कोरियाई लेखिका हान कांग की कविताओं में ऐसा क्या है जो उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिल गया?
Literature Nobel Prize 2024: नोबेल पुरस्कार देने वाली रॉयल स्वीडिश एकेडमी ने Han Kang के नाम की घोषणा करते हुए कहा, “ये सम्मान हान के पैनेपन से भरे काव्यात्मक गद्य के लिए है, जिसमें अतीत के ट्रॉमा से मुठभेड़ भी है और मानव जीवन की कोमलता भी हमारे सामने ज़ाहिर होती है.”

ये पंक्तियां लिखने वाली दक्षिण कोरियाई लेखिका हान कांग को साल 2024 के साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. नोबेल पुरस्कार देने वाली रॉयल स्वीडिश एकेडमी ने उनके नाम की घोषणा करते हुए कहा,
स्वीडिश एकेडमी के परमानेंट सेक्रेटरी मैट्स मालम ने एक सुंदर किस्सा सुनाया- जब उन्होंने हान को नोबेल मिलने की सूचना देने के लिए फोन किया तो ऐसा लग रहा था कि हान एक आम सा दिन बिता रही थीं. उन्होंने अभी-अभी अपने बेटे के साथ खाना खाया था. वे इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थीं. इसके बाद दोनों की बातचीत दिसंबर की ठंड की ओर मुड़ गई - जब हान को औपचारिक रूप से नोबेल पुरस्कार प्रदान किया जाएगा.
हान का जन्म 1970 के जाड़ों में हुआ. दक्षिण कोरिया के ग्वांगजू शहर में जन्मीं हान इस वक्त अपने मुल्क की राजधानी सियोल में रहती हैं. जहां वे नौ बरस की उम्र में अपने परिवार के साथ बसने चली आई थीं. उनका परिवार साहित्य में रचा-पगा है. पिता हांग-सिउंग-वुन एक प्रतिष्ठित उपन्यासकार हैं. हान को साहित्य में नोबेल मिला है, तो ज़ाहिर है साहित्य के प्रति वे पूरी तरह समर्पित हैं. लेकिन, अपने लेखन के साथ-साथ, कला और संगीत के क्षेत्र में भी उनका बराबर दखल है. और ये रेंज उनकी लिखाई में भी खूब दिखती है. सियोल स्थित योन्सी यूनिवर्सिटी में कोरियन साहित्य पढ़ने से पहले वे संगीत की दुनिया में ही रमी हुई थीं.
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बतौर लेखिका हान का करियर साल 1993 में शुरू हुआ. जब “लिट्रेचर एन्ड सोसाइटी” पत्रिका में उनकी पांच कविताएं छपीं. इसके दो बरस बाद साल 1995 में उनकी छोटी कहानियों की पहली किताब आई, “लव ऑफ़ यिउसू”. यहां वे पहली बार गद्य की देहरी में दाखिल होती हैं. “रेड एंकर” कहानी के लिए उन्हें एक साहित्यिक प्रतियोगिता में अवॉर्ड भी मिला था. लेकिन, उनके जिस काम से उन्हें ब्रेकथ्रू मिला वो था साल 2007 में छपा उनका उपन्यास, “दी वेजिटेरियन”. 2016 में इस किताब को बुकर पुरस्कार से भी नवाज़ा गया था. इसके अलावा उन्होंने “Human Acts”, “The White Book” जैसे उपन्यास भी लिखे हैं. उनकी सबसे हालिया किताब तीन बरस पहले 2021 में आई, “We Do Not Part.”
कविता और कहानी दोनों ही विधाओं में वे लगातार लिखती हैं. उनकी लिखाई में जीवित और मृत, देह और आत्मा के बीच संबंधों के बारे में उनकी बारीक जागरूकता झलकती है, इसके अलावा अपनी कविताओं में लगातार नए-नवेले प्रयोग करने की वजह से वे गद्य-लेखनी की मौजूदा दुनिया में एक बेंचमार्क बन गई हैं.
