राष्ट्र्पति ने बग़ावत की, पाक फौज़ की जान फंसी!
पाकिस्तान के राष्ट्रपति को किसने धोखा दिया? ट्वीट कर माफ़ी क्यों मांगी?

President is on fire in Pakistan.
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी काफ़ी नाराज़ चल रहे हैं. किससे? सरकार से. क्यों? क्योंकि बिना उनके दस्तख़त के दो कानूनों को लागू किया गया. ऐसा उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर बताया. फिर सरकार आगे आई. बोली, राष्ट्रपति झूठ बोल रहे हैं. सारे नियमों का पालन हुआ है.
लेकिन अल्वी नहीं माने. 21 अगस्त को उन्होंने अपने सेक्रेटरी को बर्ख़ास्त कर दिया. पनिशमेंट पोस्ट पर भेज दिया. दिलचस्प ये है कि सेक्रेटरी ने बग़ावत कर दी है. कहा, मुझे ज़बरदस्ती बलि का बकरा बनाया गया. मैं निर्दोष हूं. राष्ट्रपति ने जिस नए अफ़सर को सेक्रेटरी बनाने के लिए कहा, उसने जॉइन करने से मना कर दिया है.
इस घटना ने पाकिस्तान में नया राजनैतिक संकट खड़ा कर दिया है. पूर्व प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने जांच की मांग रखी है. लेकिन जानकार मानते हैं कि ये संकट किसी जांच का मोहताज नहीं है. एक महीने से भी कम समय में आरिफ़ अल्वी का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है. राष्ट्रपति रहते हुए उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को बचाने की भरसक कोशिश की. मगर बचा नहीं पाए. इमरान पहले कुर्सी से उतारे गए. अगस्त 2023 में उन्हें तोशाखाना मामले में जेल भेजा गया. फिलहाल उनके ख़िलाफ़ संशोधित सीक्रेट्स ऐक्ट के तहत जांच चल रही है. इसी सीक्रेट्स ऐक्ट पर साइन को लेकर पूरा बखेड़ा खड़ा हुआ है. चर्चा ये भी है कि कार्यकाल पूरा होने के बाद अल्वी को भी लपेटे में लिया जा सकता है. इसलिए, वो ख़ुद को बचाने की कोशिश कर रहे हैं.
अल्वी के साथ आगे क्या होता है? ये देखने वाली बात होगी. लेकिन इस ऐपिसोड ने मिलिटरी एस्टैब्लिशमेंट को परेशान ज़रूर कर दिया है. आशंका ये भी है कि अल्वी को समय से पहले ही कुर्सी से हटाया जा सकता है.
तो आइए जानते हैं,
- पाकिस्तान में राष्ट्रपति और सरकार क्यों भिड़े?
- क्या पाकिस्तान में एक और तख़्तापलट होने वाला है?
- और, वहां राष्ट्रपति और सरकार के बीच झगड़े का इतिहास क्या है?
पहले ये ट्वीट देखिए.
तारीख़ 20 अगस्त 2023.
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी ने लिखा,
‘अल्लाह गवाह है कि मैंने ‘ऑफ़िशल सीक्रेट्स अमेंडमेंट बिल’ और ‘पाकिस्तान आर्मी अमेंडमेंट बिल’ पर कभी साइन नहीं किया. मैं इन दोनों के ख़िलाफ़ था. मैंने अपने स्टाफ़ को बिल्स को लौटाने के लिए कहा था. कई इस बारे में उनसे कई बार कंफ़र्म किया. हर बार कहा गया कि बिल्स को लौटा दिया गया है. मगर आज पता चला है कि मेरे स्टाफ़ ने मेरी इच्छा और आदेश का पालन नहीं किया. अल्लाह सब जानता है, वो मुझे माफ़ कर देगा. लेकिन मैं उनसे माफ़ी मांगना चाहता हूं जिन्हें इसका ताप झेलना पड़ेगा.’
एक मुल्क का राष्ट्रपति सरेआम धोखे की बात लिख रहा था. हंगामा मचना तय था. मचा भी. सरकार को सफाई देनी पड़ी. लेकिन बवाल यहीं नहीं रुका. 21 अगस्त को राष्ट्रपति ने अपने सेक्रेटरी वक़ार अहमद को पद से हटा दिया. एस्टैब्लिशमेंट डिविजन को कहा कि हमको इस आदमी की ज़रूरत नहीं है. हमें नया सेक्रेटरी चाहिए.
