NCRB रिपोर्ट में सामने आया, कौनसा राज्य है अपराध और खुदकुशी में सबसे ऊपर?
NCRB के आंकड़ों के मुताबिक गुजरात में पुलिस हिरासत में हुई सबसे ज्यादा मौतें

हरि ओम शरण का एक बड़ा सुंदर भजन है - ''दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया.'' भजन के बोल बड़े सादे और शांत हैं. शरण बताते हैं कि किस तरह इस समूचे जग के लिए राम एक स्रोत की तरह हैं. राम के स्मरण से जो दीया जलता है, वो जग को रास्ता देता रहता है. हरि ओम शरण से माफी के साथ हम उनकी उपमा का इस्तेमाल एक दूसरी जगह करना चाहते हैं - ''डाटा एक राम, भिखारी सारी दुनिया.'' जो स्थान आध्यात्म में ईष्ट का है, वही प्रशासन की दुनिया में डेटा का है. माने जानकारी. डेटा सरकार की नीति का स्रोत होता है. वही नीति जो आपका और हमारा जीवन प्रभावित करती है. क्योंकि हम सबका जीवन बहुमूल्य है, इसीलिए बहुत ज़रूरी है कि समय समय पर डेटा की तरफ देखा जाए. आप सोच रहे होंगे कि आज हम डेटा के बारे में इतने जतन से भूमिका क्यों बांध रहे हैं. तो कारण जान लीजिए. भारत सरकार ने बड़े काम का डेटा सार्वजनिक किया है. साल 2021 की ''क्राइम इन इंडिया'' रिपोर्ट हमारे सामने है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो NCRB द्वारा तैयार की गई ये रिपोर्ट हमारे समाज में तरह-तरह के अपराधों और उनके बाद हुई कार्रवाई के बारे में बताती है. इस रिपोर्ट के आधार पर हम बता सकते हैं कि देश में महिलाएं सबसे सुरक्षित किस सूबे में हैं, कहां सबसे ज़्यादा दंगे हो रहे हैं और कहां सबसे ज़्यादा लोगों पर UAPA लग रहा है. ये भी बताएंगे कि हमारे समाज में खुदकुशी सबसे ज़्यादा कौनसे वर्ग में बढ़ रही है.
हमने शुरुआत में एक बार डेटा के महत्व को रेखांकित कर चुके हैं. अपराध और अपराधियों के डेटा से क्या फायदा हो सकता है, वो समझने के लिए आप आज से 68 साल पहले आई ''क्राइम इन इंडिया'' रिपोर्ट देख सकते हैं. भारत में अपराधों की जानकारी रिकॉर्ड्स में अंग्रेज़ों के ज़माने से ही दर्ज हो रही थी, लेकिन 1954 में ही पहली बार केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक विधिवत रिपोर्ट जारी की. इस रिपोर्ट में 1953 के आंकड़े शामिल किए गये थे. उस साल हत्या, किडनैपिंग और डकैती जैसे मुख्य अपराधों की जानकारी शामिल की गई थी. ये बताया गया था कि पुलिस को इन अपराधों से निपटने में क्या समस्या आ रही है और साथ ही सुधार के लिए भी अनुशंसाएं की गई थीं. आप तब की अनुशंसाएं देख लेंगे तो लगेगा कि 2022 की ही बात हो रही है. कुछ बिंदुओं पर गौर कीजिए-
> पुलिस में बेहतर रिक्रूट्स की भर्ती हो.
> आदतन अपराधियों पर नकेल के लिए अलग से कानून हो.
> फॉरेंसिक लैब्स की स्थापना हो.
> ग्रामीण इलाकों में पुलिस को मज़बूत किया जाए.
> अदालतों में मामलों के तेज़ी से निवारण के लिए और मैजिस्ट्रेट नियुक्त किये जाएं.
