हिंदू, सिख लड़कियों को कंवर्ट कर रहे पाकिस्तान के कट्टरपंथी, कानून बस नाम के!
पाकिस्तान में जबरन धर्म-परिवर्तन और शादी की घटनाएं बढ़ क्यों रही हैं?

जून 2020 की एक दोपहर फ़ैसलाबाद के एक घर में 12 साल की फ़राह शाहीन अपने भाईयों और बहनों के साथ खेल रही थी. उसके दादा चारपाई पर लेटकर बच्चों को खेलते देख रहे थे. बीच-बीच में वो हिदायतें भी दे देते थे. इसी बीच दरवाज़े पर ज़ोर की दस्तक सुनाई दी. दस्तक सुनकर आंगन में मौजूद सब लोग ठिठक गए. उन्हें उस समय किसी के आने का अंदाज़ा नहीं था. फिर भी बुजुर्ग चारपाई से उठकर दरवाज़े तक गए. वो जब तक कुंडी खोल पाते, उससे पहले दरवाज़ा टूट चुका था. और, तीन अधेड़ उम्र के पुरुष अंदर घुस चुके थे. उन्होंने बुजुर्ग को धक्का देकर रास्ते से हटा दिया. उन्होंने फ़राह के ऊपर कपड़ा डाला और ज़बरदस्ती उठाकर ले गए. बाहर एक वैन उनका इंतज़ार कर रही थी. उन्होंने उसमें फ़राह को रखा और लेकर निकल गए.
फ़राह के घरवाले उसी दिन पुलिस में शिकायत करने गए. पुलिसवालों ने उन्हें डांटकर भगा दिया. घरवाले कई दिनों तक लोकल अधिकारियों के चक्कर लगाते रहे. तीन महीने बाद उनकी रिपोर्ट लिखी गई. रिपोर्ट दर्ज होने के कई हफ़्ते बाद तक पुलिस सोती रही. जब उनकी नींद खुली और वे फ़राह को किडनैपर्स के चंगुल से छुड़ा पाए, तब तक शोषण का एक चक्र पूरा हो चुका था. उसके साथ क्या हुआ था? फ़राह को उठाकर 110 किलोमीटर दूर हफ़ीज़ाबाद ले जाया गया. वहां उसका रेप किया गया. फ़राह ईसाई थी. उससे ज़बरदस्ती इस्लाम क़ुबूल कराया गया. फिर अपहरण करने वाले से ही उसकी शादी भी कर दी गई. इसके बाद उसे उसी घर में ग़ुलाम बनाकर रखा गया. उसका दिन-रात शारीरिक और मानसिक शोषण होता रहा. फ़राह ने बाद में बताया था,
‘मुझे हमेशा जंज़ीरों में बांधकर रखा गया. मुझसे घर और जानवरों के अहाते की सफाई कराई जाती थी. वो नर्क से कम नहीं था.’
जब फ़राह का मामला कोर्ट में पहुंचा, तब कोर्ट ने शादी को अवैध करार दिया. इसलिए नहीं कि फ़राह नाबालिग थी और उसका अपहरण हुआ था. उसकी शादी इसलिए अवैध घोषित की गई, क्योंकि उसके कथित पति ने मैरिज सर्टिफ़िकेट में ग़लत जानकारी भर दी थी. अदालत ने फ़राह को उसके पिता के पास जाने की इजाज़त दे दी. इसमें पाकिस्तानी तंत्र या अदालत की समझ-बूझ का कोई योगदान नहीं था. वो तो बस उसकी किस्मत ठीक थी. लेकिन उसके जैसी हज़ारों और पाकिस्तानी लड़कियों की किस्मत इतनी अच्छी नहीं रही है.
मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में हर साल एक हज़ार से अधिक हिंदू, सिख और ईसाई लड़कियों को किडनैप किया जाता है. उनका धर्म-परिवर्तन कराया जाता है और फिर उनकी ज़बरदस्ती शादी कर दी जाती है. जानकार मानते हैं कि असलियत में ये संख्या कई गुणा अधिक है. क्योंकि अधिकतर मामलों में शिकायत दर्ज ही नहीं होती हैं.
आज हम ये कहानी क्यों सुना रहे हैं?
दरअसल, 16 जनवरी 2022 को यूनाइटेड नेशंस ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यक लड़कियों की किडनैपिंग, ज़बरन धर्म-परिवर्तन और नाबालिग उम्र में शादी की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताई है. यूएन ने पाकिस्तान सरकार से ज़रूरी कदम उठाने और दोषियों को सज़ा दिलाने की अपील भी की.
तो आइए जानते हैं,
- पाकिस्तान में ज़बरन धर्म-परिवर्तन और शादी की घटनाएं बढ़ क्यों रही हैं?
- पाकिस्तान में इस तरह के अपराध के ख़िलाफ़ क्या कानून बने हैं?
- और, यूएन की अपील से कितना असर पड़ेगा?
पाकिस्तान के कानून में लड़के और लड़कियों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र तय है. लड़कों और लड़कियों, दोनों के लिए 18 साल. इससे कम उम्र में शादी कराने पर सज़ा का प्रावधान है. ये कानून की नज़र में अपराध है. फिर भी जब-जब इस तरह के मामले अदालत में पहुंचते हैं, तब-तब अदालत शरिया कानून के हिसाब से फ़ैसला सुनाती रही है. शरिया कानून के अनुसार, अगर लड़की में प्युबर्टी आ गई हो तो, वो शादी के काबिल मान ली जाती है. ऐसे केसेज में शादी को वैध ठहरा दिया जाता है. ये वाला नियम हर धर्म पर लागू होता है.
मसलन, शबाना लाहौर के शाहदरा स्कूल में आठवीं क्लास की स्टूडेंट थी. उसकी उम्र महज़ 13 साल थी. एक दिन अचानक घरवालों ने उसकी शादी तय कर दी. 24 साल के यूसुफ़ के साथ. यूसुफ़, शबाना का चचेरा भाई था. शादी के बाद शबाना को कम उम्र में बड़ी ज़िम्मेदारी उठानी पड़ी. उसे स्कूल छोड़ना पड़ा. ससुराल में वो अक्सर घरेलू हिंसा का शिकार होती, इसी बीच वो एक बेटी की मां भी बन गई. प्रेग्नेंसी के दौरान ना तो उसे पर्याप्त भोजन मिलता था और ना ही उसकी अच्छे से देखभाल होती थी. बच्ची होने के बाद उसका बोझ दोगुना हो गया था. इसके कारण उसकी तबियत लगातार बिगड़ती चली गई. आखिरकार, उसके पति ने उसे तलाक दे देकर बेटी को अपनी कस्टडी में ले लिया. अब शबाना खुद गरीब हालात में अपने मां-बाप के साथ रहती है. वो इतनी पढ़ी-लिखी भी नहीं है कि कोई नौकरी पाकर अपने परिवार को आर्थिक रूप से सपोर्ट कर सके.

शबाना की शादी परिवार वालों की मर्ज़ी से हुई थी. लेकिन इसे भी ज़बरन निक़ाह की केटेगरी में रखा जाएगा. अगर लड़के और लड़की दोनों में से कोई भी सहमति देने के काबिल नहीं है तो, उसको गैर-कानूनी माना जाता है. शबाना महज तेरह साल की थी. इस लिहाज से ये बाल-विवाह था. और, बाल-विवाह मानवाधिकार उल्लंघन की श्रेणी में आता है. पाकिस्तान में लगभग 18 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 साल से पहले कर दी जाती है.
