रूस-यूक्रेन युद्ध के एक साल पूरे, कितनी बदली हमारी दुनिया?
युद्ध के एक साल बाद हमारी दुनिया किस तरह बदल गई है?

आपमें से बहुत सारे लोगों ने हैरी पॉटर सीरीज़ देखी और पढ़ी भी होगी. जो डायलॉग हमने अभी सुनाया, वो हॉगवर्ट्स के प्रिंसिपल डम्बलडोर ने बोला था. जिनका हैरी पॉटर से अभी तक वास्ता नहीं पड़ा है, उनके लिए ब्रीफ़ मे बता देता हूं. ये जेके रोलिंग की कलम से उपजी उपन्यासों की सीरीज़ है. इस पर फ़िल्में भी बन चुकी है. इस सीरीज़ का लीड किरदार हैरी पॉटर नाम का एक बच्चा है. वो जादू की पढ़ाई के लिए हॉगवर्ट्स स्कूल में दाखिला लेता है. वहां उसे अलग-अलग तासीर के लोग मिलते हैं. प्रफ़ेसर डम्बलडोर अक्सर हैरी की उलझनें सुलझाते मिल जाते हैं. ये सीरीज़ एक गल्प है, फिर भी इसमें असल ज़िंदगी का तज़ुर्बा मिलता है. मौका मिलते ही इससे रूबरू होने की कोशिश करें. हालांकि, ये आपके निजी चुनाव का मसला है. क्योंकि, बकौल डम्बलडोर, चुनने की यही कला इंसानों का चरित्र तय करती है.
जैसे, ये तस्वीर
एक पुल है. ऊपर सेना के टैंक्स चल रहे हैं. नीचे साइकिल पर एक जोड़ा बैठा है. दोनों जन टैंक्स के गुज़र जाने का इंतज़ार कर रहे हैं. ये तस्वीर 05 जून 1989 को बीजिंग में खींची गई थी. तियानमेन स्क़्वायर में हुए नरसंहार के ठीक अगले दिन. चीनी सैनिक रात के अंधेरे में प्रोटेस्ट को कुचलने के बाद बीजिंग की सड़कों को रौंद रहे थे. उनके चेहरे से अशांति टपक रही थी. पूरा शहर खौफ़ और आशंका के साये में सांसें गिन रहा था. एसोसिएटेड प्रेस के फ़ोटोग्राफ़र लियु हेंग शिंग दिन-रात हिंसा देखकर बदहवास हो चुके थे. तभी उन्हें पूर्वी बीजिंग में एक विरोधाभास दिखा. किसी ने हिंसा चुनी थी, किसी ने प्रेम. अचानक उनका चेहरा खिल गया. उन्हें लगा, सबसे उदास दौर में भी प्रेम जीवंत बना रहेगा और वही इस दुनिया का हौसला बचाकर रखेगा.
मौजूदा दौर में उदासी और हिंसा का सबसे बड़ा रूपक रूस-यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध है. आज के दिन इस युद्ध को एक बरस पूरा हो गया है. तो आइए जानते हैं,
क्या रूस-यूक्रेन युद्ध के एक साल बाद कितना हौसला बचा है?
इस युद्ध ने हमारी दुनिया को कितना बदल दिया?
और, एक बरस बाद कौन कितने पानी में है?
