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पाकिस्तान के राष्ट्रपति और चुनाव आयोग में झगड़ा क्यों हुआ?

पाकिस्तान में चुनाव की तारीख पता चल गई!

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20 फ़रवरी 2023 (अपडेटेड: 20 फ़रवरी 2023, 09:29 PM IST)
प्रतीकात्मक तस्वीर (AFP PHOTO / RIZWAN TABASSUM)
प्रतीकात्मक तस्वीर (AFP PHOTO / RIZWAN TABASSUM)
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पाकिस्तान और संकट का बहुत पुराना याराना रहा है. चाहे संकट आर्थिक हो, सैन्य हो या राजनैतिक, ये पाकिस्तान की बुनियाद में दर्ज है. इसका एक उदाहरण सिविलियन सरकार के पुराने रिकॉर्ड से रहा है. पाकिस्तान के इतिहास में कोई भी चुनी हुई सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई है. दूसरा उदाहरण संविधान का है. पाकिस्तान का पहला संविधान 1956 में बना. तब तक देश में तीन गवर्नर-जनरल और चार प्रधानमंत्री बदल चुके थे. पहला संविधान लागू होने के दो बरस बाद ही रद्दी की टोकरी में फेंका जा चुका था. दूसरा संविधान 1962 में बनाया गया. ये भी बहुत दिनों तक नहीं चला. तीसरा संविधान 1973 में ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो ने बनवाया था. उन्होंने इसमें सात बार संशोधन किया. फिर उनकी कुर्सी चली गई. इसके बाद मिलिटरी रूल की वापसी हुई. 

ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो

भुट्टो ने संविधान में तमाम इंतज़ाम करके सेना और सरकार को अलग-अलग रखने की कोशिश की थी. लेकिन वो ख़ुद ही अपने खेल में शिकार हो गए. इस घटना ने एक बात तो साबित कर दी थी कि, पाकिस्तान में सेना का दर्ज़ा संविधान और चुनी हुई सरकार से हमेशा ऊपर रहेगा. इसकी निर्णायक झलक जनरल ज़िया ने दिखला दी थी. और, जब 1999 में परवेज़ मुशर्रफ़ ने नवाज़ शरीफ़ को बाहर का रास्ता दिखाया, उन्होंने सेना की प्रभुसत्ता पर मुहर लगा दी. मुशर्रफ़ ने यहां तक कहा कि, संविधान काग़ज़ का एक टुकड़ा भर है, जिसे कचरे के डिब्बे में फेंक देना चाहिए. उन्होंने अपने कार्यकाल में इसका बखूबी पालन भी किया. भारत के ख़िलाफ़ आतंकियों को बढ़ावा देने से लेकर कबाइली नेताओं की हत्या और चीफ़ जस्टिस की गिरफ़्तारी तक, मुशर्रफ़ अपनी चाल चलते रहे. अगस्त 2008 में वो पाकिस्तान छोड़कर भाग गए. उस समय तक सिविलियन सरकार की वापसी हो चुकी थी.

हालांकि, मुशर्रफ़ ने ऐसा इको-सिस्टम तैयार कर दिया था, जिसमें सेना के सपोर्ट के बिना किसी भी प्रधानमंत्री का कुर्सी पर बने रहना नामुमकिन था. जिसने इसको कम करके आंकने की कोशिश की, उनका हश्र नवाज़ शरीफ़ या फिर इमरान ख़ान जैसा हुआ. पाकिस्तान तहरीके इंसाफ़ (PTI) के नेता इमरान ख़ान इसका सबसे ताज़ा उदाहरण हैं. 2018 में वो सेना के सपोर्ट से सरकार में आए थे. अक्टूबर 2021 में ISI चीफ़ की नियुक्ति को लेकर दोनों में झगड़ा हुआ. फिर सेना ने हाथ खींच लिया. नतीजा, अप्रैल 2022 तक इमरान ख़ान अविश्वास प्रस्ताव के ज़रिए हटाए जाने वाले पहले पाक पीएम बन चुके थे. बकौल इमरान, उन्हें सत्ता से हटाने के पीछे तत्कालीन आर्मी चीफ़ जनरल क़मर जावेद बाजवा थे. 

इमरान ने बाद में आरोप लगाया कि, उनकी सरकार की चाबी असल में जनरल बाजवा के पास थी. वो तो बस कठपुतली थे. अगर उनकी बात में ज़रा सी भी सच्चाई है तो ये सीधे तौर पर संविधान का उल्लंघन था. किसी आम लोकतंत्र में ये अप्रत्याशित होता. लेकिन पाकिस्तान में ‘अप्रत्याशित’ शब्द आम दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं. आम स्थिति में, किसी भी लोकतांत्रिक देश में संस्थाओं के बीच तालमेल होता है. वे एक-दूसरे को सुनते हैं. वाजिब बातों पर बैठकर मसले भी सुलझाते हैं. मगर पाकिस्तान में आख़िरी बार ऐसा कब हुआ था, हालिया दिनों में उसका उदाहरण तलाशे नहीं मिलता. हालांकि, इसके उलट उदाहरण बहुतेरे मिलते हैं.