इन सारी अनुशंसाओं पर काम कहां तक पहुंचा, उसपर अलग से बात हो सकती है. लेकिन इतना तो है ही कुछेक अपवाद को छोड़कर इस तरह की रिपोर्ट्स का संकलन साल दर ज़्यादा विस्तृत हुआ है. पहले खुफिया विभाग माने IB ये रिपोर्ट्स बनाता था, लेकिन राष्ट्रीय पुलिस कमीशन और गृह मंत्रालय की एक टास्क फोर्स की सिफारिशों के आधार पर 1986 में अलग से नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो बनाया गया. NCRB रिपोर्ट बनाने के अलावा क्या क्या करता है, उसपर किसी दिन दी लल्लनटॉप शो में आपको विस्तार से बताएंगे, फिलहाल अपना ध्यान लगाते हैं ''क्राइम इन इंडिया 2021''रिपोर्ट पर.
हर बार की ही तरह क्राइम इन इंडिया 2021 का स्रोत भी राज्यों द्वारा इकट्ठा की जानकारी ही है. जी हां. अपने यहां हुए अपराधों के बारे में जो भी राज्यों और एजेंसियों ने केंद्र को बताया, वही रिपोर्ट में संकलित है. केंद्र ने अपनी तरफ से आंकड़ों का कोई सत्यापन नहीं किया है. इसीलिए दो तरह के लोगों की बात का ज़्यादा लोड मत लीजिएगा-
> जो नेताजी कहें कि हमारे यहां की कानून व्यवस्था सबसे अच्छी है,
> जो नेताजी कहें कि फलाने राज्य में कानून व्यस्था सबसे घटिया है.
वैसे भी नेताओं और आंकड़ों की पटती नहीं है. अब आ जाइए दूसरे राइडर पर. एनसीआरबी अपनी रिपोर्ट में FIR को आधार बनाता है. अब आप तो जानते ही हैं कि थाने में तहरीर से लेकर FIR तक का सफर कितना लंबा और जटिल होता है. हर मामला जो तहरीर की शक्ल में पुलिस के सामने आता है, उसपर FIR नहीं ली जाती. ऐसे में अंडर रिपोर्टिंग होती है. माने अपराधों की असल संख्या मालूम नहीं चलती. अपराधों की संख्या एक और कारण से भी घटती है. NCRB संकलन के लिए ''प्रिंसिपल ऑफेंस रूल'' का इस्तेमाल करता है. माने एक एफआईआर में अगर एक से ज़्यादा अपराधों का ज़िक्र हो, तो सबसे गंभीर अपराध को ही गिना जाता है. मिसाल के लिए अगर किसी मामले में बलात्कार और हत्या दोनों हुए हों, तो सिर्फ हत्या को गिना जाएगा.
पूरी रिपोर्ट भारी भरकम है. और कुल तीन वॉल्यूम माने खंडों में प्रकाशित हुई है. इसीलिए रिपोर्ट के सारे पहलुओं का अध्ययन करना मुश्किल है. इसीलिए हमने रिपोर्ट के कुछ हिस्सों पर अपना ध्यान केंद्रित किया है. पहला हिस्सा है ''Snapshots (States & Union Territories)''. इसमें 27 बिंदुओं में मोटा-माटी आंकड़ों और पैटर्नस को बताया गया है. क्या-क्या है स्नैपशॉट्स में?
1. 2021 में कुल 60 लाख 96 हज़ार 310 संज्ञेय अपराध दर्ज हुए. 2020 की तुलना में 7.6 फीसदी गिरावट हुई. एक लाख की आबादी पर अपराध 487.8 से 445.9 पर आ गए हैं.
अब आप पूछेंगे ये गिरावट कैसे हुई? क्या अपराधी वाकई सुधर गए? तो जवाब ये है, नहीं. गिरावट का बड़ा हिस्सा ऐसे मामलों से आया है, जो किसी पब्लिक सर्वेंट के आदेश की अवहेलना पर बनते हैं. मिसाल के लिए भीड़ को जुटने से रोकने के लिए धारा 144 लागू कर दी जाती है. इसके उल्लंघन पर पुलिस आप पर वैधानिक कार्रवाई कर सकती है, IPC की धारा 188 के तहत मामला भी बन सकता है. 2020 में ऐसे 6 लाख 12 हज़ार मामले दर्ज हुए थे. 2021 में संख्या हो गई 3 लाख 22 हज़ार. इसी तरह ‘Other IPC Crimes भी 10 लाख 62 हज़ार से 4 लाख 96 हज़ार पर आ गए हैं.