वो 24 फ़रवरी 2022 की सुबह थी. भारत में लोगों की दिनचर्या पुतिन के इसी ऐलान से शुरू हुई थी. जिसका डर महीनों से जताया जा रहा था, उस सुबह वो सच साबित हो गया था. रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया था. यूक्रेन की राजधानी किएव में हवाई हमले की चेतावनी वाले सायरन गूंजने लगे थे. रूसी सेना की बख़्तरबंद गाड़ियां, टैंक्स, हेलिकॉप्टर्स यूक्रेन की सीमा में मंडरा रहे थे. कुछ ही घंटों के अंतराल में हर तरफ़ अराजकता फैली हुई थी. अपने भविष्य को लेकर अनिश्चित लोग देश छोड़कर भाग रहे थे. हज़ारों लोग बंकरों में शरण लिए हुए थे. आसमान से आग बरस रही थी. जिसमें सबकुछ धुआं हुआ जा रहा था. ऐसा लग रहा था, कुछ ही समय में रूसी सेना किएव पर क़ब्ज़ा कर लेगी. उन्हें किसी तरह से रोकना मुश्किल लग रहा था. इस बीच कई अफ़वाहें भी फैलीं. मसलन, यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेन्स्की देश छोड़कर भाग गए हैं. कुछ ने कहा, ज़ेलेन्स्की को गिरफ़्तार कर लिया गया है. कहीं ये चला कि ज़ेलेन्स्की की हत्या हो चुकी है. जल्दी ही किएव में कठपुतली सरकार बिठाई जाएगी.
इन अफ़वाहों पर ताला तब लगा, जब 25 फ़रवरी को जे़लेन्स्की ने देश को संबोधित किया. उन्होंने सारी आशंकाओं को खारिज किया. बोले, इस तरह की झूठी ख़बरें फैलाई जा रहीं हैं कि मैं किएव से भाग चुका हूं. मैं राजधानी में ही हूं. मैं अपने लोगों के साथ हूं. और, मैं यहीं रहूंगा. उसी भाषण में ज़ेलेन्स्की ने बताया कि नेटो ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं. कोई हमारी मदद को नहीं आ रहा. अब हमें अपनी सुरक्षा ख़ुद ही करनी है.
इस समय तक यूक्रेन रूस की कुछ मांगों पर बात करने के लिए तैयार हो चुका था. पुतिन ने हमला बंद करने के लिए तीन शर्तें रखी थीं.
- नंबर एक. क्रीमिया और सेवस्तोपूल पर रूस की संप्रभुता को स्वीकार किया जाए. 2014 में क़ब्ज़े के बाद रूस ने इन दोनों इलाकों में जनमत-संग्रह कराया और फिर उन्हें रूस का प्रांत घोषित कर दिया. यूक्रेन इस क़ब्ज़े को अवैध बताता है.
- नंबर दो. यूक्रेन की सैन्य क्षमता कम की जाए. उसके पास ऐसे हथियार ना हों, जिससे रूस की संप्रभुता पर ख़तरा आए.
- तीसरी शर्त, यूक्रेन अपनी तटस्थता तय करे. यानी, वो यूरोपियन यूनियन या नेटो की सदस्यता लेने का विचार हमेशा के लिए छोड़ दे.
यूक्रेन ने इन शर्तों पर बातचीत की पहल की. फ़रवरी और मार्च में दोनों देशों के नेता बेलारूस बॉर्डर पर कई बार मिले. यूएन में भी प्रस्ताव पास कर शांति बरतने के लिए कहा गया. मगर बात नहीं बन पाई. झगड़ा जारी रहा और एक बरस बाद भी जारी ही है. इतने समय में युद्ध कहां पहुंचा?
शुरुआती दौर में रूस ने काफ़ी तेज़ी से बढ़त बनाई. इंस्टिट्यूट फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ वॉर (ISW) की रिपोर्ट के अनुसार, 23 मार्च 2022 तक यूक्रेन के खारकीव, ज़ेपोर्जिया, ख़ेरसॉन, मारियोपोल और चेर्नोबिल जैसे बड़े शहर रूस के क़ब्ज़े में आ चुके थे. लुहान्स्क और दोनेश्क पर रूस का नियंत्रण पहले से था.
पश्चिमी देशों की मदद के बाद यूक्रेन ने रूस को जवाब देना शुरू किया. कई जगहों से रशियन आर्मी को पीछे भागना पड़ा. कुछ शहरों में भीषण लड़ाई चल रही है.
