( ये लेख मुंबई से लल्लनटॉप के दोस्त पुनीत शर्मा ने ख़ास हमारे इसरार पर भेजा है.पुनीत फिल्मी दुनिया में गीत और कहानी लिखने का काम करते हैं.)--------------------------------------------------------------------------------अक्सर मैं अपने कुछ ख़ास दोस्तों से एक सवाल करता हूं. जब भी मैं किसी फ़िल्म कीपटकथा पर काम कर रहा होता हूं, मुझे उसमें कहीं गानों की गुंजाइश नहीं दिखाई देती.क्या ये उस आदमी के लिए आश्चर्य की बात नहीं है, जिसकी पहली पहचान गीतकार के रूपमें है? उससे भी बढ़कर बात ये कि उस गीतकार को गीतों से एक ख़ास किस्म का अथाह प्रेमहै. इसके बदले में मुझे बहुत से जवाब मिलते हैं, लेकिन कोई एक ऐसा जवाब नहीं मिलताजो मुझे संतुष्ट कर सके. जब सौरभ ने मुझे इस साल के फ़िल्मी गीतों पर कुछ लिखने कोकहा, तो मैंने सोचा क्यों ना इसी बहाने अपने सवाल की ख़ोज पर भी निकला जाए. किसी औरके दिए काम में अपना स्वार्थ ढूंढ लेने से बड़ी कोई और उपलब्धि नहीं है. बशर्ते आपकास्वार्थ आपको उस मुख्य उद्देश्य से दूर न ले जाता हो. वैसे मैं एक स्वघोषित निडरमनुष्य हूं लेकिन अपने समय के गीतों पर लिखते हुए एक डर रहता है. पहला डर यह किकहीं आप गीतों को सिर्फ़ गीतकार के रूप में तो नहीं सुन रहे और दूसरा ये कि आप परअपने ही साथियों की समीक्षा की ज़िम्मेदारी है. समीक्षा को सरल करने के लिए मैं इसेदो भागों में बांट रहा हूं. कुछ गीत वो होंगे जो अपनी धुन के साथ मुझे दूसरों सेबेहतर लगे और दूसरे वो जिनके शब्द धुन के बग़ैर मेरे ज़्यादा करीब आए. ये कोई मेरिटलिस्ट नहीं है. ऐसे कई गीत हो सकते हैं जो मेरे कानों तक पहुंचे ही ना हों. ऐसे भीगीत आपको शायद यहां न मिलें जो बहुत ख़ूबसूरत हों लेकिन आज ये लिखते हुए मुझे उनसेकोई खास जुड़ाव महसूस न हुआ हो. जनवरी शुरुआत करते हैं जनवरी से जिसकी एक फ़िल्म केगानों ने ऐसी उम्मीद बांधी थी कि, इस साल अगर कुछ और अच्छा नहीं भी सुनने को मिलातो इनके सहारे ज़िंदा रहा जा सकता है. वो फ़िल्म थी "जुगनी" और गीतकार थे "शैली"और उन शब्दों को "क्लिंटन" के बेहद खूबसूरत और नए साउंड ने अपने कंधों पर यूं उठारखा था, जैसे कोई अत्तार दो ख़ुशबुओं को मिला के एक अलहदा इत्र बनाता है. विशालभारद्वाज की महीन आवाज़ में डूबा "डुग डुगी डुग" इस फ़िल्म का हासिल था और इसे सालके सबसे बड़े गानों में बिना विवाद शामिल किया जा सकता है. आव-भगत में मुस्कानें,फ़ुर्सत की मीठी तानें, दाएं का हाथ पकड़ के, बाएं से पूछ के, ओए ओए होए डुग डुगी डुगशोर भरे शब्दों के दौर में इतना सहज सुनना बड़ा "रेयर" है. दूसरी फ़िल्म जो उम्मीदजगाती आई वो थी "साला खड़ूस" लेकिन स्वानंद की कुछ अच्छी लाइनें, बहुत सारे गानों औरठीक-ठाक संगीत की भीड़ में खो सी गईं. जैसे "तेरी नज़र जाए जिधर, मेरी नज़र रखे उस पेपहरा". हमारे ज़्यादातर श्रोताओं के पास अब इतना वक्त है नहीं कि, वो एक ढेर में सेअच्छा माल ढूँढ सकें. वो तो यूट्यूब पर ट्रेंड होते सारे गाने सुन ले वही काफ़ी है.