ये तो हुआ अर्ली मैरिज की बात. पाकिस्तान में तय उम्र से पहले और बिना सहमित के होने वाली शादियां बेहद आम हैं. ये कानूनी अपराध तो है, लेकिन इस तरह के मामलों में सरकार या अदालत दखल देने से बचती है.
जब यही बात अल्पसंख्यकों की हो, तब मामला और संगीन हो जाता है. उनकी तो सुनवाई भी नहीं होती. एक उदाहरण पूजा कुमारी का है. सिंध प्रांत के रोहरी में रहने वाली पूजा 18 साल की थी. उसी शहर का रहने वाला 24 साल का वाहिद बक्स लशारी उसे पसंद करता था. लेकिन बात तब बिगड़ गई, जब वो पूजा को शादी के लिए तंग करने लगा. पूजा के घर वालों ने पुलिस से मदद की गुहार लगाई. लेकिन पुलिस ने उनकी कोई मदद नहीं की. इसकी वजह थी वाहिद की जाति का दबदबा. वाहिद लशारी जाति से आता था, उस इलाके में उनका दबदबा था. 21 मार्च 2022 को वाहिद अपने दो साथियों के साथ जबरन पूजा के घर घुस गया. उन्होंने उसका अपहरण करने की कोशिश की. जब पूजा ने विरोध किया तो वाहिद ने उसको गोली मार दी. पूजा की मौके पर ही मौत हो गई. उसके परिवार को कभी इंसाफ़ नहीं मिला.
एक कहानी ईसाई लड़की हुमा युनुस की है. उसको अक्टूबर 2019 में उसके घर से किडनैप किया गया था. उस समय उसकी उम्र महज 14 साल थी. अपहरण के कुछ दिनों के बाद किडनैपर्स ने हुमा के घरवालों को मैरिज सर्टिफ़िकेट और इस्लाम क़ुबूल करने का सर्टिफ़िकेट भेजा. हुमा के घरवाले अदालत गए. सिंध हाईकोर्ट ने फ़रवरी 2020 में फ़ैसला सुनाया कि शरिया लॉ के हिसाब से शादी वैध है.
जुलाई 2020 में हुमा ने किसी तरह अपने घरवालों से बात की. उसने अपनी आपबीती बयान की. बताया कि उसे एक कमरे में बंद करके रखा जाता है. उसके साथ दिन-रात रेप होता है. रेप के कारण वो प्रेग्नेंट भी हो गई थी. उसके घरवाले फिर से अदालत पहुंचे. मानवाधिकार संगठन भी उनके साथ खड़े हुए. तब जाकर कोर्ट ने हुमा के किडनैपर अब्दुल जब्बार की गिरफ़्तारी का आदेश दिया. लेकिन पुलिस टाल-मटोल करती रही. लंबे समय तक हुमा क़ैद में ज़िंदगी बसर करती रही.
ये तो महज कुछ उदाहरण भर हैं. पाकिस्तान में हर साल एक हज़ार से अधिक नाबालिग अल्पसंख्यक बच्चियां ज़बरन धर्म-परिवर्तन और ज़बरिया निक़ाह का शिकार होती हैं.
यूएस कमीशन ऑन इंटरनैशनल रिलिजियस फ़्रीडम (USCIRF) की एक रिपोर्ट कहती है कि, ‘अधिकतर मौकों पर सरकारी अधिकारी कार्रवाई करने से बचते हैं. किडनैपिंग के मामलों में, अधिकारी ये तर्क देते हैं कि पीड़िता ने अपनी मर्ज़ी से इस्लाम क़ुबूल कर लिया.’
इस तरह की घटनाओं की वजह क्या है?
इसकी तीन बड़े कारण हैं. एक-एक कर जान लेते हैं.