23 फ़रवरी 2023 की ISW की रिपोर्ट में ये साफ़-साफ़ दिखता है. इस समय ख़ेरसॉन, मारियोपोल, लुहान्स्क और दोनेश्क में ही रूस की मौजूदगी दिखती है. बाकी जगहों को यूक्रेन ने वापस हासिल कर लिया है या प्रोसेस में हैं. पश्चिमी देशों ने अब तक चार लाख करोड़ रुपये से अधिक की मदद यूक्रेन को दी है. इसमें हथियारों से लेकर सैलरी तक के लिए दिए गए पैसे शामिल हैं. हाल ही में सीक्रेट ट्रिप पर किएव पहुंचे अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने चार हज़ार करोड़ रुपये की मदद का ऐलान किया था.
पश्चिमी देशों की खुफिया एजेंसियों ने दावा किया है कि, रूस फिर से अटैक बढ़ाने की तैयारी कर रहा है. यूक्रेन ने कहा कि वो इसके लिए तैयार है. यानी, हिंसा और नुकसान का चक्र अभी चलता रहेगा.
अब जान लेते हैं कि अभी तक कितना कुछ बदल चुका है? 11 पॉइंट्स में समझते हैं.
> नंबर एक.यूएन ह्यूमन राइट्स कमीशन (UNHRC) की रिपोर्ट के मुताबिक, 13 फ़रवरी 2023 तक 08 हज़ार से अधिक यूक्रेनी नागरिक युद्ध में मारे जा चुके हैं. लगभग 12 हज़ार लोग घायल भी हुए हैं. यूएन का कहना है कि असली आंकड़ा इससे कहीं ज़्यादा है. हताहत हुए सैनिकों का आधिकारिक डेटा अभी तक पता नहीं चला है.
> नंबर दो. युद्ध में यूक्रेन का इंफ़्रास्ट्रक्चर बुरी तरह तबाह हुआ है. वर्ल्ड बैंक ने सितंबर 2022 में कहा था कि, यूक्रेन को पहले जैसा बनाने के लिए लगभग 30 लाख करोड़ रुपये की ज़रूरत होगी. तब से वोल्गा में बहुत पानी बह चुका है. तबाही बढ़ी है. वर्ल्ड बैंक मार्च में नया अनुमान पेश करेगा. तब पता चलेगा कि यूक्रेन किस हालत में है!
> नंबर तीन. युद्ध के बाद से 80 लाख से अधिक यूक्रेनी नागरिकों को अपना देश छोड़ना पड़ा है. वे शरणार्थी बनकर यूरोप के अलग-अलग देशों में गए. सबसे अधिक 28 लाख शरणार्थी रूस पहुंचे. आरोप है कि अधिकतर को रूस ज़बरदस्ती अपनी सीमा में ले गया. पोलैंड और जर्मनी ने मिलकर लगभग 26 लाख लोगों को शरण दी है.
इसके अलावा, यूक्रेन में पढ़ाई कर रहे हज़ारों स्टूटेंड्स को बाहर जाना पड़ा. उनका भविष्य अभी भी अधर में है.
> नंबर चार. रूस पर यूक्रेन में वॉर क्राइम्स के अनगिनत आरोप हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के अनुसार, रूसी सैनिकों ने क़ब्ज़े वाले इलाकों में बलात्कार, टॉर्चर, हत्या, ज़बरदस्ती हटाने जैसे सैकड़ों अपराध किए हैं.
सबसे ख़तरनाक उदाहरण बूचा का था. वहां मार्च 2022 में 458 आम नागरिकों का नरसंहार हुआ था. कई लोगों के हाथों को पीठ से बांधकर गोली मार दी गई थी. कईयों को कतार में खड़ा कर मार डाला गया था. रूस ने इसको फ़ेक बताकर खारिज कर दिया. दिसंबर 2022 में न्यू यॉर्क टाइम्स ने सेटेलाइट इमेजरी के सहारे नरसंहार की पुष्टि की. जिस समय नरसंहार हुआ था, उस समय बूचा पर रूसी सेना का ही कंट्रोल था.