पाकिस्तान में एस्टैब्लिशमेंट डिविजन सिविल सर्विस से जुड़े मसलों को देखती है. सिविल सेवा के अधिकारियों की नियुक्ति और बर्खास्तगी भी उन्हीं के जिम्मे होती है. राष्ट्रपति ने हुमैरा अहमद का नाम सुझाया था. लेकिन हुमैरा ने सेक्रेटरी बनने से मना कर दिया.
इससे पहले वक़ार अहमद ने भी चिट्ठी लिखी. कहा,
- राष्ट्रपति ने ना तो बिलों पर सहमति दी और ना ही उन्हें वापस भेजने के लिए कोई लिखित आदेश ही दिया.
- पाकिस्तान आर्मी अमेंडमेंट बिल 02 अगस्त को हमारे पास आया. 03 को इसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया गया था. उनके पास अपनी राय देने के लिए 11 अगस्त तक का टाइम था. लेकिन 21 अगस्त तक उन्होंने फ़ाइल नहीं लौटाई.
- ऐसा ही ऑफ़िशल सेक्रेट्स अमेंडमेंट बिल के साथ भी हुआ. ये बिल हमें 08 अगस्त को मिल गया था. राष्ट्रपति के पास 17 अगस्त तक का समय था. मगर उन्होंने अभी तक उस फ़ाइल को नहीं लौटाया है. फ़ाइल्स अभी भी उन्हीं के दफ़्तर में रखी हैं.
- मेरे साथ अन्याय किया है. मैं दरख़्वास्त करूंगा कि मामले की किसी काबिल एजेंसी से जांच कराई जाए.
- अगर ज़रूरत पड़ी तो मैं अदालत में अपना पक्ष रखूंगा.
ये तो हुआ बर्खास्त अफ़सर का पक्ष. इस पर अभी तक राष्ट्रपति की तरफ़ से कोई बयान नहीं आया है. अब उन दोनों कानूनों के बारे में जान लेते हैं, जिनको लेकर पूरा बवाल मचा है.
पाकिस्तान आर्मी अमेंडमेंट ऐक्ट.इसके तहत, पाक फौज़ या राष्ट्रीय से जुड़ी संवेदनशील जानकारियां लीक करने पर 05 बरस तक की जेल का प्रावधान लाया गया.
इसके अलावा, जो भी लोग आर्मी ऐक्ट से बंधे हुए हैं, वे आर्मी की सेवा से हटने या हटाए जाने के 02 बरस बाद तक राजनीति में नहीं जा सकते.
31 जुलाई को संसद के दोनों सदनों ने बिल को मंज़ूरी दे दी. 02 अगस्त को इसे राष्ट्रपति के पास भेजा गया.
इसके तहत, खुफिया एजेंसियों और फ़ेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) को संदेह के आधार छापेमारी करने और लोगों को हिरासत में लेने का अधिकार दिया गया है. इसके लिए अब वॉरंट की भी ज़रूरत नहीं होगी. इसके अलावा, ‘दुश्मन’ की परिभाषा को विस्तार दिया गया. और, डॉक्यूमेंट्स की लिस्ट में इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन को भी शामिल किया गया. साथ ही साथ, युद्धकाल में मिलने वाली सज़ा का दायरा शांतिकाल तक के लिए बढ़ा दिया गया. इस पर संसद के अंदर भी विरोध हुआ. बाद में सरकार ने बिना वॉरंट के गिरफ़्तारी वाला प्रावधान हटा लिया. 06 अगस्त को सेनेट और फिर 07 अगस्त को नेशनल असेंबली ने बिल को मंज़ूरी दे दी. 08 अगस्त को इसे राष्ट्रपति के पास भेजा गया.
19 अगस्त को ख़बर चली कि राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी ने दोनों बिलों पर साइन कर दिया है. और, ये कानून बन चुके हैं. इसके अगले ही दिन राष्ट्रपति ने ट्वीट कर कहानी पलट दी.
