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नेटो में आपसी कलह की वजह क्या है?

2024 की नेटो समिट ऐसे समय में बुलाई गई है, जब यूक्रेन पर रूस के हमले तेज़ हो रहे हैं. बैठक से एक दिन पहले ही यूक्रेन में सबसे बड़े बच्चों के अस्पताल पर अटैक हुआ. दूसरी बात, रूस को अलग-थलग करने की कोशिश कमज़ोर हुई है.

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नेटो की सेना (फोटो-गेट्टी)
10 जुलाई 2024 (Updated: 12 जुलाई 2024, 13:33 IST)
Updated: 12 जुलाई 2024 13:33 IST
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“नाटो की तथाकथित सुरक्षा अन्य देशों की सुरक्षा की कीमत पर है. नाटो की वजह से दुनिया और पूरे रीजन में काफी बड़े जोखिम पैदा हुए हैं. चीन नाटो द्वारा लगाए उन आरोपों का दृढ़ता से विरोध करता है जिसमें नाटो ने चीन पर कई आरोप लगाए हैं. नाटो एशिया-पैसिफिक में पूर्व की ओर बढ़ रहा है जिससे रीजन में तनाव पैदा हो रहा है. उन्होंने चीन के बहाने तनाव बढ़ाने की कोशिश की है जिसका हम दृढ़ता से विरोध करते हैं.”

ये बयान है चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान का जो आरोप लगा रहे थे कि नेटो चीन का इस्तेमाल अपनी ग़लतियां छिपाने के लिए करता है. ये पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए ख़तरनाक है. चीन की तल्ख़ी नेटो के सेक्रेटरी-जनरल जेन्स स्टोलेनबर्ग के बयान के बाद आई है. 08 जुलाई को उन्होंने कहा था कि चीन, यूक्रेन की जंग में रूस का समर्थन कर रहा है. इसके अगले ही दिन स्टोलेनबर्ग को नेटो की 75वीं समिट में हिस्सा लेना था. उनके बयान से समझ आ गया कि समिट का फ़ोकस रूस-यूक्रेन जंग के साथ-साथ चीन पर भी रहेगा.

आख़िरकार, 09 जुलाई को अमरीका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में नेटो समिट शुरू हुई. नेटो का फ़ुल फ़ॉर्म है - नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन. शुरुआत 12 देशों के साथ अप्रैल 1949 में हुई थी. मकसद था, कोल्ड वॉर में सोवियत संघ के प्रभुत्व को रोकना. फिर 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया. मगर नेटो बना रहा. कालांतर में इसके सदस्यों की संख्या भी बढ़ी. अभी इसमें कुल 32 देश हैं. अमरीका और कनाडा के अलावा यूरोप के 30 देश इसके सदस्य हैं. 

2024 की नेटो समिट ऐसे समय में बुलाई गई है, जब यूक्रेन पर रूस के हमले तेज़ हो रहे हैं. बैठक से एक दिन पहले ही यूक्रेन में सबसे बड़े बच्चों के अस्पताल पर अटैक हुआ. दूसरी बात, रूस को अलग-थलग करने की कोशिश कमज़ोर हुई है. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के विदेश दौरे बढ़े हैं. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस का दौरा किया है. तीसरी चीज़, नेटो के सबसे ताक़तवर मेंबर अमरीका में नेतृत्व का संकट बढ़ रहा है. राष्ट्रपति जो बाइडन की फ़िटनेस पर सवाल उठ रहे हैं. इन सबके अलावा, नेटो देशों की आपसी कलह भी जारी है. हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान रूस जाकर आए हैं. जबकि हाल ही में तुर्किए के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन SCO समिट में पुतिन से मिले और उनको अपने यहां आने का न्यौता भी दिया.

तो, समझते हैं-
- इस बार की नेटो समिट का एजेंडा क्या है?
- क्या नेटो की आपसी कलह खत्म हो पाएगी?
- और, नेटो समिट के केंद्र में चीन और रूस क्यों हैं?