इस बात को थोड़ा साफ़गोई से समझने के लिए 2014 में आई उनकी किताब “Human Acts” का ये अंश देखिए,
हान की कल्पनाओं की दुनिया में मानव मन के तहखानों में छिपे अंधेरे को टोहने की कोशिश है. किसी रौशनी के आसरे नहीं, अपनी बेपैरहन उंगलियों के सहारे. साल 2012 में शाया हुई उनकी एक छोटी कहानी है “यूरोपा”. जिसमें कहानी कहने वाला एक पुरुष है, जिसने एक महिला का मुखौटा लगाया हुआ है. वो एक ऐसी महिला के प्रति आकर्षित हो गया है, जिसकी अभी-अभी शादी टूटी है. कहानी के नैरेटर पुरुष के पास सिवाय चुप्पी के कोई जवाब नहीं होता, जब उसकी प्रेमिका पूछती है, “अगर तुम अपनी मर्जी के मुताबिक जी पाने में सक्षम होते, तो तुम अपने जीवन के साथ क्या करते?" कहानी का एक हासिल है ये समझाइश कि इस दुनिया में न तो तृप्ति के लिए और न ही प्रायश्चित के लिए कोई जगह है.
दुःख एक ब्लैक होल की तरह हमें खींचता है. बुद्ध ने कहा था, “जीवन दुखम, सर्वम दुखम” यानी जीवन में दुःख है और सब जगह दुःख है. संस्कृत के महान कवि भवभूति ने तो यहां तक कह दिया था, “एको रस: करुण एव”. माने, रस तो केवल एक ही है और वो है करुण रस. सुख की छतें होती हैं, अलग-अलग. लेकिन दुःख एक नीले आसमान सरीखा है, जिसमें सबका समरूप हिस्सा है. अपने खांचे के आसमान को हान ने सफ़ेद रंग से लीपा. 2016 में आई उनकी किताब “The White Book” दुःख का दस्तावेज है. इस किताब में उनकी काव्यात्मक शैली हावी रही है. ये उपन्यास उस व्यक्ति को समर्पित एक शोकगीत है जो उपन्यास के मुख्य किरदार की बड़ी बहन हो सकती थी, लेकिन जन्म के कुछ घंटों बाद ही उसकी मृत्यु हो गई. सफ़ेद रंग की चीजों पर लिखे गए छोटे-छोटे नोट्स के साथ ये किताब अपनी दिशा में आगे बढ़ती है. इसलिए ये किताब एक उपन्यास से ज्यादा “प्रार्थना की किताब” है. कल्पना कैसे-कैसे कुलांचे भरती है, इसका एक मॉडल है ये उपन्यास. कहानी का नैरेटर ये मानता है कि अगर उसकी बहन को जीने का मौका मिल पाता, तो वो खुद पैदा नहीं होना चाहती. मृत बहन के लिए लिखे इस किताब आखिरी शब्द थे, “उन सभी सफेद चीजों के भीतर, मैं आपकी छोड़ी गई अंतिम सांस लूंगा.
हान के साहित्य को थोड़ा और साफ़ समझने के लिए हम चिड़िया की आंख खोज रहे थे. और किस्मत से, हमें घर से निकलते ही मंजिल मिल गई. जेएनयू के “सेंटर फॉर कोरियन स्टडीज” में प्रोफेसर सत्यांशु श्रीवास्तव बताते हैं,
हान की लिखाई की उंगली पकड़कर हम कोरियाई साहित्य को भी थोड़ा और जानना-बूझना चाहते थे, सो इन सवालों का भी परफेसर साहब ने शमन किया. बोले,
आप उनकी साहित्यिक दुनिया के अरण्य में खूब विचरण करें. तब तक हम आपको उनके लिखे के साथ छोड़े जाते हैं,
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