वैसे ये पहली बार नहीं है, जब पाकिस्तान में राष्ट्रपति की कुर्सी को लेकर हंगामा खड़ा हुआ हो. इसकी शुरुआत पाकिस्तान बनने के साथ ही हो गई थी. 1947 में पाकिस्तान नया मुल्क बना. 1956 तक पाकिस्तान में राजतंत्र रहा. ब्रिटिश क्राउन हेड ऑफ़ द स्टेट होता था. गवर्नर-जनरल उनका प्रतिनिधि. फिर आया 1956 का साल. पहला संविधान बना. पाकिस्तान गणतंत्र बन गया. राजशाही खत्म हो गई. अब हेड ऑफ़ द स्टेट की ज़िम्मेदारी राष्ट्रपति के पास आ गई. उनका चुनाव इलेक्टोरल कोलाज के ज़रिए होने लगा.
- मार्च 1956 में इस्कंदर मिर्ज़ा पहले राष्ट्रपति बने. अंदरखाने विरोध हुआ तो जूनियर आर्मी अफ़सर अयूब ख़ान से दोस्ती की. प्रमोशन देकर आर्मी चीफ़ बना दिया. 07 अक्टूबर 1958 को उन्होंने अपने ही बनाए संविधान को रद्दी की टोकरी में डाल दिया. मार्शल लॉ लगाया. अयूब ख़ान को मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर बना दिया. 20 दिन बाद अयूब ख़ान ने इस्कंदर मिर्ज़ा को कुर्सी से उतार दिया. बाद में उन्हें पाकिस्तान से निर्वासित कर दिया गया. इस्कंदर मिर्ज़ा के अंतिम दिन लंदन में गुज़रे. गुज़ारे के लिए वो होटल चलाया करते थे. नवंबर 1969 में उनकी मौत हो गई. उस समय पाकिस्तान में याह्या ख़ान का शासन शुरू हो चुका था. याह्या ने मिर्ज़ा के मृत शरीर को पाकिस्तान लाने की इजाज़त नहीं दी. उन्हें ईरान में दफ़्न किया गया.
- इस्कंदर मिर्ज़ा के बाद अयूब ख़ान राष्ट्रपति बने. अयूब ने प्रधानमंत्री की कुर्सी को खत्म कर दिया. 1962 में नया संविधान लेकर आए. पाकिस्तान प्रेसिडेंशियल रिपब्लिक बन गया. जैसा कि अभी अमेरिका में है. राष्ट्रपति स्टेट के साथ-साथ सरकार के भी मुखिया भी बन गए. अयूब के कार्यकाल में भारत के साथ युद्ध भी हुआ. ताशकंद समझौते के बाद युद्धविराम हो गया. 1969 आते-आते अयूब ख़ान की ताक़त घटने लगी थी. एक तरफ़ ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो सड़कों पर थे, दूसरी तरफ़ ईस्ट पाकिस्तान में शेख़ मुजीब का आंदोलन चल रहा था. आख़िरकार, मार्च 1969 में अयूब ने इस्तीफा दे दिया. कुर्सी याह्या ख़ान के हवाले कर दी.
- याह्या ख़ान को अराजकता विरासत में मिली थी. ईस्ट पाकिस्तान में आज़ादी की मांग उठने लगी थी. याह्या ने चुनाव भी कराए. इसमें शेख़ मुजीब की अवामी लीग को बहुमत मिला. लेकिन सरकार नहीं बनने दी गई. विरोध हुआ तो सेना उतार दी. दिसंबर 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच एक और युद्ध हुआ. पाकिस्तान हार गया. बांग्लादेश नाम से नया मुल्क बना. पाकिस्तान में इस हार का ठीकरा याह्या के ऊपर फूटा. 20 दिसंबर 1971 को याह्या ने इस्तीफा दे दिया.
- याह्या के बाद ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो राष्ट्रपति बने. उन्होंने नया संविधान बनवाया. इसके तहत, पाकिस्तान में संसदीय लोकतंत्र की स्थापना हुई. राष्ट्रपति को हेड ऑफ़ द स्टेट का दर्ज़ा मिला. प्रधानमंत्री की कुर्सी वापस लाई गई. उन्हें सरकार की ज़िम्मेदारी मिली. 1973 में चुनाव के बाद भुट्टो प्रधानमंत्री बन गए.