नेटो एक साझा सैन्य संगठन है. मतलब, किसी एक सदस्य देश पर हमले को समूचे संगठन पर हमला माना जाता है. इसलिए उसकी रक्षा में सभी सदस्यों को अपनी सेना उतारनी पड़ेगी. ये नेटो के आर्टिकल फ़ाइव में दर्ज़ है. इसका इस्तेमाल सिर्फ़ एक बार हुआ है. 11 सितंबर 2001 को अमरीका पर हुए आतंकी हमले के बाद. नेटो की अपनी कोई सेना नहीं है. संकट में सभी देशों की सेना मिलकर लड़ती है.
नेटो के सदस्य देशों की आर्मी में कुल मिलकर 35 लाख सैनिक हैं. इससे आप उसकी ताकत का अंदाज़ा लगा सकते हैं. नेटो के सदस्य देशों की सेनाएं समय-समय पर युद्ध अभ्यास भी करती रहती है. 
नेटो के हर सदस्य के पास वीटो पावर है. कोई भी फ़ैसला सभी सदस्यों की सहमति से लिया जाता है. अगर एक भी देश ने मना किया तो प्रस्ताव फ़ेल हो जाता है. जैसा हमने पहले बताया नेटो की स्थापना सोवियत संघ के विस्तार को रोकने के लिए हुई थी. मगर 1991 में तो सोवियत संघ का विघटन हो गया. उसके बाद नेटो को भंग क्यों नहीं किया गया? दरअसल, नेटो ने इस घटना के बाद अपना मकसद बदल लिया. कहा,अब हम दुनिया की शांति और स्थिरता के लिए काम करेंगे. कालांतर में रूस और चीन की चुनौती बढ़ी. क्यों? इसका ज़िक्र हम आगे करेंगे.

इस बार की नेटो समिट 09 से 11 जुलाई तक चलेगी. इसमें सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष और शीर्ष अधिकारी शामिल हो रहे हैं. चूंकि इसमें यूक्रेन जंग का मुद्दा सबसे ऊपर है. इसलिए, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेन्स्की को भी बुलाया गया है. ज़ेलेन्स्की ज्यादा हथियारों की सप्लाई और नेटो की मेंबरशिप के लिए कैंपेन कर रहे हैं. उनको थोड़ी-थोड़ी सफलता भी मिल रही है. समिट के पहले दिन बाइडन ने यूक्रेन को एयर डिफ़ेंस सिस्टम की सप्लाई बढ़ाने का एलान किया. इससे रूस के हवाई हमलों को रोकने में मदद मिलेगी.

रूस-यूक्रेन के अलावा और क्या है एजेंडे पर?
चार पॉइंट्स में समझिए,
1. चीन, साउथ चाइना सी के ज़्यादातर हिस्से को अपना बताता है. ऐसे इलाकों को भी जो अंतरराष्ट्रीय क़ानून के हिसाब से उसके नहीं हैं. इनमें से कई हिस्सों पर फ़िलिपींस और ताइवान भी हक़ जताते हैं. इसलिए चीन की इस इलाके में झड़प भी होती रहती है. जून 2024 में चीन और फ़िलिपींस की नौसेना आपस में भिड़ गई. साउथ चाइना सी ग्लोबल ट्रेड के लिए भी बेहद ज़रूरी है. नेटो सदस्य देशों के जहाज़ इसी रास्ते से सामान लाते ले जाते हैं. चीन की उपस्थिति से ये व्यापार प्रभावित हो सकता है. नेटो देश इसका समाधान चाहते हैं. इसलिए चीन नेटो की नज़र में रहता है. पहली बार नेटो और चीन की टशल शुरू हुई थी साल 2019 में. तब लंदन में नेटो समिट हुई थी. वहां पहली बार चीन की चुनौती पर चर्चा हुई थी. इसके बाद से ये चुनौती स्थायी है.

 

2. यूक्रेन युद्ध: जबसे यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ है. तबसे हर बड़े अंतराष्ट्रीय मंच पर ये मुद्दा छाया रहता है. इस समिट में भी यही होता दिख रहा है. जो बाइडन ने पहले दिन अपने स्पीच में यूक्रेन का ज़िक्र किया. कहा यूक्रेन, पुतिन को हराने में कामयाब होगा. सनद रहे नेटो की रूस से दुश्मनी हालिया नहीं है. इसकी शुरुआत 2014 में ही हो गई थी जब रूस ने क्रीमिया पर क़ब्ज़ा कर लिया था. नेटो ने इसका विरोध किया था. उन्होंने उस मामले में हस्तक्षेप तो नहीं किया था. मगर रूस के पड़ोसी देशों में डिफ़ेंस मज़बूरत कर दिया.

