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लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े 3 बिल पेश, परिसीमन पर संग्राम, पूरा मामला समझ लें यहां

Womens Reservation Bill 2026: सरकार का दावा है कि महिलाओं के लिए 33% रिजर्वेशन लागू करने के लिए ये तीन बिल जरूरी हैं. विपक्षी पार्टियों ने कहा है कि वे महिलाओं के रिजर्वेशन का समर्थन करती हैं लेकिन इसे डिलिमिटेशन से जोड़ने का विरोध करती हैं. क्या हैं ये तीन बिल और क्यों हो रहा है इनका विरोध? इससे जुड़े हर पहलू को समझ लें.

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सौरभ
| अर्पित कटियार
16 अप्रैल 2026 (अपडेटेड: 16 अप्रैल 2026, 01:49 PM IST)
nari shakti vandan act amendment, Womens Reservation Bill 2026
संसद में महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े तीन अहम बिल पेश कर दिए गए हैं. (फाइल फोटो: आजतक)
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केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े तीन अहम बिल संसद में पेश किए हैं. अगले तीन दिन इन बिलों पर बहस होनी है. सरकार का दावा है कि महिलाओं के लिए 33% रिजर्वेशन लागू करने के लिए ये जरूरी हैं. बिल पास होने के बाद लोकसभा में सांसदों की संख्या 543 से बढ़कर लगभग 850 हो जाएगी. फिर इन्हीं सांसदों में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी. यह सब इतना आसान नहीं है. 

बिल पेश होने के साथ ही विपक्ष ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है. विपक्ष का आरोप है कि सरकार संविधान को हाईजैक करना चाहती है. सीटों की आखिरी संख्या निर्धारित करने के लिए परिसीमन यानी डिलिमिटेशन की प्रक्रिया भी लागू की जाएगी. इसलिए दक्षिण भारत की पार्टियां भी ये आरोप लगा रही हैं कि उनके राज्यों के साथ भेदभाव हो रहा है. क्या हैं ये तीन बिल और क्यों हो रहा हैं इनका विरोध? इसे ही जानने की कोशिश करेंगे.

कौन-कौन से हैं ये तीन बिल?

पहला: संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026. प्रस्तावित संशोधन में संविधान के अनुच्छेद 81 में बदलाव किया जा रहा है. इसके तहत लोकसभा में राज्यों से चुने जाने वाले सदस्यों की अधिकतम संख्या 815 तक हो सकती है. केंद्र शासित प्रदेशों से अधिकतम 35 सदस्य चुने जाएंगे. इनका चयन किस तरीके से होगा, यह संसद कानून बनाकर तय करेगी. इसमें जनसंख्या के आधार पर हर राज्य विधानसभा में सीटों की संख्या में बदलाव की भी मांग की गई है. विपक्षी पार्टियों ने 850 के आंकड़े के आधार पर और राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर सवाल उठाए हैं. 

इस बिल में संविधान के अनुच्छेद 82 में भी संशोधन का प्रस्ताव है. जो अभी हर जनगणना के बाद संसदीय क्षेत्रों के डिलीमिटेशन (परिसीमन) की बात करता है. अभी अनुच्छेद 82 के तीसरे प्रावधान के मुताबिक, अगला परिसीमन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आधार पर किया जाना अनिवार्य है. लेकिन सरकार संशोधन करने जा रही है कि इस पूरे प्रावधान को ही हटा दिया जाए. 

दूसरा: केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026. इस दूसरे प्रस्तावित संशोधन में केंद्र शासित प्रदेश अधिनियम, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम और GNCT दिल्ली अधिनियम में बदलाव करने की बात कही गई है, ताकि डिलिमिटेशन और असेंबली सीटों की संख्या में बदलाव की इजाजत मिल सके.

तीसरा: परिसीमन विधेयक 2026 (डिलिमिटेशन बिल 2026). तीसरे बिल में एक नए डिलिमिटेशन एक्ट का प्रस्ताव है, जिसके तहत इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए भारत में एक परिसीमन आयोग की स्थापना की जाएगी. 2023 में 106वां संशोधन हुआ था, जिसके मुताबिक लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण तभी लागू होगा, जब नई जनगणना के बाद परिसीमन  होगा. 