- अगले राष्ट्रपति बने फ़ज़ल इलाही चौधरी. वो पाकिस्तान के पहले राष्ट्रपति थे, जिनकी शक्तियां प्रधानमंत्री से कम थीं. भुट्टो को कार्यकाल पूरा होने से पहले ही पीएम की कुर्सी से उतार दिया गया. उनके वफ़ादार रहे जनरल ज़िया उल-हक़ ने तख़्तापलट कर दिया था. इसके बावजूद चौधरी कुर्सी पर बन रहे. लेकिन ज़िया उल-हक़ से खटपट होती रही. सितंबर 1978 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया. इसके बाद ज़िया उल-हक़ राष्ट्रपति बने.
- जनरल ज़िया ने 1988 तक शासन चलाया. उन्होंने 1973 के संविधान में मिले मूल अधिकारों को ग़ायब कर दिया. और भी बहुत सारे बदलाव किए. 1985 में संविधान संशोधन हुआ. पाकिस्तान में सेमी-प्रेसिडेंशियल सिस्टम लाया गया. सरकार की शक्तियां राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच बंट गई. राष्ट्रपति को सरकार भंग करने का अधिकार मिला. यानी, जनरल ज़िया ने अपना वर्चस्व बरकरार रखा था.
लेकिन अगस्त 1988 में एक प्लेन हादसे में उनकी मौत हो गई.
- जनरल ज़िया के बाद ग़ुलाम इसाक़ ख़ान राष्ट्रपति बने. उन्हीं के कार्यकाल के दौरान बेनज़ीर भुट्टो पाकिस्तानी की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं. लेकिन उनकी राष्ट्रपति के साथ पटरी नहीं खा रही थी. अगस्त 1990 में इसाक़ ख़ान ने बेनज़ीर सरकार को बर्खास्त कर दिया. भ्रष्टाचार और अराजकता का हवाला देकर. बेनज़ीर के बाद नवाज़ शरीफ़ पीएम बने. 03 बरस बाद ग़ुलाम इसाक़ ख़ान ने उनकी सरकार भी बर्खास्त कर दी. नवाज़ शरीफ़ सुप्रीम कोर्ट चले गए. सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के फ़ैसले को अवैध ठहरा दिया. नवाज़ वापस कुर्सी पर आए. लेकिन राष्ट्रपति से उनकी नहीं बनी. तब मिलिटरी ने दखल दिया. फिर नवाज़ शरीफ़ और ग़ुलाम इसाक़ ख़ान, दोनों को इस्तीफा देना पड़ा.
- ग़ुलाम इसाक़ ख़ान के बाद वसीम सज्जाद 04 महीनों के लिए कार्यवाहक राष्ट्रपति बने. नवंबर 1993 में फ़ारुक लेग़ारी पाकिस्तान के आठवें राष्ट्रपति बने. लेग़ारी, भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) से ही ताल्लुक रखते थे. उन्हें बेनज़ीर सरकार ने ही नॉमिनेट किया था. लेकिन बाद में दोनों में जजों की नियुक्ति और सरकार की पॉलिसी को लेकर झगड़ा हुआ. 1996 में लेग़ारी ने बेनज़ीर सरकार को डिसमिस कर दिया.
1997 में नया आम चुनाव कराया गया. नवाज़ शरीफ़ चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बने. सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस की नियुक्ति को लेकर वो लेग़ारी से उलझ गए. दिसंबर 1997 में लेग़ारी को पद छोड़ना पड़ा.
एक बार फिर से वसीम सज्जाद केयरटेकर प्रेसिडेंट बनाए गए.
- जनवरी 1998 में मोहम्मद रफ़ीक तरार नौवें राष्ट्रपति बने. उन्होंने पाकिस्तान में संसदीय लोकतंत्र लौटाने की दिशा में काम किया. राष्ट्रपति की शक्तियां कम करने वाले संविधान संशोधनों को मंज़ूरी दी.