फ़रवरी फिर आया फ़रवरी और मुझे पहला सुकून दिया "फ़ितूर" ने. यहां स्वानंद के बोल यूंही खर्च नहीं हुए. अमित के साथ उनकी जुगलबंदी काफ़ी अच्छी रही. जिसका शिखर रहा"पश्मीना". अमित के संगीत का अपना एक बोलने का ढंग है. सौ गानों की भीड़ में आप उनकेसंगीत का डायलेक्ट पकड़ सकते हैं. ठीक यही बात स्वानंद की भाषा पर भी सटीक बैठती है.कच्ची हवा, कच्चा धुआं घुल रहा ऐसे बोलों के साथ फ़ितूर के संगीत का बैलेंस काफ़ीबेहतरीन रहा. अमित और स्वानंद आख़िरी बार "काय पो चे" में साथ सुनाई दिए थे, लेकिनउस लज़्ज़त का ज़िक्र इस मज़े को शायद थोड़ा कम कर दे. इस महीने के बाकि गाने ठीक-ठाक तोथे लेकिन एक घिसी-पिटी लकीर पर चल रहे थे. पिछले साल ऐसे ही गानों की मांग के कारणतंग आकर मैंने गाने लिखना लगभग छोड़ ही दिया था. तो क्या ये कारण था कि मेरी लिखीफ़िल्मों में मुझे गानों की गुंजाइश नहीं दिखती क्यों कि मुझे लगता है कि गानों कोसुनने वाले ख़त्म हो गए हैं. ऊपर लिखे गए गानों को पढ़कर तो ऐसा नहीं लगता. तो फिरक्या कारण है? इस बात पे सर खुजाते हुए मैं फ़रवरी की जिस अगली फ़िल्म पे बात करनाज़रूरी समझूंगा वो है "नीरजा". नीरजा के गाने ऐसे हैं जिन्हें नज़रंदाज़ भी नहीं कियाजा सकता और ना ही उन्हें सुनकर प्रसून और विशाल-शेखर जैसे बड़े नामों का एहसास होताहै. कुछ ऐसा लगता है कि खाना तो अच्छा था लेकिन इनसे हमारी "उम्मीद" कहीं ज़्यादाबड़ी थी. जब आप बड़े खिलाड़ी बन जाते हैं तो आपको खेलने के लिए एक बड़ा और खुला मैदानमिलता है. लोग चाहते हैं कि वो आप उन्हें अपने खेल से चमत्कृत करें. फिर आप चाहेजैसे-तैसे जीत जाएं लेकिन ये "जैसे-तैसे" उस जीत को जीत नहीं रहने देते. मैं किसीजीत-हार से नहीं, खेलने के हुनर पर फ़िदा होता हूं. हारने में कैसे हुनर ? चलिए मैंआपको एक हारे हुए हुनर की मिसाल देता हूँ । उसका नाम था "ज़ुबान" की एलबम और गाना था"अज्ज सानु ओ मिलिया"। हार इसी बात की थी कि इतने अच्छे गाने को उसका ड्यू नहींमिला और जीत थी ऐसे कमाल के बोल, जीवें धर्त नु बीज, बीजा नु फूल फुला नु त्रैल,त्रैल नु किरण किरना नु रंग, रंगा नु नैन नैना नु ख्वाब जी अज्ज सानु ओ मिलेया आपपूरा गीत तसल्ली के साथ सुनेंगे तो आपको समझ आएगा कि सुरजीत पातर के