> नंबर पांच. युद्ध से पहले तक रूस नेचुरल गैस, कच्चे तेल, गेहूं, खाद जैसी बुनियादी ज़रूरत की चीज़ों के सबसे बड़े उत्पादक देशों में था. दूसरी तरफ़ यूक्रेन सूरजमूखी के तेल और गेहूं उपजाने में अव्वल नंबर पर था. युद्ध के बाद इसमें बड़ा अंतर पड़ा. पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए. इसके चलते विकासशील और कम-विकसित देशों के लिए रूस से सामान खरीदना मुश्किल हो गया. उधर, यूक्रेन की धरती पर लड़ाई चल रही है. वहां प्रोडक्शन थम गया. जो कुछ स्टॉक में बचा था, उसमें से कुछ पर रूस ने क़ब्ज़ा कर लिया. रूस पर अनाज की चोरी के आरोप भी लगे. जिस पोर्ट से यूक्रेन निर्यात करता था, उस पर भी रूस बैठ चुका था. इससे निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ.
इसका सबसे ज़्यादा नुकसान अफ़्रीका और एशिया के ग़रीब देशों को झेलना पड़ा. एक उदाहरण पाकिस्तान का है. द नेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 में पाकिस्तान ने अपनी कुल ज़रूरत का 39 प्रतिशत गेहूं यूक्रेन से खरीदा था. युद्ध के कारण सप्लाई प्रभावित हुई. नतीजा, पाकिस्तान इस समय गेहूं की किल्लत से जूझ रहा है. महंगाई और विदेशी मुद्रा भंडार की कमी ने पाकिस्तान के घुटने टिकवा दिए हैं. सरकार मान चुकी है कि देश दीवालिया हो चुका है.
उसी तरह अफ़्रीकी महाद्वीप के देश सस्ते अनाज और खाने वाले तेल के लिए यूक्रेन और रूस पर निर्भर थे. वहां महंगाई बढ़ी. मानवीय मदद के सहारे जी रहे लाखों लोग भुखमरी की कगार पर पहुंचे. कई देशों में खाद्य संकट पैदा हुआ. इन सबके अलावा, रूस फ़र्टिलाइज़र्स का सबसे बड़ा उत्पादक है. युद्ध के बाद से फ़र्टिलाइज़र्स के दाम बढ़ गए हैं. इससे पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ रही है.
> नंबर छह. हमले के बाद से एक हज़ार से अधिक विदेशी कंपनियों ने रूस में अपना बिजनेस बंद कर दिया. कई देशों ने अपने यहां रूसी नागरिकों की संपत्ति ज़ब्त की. यूरोप ने रूस से नेचुरल गैस और तेल की खरीद घटाने का वादा किया. वे साउथ अमेरिका और अफ़्रीका में नए सोर्स तलाश रहे हैं. इन सबसे रूस की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है.
> नंबर सात. पिछले बरस पुतिन ने आंशिक लामबंदी का आदेश दिया था. यानी, 18 से 59 की उम्र के बीच जिस किसी रूसी नागरिक ने सेना की ट्रेनिंग ली थी, उन्हें युद्ध लड़ने के लिए बुलाया गया. इस आदेश के बाद भयानक अराजकता फैली. मॉस्को टाइम्स की रिपोर्ट कहती है कि दो हफ़्ते के अंदर 07 लाख से अधिक लोग रूस छोड़कर भाग गए. बाद में पुतिन ने इस आदेश को वापस ले लिया.
