पुतिन के ‘गुरु’ को मारने की साज़िश के पीछे कौन?
अलेक्जेंडर डूगिन की पूरी कहानी क्या है?

20 अगस्त 2022 की रात रूस की राजधानी मॉस्को के एक हाईवे के बीचोंबीच एक शख़्स बदहवास खड़ा था. वो बार-बार अपना सिर पकड़ रहा था. अपने हाथ फैला रहा था. पैर पटक रहा था. उसके सामने जो नज़ारा पसरा था, उसने उसकी आंखों में बेहिसाब हैरानी भर दी थी. सड़क पर एक कार धू-धू कर जल रही थी. कार के चीथड़े इधर-उधर बिखरे पड़े थे. साथ में मांस के कुछ लोथड़े भी.
जो शख़्स ये सब देख रहा था, उसके चेहरे पर हैरानी के साथ-साथ बेचारगी भी थी. हैरानी इसलिए कि मौत की मशीन बन चुकी उस कार में उसे भी होना था. लेकिन ऐन समय पर उसने अपना मन बदल दिया.
और, बेचारगी इसलिए क्योंकि उस कार को उसकी सगी बेटी चला रही थी. जिससे उसने कुछ घंटे पहले ही कहा था, तुम अपनी कार से घर निकलो. मैं थोड़ी देर से आता हूं.
बेटी घर के लिए निकली और कभी पहुंच ही नहीं पाई. रास्ते में उसकी कार में धमाका हुआ और उसी में उसकी मौत हो गई. सामान्य स्थिति में, ये दुर्घटना किसी आम रोड एक्सीडेंट की तरह फ़ाइल में लिखी जाती. जांच का दिखावा होता और फिर बात खत्म हो जाती.
लेकिन 20 अगस्त की रात जो हुआ, उसने रूस की सत्ता के केंद्र क्रेमलिन से लेकर यूक्रेन और बाकी दुनिया को अलर्ट कर दिया था. ऐसा क्यों? क्योंकि उस कार दुर्घटना में मरनेवाली लड़की का नाम डारया डूगिना था. और, हाईवे पर बदहवास खड़े उसके बाप का नाम अलेक्जेंडर डूगिन है. वही, अलेक्जेंडर डूगिन, जिन्हें पुतिन का रासपुतिन कहा जाता है. जिन्हें वेस्टर्न मीडिया में पुतिन का दिमाग कहा जाता है. कहा तो ये भी जाता है कि पुतिन जो करते या कहते हैं, वो डूगिन बहुत पहले लिख चुके हैं.
तो, आज हम जानेंगे,
अलेक्जेंडर डूगिन की पूरी कहानी क्या है?
उन्हें पुतिन का दिमाग क्यों कहा जाता है?
और, डूगिन की बेटी की हत्या में यूक्रेन का नाम क्यों आ रहा है?
साल 1997. रूस में एक किताब पब्लिश हुई. इसका नाम था, द फ़ाउंडेशंस ऑफ़ जियो-पॉलिटिक्स. इस किताब में यूक्रेन पर भी लिखा गया था. इसके मुताबिक,
एक देश के तौर पर यूक्रेन का कोई भू-राजनीतिक आधार नहीं है, उसका कोई सांस्कृतिक महत्व नहीं है, कोई भौगोलिक अनोखापन नहीं है, कोई जातीय विशेषता नहीं है.

यानी, यूक्रेन कोई देश है ही नहीं. उसके पास राष्ट्र बनने लायक कोई विशेषता नहीं है. ये दावा करने वाले लेखक का नाम था, अलेक्जेंडर डूगिन.
जिस समय डूगिन की किताब पब्लिश हुई थी, उस समय व्लादिमीर पुतिन सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने में मशगूल थे. इसके दो बरस बाद वो पहले रूस के प्रधानमंत्री बने और फिर बोरिस येल्तसिन ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी चुन लिया. उसके बाद से रूस की सत्ता पर पुतिन का आधिपत्य है.
पुतिन पहली बार साल 2000 में राष्ट्रपति बने. बीच में कुछ समय के लिए उन्होंने कुर्सी अपने एक वफ़ादार दमित्री मेदवेदेव को सौंपी थी. लेकिन फिर वापस काबिज हो गए. अभी तक हैं और आगे भी रहने का इरादा है. 2021 में पुतिन ने एक लेख लिखा. ऑन द हिस्टॉरिकल यूनिटी ऑफ़ रशियंस एंड यूक्रेनियन्स. इसमें पुतिन ने डूगिन की लिखी कई बातों को दोहराया. मसलन, यूक्रेन कोई देश नहीं है. यूक्रेन को रूस से अलग रहने का कोई अधिकार नहीं है. इसके छह महीने बाद ही पुतिन ने अपनी सेना को यूक्रेन पर हमला करने का आदेश दे दिया. पुतिन ने इस हमले को जायज ठहराने के लिए बार-बार डूगिन की थ्योरी दोहराई है. वो ये भी कहते रहे हैं कि यूक्रेन कोई देश ही नहीं है. ये वही थ्योरी है, जिसके बारे में डूगिन ने 90 के दशक में अपनी किताब में लिखा था.