2. Offence Affecting Human Body माने हत्या, चोट पहुंचाना, किडनैपिंग आदि 5.1 फीसदी बढ़ गए हैं. क्राइम रेट 77.4 था, अब हो गया है 80.5. हत्याओं के मामले कमोबेश उतने ही हैं, लेकिन किडनैपिंग के मामले एक साल में 19.9 फीसदी बढ़ गए हैं.
यहां एक बात गौर करने वाली है. किडनैपिंग के कुल मामलों में बच्चियों और महिलाओं की संख्या तकरीबन 85 फीसदी थी. आंकड़ों को माइक्रोस्कोप से देखने पर मालूम चलता है कि नारी पूजा की डींगें हांकने वाले हमारे समाज में महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं. महिलाओं के खिलाफ अपराध साल भर में 15.3 फीसदी बढ़ गए हैं. और 31.8 फीसदी मामलों में महिलाएं पति या फिर पति के रिश्तेदारों के हाथों क्रूरता का शिकार बनीं. महिलाओं के साथ-साथ बच्चे भी पहले से ज़्यादा असुरक्षित हुए हैं. उनके खिलाफ अपराध 16.2 फीसदी बढ़ गए हैं. अगवा होने वाले लोगों में तकरीबन 70 फीसदी बच्चे ही थे.
3. अब गौर करते हैं वंचित तबकों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर. इस बात में राहत खोजी जा सकती है कि अनुसूचित जाति के लोगों के खिलाफ होने वाले अपराधों की संख्या कमोबेश उतनी ही है. आंकड़ा 50 हज़ार 291 मामलों से 50 हज़ार 900 मामलों तक ही पहुंचा. वैसे आदर्श स्थिति यही होगी कि ऐसे मामलों की संख्या घटते घटते नगण्य हो जाए. अनुसूचित जनजाति के खिलाफ अपराध 8 हज़ार 272 से बढ़कर 8 हज़ार 802 हो गए. यहां उछाल 6.4 फीसदी का है. और ये हमारे लिए चिंता का विषय होना चाहिए.
4. अगला बिंदु बड़ा दिलचस्प है. इन दिनों आर्थिक अपराध और भ्रष्टाचार पर एजेंसियों की कार्रवाई की बहुत सी खबरें आती हैं. इन्हें लेकर राजनीति भी खूब होती है. NCRB की रिपोर्ट में इनकी जानकारी भी दर्ज है. कुल मामलों में राजनैतिक मामलों की संख्या बहुत छोटी होती है. ज़्यादातर मामले फ्रॉड और जालसाज़ी जैसे हैं. लेकिन आंकड़ा दिलचस्प है. आर्थिक अपराध एक साल में 19.4 फीसदी बढ़ गए हैं. इसी तरह राज्यों में एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा दर्ज मामलों में भी 19.9 फीसदी की बढ़त हुई है. इनमें से तकरीबन 68 फीसदी मामले ऐसे थे, जिनमे जाल बिछाकर आरोपी को पकड़ा गया. आपने वैसी खबरें पढ़ी भी होंगी - अफसर घूस लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार. ये वैसे ही मामले थे.
5. ये बिंदु देश की तमाम सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए. 2020 में जहां 68 हज़ार 312 किलो विस्फोटक बरामद हुआ था, वहीं 2021 में 1 लाख 42 हज़ार 914 किलो विस्फोटक बरामद हुआ. माने दोगुने से भी ज़्यादा. बरामद विस्फोटकों में RDX, TNT, प्लास्टिक विस्फोटक वगैरह थे. तकरीबन 143 टन में से सिर्फ 195 किलो विस्फोटक आतंकवादियों, उग्रवादियों और चरमपंथियों के पास से मिला. बाकी विस्फोटक तस्करों के पास से. विस्फोटक की बरामदगी सुरक्षा एजेंसियों की सफलता भी है और ये चेतावनी भी कि विस्फोटकों की तस्करी बहुत बड़े पैमाने पर बढ़ रही है. ये अच्छा संकेत नहीं है. क्योंकि एक्सप्लोसिव डिवाइसेज़ माने डेटोनेटर, ग्रेनेड आदि की बरामदगी में भी 9 फीसदी से ज़्यादा का उछाल आया है.
