ार मिलिटरी हेलिकॉप्टर्स हैं. वहीं रूस के पास डेढ़ हज़ार से थोड़े ज़्यादा हेलिकॉप्टर्स हैं.
ये हुई रूस और नेटो की सैन्य क्षमता की बात. यहां एक बात नोट करिएगा. हमने नेटो की जितनी ताक़त बताई, उसमें सबसे बड़ा योगदान अमेरिका का है. अमेरिका ना सिर्फ़ नेटो देशों में, बल्कि पूरी दुनिया में सेना पर सबसे ज़्यादा खर्च करने वाला देश है. हालांकि, हमें ये बात याद रखनी चाहिए कि रूस दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु ताकत है. उसके पास अमेरिका चीन से ज़्यादा परमाणु हथियार हैं. हालिया जंग में पुतिन कई दफे परमाणु हथियार इस्तेमाल करने की धमकी दे चुके हैं. उनकी धमकी को हल्के में नहीं लिया जा सकता है.
रूस में सर्गेइ कारागनाव नाम के पॉलिटिकल साइंटिस्ट हैं. रूसी सरकार के ख़ास समझे जाते हैं. वो सरकार को सलाह देते रहते हैं. उन्होंने रूसी अखबार कोमेसेंत को इंटरव्यू दिया. उसमें बोले, रूस परमाणु युद्ध छेड़े बिना ही नेटो देशों पर लिमिटेड न्यूक्लियर अटैक कर सकता है. पुतिन को अब अपनी न्यूक्लियर पॉलिसी बदलनी चाहिए. हमें ये संदेश देना चाहिए कि हम अपने दुश्मनों पर परमाणु हमला करने के लिए तैयार है. हालांकि, उन्होंने ये भी कहा कि मैं परमाणु युद्ध का समर्थन नहीं करता हूं. पश्चिम एक अंतहीन लड़ाई लड़ सकता है. मैं नहीं चाहता ऐसा हो, लेकिन एक भयानक स्थिति पर पहुंचने से पहले हमें ये रोक देना होगा. कारागनाव के अलावा भी कुछ कट्टरपंथी किस्म के लोग पुतिन पर परमाणु हथियार के इस्तेमाल का दबाव बना रहे हैं.
हालिया मुद्दा क्या है?पिछले कुछ महीनों से यूक्रेन मांग कर रहा है कि उसे रूस के अंदर लंबी दूरी की मिसाइल का इस्तेमाल करने दिया जाए. ऐसी मिसाइल जो रूस के अंदर जाकर तबाही मचा सके. ऐसे में सवाल उठता है कि यूक्रेन की इस मांग पर अचानक एक्शन क्यों लिया जा रहा है? जबकि यूक्रेन तो महीनों से लंबी दूरी की मिसाइल इस्तेमाल करने की इजाज़त मांग रहा था.
इसकी दो बड़ी वजहें हैं. पहली, रूस को ईरानी मिसाइलों की सप्लाई की रिपोर्ट्स. सितंबर की शुरुआत में रिपोर्ट आई थी कि ईरान, रूस को मिसाइलों की सप्लाई कर रहा है. सबसे पहले अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी रिपोर्ट में ये दावा किया. फिर यूरोपियन यूनियन ने चिंता जताई. उसके बाद अमेरिका ने भी कहा कि इसके लिए ईरान पर प्रतिबंध लगाया जाएगा. ईरान ने रिपोर्ट को झूठा बताया है. रूस ने भी आरोप स्वीकार तो नहीं किया. मगर इतना ज़रूर कहा कि ईरान हमारा अच्छा सहयोगी है. हम उससे हर किस्म का व्यापार करने के लिए आज़ाद हैं.
दूसरी वजह है, परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का डर. यूक्रेन ने अगस्त से रूस के कुर्स्क प्रांत पर क़ब्ज़ा कर रखा है. पुतिन अभी तक उसको वापस लेने में सफल नहीं हुए हैं. इसके चलते उनके ऊपर दबाव बढ़ रहा है. जानकारों का मानना है कि पश्चिमी देश रूस को इंगेज करना चाहते हैं. ताकि पुतिन जंग को यूक्रेन से बाहर लेकर ना जाएं.
रूस का इसपर क्या कहना है?ज़ाहिर सी बात है वो ऐसे हथियारों का इस्तेमाल नहीं ही चाहेगा. उसका तर्क है कि इस तरह की लंबी दूरी की मिसाइल यूक्रेन ऑपरेट नहीं कर सकता है. इन्हें चलाने के लिए सेटलाईट से डाटा इकठ्ठा किया जाता है, ताकि सीधे टारगेट को निशाना बनाया जा सके. ये तकनीक फिलहाल यूक्रेन के पास नहीं है. पर नेटो देशों के पास ज़रूर है. इसलिए पुतिन ने कहा है कि अगर इनका इस्तेमाल होता है तो हमारे नेटो से सीधी जंग होगी.
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