अक्टूबर 1999 में तत्कालीन आर्मी चीफ़ परवेज़ मुशर्रफ़ ने नवाज़ शरीफ़ का तख़्तापलट कर दिया. तरार ने इसका विरोध किया. मगर उनकी नहीं सुनी गई. बाद में वो मुशर्रफ़ के साथ हो गए. लेकिन 2001 में उन्हें कुर्सी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया. उनके बाद परवेज़ मुशर्रफ़ ने कुर्सी हथिया ली. वो पाकिस्तान के चौथे मिलिटरी शासक और 10वें राष्ट्रपति बने.
- फ़रवरी 2008 में आम चुनाव हुआ. ये सही मायनों में पाकिस्तान का पहला लोकतांत्रिक चुनाव था. PPP पहले नंबर पर थी. दूसरे नंबर पर पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज़ (PML-N) थी. मुशर्रफ़ ने चुनाव में अपनी पार्टी भी खड़ी की थी. लेकिन वो तीसरे नंबर पर रही.
पहले PML-N और PPP ने मिलकर सरकार बनाई. लेकिन कुछ ही समय बाद PML-N अलग हो गई. उसने मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ महाभियोग लाने की तैयारी शुरू कर दी. अगस्त 2008 में मुशर्रफ़ ने इस्तीफा दे दिया. वो देश छोड़कर भाग गए. मोहम्मद मियां सुमरो को 22 दिनों के लिए ऐक्टिंग प्रेसिडेंट बनाया गया.
- सितंबर 2008 में आसिफ़ अली ज़रदारी नए राष्ट्रपति बने. 2010 में 18वां संविधान संशोधन लाया गया. इसके तहत राष्ट्रपति की शक्तियों को घटाया गया. तब से सरकार की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से प्रधानमंत्री के पास आ गई. राष्ट्रपति सेरेमोनियल हेड बनकर रह गए.
- ज़रदारी के बाद ममनून हुसैन राष्ट्रपति बने. उन्होंने भी अपना 05 बरस का कार्यकाल पूरा किया.
- अगस्त 2018 में पाकिस्तान तहरीके इंसाफ़ (PTI) ने सरकार बनाई. इमरान ख़ान पीएम बने. उसके अगले महीने ही ममनून हुसैन का कार्यकाल खत्म हो रहा था. PTI ने अपनी तरफ़ से आरिफ़ अल्वी को खड़ा किया. अल्वी राष्ट्रपति चुनाव जीत गए. वो मौजूदा राष्ट्रपति हैं. उनका टर्म 09 सितंबर 2023 को खत्म हो रहा है. उससे पहले उनके ट्वीट ने पाकिस्तानी सत्ता-प्रतिष्ठान के लिए नई मुसीबत खड़ी कर दी है.
लेकिन अल्वी सरेआम मुखालफ़त कर क्यों रहे हैं?इसकी दो वजहें बताई जा रही हैं.
नंबर एक. इमरान ख़ान.18 अगस्त को इमरान के ख़िलाफ़ ऑफ़िशल सीक्रेट्स ऐक्ट के तहत केस दर्ज किया गया. इमरान फिलहाल तोशाखाना मामले में सज़ा काट रहे हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके ऊपर पीएम रहते हुए सीक्रेट डॉक्यूमेंट्स का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए करने का आरोप है. FIR के मुताबिक, ये डॉक्यूमेंट अभी भी इमरान के कंट्रोल में है. इस केस में इमरान को 02 से 14 साल तक की जेल या फिर मौत की सज़ा तक हो सकती है. आरिफ़ अल्वी, इमरान की पार्टी PTI के मेंबर रह चुके हैं. उन्होंने कई मौकों पर उन्हें बचाने की कोशिश भी की. जानकारों का कहना है वो इस बार इमरान की जान की परवाह कर रहे हैं.
नंबर दो. अपने भविष्य की सुरक्षा.सितंबर 2023 में आरिफ़ अल्वी का कार्यकाल खत्म हो रहा है. उन्हें आशंका है कि उनके ऊपर भी सीक्रेट्स ऐक्ट के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है. इसलिए, एक धड़ा ये कह रहा है कि वो ख़ुद को बचाने की कोशिश कर रहे हैं.
वीडियो: दुनियादारी: राष्ट्रपति कैंडिडेट की सरेआम हत्या, चीन-अमेरिका का क्या कनेक्शन पता चला?