जैसा कि हमने आपको बताया था, स्नैपशॉट्स वाले हिस्से में मोटा माटी बातें थीं. और वहां भी कुल 27 बिंदु थे, जिनमें से महत्वपूर्ण विषयों को हमने इन पांच विषयों में समेटने की कोशिश की है. और अब तक की बात ज़्यादातर आंकड़ों में हुई. अब हम आंकड़ों से निकलकर पैटर्न्स की तरफ चलेंगे. और इसके लिए हम मीडिया रिपोर्ट्स का सहारा लेंगे. आज NCRB की रिपोर्ट से निकलकर जितनी बातें सामने आईं, उनमें सबसे ज़्यादा चर्चा खुदकुशी के आंकड़ों की है.
2021 के साल में कुल 1 लाख 64 हज़ार 33 लोगों ने अपनी जान ली. जबकि 2020 में ये आंकड़ा 1 लाख 53 हज़ार 52 था. ये 7.18 फीसदी का उछाल है. लेकिन जब आप इस बात पर गौर करेंगे, कि खुदकुशी कर कौन रहा है, तब आपको लोगों की मानसिक सेहत के साथ-साथ देश की आर्थिक सेहत का भी अंदाज़ा हो जाएगा. इंडियन एक्सप्रेस के लिए हरिकिशन शर्मा ने खुदकुशी के आंकड़ों पर विस्तार से रिपोर्ट की है. हरिकिशन अपनी रिपोर्ट में बताते हैं कि खुदकुशी के 25.6 फीसदी मामलों में दैनिक वेतन भोगियों ने अपनी जान ली. माने डेली वेज पर काम करने वाले लोग. थोड़ी छूट लेकर इन्हें आप मज़दूर कह सकते हैं. लेकिन हम यहां साफ कर दें यहां खेतों में मज़दूरी कर रहे लोगों को नहीं जोड़ा गया है. उनके लिए अलग से कॉलम है.
2020 कोरोना महामारी और सख्त लॉकडाउन का साल था. 2021 में महामारी की दूसरी लहर आई थी. लेकिन 2019 में, जब महामारी नहीं थी, तब भी 23.4 खुदकुशी के मामले डेली वेजे पर काम करने वालों के थे. 2020 में संख्या बढ़कर 24.6 फीसदी हुई और 2021 में 25 फीसदी को पार कर गई. बढ़ते की ये रफ्तार भारत की राष्ट्रीय औसत से ज़्यादा है. इसका मतलब डेली वेज पर काम कर रहे लोग ज़्यादा तनाव में हैं और उन्हें समय रहते मदद नहीं मिल पा रही है. इतना ही नहीं, अपना स्वयं का काम करने वाले लोगों में भी खुदकुशी के मामले 16.73 फीसदी बढ़े हैं. सैलरीड लोग, माने वेतनभोगियों में खुदकुशी के मामले 7 फीसदी बढ़े. इन सारे आंकड़ों के बाद आप चाहें तो इस बात में राहत खोज सकते हैं कि बेरोज़गारों के बीच खुदकुशी के मामले 12.38 फीसदी घट गए हैं. सबसे ज़्यादा मामले सामने आए हैं महाराष्ट्र से.
NCRB की रिपोर्ट में कहा गया है कि खुदकुशी करने वालों के पेशे वाली जानकारी का उनकी आत्महत्या के कारण से संबंध नहीं है. रिपोर्ट खुदकुशी के 33.2 फीसदी मामलों को ''पारिवारिक कारणों के चलते'' बताती है और 18.6 फीसदी मामलों को बीमारी के चलते. लेकिन ये साफ नहीं करती कि क्या पारिवारिक कारणों में आर्थिक कारण भी शामिल हैं? आंकड़े सभी के सामने हैं, साफ दिख रहा है कि डेली वेज, सैलरीड क्लास और अपना काम करने वालों में खुदकुशी के मामले बढ़ गए हैं. फिर भी तर्क के लिये आर्थिक पक्ष को किनारे रख दिया जाए, तो क्या ये नहीं कहा जा सकता कि इन तबकों तक मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच बहुत कमज़ोर है? क्या इसके लिए सूबों और राज्यों की सरकारों को कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता?