बोलों के साथवरुण ग्रोवर ने बड़े ही भले से ताल मिला कर, इसे यूं पूरा किया है कि पता नहीं चलता,एक कहां शुरू हुआ है और दूसरा कहां ख़त्म. मार्च इसके बाद तो मुझे मार्च में सिर्फ़एक ही ऐसा गाना मिला, जिसे मैं यहां शामिल कर सका. वो था कपूर एंड संस का "बोलना"जिसका संगीत तनिष्क बाग़ची का था और बोल थे डॉक्टर देवेंद्र काफ़िर के. फ़िल्म अच्छीथी लेकिन उसमें गानों की जगह नहीं दिखती थी. गानें उसमें ज़बरदस्ती घुसाए गए थे.शायद ये भी एक बड़ा डर है जो मेरी कई पटकथाओं से गानों को दूर रखता है. अप्रैल ख़ैर !मार्च गुजरने के बाद अप्रेल की पहली फ़िल्म थी "की एंड का". "जी हुज़ूरी" इसका एक ऐसागाना था जो मैं सईद कादरी के लिए सुन सका, लेकिन ऐसे गानें में जब आप मन डुबाने कीकोशिश करते हैं तो आपका माथा कांच से टकरा जाता है. यही हाल गानों की एक लंबीफ़ेहरिस्त का है. इन गानों से शिकायत ये होती है कि पहली बार सुनने के लिए इस तरह केगाने सतह पर अच्छे होते हैं लेकिन उनसे दूसरी-तीसरी बार मिला जाए, तो वो वही बातेंउसी तरह से दोहराते हैं. मेरी ग़लती शायद यही है कि मेरी दिलचस्पी, दिलचस्प लोगो मेंहै. इन्हीं दिलचस्प गानों को ढूंढते हुए मेरे हाथ लगी एक छोटी सी फ़िल्म, "निल बटेसन्नाटा". इस फ़िल्म में मनोज यादव ने "मौला" और "मुरब्बा" नाम के दो गीत बड़े हीकरीने से लिखे थे. उनमे से भी ख़ास था मुरब्बा. इतना सच बता दे ज़िंदगी तू रिश्ते मेंमेरी क्या लगती है मुझको मैं अच्छी लगती हूं तुझको तू कैसी लगती है इन गानों केबोलों में ताज़गी भी थी और संगीत उनके साथ कदम मिला के भी चल रहा था. लंबी यात्राओंका सहारा ये छोटे सुख ही होते हैं. इस सुख को भोग के थोड़ा आगे बढ़ा तो मुझे मिला,मैथियास डुप्लेसी के कांसे जैसे झनझनाते हुए संगीत में डूबा "लाल रंग" का एक गीत"बावली बूच". गीतकार दुष्यंत ने इस गाने में बहुत ही सुंदर और सौंधे शब्दों काप्रयोग मुहावरों की तरह किया है. कह गए स्याणे, सोच-साच के सहज पके के तो आवे स्वादइश्क पकाया मंदी आंच पे बहुत पके तो हो बरबाद गाना हिट तो था लेकिन शायद उतने लोगोंतक नहीं पहुंचा, जिसका वो हकदार था. जब एक मन से लिखा हुआ गाना उसकी ऑडियंस तक नहींपहुंचता तो एक अनकहा मलाल रह जाता है. ख़ासकर ऐसे गाने का जो अच्छा होकर भी उसी आयतनका हो, जिसे प्रसिद्धि के तरल में डुबाने से आर्किमिडीज़ के सिंद्धात के मुताबिक़प्रसिद्धि को आयतन के बराबर छलकना चाहिए लेकिन ऐसा हुआ नहीं. ऐसी घटनाओं के बादआपको सुनने वालों के बारे में कुछ समझ नहीं आता, लेकिन फिर बाज़ार के बारे में सबकुछसमझ आ जाता है. मई अप्रेल की उहापोह के बाद मई ख़ाली