पुतिन ने भले ही फ़रवरी 2022 में यूक्रेन पर हमले का आदेश दिया हो, लेकिन इसकी भविष्यवाणी आठ बरस पहले ही हो चुकी थी. फ़रवरी 2014 की बात है. तीन महीने तक चले यूरोमैदान प्रोटेस्ट के बाद यूक्रेन के राष्ट्रपति विक्टर यान्कोविच देश छोड़कर भाग गए. यान्कोविच रूस के समर्थक थे. वो यूरोप की बजाय रूस से करीबी रखना चाहते थे. इसी वजह से यूक्रेन की जनता उनके ख़िलाफ़ हो गई थी.
यान्कोविच के भागने के बाद यूक्रेन अस्त-व्यस्त था. राजनैतिक अस्थिरता थी. अराजकता फैली हुई थी. इसका फायदा उठाकर रूस ने क्रीमिया पर हमला कर दिया. क्रीमिया को निकिता ख्रुश्चेव ने 1950 के दशक में यूक्रेन को गिफ़्ट में दिया था. उस समय यूक्रेन सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करता था. सोवियत संघ के विघटन के बाद उसका उत्तराधिकार रूस को मिला. यूक्रेन अलग देश बना. क्रीमिया उसका हिस्सा बन गया. लेकिन रूस के जेहन से वो अलग नहीं हुआ था. रूस बस मौके के इंतज़ार में था. जैसे ही उसे यूक्रेन में अपना प्रभाव कम होने की आशंका लगी, उसने हमला करके क्रीमिया को अपना हिस्सा बना लिया.
इस हमले के तीन महीने बाद अलेक्जेंडर डूगिन ने बीबीसी को एक इंटरव्यू दिया. इसमें डूगिन ने कहा था कि रूस और यूक्रेन के बीच लड़ाई को कोई नहीं रोक सकता. ये होना ही है. डूगिन ने ये भी कहा था कि रूस को मॉरल अथॉरिटी बचाए रखने के लिए यूक्रेन पर हमला कर देना चाहिए. डूगिन ने ऐसी ही अपील 2008 में भी जारी की थी. उस समय रूस ने जॉर्जिया पर हमला किया था.
इसके अलावा, डूगिन ने ही नोवोरशिया (यानी न्यू रशिया) का टर्म ईजाद किया था. इसका इस्तेमाल कथित तौर पर अतीत के रूसी साम्राज्य को रिवाइव करने के प्लान के लिए किया जाता है. पुतिन का एक मकसद ये भी है.
अब तक आपको ये बात समझ में आ गई होगी कि जो पुतिन कहते या करते हैं, वो डूगिन ने बहुत पहले बता या लिख दिया था. ये एक संयोग भी हो सकता है. हालांकि, वेस्टर्न मीडिया में संयोग की संभावना पर बहुत ध्यान नहीं दिया गया. वहां ये बात चली कि व्लादिमीर पुतिन के पीछे डूगिन का दिमाग काम करता है. कहा ये भी गया कि अगर पुतिन के अगले कदम को देखना है तो आपको डूगिन पर नज़र रखनी होगी. डूगिन को पुतिन के रास्पुतिन के तौर पर भी पेश किया गया. रास्पुतिन रूस के आख़िरी ज़ार निकोलस द्वितीय का आध्यात्मिक गुरु था. कहते हैं कि उसके इशारे पर रूस में पत्ता हिलता था. इससे कुलीन वर्ग के लोग नाराज़ हो गए. उन्होंने साज़िश करके रास्पुतिन की हत्या कर दी.

डूगिन को रास्पुतिन के कद का बताया जाता है. लेकिन तर्क इस धारणा के ख़िलाफ़ भी दिए जाते हैं. कहा जाता है कि डूगिन को ज़रूरत से ज़्यादा प्रचार मिला है. ऐसा इसलिए क्योंकि डूगिन के पास कोई आधिकारिक पद नहीं है. बहुत संभावना है कि पुतिन पर डूगिन की थ्योरीज़ का प्रभाव रहा हो, लेकिन उन्हें पुतिन का आध्यात्मिक गुरु बताना पूरी तरह सही नहीं है.