> नंबर आठ. 2022 में रूस ने दो लाख से अधिक वेबसाइट्स को ब्लॉक किया. 21 हज़ार से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया. हज़ारों के ख़िलाफ़ सेंशरशिप कानूनों के तहत मुकदमा शुरू हुआ. पुलिस मॉनिटरिंग ग्रुप ओवीडी-इंफ़ो (OVD-Info) के मुताबिक, कम से कम 94 लोगों को सज़ा भी हो चुकी है. सरकार की आलोचना करने वाले कई अख़बारों पर बैन लगाया जा चुका है. एक उदाहरण नोवाया गज़ेटा का है. इसके संपादक दमित्री मुरातोव को 2021 में शांति का नोबेल प्राइज़ मिला था. उनका अख़बार Yr सरकारी दमन की चपेट में आया. अप्रैल 2022 में नोवाया गज़ेटा को रूस में अपना काम-धाम समेटना पड़ा.
एक और आंकड़ा है. रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) ने दिसंबर 2022 में सालाना रिपोर्ट जारी की थी. इसके मुताबिक, रूस-यूक्रेन युद्ध में ड्यूटी करते हुए 08 पत्रकार अपनी जान गंवा चुके हैं. और तो और, यूक्रेन के जिन प्रांतों में रूस ने क़ब्ज़ा किया था, वहां के कई लोकल पत्रकारों के बारे में कोई खोज-ख़बर नहीं है.
> नंबर नौ. 21 फ़रवरी 2023 को पुतिन ने न्युक्लियर आर्म्स कंट्रोल ट्रीटी से बाहर निकालने का ऐलान कर दिया. ये संधि 2010 में अमेरिका और रूस के बीच हुई थी. इसे न्यू स्टार्ट ट्रीटी भी कहा जाता है. दोनों देशों के पास दुनिया के 90 प्रतिशत न्युक्लियर हथियार हैं. इस संधि के तहत, हमले के लिए तैयार न्युक्लियर वॉरहेड्स और मिसाइलों की संख्या तय की गई थी. इसके अलावा, दोनों देश एक-दूसरे के न्युक्लियर हथियारों की मौजूदा स्थिति भी साझा करते थे. पुतिन के ऐलान के बाद ये सब रुक जाएगा. यानी, रूस के न्युक्लियर वेपंस की मौजूदा स्थिति का पता लगाना बेहद मुश्किल होगा. रूस के पास सबसे ज़्यादा परमाणु हथियार हैं. पुतिन ने कई बार अपनी परमाणु-क्षमता का प्रदर्शन भी किया है. न्यू स्टार्ट ट्रीटी से निकलने के बाद वो कौन सी राह पकड़ेंगे, कहना मुश्किल हो गया है.
> नंबर दस. रूस-यूक्रेन युद्ध ने एक बार फिर से पश्चिमी देशों का पक्षपात उजागर किया. जिस समय युद्ध चल रहा है, उस समय कई और देश भी मानवीय मदद की राह देख रहे हैं. उन देशों में भी शरणार्थी संकट है. जैसे, इथियोपिया, यमन, लेबनान, अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया आदि. अधिकतर का संकट पश्चिमी देशों ने ही पैदा किया है. लेकिन पश्चिम ने उस तरफ़ नज़र देने से इनकार कर दिया है. ब्रिटिश अख़बार गार्डियन ने 23 फ़रवरी को अपने संपादकीय में लिखा,
‘इथियोपिया में संभवत: कहीं अधिक ख़तरनाक युद्ध चल रहा है, लेकिन जिस तरह पश्चिमी देशों ने दूसरे शरणार्थियों की तुलना में यूक्रेनी नागरिकों का स्वागत किया, उसने उनका पाखंड सबके सामने ला दिया है.’
