The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • PM Modi says dushyant kumar gajal in speech, rahul asks question on Adani

मोदी ने जिस गज़ल का शे'र पढ़ा, उसकी बाकी लाइनें सरकारों को चुभ जाती हैं!

बगावती तेवर वाले दुष्यंत कुमार की इस गजल की बाकी लाइनें भी जरूर पढ़नी चाहिए

Advertisement
PM Modi Dushyant Kumar Parliament
PM मोदी ने दुष्यंत कुमार की गजल का शे'र पढ़ा (फोटो साभार आज तक और Wikimedia)
pic
शिवेंद्र गौरव
8 फ़रवरी 2023 (अपडेटेड: 8 फ़रवरी 2023, 10:12 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बजट सत्र के सातवें दिन राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब दे रहे थे. जो लोग शे'र, गजल सुनने-कहने के शौक़ीन नहीं भी हैं, उन्होंने भी मोदी की ज़बानी एक शे'र आज खूब सुना.

शे'र है-

तुम्हारे पांव के नीचे कोई ज़मीन नहीं,
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं.

इसे हिंदी-उर्दू गज़ल के अज़ीम शायर दुष्यंत कुमार ने लिखा है. ये असल में मतले का शे'र है. मतला यानी एक भरी-पूरी गज़ल का पहला शे'र. मोदी ने शे'र पढ़ा तो मुझे दुष्यंत कुमार याद आ गए. वो दौर भी याद आया जब उनका लिखा जनमानस के लिए 'विद्रोह का नारा' था, जब छात्रसंघ चुनावों के जयघोष में दुष्यंत के मिसरे होते थे.

दुष्यंत कुमार त्यागी की पैदाइश साल 1933 की है. इलाहाबाद से पढ़ाई हुई थी. शुरुआत में 'परदेसी' और बाद में दुष्यंत कुमार नाम से कविताएं और गजलें लिखीं. नागार्जुन और धूमिल की तरह ही दुष्यंत की भाषा आसान और आम बोलचाल की थी. लेकिन, तेवर बगावती थे. हालांकि कई बार आलोचक उनकी कलमकारी के नुक्ताचीन भी रहे हैं. उनकी शायरी के मीटर पर सवाल उठाते रहे हैं. लेकिन, साल 1975 की 30 दिसंबर को 42 साल की उम्र में जब दुष्यंत का देहांत हुआ, तब देश में इंदिरा गांधी के लगाए आपातकाल के कुछ महीने ही गुजरे थे. इस वक़्त दुष्यंत के शे'र जनता की आवाज कहे जाते थे. आख़िरी दौर में जब दुष्यंत भोपाल में राजभाषा विभाग में काम कर रहे थे, तब उनकी गजलें केंद्र सरकार के खिलाफ हुआ करती थीं.

देहांत से कुछ महीने पहले दुष्यंत ने लिखा था,

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है,
आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है.

खास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,
यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है.

एक बूढा आदमी है मुल्क में या यों कहो,
इस अंधेरी कोठरी में एक रौशनदान है.

मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के कदम,
तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है.

इस कदर पाबंदी-ए-मज़हब की सदके आपके,
जब से आज़ादी मिली है, मुल्क में रमजान है.

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला की हिन्दुस्तान है.

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूं,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है.

इस गजल को इमरजेंसी के हालात बयान करने वाली गजल कहा गया. आज भी कहा जाता है. लिखने वाले का कॉन्टेक्स्ट उसका वक्त और उस वक़्त के हालात ही तो होते हैं. इमरजेंसी में अखबारों के दफ्तर बंद कर दिए गए थे. लेकिन फिर भी लिखने वाले लिख रहे थे. कहने वाले कह रहे थे. जिनमें हिम्मत थी वो लड़ रहे थे, जिनमें नहीं थी, उनमें आने लगी थी. उठ खड़े होने का दम भरतीं कविताओं की पंक्तियाँ, आवाज खुद-ब-खुद ऊंची हो जाए, ऐसी गजलों के मिसरे गुनगुनाते हुए लोग जेल जा रहे थे. और ऐसे वक़्त में दुष्यंत चाहते थे कि चीथड़े लपेटे हुए जो मुल्क उन्हें मिला था. वो उस मुल्क में रहने वाले करोड़ों लोगों की जानिब सरकार से सवाल कर सकें.