अब नए बिल में अनुच्छेद 334A में संशोधन का प्रस्ताव है. इसके तहत यह प्रावधान किया जा रहा है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई (33%) महिला आरक्षण परिसीमन होते ही तुरंत लागू किया जा सके. यानी नई जनगणना से जोड़कर देरी नहीं की जाएगी और इसके लिए सरकार ला रही है डिलिमिटेशन बिल 2026, जो डिलिमिटेशन बिल, 2002 की जगह लेगा. 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, डिलीमिटेशन बिल केंद्र सरकार को यह अधिकार देगा कि वो आधिकारिक राजपत्र में नोटिफिकेशन जारी करे और एक परिसीमन आयोग बना दे. इस आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा या रिटायर्ड जज करेंगे.

इससे दो ऐसे सवाल उठते हैं जिनका अभी तक कोई हल नहीं निकला है. पहला- परिसीमन की इस प्रक्रिया में कितना समय लगेगा और दूसरा- इसमें किस जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाएगा. महिला संगठनों, सांसदों और वकीलों की एक खुली याचिका में आरक्षण को डिलिमिटेशन से ‘अलग’ करने की मांग की गई है. विपक्ष ने भी यही तर्क दिया है कि तय 33% कोटा आबादी में होने वाले बदलावों पर निर्भर नहीं करता है.

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्तावित संशोधन में यह नियम है कि महिलाओं का रिज़र्वेशन लागू होने से 15 साल तक रहेगा, जब तक कि संसद इसे आगे न बढ़ा दे.

क्यों हो रहा है विरोध? 

द हिंदू ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि अगर ये प्रस्ताव लागू हो जाते हैं, तो हिंदी भाषी राज्यों (हिंदी हार्टलैंड) की लोकसभा सीटों की हिस्सेदारी 38.1% से बढ़कर 43.1% हो जाएगी. लेकिन साउथ के राज्यों की हिस्सेदारी घटकर 24.3% से 20.7% रह जाएगी. रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रस्ताव के लागू होने पर यूपी की लोकसभा में हिस्सेदारी 14.73% से बढ़कर 16.24% हो जाएगी, जबकि केरल की हिस्सेदारी 3.68% से घटकर 2.7% रह जाएगी.

यही वजह है कि परिसीमन का मुद्दा पिछले 50 साल से राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाता रहा है. दक्षिण भारत के राज्यों का कहना है कि अगर सीटों का बंटवारा सिर्फ जनसंख्या के आधार पर हुआ तो उन्हें नुकसान होगा, क्योंकि वे जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे हैं. लेकिन उत्तर भारत के कई राज्यों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है. इसी वजह से 1976 और 2001 में संविधान संशोधन कर सीटों में बदलाव को टाल दिया गया था. अभी यह रोक 2026 तक लागू है. अब सरकार इस व्यवस्था को बदलना चाहती है.

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने चेतावनी दी कि अगर राज्यों को रिप्रेजेंटेशन नहीं मिला तो वे विरोध करेंगे, जबकि DMK नेताओं ने इस कदम को संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन बताया.

विपक्ष: महिलाओं के पक्ष में, डिलिमिटेशन के खिलाफ

विपक्षी पार्टियों ने कहा है कि वे महिलाओं के रिजर्वेशन का समर्थन करती हैं लेकिन इसे डिलिमिटेशन से जोड़ने का विरोध करती हैं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि विपक्ष महिला आरक्षण का पूरी तरह समर्थन करता है लेकिन डिलिमिटेशन का विरोध करेगा. कानूनी जानकारों ने यह भी चेतावनी दी है कि सीटों के बंटवारे, डिलिमिटेशन और रिजर्वेशन को एक फ्रेमवर्क में मिलाने से राजनीतिक रूप से संवेदनशील स्थिति बन सकती है.

लोकसभा में पेश किए गए तीनों बिलों पर लोकसभा में चर्चा शुरू हो गई है. तीनों बिलों पर 17 अप्रैल को शाम 4 बजे वोटिंग होगी. सरकार ने 12 घंटे चर्चा का समय तय किया है.

वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: विपक्ष को महिला आरक्षण स्वीकार, परिसीमन पर रार, संसद में फंसेगा मामला?

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