> नंबर ग्यारह. इस युद्ध ने एक नए तरह का वर्ल्ड ऑर्डर तैयार किया है. जिसमें पश्चिमी देशों के दावों पर सवाल पूछे जा रहे हैं. उनसे तर्क-वितर्क किया जा रहा है. एक तरफ़ पश्चिमी देश लोकतंत्र को बचाने का दम भर रहे हैं. दूसरी तरफ़, रूस और चीन दूसरे देशों के साथ मिलकर आईना दिखा रहे हैं. गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण अफ़्रीका की सेना रूस और चीने के साथ मिलिटरी ड्रिल कर रही है. दक्षिण अफ़्रीका में अफ़्रीकन नेशनल कांग्रेस (ANC) की सरकार है. इसी पार्टी ने रंगभेद के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रही थी. इस लड़ाई में अमेरिका ने उनकी कोई मदद नहीं की. उस समय सोवियत संघ और चीन उसके साथ खड़े थे. दूसरा उदाहरण भारत का है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. उसने युद्ध की आलोचना की है, लेकिन वो अपनी शर्तों पर रूस से तेल खरीद रहा है.
जब भी अमेरिका लोकतंत्र की दुहाई देता है, तब उसके पुराने पाप सामने आ जाते हैं. दुनियाभर के देशों में तख़्तापलट कराने और तानाशाहों के साथ खड़े होने का उसका ऐतिहासिक रिकॉर्ड रहा है. नए वर्ल्ड ऑर्डर में उसके लिए अपनी दादागिरी दिखाना थोड़ा मुश्किल ज़रूर हुआ है.
अब युद्ध से जुड़े ताज़ा अपडेट्स जान लेते हैं.
- 23 फ़रवरी को यूएन जनरल असेंबली (UNGA) की विशेष बैठक बुलाई गई. इसमें रूस को यूक्रेन से अपनी सेना निकालने की मांग से जुड़ा एक प्रस्ताव लाया गया. 141 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट डाला. 07 देशों ने इसके विरोध में वोटिंग की. जबकि 32 देशों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया. इनमें से एक भारत भी था.
- 24 फ़रवरी को चीन ने संघर्षविराम के लिए 12-सूत्रीय एजेंडा पेश किया. पश्चिमी देशों ने तुरंत इसको खारिज कर दिया. नेटो के सेक्रेटरी-जनरल जेंस स्टोलेनबर्ग ने कहा कि चीन की कोई क्रेडिबिलिटी नहीं है.
- एक साल पूरा होने पर ज़ेलेन्स्की ने ट्वीट किया, ‘एक साल पहले लाखों लोगों ने एक शपथ ली थी. उन्होंने सरेंडर करने की बजाय रुककर संघर्ष करना और लड़ना चुना था. हमें पता है कि 2023 हमारी विजय का साल साबित होगा.’
- रूस के पूर्व राष्ट्रपति और नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के मौजूदा डिप्टी चेयरमैन दमित्री मेदवेदेव ने रूस की जीत का भरोसा जताया. लिखा कि हम जल्दी ही सभी लक्ष्य हासिल कर लेंगे.
- अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने ट्वीट किया, ‘एक साल पहले राष्ट्रपति ने सोचा था कि वो आसानी से किएव को हथिया लेंगे. फिर उनका सामना यूक्रेन की बहादुरी और दूसरे देशों की दृढ़ इच्छाशक्ति से हुआ.’
- एक अपडेट रूसी सेना के अंदर चल रहे झगड़े से जुड़ी है. पिछले दिनों वेग्नर ग्रुप और रूसी सेना के बीच विवाद पैदा हुआ था. वेग्नर ग्रुप एक प्राइवेट आर्मी है. इसका मुखिया पुतिन का करीबी दोस्त येवगेनी प्रिगोझिन है. उसने आरोप लगाया था कि उसके लड़ाकों को हथियार नहीं मिल रहे हैं. जिसके कारण उन्हें नुकसान हो रहा है. 23 फ़रवरी की सुबह वेग्नर ग्रुप ने कहा कि सप्लाई शुरू हो गई है.
- और भी देशों और संगठनों ने अपने-अपने ढंग से रूस-यूक्रेन युद्ध की पहली बरसी को याद किया है.
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