मसलन, 19 फ़रवरी को पाकिस्तान के चुनाव आयोग (ECP) ने राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी को ठेंगा दिखा दिया. अल्वी ने चीफ़ इलेक्शन कमिश्नर सिकंदर सुल्तान रज़ा को मिलने बुलाया था. पंजाब और ख़ैबर-पख़्तूनख़्वाह में नए चुनाव की तारीखों पर चर्चा के लिए. लेकिन कमिश्नर ने मुलाक़ात से मना कर दिया. दोनों प्रांतों में इमरान की पार्टी PTI सरकार चला रही थी. अप्रैल 2022 के बाद से इमरान जल्दी से जल्दी आम चुनाव कराने की मांग कर रहे थे. इसके लिए उन्होंने कई आज़ादी मार्च भी निकाले. मगर हर बार बीच रास्ते से वापस लौट गए. नवंबर 2022 में इमरान ने रैली से लौटते हुए ऐलान किया कि अब लड़ाई सदन में होगी.

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी 

आख़िरकार, जनवरी 2023 में पंजाब और ख़ैबर-पख़्तूनख़्वाह, दोनों प्रांतों के मुख्यमंत्रियों ने सदन को भंग करने की सिफ़ारिश की. राज्यपाल ने सिफ़ारिश पर दस्तखत कर दिए. इस तरह दोनों प्रांतों में कार्यवाहक सरकार अस्तित्व में आ गई. तय नियमों के हिसाब से, सदन भंग होने के 90 दिनों के भीतर नया चुनाव कराना होता है. और, चुनाव के 14 दिनों के अंदर नया मुख्यमंत्री नियुक्त करना होता है.

नियम के बावजूद दोनों प्रांतों के गवर्नर साहब कान में रुई डालकर बैठे रहे. जब राज्यपाल ने चुनाव की नई तारीख़ बताने में दिलचस्पी नहीं दिखाई, तब PTI ने कोर्ट का रुख किया. उन्होंने पेशावर हाईकोर्ट में याचिका डाली. वहां अभी भी सुनवाई चल रही है. कोर्ट ने 20 फ़रवरी तक खै़बर के गवर्नर से जवाब मांगा है.

ये तो हुई कोर्ट की कार्यवाही. राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी अपने स्तर पर भी कोशिश कर रहे थे. आरिफ़ अल्वी, इमरान की पार्टी PTI के सदस्य रह चुके हैं. उन्होंने 08 फ़रवरी को चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखी. इसमें उन्होंने लिखा कि, चुनाव कराने में देरी की कोई वजह नहीं दिख रही है. अगर ऐसा जान-बूझकर किया जा रहा है तो ये लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है.

चुनाव आयोग ने इस चिट्ठी का कोई जवाब ही नहीं दिया. 19 फ़रवरी को आरिफ़ अल्वी ने एक इंटरव्यू में कहा कि उन्होंने इलेक्शन कमिश्नर को मीटिंग के लिए बुलाया है. इस मीटिंग में चुनाव की तारीख़ों पर बात होनी थी. इस मीटिंग के लिए 20 फ़रवरी की तारीख़ तय की गई थी. लेकिन उससे पहले ही ECP ने अपना जवाब भेज दिया. उन्होंने चिट्ठी में लिखा कि, हमें अपनी संवैधानिक और कानूनी कर्तव्यों का पता है. इस बारे में हम पहले भी बता चुके हैं. चूंकि मामला कोर्ट में है. इसलिए, हमारा आपसे मीटिंग करना सही नहीं होगा.

ECP के मना करने के बाद एक और बड़ी अपडेट आई. राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी ने दोनों प्रांतों में चुनाव के लिए 09 अप्रैल की तारीख़ तय कर दी है. इस संबंध में राष्ट्रपति ने अधिसूचना भी जारी कर दी है. इसमें लिखा है कि चुनाव आयोग आगे का कार्यक्रम जल्द से जल्द घोषित करे. राष्ट्रपति का फ़ैसला इलेक्शन कमिश्नर की चिट्ठी के ठीक बाद आया है. आरिफ़ अल्वी ने कहा है कि उन्होंने अपनी शक्तियों का सही इस्तेमाल किया है. हालांकि, जिस तरह से उन्होंने ये आदेश सुनाया है, झगड़ा होना तय माना जा रहा है. चुनाव आयोग इसे अपने अहं पर हमले की तरह लेगा. जानकारों का कहना है कि आर्थिक संकट से ग्रस्त पाकिस्तान के लिए इस नए राजनैतिक बवाल से निपटना खासा मुश्किल होने वाला है.

पाकिस्तान में पंजाब और ख़ैबर विधानसभा के अलावा नेशनल असेंबली की 33 सीटों के लिए भी चुनाव होना है. आयोग ने नेशनल असेंबली की सीटों पर वोटिंग के लिए 16 मार्च की तारीख़ तय की है. उस रोज़ बुधवार है. यानी वर्किंग डे. PTI का कहना है कि वोटिंग 19 मार्च को कराई जानी चाहिए. वरना लोग वोट डालने नहीं आएंगे. लेकिन चुनाव आयोग उनकी मांग मानने के लिए तैयार नहीं है. जहां तक दोनों प्रांतों में चुनाव का सवाल है, ECP का तर्क था कि चुनाव कराने के लिए ज़रूरी पैसे की कमी है. इसके अलावा, उसी समय बोर्ड एग्जाम और दूसरी चीजें आ जाएंगी. ऐसे में पूरी सुरक्षा मुहैया कराना मुश्किल होगा. राष्ट्रपति अल्वी की घोषणा के बाद पूरी बहस अलग दिशा में मुड़ गई है. इसका दूसरा छोर फिलहाल तो नहीं ही दिख रहा है.

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