रूस को नेटो से क्या दिक्कत है?
रूस का कहना है कि यूक्रेन को नेटो की सदस्यता नहीं मिलनी चाहिए. अगर ऐसा होता है तो उसकी दो-तिहाई से अधिक पश्चिमी सीमा सीधे नेटो की पहुंच में आ जाएगी. इसके अलावा रूस का कहना है कि 1997 के बाद जो भी देश नेटो के मेंबर बने हैं, उन्हें निकाला जाए. और, ये गारंटी मिले कि आगे किसी भी देश को नेटो में शामिल नहीं किया जाएगा. इसके अलावा चीन और रूस की दोस्ती ने भी नेटो को चिंता में डाला है. आरोप हैं कि चीन, रूस को सेमीकंडक्टर बेच रहा है. 2023 में रूस ने 90% माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक्स का आयात चीन से किया, जिसका इस्तेमाल मिसाइलों, टैंकों और विमानों के उत्पादन में किया गया था. इल्ज़ाम तो ये भी हैं कि चीन, रूस को सेटेलाइट तस्वीरें भी साझा कर रहा है. इससे रूस को हमला करने में सफलता मिली है.

3. बाइडन की फ़िटनेस.
ये नेटो का आधिकारिक रूप से कोई एजेंडा नहीं है. लेकिन जानकार कहते हैं कि नेटो सदस्य के बीच इसकी चर्चा हो सकती है. जून 2024 में हुई प्रेसिडेंशियल डिबेट में बाइडन ने ख़राब प्रदर्शन किया था. जिसके बाद उनकी फ़िटनेस पर सवाल उठाए गए. मांग उठी कि डेमोक्रेटिक पार्टी को उनकी जगह किसी और को उम्मीदवार बना देना चाहिए.
जिस दिन नेटो समिट शुरू हुई, उसी शाम डोनाल्ड ट्रंप ने मियामी में रैली की. वहां उन्होंने नेटो सदस्यों को जमकर लताड़ा. ट्रंप ये कहते रहे हैं कि अगर सदस्य देशों ने तयशुदा रकम खर्च नहीं की तो मैं उन्हें रूस से नहीं बचाऊंगा. तयशुदा रकम क्या है? जीडीपी का दो फीसदी डिफ़ेंस पर खर्च करने का प्रावधान है. मगर नेटो के कुछ ही देश उसका पालन करते हैं. इसलिए, ट्रंप नाराज़गी जताते हैं.

4. ये नेटो की अंदरुनी कलह से जुड़ी है.
भले ही नेटो ख़ुद को ताक़तवर बताने की कोशिश करे, मगर उसकी आपसी कलह को कोई नकार नहीं सकता. तुर्किए और हंगरी ने फ़िनलैंड और स्वीडन के नेटो में शामिल होने का विरोध किया था. तुर्किए और हंगरी की रूस के साथ भी अच्छी दोस्ती है.  हंगरी के तो रूस और चीन दोनों के साथ संबंध मज़बूत ही हुए हैं. 6 जुलाई को ही हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान रूस गए थे. रूस के बाद उन्होंने चीन जाकर राष्ट्रपति जिनपिंग से मुलाकात की.

अब नेटो की कुछ खासियतों की बात कर लेते हैं. नेटो ने इस समिट में इंडो पेसेफिक रीजन के अपने पार्टनर्स को दावत दी है. ये देश हैं ऑस्ट्रेलिया, जापान साउथ कोरिया और न्यूज़ीलैंड. ये देश नेटो के मेंबर नहीं हैं लेकिन नेटो के ग्लोबल पार्टनर कहलाते हैं. नेटो इन्हें समिट में चीन के ख़तरे बताने की कोशिश करेगा. 

समिट से जुड़े ताज़ा अपडेट्स जान लीजिए,
- बेलारूस और चीन मिलकर पोलैंड की सीमा के पास युद्ध अभ्यास कर रहे हैं. पोलैंड नेटो का मेंबर है. और बेलारूस, रूस का बेस्ट फ्रेंड. इस युद्ध अभ्यास को नेटो समिट के काउंटर की तरह देखा जा रहा है. इस अभ्यास को ‘ईगल असॉल्ट 2024’ नाम दिया गया है.
- यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर ज़ेलेन्स्की ने समिट में एयर डिफ़ेंस सिस्टम और विमानों की मांग की है. सनद रहे नेटो संगठन के तौर पर यूक्रेन की मदद नहीं कर रहा है. हालांकि, उसके सदस्य देश अलग से हथियार भेज रहे हैं.
- रूसी सत्ता-प्रतिष्ठान के केंद्र क्रेमलिन के प्रवक्ता दमित्री पेस्कोव ने कहा है कि रूस, इस समिट पर नज़र बनाए हुए है. वो हर बयान पर ध्यान दे रहा है.
- ये समिट मौजूदा सेक्रेटरी-जनरल जेन्स स्टोलेनबर्ग के लिए आख़िरी है. वो 2014 से नेटो का नेतृत्व कर रहे हैं. अक्टूबर महीने में नीदरलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री मार्क रूटा नेटो की कमान संभाल लेंगे

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