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PM मोदी G20 में गए, BRICS में नहीं गए, क्या मतलब निकाला जाए?

BRICS में सारे मुख्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष थे; बस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बैठक में शामिल नहीं हुए. उनकी जगह विदेश मंत्री एस जयशंकर ने प्रतिनिधित्व किया.

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23 नवंबर 2023 (पब्लिश्ड: 06:53 PM IST)
modi in g20 and brics
भारत का रुख तटस्थता का है. कहीं बढ़ कर खेलते हैं, कहीं लेट-कट और कहीं डक भी करते हैं. (फ़ोटो - PTI)
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इज़रायल और हमास की जंग (Israel-Hamas war) ने दुनिया को बांट दिया है. भू-राजनीति में सारा फ़साद इसी बात पर है कि कौन-किसके पाले में है. पाले साफ़ भी हैं और धुंधले भी, क्योंकि कई देशों का रुख बड़ा 'सेफ़' है. BRICS ग्रुप (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका) के नेताओं ने जंग पर चर्चा करने के लिए 21 नवंबर को एक वर्चुअल बैठक रखी. प्रमुख देशों में से सभी ने इज़रायल की कार्रवाई की पूरी तरह से या आंशिक तौर से निंदा की है. इस वजह से ये माना जा रहा था कि इस पर सर्वसम्मति तक पहुंचा जा सकता है. मगर ये हो ना सका, क्योंकि भारत की तरफ से पीएम नरेंद्र मोदी बैठक में शामिल नहीं हुए.

इस मीटिंग का शीर्षक था - 'मध्य-पूर्व की स्थिति पर संयुक्त बैठक'. इसमें ब्राज़ील के लूला डी सिल्वा, रूस के व्लादिमीर पुतिन, चीन के शी जिनपिंग और दक्षिण अफ्रीका के सिरिल रामफ़ोसा मौजूद थे. यानी लगभग सारे मुख्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष थे; बस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बैठक में शामिल नहीं हुए. उनकी जगह विदेश मंत्री एस जयशंकर ने प्रतिनिधित्व किया. तो सवाल उठने लाज़मी थे, कि प्रधानमंत्री मोदी इस 'संयुक्त बैठक' में शामिल क्यों नहीं हुए?

पहले तो, मीटिंग में बात क्या हुई?

BRICS की ये बैठक दक्षिण अफ़्रीका ने बुलाई थी, जो अभी ग्रुप का सदर है. वो ग़ाज़ा पट्टी में इज़रायल की बमबारी और 'हत्याओं' के ख़िलाफ़ काफी मुखर भी रहा है. हाल ही में वहां के अधिकतर सांसदों ने वोट किया था, कि जब तक इज़रायल युद्धविराम के लिए सहमत नहीं हो जाता, तब तक इज़रायली दूतावास को बंद किया जाए और उनके साथ राजनयिक संबंधों को ख़त्म कर दिया जाए. पिछले हफ़्ते उन्होंने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक कोर्ट (ICC) से मांग भी की थी, कि इज़रायल की गतिविधियों की जांच की जाए और बेंजामिन नेतन्याहू के ख़िलाफ़ वॉरंट जारी किया जाए.

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बीते मंगलवार को हुई बैठक में दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफ़ोसा ने इज़रायल पर युद्ध अपराधों और ग़ाज़ा में 'नरसंहार' के आरोप लगाए. अपनी शुरूआती टिप्पणी में उन्होंने कहा,

"इज़रायल जिस तरह से फ़ोर्स का ग़ैर-क़ानूनी इस्तेमाल कर रहा है, फ़िलिस्तीनियों को 'सामूहिक सज़ा' दे रहा है, वो युद्ध अपराध है. ग़ाज़ा के निवासियों को दवा, ईंधन, भोजन और पानी से जानबूझकर वंचित करना नरसंहार जैसा ही है."

ब्रिक्स वर्चुअल बैठक का स्क्रीनशॉट.

पुतिन और शी ने इतनी ज़ोर से तो नहीं बोला, मगर बोला. दोनों ने ही युद्धविराम की अपील की और बंधकों को छोड़ने का आग्रह किया. हालांकि, पुतिन इस मौक़े पर भी अमेरिका की आलोचना से नहीं चूके. कहा कि ये विवाद अमेरिका की नाक़ामयाब कूटनीति की वजह से हो रहा है. वहीं, शी ने कहा कि विवाद का मूल कारण ये है कि फ़िलिस्तीनियों को उनके राज्य के अधिकार, उनके अस्तित्व के अधिकार से वंचित रखा गया है.

भारत ने क्या कहा?

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत का पक्ष रखा, कि तत्काल संकट एक आतंकवादी हमले की वजह से शुरू हुआ है और जहां आतंकवाद का सवाल है, किसी को भी समझौता नहीं करना चाहिए. हालांकि, अगली ही पंक्ति में उन्होंने 'टू-स्टेट सल्यूशन' पर भी ज़ोर दिया. कहा,

"जहां तक आतंकवाद का सवाल है, हममें से किसी को भी इसके साथ समझौता नहीं करना चाहिए. बंधक बनाना भी उतना ही अस्वीकार्य और अक्षम्य है. बड़े पैमाने पर नागरिकों की मौत और मानवीय संकट को देखते हुए हमारी चिंता और बढ़ गई है. हम नागरिकों की मौत की कड़ी निंदा करते हैं."