दुष्यंत की उस दौर की एक और गजल के दो शे'र हैं-

होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिये,
इस पर कटे परिंदे की कोशिश तो देखिये.

गूंगे निकल पड़े हैं, ज़ुबां की तलाश में,
सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिए.

दुष्यंत चाहते थे कि अब बोला जाए. चुपचाप सहा न जाए. गूंगे बने रहना किसी तानाशाह की नाक तले पलने वालों की नियति हो सकती है, लोकतंत्र में जीने का सौभाग्य रखने वालों की नहीं.

एक और गजल के कुछ मिसरे सुनिए,

कहां तो तय था चरागां हर एक घर के लिये,
कहां चराग मयस्सर नहीं शहर के लिये.

यहां दरख़्तों के साये में धूप लगती है,
चलो यहां से चलें उम्र भर के लिये.

न हो कमीज़ तो घुटनों से पेट ढ़क लेंगे,
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिये.

खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही,
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये.

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता,
मैं बेकरार हूं आवाज में असर के लिये.

जिएं तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले,
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिये.

ये गजल भी उस दौर की बदहाली की निशानदेह है. गरीबी के खिलाफ लड़ाई का उद्घोष सी लगती है. वो लोग जिन्हें इस बात का मुकम्मल यकीन है कि चित्कारें उन तक नहीं पहुंचेंगी, आवाजें दब जाएंगी, दुष्यंत उन आवाजों में असर चाहते हैं.

और आज PM मोदी ने जो शे'र पढ़ा, उस गजल के बाकी शे'र भी सुन लीजिए-

मैं बेपनाह अंधेरों को सुब्ह कैसे कहूं,
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं.

तेरी ज़ुबान है झूठी ज्म्हूरियत की तरह,
तू एक ज़लील-सी गाली से बेहतरीन नहीं.

तुम्हीं से प्यार जतायें तुम्हीं को खा जाएं,
अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं.

तुझे क़सम है ख़ुदी को बहुत हलाक न कर,
तु इस मशीन का पुर्ज़ा है तू मशीन नहीं.

बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहां,
ये मुल्क देखने लायक़ तो है हसीन नहीं.

ज़रा-सा तौर-तरीक़ों में हेर-फेर करो,
तुम्हारे हाथ में कालर हो, आस्तीन नहीं.

पहला शे'र जब मोदी ने पढ़ा तो वे बता रहे थे कि कांग्रेस का पतन हो गया है. मोदी ने शे'र के पहले जो कहा उसे भी जान लीजिए. वे कहते हैं-

Embed

शे'र पढ़ने के बाद, PM मोदी आगे बोले, 

Embed

पांव के नीचे जमीन न होना और उस पर यकीन न होना. गहरी नींद में सोया हुआ कोई अपने काफिले से अलग हो जाए, तो दुष्यंत का ये शे'र उसके लिए सटीक है. किसी राजनीतिक दल के घटे प्रभाव पर तंज कसने के लिए भी ये शे'र सटीक है. लेकिन गजल में और भी शे'र हैं. दुष्यंत की कलम जब इस गजल में बेपनाह अंधेरों और झूठी जम्हूरियत की बात करती है तो ओवैसी का मुसलमानों के साथ भेदभाव का आरोप भी ध्यान आता है. इसी गजल में दुष्यंत सियासत के परजीवी होने की बात कर रहे हैं, तब राहुल गांधी का बयान ध्यान आता है जो PM मोदी का भाषण ख़त्म होने के बाद सदन से बाहर आकर पत्रकारों को देते हैं. राहुल अडानी मामले पर जांच की मांग करते हैं, कहते हैं, ‘राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है, PM मोदी अडानी की मदद कर रहे हैं और मेरे सामान्य से सवालों का जवाब नहीं दे रहे हैं.’

कहते हैं कि शायर अख़बारनवीस भी होता है, जब कागज़ काला करता है तो अपने दौर की व्यथाएं भी कलमबंद कर देता है. लेकिन जब कोई पुरानी पोथी, आज के दौर की हालत बयान करते हुए पढ़ी जाए तो इतनी उम्मीद करना बेमानी नहीं कि सुनने वाले का नजरिया आपसे फर्क भी हो सकता है. आपके खिलाफ भी हो सकता है. 

वीडियो: कांग्रेस ने अडानी पर क्या सीरीज़ शुरू की, पीएम मोदी से कौन से तीन सवाल पूछे?

Advertisement

Advertisement

()