मिला. जो कुल जमा हासिल था वो"बुद्धा इन ट्रैफिक जैम" फिल्म में रोहित शर्मा के संगीत में बंधी फैज़ की नज़्मेंथी. फैज़ साहब के बारे में तो क्या कहूं लेकिन रोहित ने "चंद रोज़" और "बेकार कुत्ते"अच्छे से कंपोज़ किया. जून इसके बाद सीधे जून में "धनक" आई और मनोज यादव ने एक बढ़ियागीत लिखा "जीने से भी ज़्यादा" और "te3n" के गानों में अमिताभ भट्टाचार्य ने कुछअच्छी लाइनें लिखी. क्लिंटन ने टुकड़ों में अच्छा संगीत भी दिया लेकिन कोई एक गानापूरी तरह रिझा नहीं पाया. फिर दो महीनों के इंतज़ार के बाद स्याह आसमान में चमका"उड़ता पंजाब" नाम का एक धूमकेतू. मैं उड़ता पंजाब के किस गाने का ज़िक्र करूँ और किसेछोडूं समझ नहीं आता. फिर भी दो गाने, शैली का "डा डा डस्से" और वरुण का "उड़ दापंजाब" इतने खूबसूरत थे कि दोनों ने मुझे काफ़ी कुछ दिया. "डर डा डा डस्से रे औरमंज़िल हस्से रे" और "अंदर का कुत्ता अज्ज कड़िये" शैली ने "चिट्टा वे" और बाकि गानोंमें भी कोई कमी नहीं छोड़ी. अमित ने फिर से अपना लहज़ा संभालते हुए संगीत को कहींकहीं एक नई ख़ुशबू भी दी. इत्र का टॉप नोट उन्होंने बदला, हार्ट नोट ज़रा सा नए जादूसे ब्लेंड किया लेकिन बेस नोट वही रखा जिसके लिए वो पहचाने जाते हैं. शैली से मिलाये साल का आख़िरी जादू था. लेकिन वरुण का कमाल यहीं नहीं रुका और वो रमन राघव 2.0में क़त्ले-आम, पानी का रास्ता और बेहूदा के साथ लौटा. शब्दकोष के क्रूर, लहूलुहानशब्दों को मासूम लफ़्ज़ों के पास बिठाकर पैदा किए गए आतंक में बुने हुए इस फ़िल्म केसारे गानें कमाल थे लेकिन,"तेरा ख़ून है सौ में नब्बे काला"सिर्फ़ इसी एक लाइन के दम से ही "बेहूदा" इस फ़िल्म का हासिल था.जुलाई इसके बाद जुलाई में स्कूल खुले और सुल्तान आया. इरशाद पूरे साल में पहली बारझलके ख़ून में तेरे मिट्टी, मिट्टी में तेरा ख़ून ऊपर अल्लाह नीचे धरती, बीच में तेराजूनून फ़िल्म के बाकि गाने "जग घुमेया" और "बुलेया" भी विशाल-शेखर की धुन और इरशादके बोलों का अच्छा संगम रहे. इरशाद ने इसके ठीक बाद मदारी के "डम डम" में एक कलेवरके बोल दिए. बैठ बैठ संतों की गोदी बिना तेल के जनता धो दी दिल्ली बैठा बड़ा विरोधीरे अगस्त जुलाई और अगस्त में ढिशुम, मोहनजोदड़ो, रुस्तम के एल्बम टुकड़े-टुकड़े मेंकुछ गीतों के साथ आए, लेकिन उनका मामला भी मन डुबाने की कोशिश में माथा कांच परमारने वाला था. सिर्फ़ मोहनजोदड़ो में रहमान के संगीत के बारे में ये नहीं कहा जासकता. सितंबर फिर सितंबर में "बार-बार देखो" ने ऐसा कुछ ख़ास नहीं दिया लेकिन,"पिंक" ने कुछ ख़ूबसूरत गाने दिए, खासकर शांतनु की सधी हुई धुन और क़ुरतुलैन