विदेश मंत्री ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि प्रधानमंत्री मोदी ने इस संदर्भ में क्षेत्र और दुनिया भर के कई नेताओं से बात की है. 

लेकिन प्रधानमंत्री आए क्यों नहीं?

न्यूज़ पोर्टल द प्रिंट ने सरकारी सूत्रों के हवाले से छापा कि प्रधानमंत्री का शेड्यूल पहले से तय था. उन्हें राजस्थान चुनाव प्रचार के लिए जाना था. फिर एक बात ये भी निकल कर आई कि अगले ही दिन - 22 नवंबर को - G20 की वर्चुअल समिट होनी थी. इज़रायल-हमास जंग के ही बैक-ड्रॉप में हुई इस समिट की सदारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की और वहां उन्होंने साफ़ कहा कि आतंकवाद सभी देशों को अस्वीकार्य है और नागरिकों की मौत - कहीं भी हो - निंदनीय ही है.

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भू-राजनीति के कई जानकार इस बात को हाइलाइट करते हैं कि इज़रायल-हमास युद्ध पर नई दिल्ली का रुख पूर्व के बजाय, अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के क़रीब है. उनका कहना है कि हम ब्रिक्स की जगह G20 को तरजीह दे रहे हैं. दोनों ग्रुपिंग्स की पॉलिटिक्स और झुकाव जग-ज़ाहिर हैं. तो नरेंद्र मोदी की ब्रिक्स में ग़ैर-मौजूदगी को किस तरह देखा जाए? या देखा जा रहा है? इसके लिए हमने बात की थिंक टैंक MP-IDSA में असोसिएट फ़ेलो डॉ स्वस्ति राव से. उन्होंने हमें बताया,

"भारत की विदेश नीति का मूलभूत सिद्धांत है मल्टी-अलाइनमेंट. माने हम किसी ख़ेमे की राजनीति के पैरोकार नहीं है. अपने राष्ट्रीय हितों के हिसाब से अपनी विदेश नीति तय करते हैं. लेकिन ये कहना कि G-20 का महत्व उतना ही है, जितना क्वॉड का या ब्रिक्स का -- ये ग़लत होगा. क्योंकि भारत हमेशा नैशनल इंट्रेस्ट के हिसाब से ही देश और इस तरह के समूहों को अमहियत देता है."

स्वस्ति कहती हैं कि भारत ग्लोबल साउथ के लिए सच में प्रतिबद्ध है. उसमें कोई घालमेल नहीं. लेकिन हमारी विदेश नीति में आतंकवाद के ख़िलाफ़ कड़ा रुख है. इस वजह से हमें एक-तरफ़ा देखा जा सकता है. साथ ही भारत किसी भी ऐसी ग्रुपिंग को बहुत अहमियत नहीं देगा, जिसमें चीन का प्रभुत्व है. तो भारत का ग्लोबल साउथ के प्रति कमिटमेंट अपनी तरफ़. लेकिन केवल इसलिए कि भारत ब्रिक्स का मेंबर है, इसीलिए ज़रूरी नहीं कि बाक़ी देशों से सहमत भी हो.

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दूसरा सवाल: BRICS के सभी प्रमुख देशों ने इज़रायल की कार्रवाई की निंदा की. सो माना जा रहा था कि सर्वसम्मति तक पहुंचा जा सकता है. मगर भारत के रुख के चलते ये नहीं हो पाया. क्या भारत के इस स्टैंड की वजह से BRICS के अंदर तनाव पैदा हो सकता है?

“देखिए. ये वही दक्षिण अफ़्रीका, वही चीन है, जिन्होंने कभी यूक्रेन पर रूसी आक्रमण की निंदा नहीं की. आज वही युद्धविराम और मानवीय संकट के लिए आवाज़ उठा रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आप इसे दोहरा चरित्र भी कह सकते हैं, मौक़ा-परस्ती भी और शुद्ध रूप से इसे किसी देश की स्वतंत्र विदेश नीति कहा जा सकता है. हमने भी रूस-यूक्रेन युद्ध के वक़्त अपनी तटस्थता नहीं छोड़ी. अमेरिका के कहने के बावजूद रूस का खंडन नहीं किया.”

राजनीति देश की हो या अंतरराष्ट्रीय, इसमें कुछ सही-ग़लत नहीं होता. केवल मौक़े और समय की बात है. भारत का रुख तटस्थता का है. कहीं बढ़ कर खेलते हैं, कहीं लेट-कट और कहीं डक भी करते हैं. इसमें कई तरह की ऑप्टिक्स शामिल है. और सारा खेल ऑप्टिक्स है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का किसी बैठक में दिखना भी, और कहीं न दिखना भी.

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