चलने से पहले आपको एक और महत्वपूर्ण विषय के आंकड़े भी बता देते हैं. भारत में पुलिस सुधार की मांग तब और मुखर हो जाती है, जब कस्टोडियल डेथ माने हिरासत में मौत की खबर आती है. आप किसी भी राज्य के अखबार खंगालकर देख लीजिए. नियमित रूप से खबर आती है कि थाने में रहस्यमयी परिस्थितियों में आरोपी या गवाह की मौत हो जाती है. और इसके बाद शुरू हो जाती है लीपा-पोती. खैर, इस विषय पर हम पहले भी कई बार विस्तार से बात कर चुके हैं. आज आंकड़े देते हैं. साल 2021 में सबसे ज़्यादा कस्टोडियल डेथ हुईं गुजरात में. देश भर के कुल 88 मामलों में से 23 गुजरात से हैं. 2020 से तुलना करें तो गुजरात में कस्टोडियल डेथ्स में 53 फीसदी बढ़ोतरी हुई है. इसके बाद महाराष्ट्र का नंबर आता है, जहां 2021 में 21 लोग पुलिस हिरासत में मारे गए.
गुजरात में हुई 23 कस्टोडियल डेथ्स में से 22 ऐसी हैं, जिनमें पीड़ितों की मौत उस समय हुई जब वे रिमांड पर नहीं थे. एक व्यक्ति की मौत विधिवत पुलिस कस्टडी में हुई. नौ लोगों की मौत के लिए वजह आत्महत्या दी गई. नौ अन्य लोगों की मौत के लिए कहा गया कि वे बीमारी के चलते मारे गए. दो मामलों में पुलिस पर आरोप लगा कि उसने मृतकों पर हमला उन्हें घायल किया था और एक कथित रूप से कस्टडी से फरार होने की कोशिश में मारा गया. इन मामलों के संबंध में 12 पुलिस कर्मियों को गिरफ्तार भी किया गया.
राहत की बात ये है कि अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, केरल, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, ओडिशा, सिक्किम और उत्तराखंड जैसे राज्यों में कस्टोडियल डेथ का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ.
अब आते हैं दंगों पर. NCRB की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2021 में सांप्रदायिक दंगों के सबसे ज़्यादा -- माने 100 मामले झारखंड में दर्ज हुए, दूसरे नंबर पर यहां भी महाराष्ट्र रहा. सख्त कार्रवाई के नाम पर आजकल UAPA माने अनलॉफुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट का ज़िक्र खूब होता है. इसके सबसे ज़्यादा मामले देखे गए --- आपने ठीक गेस किया - जम्मू कश्मीर में. टॉपर्स की लिस्ट कुछ इस तरह है -
जम्मू कश्मीर - 289
मणिपुर - 157
असम - 95
झारखंड - 86
उत्तर प्रदेश 83
अमूमन हम आपको ऐसे बुलेटिन्स में राजनैतिक प्रतिक्रियाएं भी सुनवाते हैं. लेकिन हमने आज बड़ी खबर की शुरुआत में ही आपको बताया कि राजनैतिक टिप्पणियों में समस्या क्या आती है. वहां आंकड़ों पर सार्थक बहस नहीं होती, तू-तू मैं-मैं करके नंबर बनाए जाते हैं. आज बात डेटा की है. इसीलिए हम राजनैतिक प्रतिक्रियाओं को किनारे कर रहे हैं. हमने यहां कुछ बड़े बिंदुओं को छूने की कोशिश की. चूंकि रिपोर्ट विस्तृत है, इसीलिए कई और बिंदु हैं, जिनपर आप दी लल्लनटॉप की विस्तृत कवरेज को वेबसाइट पर जाकर पढ़ सकते हैं.
वीडियो: NCRB के डेटा ने बताया मज़दूर खुदकुशी को मजबूर क्यों हैं?