बलोच कीमहीन आवाज़ पे तनवीर गाज़ी का बहुत उम्दा गीत "कारी कारी", जिसमे तनवीर के शब्द चुनावऔर "इमेज" के इस्तेमाल को आप नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. छावं छैली धूप मैली क्यों हैरी ठीक उसके बाद स्वानंद ने "पार्च्ड" में "माई री माई" नामक एक नोटिस करने लायकगीत लिखा. बेंजो में अमिताभ ने "उड़नछू" गीत के अच्छे बोल लिखे लेकिन वो गाना भीकहीं अधपका रह गया. "एम एस धोनी" में मनोज मुंतशिर और अमाल का "बेसबरियां" सितंबरके आख़िरी छोर पर खड़ा एक अच्छा गीत रहा. अक्टूबर अक्टूबर तो ख़ैर दूर से ही बता रहाथा कि मैं अपनी शुरुआत साल के सबसे बड़े धमाके "मिर्ज़्या" के साथ करूँगा लेकिन जबधमाका हुआ, उसकी गूंज उम्मीद से दो मील दूर तक सुनाई दी. इस फ़िल्म के हर गाने मेंशंकर-एहसान-लॉय और गुलज़ार ने "उड़ता पंजाब" के बाद पंजाब की मिट्टी से दूसरी तरह काबड़ा चमत्कार पैदा किया. तीन गवाह हैं इश्क के एक नदी थी दोनों किनारे थाम के बहतीथी कोई लाए चिंगारी इश्क़ दी फिर अग्ग लगे असमान अफ़सोस, इन गानों ने अपने भीतर अलहदाअफ़साने तो पैदा कर कर लिए लेकिन फ़िल्म का कमज़ोर अफ़साना इन गानों को अपने कंधों परनहीं उठा सका. जैसे किसी हाइवे पर आपके साथ-साथ एक बस चल रही हो और उसकी खिड़की परएक ख़ूबसूरत लड़की/लड़का हो. आप दोनों को पहली नज़र में इश्क़ हो जाता है और आप एक दूसरेको पूरे रास्ते निहारना चाहते हैं. तभी एक बस का पेट्रोल ख़त्म हो जाता है और आपकीप्रेम कहानी भी. हम जैसे पागल तो बस से उतर कर लड़की को ढूंढ भी लें लेकिन क्या हरआदमी ये कर सके ये मुमकिन है? फ़िल्म अगर चलती तो इन गानों की उम्र कहीं-कहीं ज़्यादाहोती. इसके बाद आई "शिवाय" के कुछ गीत कुछ हिस्सों में अच्छे लगे लेकिन प्रीतम ने"ऐ दिल है मुश्किल" में ना सिर्फ़ अच्छे गाने दिए बल्कि उन्हें जनता ने पूरी तरह सेकबूला. कितनी दफ़ा, सुबह को मेरी तेरे आंगन में बैठे मैंने शाम किया ये अमिताभभट्टाचार्य की साल में पहली फ़िल्म थी, जिसमें वो खुल के चमके लेकिन अभी उनकी चमक कोउसके हिस्से की कुछ और आग मिलनी बाकि थी. नवंबर नवंबर की शुरुआत एक निराशा से हुईजिसका नाम था "रॉक ऑन". गीत फ़िल्म जितने उबाउ नहीं थे. तुम कोई गुण में कम हो येझूठ है अधिकार कम पाओ तो ये लूट है जावेद साहब के बोल कई जगह बेहतरीन थे लेकिन इसफ़िल्म की पहली किश्त ने हमें शंकर-एहसान-लॉय और जावेद अख़्तर के वो गाने दिए थे,जिन्होंने लंबे वक़्त तक हमारी ज़ुबान पर कब्ज़ा बनाए रखा था. इस कारण ये काम कोई नईउम्मीद नहीं देता. "तुम बिन 2" भी ठीक इन्ही मायनों में निराश कर के गई. इसके बादआई "डियर ज़िंदगी" में कौसर मुनीर के गीत फ़िल्म के स्वाद की तरह हलके-फुल्के थे.