- नंबर एक. धार्मिक उद्दंडता. पाकिस्तान की लगभग 96 प्रतिशत आबादी इस्लाम धर्म को मानती है. दो प्रतिशत हिंदू और एक प्रतिशत ईसाई हैं. बाकी के एक प्रतिशत में अहमदिया और दूसरे मतों को मानने वाले लोग आते हैं. अल्पसंख्यक बच्चियों का धर्म-परिवर्तन कराने और उनसे शादी करने वाले अक्सर प्रभावशाली मुस्लिम होते हैं. उनका अपने इलाके में दबदबा होता है. अगर अदालत अल्पसंख्यकों के पक्ष में फ़ैसला सुनाती है, तब ऐसा प्रचारित किया जाता है कि इस्लाम ख़तरे में है. इसी वजह से सरकारी तंत्र अपराधियों को निशाना बनाने से बचता है. उन्हें ये भी लगता है कि कठमुल्लाओं से अल्पसंख्यकों को कंट्रोल करके रखना ज़्यादा आसान है.
- दूसरी वजह धार्मिक तनाव से जुड़ी है. अपराधी अक्सर धर्मों के बीच पनप रहे तनाव का सहारा लेते हैं. जब कभी उनके ऊपर आंच आती है, तब वे घटना को इस्लाम के अस्तित्व से जोड़ देते हैं. इस तरह उन्हें पूरी कम्युनिटी का सपोर्ट मिल जाता है. किडनैपर्स बच्चियों को ये डर भी दिखाते हैं कि शिकायत करने पर उनका और उनके परिवार का बुरा हश्र होगा. पाकिस्तान अपने यहां अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने में विफल रहा है. आए दिन हिंदू मंदिरों पर हमले की घटनाएं सामने आती रहती हैं. पाकिस्तान सरकार भले ही अपनी नाक बचाने के लिए मंदिरों की मरम्मत कराने लगती है, लेकिन वे भी दोषियों के ख़िलाफ़ जाने से बचते हैं.
- तीसरी वजह का संबंध इस्लामी कानून से है. एक बार लड़की ने इस्लाम क़ुबूल कर लिया, उनके ऊपर इस्लामी फ़ैमिली लॉ लागू हो जाता है. ये कानून कहता है कि, जैसे ही लड़की का मासिक-धर्म शुरू हुआ, वैसे ही वो शादी के योग्य हो गई.

2018 तक पाकिस्तान में लड़कियों की शादी की उम्र 16 साल थी. इसके बावजूद बाल विवाह से जुड़े कई केस देखने को मिल रहे थे.. जब इन केसों की तादाद बढ़ने लगी, तब पाकिस्तान की महिला सांसद शेरी रहमान ने संसद में एक बिल पेश किया. इस बिल में लड़कियों की शादी की उम्र 18 साल तय करने की बात कही गई थी. बिल बहुतत से संसद में पास हो गया. लेकिन जमियत उलेमा-ए-इस्लाम और जमात ए इस्लामी जैसे संगठनों ने इसका विरोध किया. इन सगंठनों ने इसे इस्लाम के विरुद्ध बताया. उस वक्त सांसदों ने ये बात रखी थी कि ओमान, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात जैसे मुस्लिम देशों ने पहले ही शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल तय कर दी है. इसके अलावा, इसी तरह का बिल ‘सिंध चाइल्ड मैरिज रेस्ट्रेंट एक्ट 2013’ भी सिंध विधानसभा से 2014 में पारित हो चुका था. उस वक्त बिल का कोई विरोध नहीं हुआ था.
अब जानते हैं कि में फोर्स्ड मैरिज को रोकने के लिए क्या प्रावधान किए गए हैं?फोर्स्ड मैरिज को रोकने के लिए पाकिस्तान में कई कानून मौजूद थे, जैसे डिवोर्स एक्ट 1869, चाइल्ड मैरिज रेस्ट्रेंट एक्ट 1929, डिजॉल्युशन ऑफ़ मुस्लिम मैरिज एक्ट 1939 और मुस्लिम फैमिली लॉज़ ऑर्डिनेंस 1961 (MFLO). इन कानूनों में MFLO सबसे कारगर है.