प्रॉविडेंस की एक रिपोर्ट में रूस के तंत्र पर नज़र रखने वाले जानकार का अनुभव पब्लिश हुआ था. उन्हें रूस की सेना के एक अधिकारी ने कहा था, डूगिन की जितनी चर्चा रूस में नहीं होती, उससे कई गुणा ज़्यादा वेस्ट में हो जाती है.
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, डूगिन रूस के अंदर या बाहर बिना किसी सिक्योरिटी के सफ़र करते हैं. उन्हें क्रेमलिन के अंदर एक्सेस भी नहीं मिला है. कहा जाता है कि डूगिन पुतिन के करीब जाने के लिए ऐसी हरक़ते करते हैं. उकसावे वाले बयान देते हैं. डूगिन इंटरव्यूज़ के लिए पैसे भी मांगते हैं.
इतना विरोधाभास रखने वाले अलेक्जेंडर डूगिन आख़िर हैं कौन?
डूगिन का जन्म 1962 में हुआ था. उनके पिता सोवियत संघ की सेना में अधिकारी थे. डूगिन सोवियत संघ के विघटन के बाद चर्चा में आए थे. उन्होंने लेख लिखकर आने वाले समय के रूस की परिकल्पना की थी. इसमें उन्होंने दावा किया था कि रूस ही इकलौता देश है, जो पश्चिमी देशों को टक्कर दे सकता है. डूगिन अभी तक 30 से अधिक किताबें लिख चुके हैं. वो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पुतिन के पैरोकार के तौर पर पेश होते हैं. वो पुतिन के आक्रामक रवैये का जमकर प्रचार करते रहते हैं. उनकी बेटी डारया डूगिना भी अपने पिता के नक़्शे-कदम पर ही चल रही थी. यूक्रेन पर हमले का प्रचार करने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन ने बाप-बेटी की जोड़ी को बैन कर दिया था.
आज हम ये कहानी क्यों सुना रहे हैं?
दरअसल, 20 अगस्त 2022 को रूस की राजधानी मॉस्को के पास ज़खोरोव एस्टेट में आर्ट से जुड़ा एक इवेंट चल रहा था. ज़खोरोव एस्टेट में महान रूसी लेखर अलेक्जेंडर पुश्किन का बचपन गुज़रा था. बाद में इस जगह को म्युजियम में बदल दिया गया. यहीं पर आर्ट और लिटरेचर के चुनिंदा आयोजन भी होने लगे. 20 अगस्त की दोपहर ज़खोरोव एस्टेट के लिए बेहद खास थी. इसमें अलेक्जेंडर डूगिन और उनकी बेटी डारया डूगिना, दोनों हिस्सा लेने आए थे.
शाम में उन्हें वापस लौटना था. तय प्लान के मुताबिक डूगिन को डारया के साथ ही जाना था. लेकिन उन्होंने ऐन मौके पर अपना मन बदल दिया. डूगिन ने अपनी कार डारया के हवाले कर दी. बोले, मैं तुम्हारे पीछे आता हूं. डारया कार लेकर निकली और रास्ते में उसकी कार में लगा बम फट गया. डारया की मौके पर ही मौत हो गई. रूसी मीडिया में छपी रपटों के अनुसार, जिस कार में ब्लास्ट हुआ, वो डूगिन के नाम पर ही रजिस्टर्ड थी.
बम धमाके के बाद पुलिस ने हत्या की जांच शुरू की. उनका दावा है कि इस धमाके की प्लानिंग सोच-समझकर की गई थी. बम को रिमोट के ज़रिए डेटोनेट किया गया था.
चूंकि कार डूगिन के नाम पर थी, इसलिए माना जा रहा है कि हमला उन्हें निशाना बनाकर किया गया था. लेकिन प्लान चेंज होने के कारण डूगिन बच गए.
रूस के विदेश मंत्रालय ने इस घटना पर एक धमकी भी जारी की है. उनकी तरफ़ से कहा गया है कि अगर हमले में यूक्रेन की भूमिका की पुष्टि हुई तो ये उनके लिए अच्छा नहीं होगा.
इस घटनाक्रम पर यूक्रेन ने क्या कहा?उन्होंने कहा कि हमारा इस हमले में कोई हाथ नहीं है. यूक्रेन रूस की तरह कोई क्रिमिनल स्टेट नहीं है. हम इस तरह के कृत्यों में शामिल नहीं होते.
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