मेरे मोहल्ले में, चांद जो आया है ईद जो लाया है, तू ही तो नहीं अम्मी ने मेरी जो,सूट सिलाया है ख़्वाब दिखाया है, तू ही तो नहीं फिर "बेफिक्रे" के साथ बड़े लंबे वक्तबाद मैदान में उतरे जयदीप साहनी. गानें उन्होंने सभी अच्छे लिखे और सबसे खूबसूरत था"नशे सी चढ़ गई", लेकिन विशाल-शेखर के संगीत के नीचे कुछ बहुत कमाल बोल दबे-दबे सेसुनाई दिए.खुलती बसंत जैसे धुलता कलंक जैसे दिल की दरार में हो प्यार का सीमेंट जैसे अंखियोंही अंखियों में जंग की फरंट जैसे मिल जाए सदियों से अटका रिफंड जैसेमैं जयदीप को गीतों के मायने के साथ शब्दों के साउंड का चुनाव करने के लिए भीबेहतरीन मानता हूं. वो अमिताभ या स्वानंद की तरह गायक नहीं है फिर भी वो अपने गानोंमें कमाल की आवाज़ें लाते हैं. जिस तरह साउंड का इस्तेमाल गुलज़ार सबसे कमाल कीखूबसूरती से करते हैं. दिसंबर फिर आया साल का अंत और अमिताभ ने फिर एकबार 2017 परचाळा पाड़ते हुए लट्ठ गाड़ दिया.मांगती है लागत में तुझसे हर बूंद पसीना पर मुनाफा बदले में ये जान ले बेहद देती हैरे बंदे की मेहनत को किस्मत का सादर परनाम है प्यारे दंगल दंगल, दंगल दंगल सूरजतेरा चढ़ता ढलता गर्दिश में करते हैं तारे दंगल दंगल, दंगल दंगलआप इस फ़िल्म का कोई भी गीत उठाइए और वो आपकी प्यास पूरी कर देगा. फिर भी मेरापसंदीदा गीत वो रहा जिसे लोगों ने अभी इतना नहीं सुना है. एक नयी सी दोस्ती आसमांसे हो गयी ज़मीन मुझसे जल के मुंह बना के बोली तू बिगड़ रही है ज़िंदगी भी आज कलगिनतियों से "लूम के" गणित के आंकड़ों के साथ एक आधा शेर पढ़ रही है मैं सही ग़लत केपीछे छोड़ के चली कचहरियां दंगल की क़ामयाबी का शुक्रिया, ये गाना यूं ही खराब नहींजाएगा. कभी-कभी फ़िल्म बड़ी भी हो लेकिन फ़िल्म की कहानी में गीत सहजता से ना आते होंतो वो अपना महत्व खो देते हैं. इसी अंत के बाद होती है एक शुरुआत. ऐसे गानों की जोहमने सुने ही नहीं. अजी हमारी लफ़्फ़ाज़ी से कहीं तलवार नहीं अड़ती, हमारे झूठों सेमरकज़ की सरकार नहीं गिरती राजशेखर ने ये गीत "शहर महबूब" एक "क्यूट कमीना" नाम कीबेनाम सी फ़िल्म के लिए लिखा था. डर इसी बात का है कि मैं इस फ़िल्म से जुड़ा था तभीमुझे इसका पता लग सका. न जाने कितने ही ऐसे ख़ूबसूरत गीत लोगों तक पंहुचने से पहले"हिट हुक्लाइन्स" के शोर में गुमनामी रहते हुए दम तोड़ देते हैं. हमारे कुछ गीतकारोंको कई दफ़े इन्हीं हुकलाइनों की तलाश में सहजता से समझौता करना पड़ता है. गानेंबनवाने वालों का मानना है जो एक हद तक दुःखद रूप से सच भी है कि, लोगों में लंबीलाइनें