MFLO के तहत, शादी के वक्त निक़ाहनामा (मैरिज सर्टिफिकेट) का प्रावधान किया जाता है. शादी के वक्त लड़की को निकाहनामे पर साइन करना या अंगूठे का निशान लगाना लाज़मी होता है. वहीं लड़का खुद या अपने किसी प्रतिनिधि से निकाह नाम साइन करवा सकता है. इस एक्ट में निकाह करवाने वाली शख़्स को अहमियत दी जाती है. ये उसकी ज़िम्मेदारी होती है कि दोनों पक्षों से सिग्नेचर लिए जाएं. लेकिन शातिर लोग इससे बचने के तरीके भी खोज लेते हैं, इसके बाद भी पाकिस्तान में फोर्स्ड मैरिज के कई केस सामने आ रहे थे, इसके लिए पाकिस्तान की सरकार ने साल 2004 में एक कानून बनाया. इसके तहत अगर जबरन किसी लड़की की शादी करवाई जाएगी तो उसके ख़िलाफ़ क्रिमिनल एक्ट के तहत कार्रवाई को लाज़िमी कर दिया गया.
लेकिन क्या अब भी जबरन शादी करवाने के केस में कमी आई, इसका जवाब है नहीं. साल 2005 से 2010 के बीच ऐसे मामलों में लगातार बढ़ोतरी हुई. पाकिस्तान का बचाव करने वाले लोग संविधान का सहारा लेकर कहते कि, पाकिस्तान का संविधान मर्द और औरत दोनों के अधिकारों की सुरक्षा बिना किसी भेदभाव के करने की बात कहता है. लेकिन उसका ज़मीन पर कोई प्रभाव देखने को नहीं मिलता है.
फोर्स्ड मैरिज के बढ़ते मामलों को लेकर जब पाकिस्तान आंच आने लगी, तब उसने 2011 में ‘प्रिवेंशन ऑफ़ एंटी वीमेन प्रैक्टिस अमेंडमेंट एक्ट’ पारित किया, इसके तहत अगर कोई किसी महिला की जबरन शादी करवाता है तो उसे 03 से 10 साल तक की जेल हो सकती है. और पकड़े जाने पर दो लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. हालांकि, इस कानून का पालन ठीक से नहीं हो पा रहा है.
अब जानते हैं कि UN ने क्या कहा है?UN के ह्यूमन राइट्स एक्सपर्ट्स ने बढ़ते मामलों पर चिंता ज़ाहिर की है. कहा है कि ये लड़कियां बहुत कम उम्र की होती हैं. शादी से पहले उनका धर्मांतरण भी कर दिया जाता है. एक्सपर्ट्स ने कहा है कि ऐसे केस पाकिस्तान में लगातार बढ़ रहे हैं. जो चिंता का विषय है, पाकिस्तान की सरकार को इनपर रोक लगाने के लिए कदम उठाने चाहिए. और ऐसे अपराधियों को जवाबदेह ठहराना चाहिए.
एक्सपर्ट्स ने ये भी कहा कि, हम ये सुनकर बहुत परेशान हैं कि 13 साल से कम उम्र की लड़कियों को उनके परिवारों से अगवा किया जा रहा है, और उनकी तस्करी की जा रही है. कई केस में तो उनकी उम्र से दोगुनी उम्र के पुरुषों से शादी की जाती है, और इस्लाम में धर्मांतरण के लिए मजबूर किया जाता है. पुलिस भी परिवार का साथ नहीं देती है. न ही कोई एक्शन लिया जाता है. ये अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों का उल्लंघन है. यूएन ने भले ही चिंता जता दी हो. लेकिन जब तक पाकिस्तान की राजनीति पर धर्म का प्रभाव बरकरार रहेगा, तब तक किसी भी तरह के सकारात्मक बदलाव की उम्मीद करना बेमानी होगी.
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