सुनने की क्षमता कम हो रही है. सुनने वाले संगीत के सुख भोगने में भीशीघ्रपतन का शिकार हो रहे हैं. उन्हें ठहर के कही जाने वाली बातें सुनने से बोरियतहोने लगती है. सहजता से बोली जाने वाली बातें उन्हें हज़ारों में एक बार चमत्कृतकरती है. उन्हें गाने सुनने से ज़्यादा देखने की आदत हो चली है. गानें भी अब तभी गौरसे सुने जाते हैं जब उसमे कोई सितारा हो या दृश्य मनमोहक हों. इंडी म्युज़िक कोमुख्यधारा में लाने के सपनों के लगभग दम तोड़ देने के बाद, छोटी फिल्मों के बड़ेगानों का दौर भी अब बहुत कमज़ोर होता दिखता है. शायद यहीं आकर मेरा सवाल जवाब केसबसे करीब आता है. छोटी फ़िल्में अगर कोई बहुत बड़ा झंडा भी गाड़ दें, तो उनकी आवाज़ एकविशिष्ट वर्ग तक ही पहुंच पाती है. ये ही वो सब कारण हैं जो मुझसे गाने लिखवाना भीचाहते हैं और मुझे निराश भी करते हैं. जब तक सुनने और बनाने वाले, गाने बनवानेवालों के उस बड़े समूह से सीधे ये मांग नहीं करते, दोनों को एक साल में इन्हीं चंदगानों से मन भरना होगा. जब तक हम डांस और प्रेम गीतों से आगे नहीं बढ़ते, उम्मीद औरसतही फलसफ़ों से ज़्यादा भी मांग नहीं करते, हमें कई खूबसूरत और जादुई पहलुओं कोगुनगुनाने के सुख से महरूम रहना होगा. हमारी अर्थव्यवस्था का एक बड़ावर्ग और उनकेछोड़े-बड़े सुख-दुःख अपने लिए गीत खोज रहे हैं. दुनिया में पचास करोड़ के करीबहिंदीभाषियों के मन क्या दो-चार भावनाओं में डूब के मर जाते हैं ?सच कहूं तो होस्टलकी मेस में चंद सब्ज़ियों से बोर हो जाने वाला यूथ कई सालों से चंद ही ख़्यालों कोतीन-चार ग्रेवियों में मिला कर खाने का आदी कैसे हो जाता है मुझे समझ नहीं आता. इसकशमकश को दिल में लिए हुए मैं नए साल तो नहीं पर नए कैलेंडर से उम्मीद रखता हूं. नया साल दरअसल एक नया कैलेंडर है, कैलेंडर से उम्मीद नहीं करनी चाहिए उसके पीछेलिखी भविष्यवाणियों से भी नहीं, आदमी का नया कैलेंडर, रंग, तस्वीरों, कीमत की दबीमुस्कराहट में, उसके पिछले साल के बारे में बताता है, खैर , कैलेंडर चाहे जैसा होतारीखें सब पर वही होती हैं, उन पर निशान लगाइए, निशानों से उम्मीद कीजिए, वो आपकाएलान हैं, खुद से उम्मीद करना एक अच्छी बात है, इतना ही मुझे पता है इतना ही ज्ञातहै-------------------------------------------------------------------------------- ये भी पढ़ेंहिंदी सिनेमा ने पिछले साल इन दृश्यों में अपनी तमाम पूँजी उंडेल दी है! इन्हेंबार-बार देखा जाना चाहिए2017 की 15 फिल्में जो सबसे ज्यादा तृप्त करेंगी!2016 के 11 सबसे खूबसूरत लिखे हुए गानेफिल्में देखने वालों की 5 कैटेगरी, तुम किसमें आते हो?