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जब जिन्ना ने खेल में हिन्दू-मुस्लिम करना शुरू किया, तो महात्मा गांधी ने क्रिकेट को कैसे बचाया?

एक समय हिंदुस्तान में क्रिकेट हिंदू-मुसलमानों के बीच वर्चस्व और ताकत दिखाने का जरिया बन गया था. कैसे मोहम्मद अली जिन्ना भी क्रिकेट से फायदा उठाने से नहीं चूके? और फिर कैसे महात्मा गांधी ने जिन्ना की चाल को समझ लिया और जो किया, उससे क्रिकेट को इंडिया में एक सही दिशा मिली.

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गांधी जी ने जिन्ना की चाल को समझ लिया और एक बड़ा निर्णय लेकर क्रिकेट को बढ़िया दिशा दे दी | फाइल फोटो: इंडिया टुडे
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अभय शर्मा
21 नवंबर 2023 (अपडेटेड: 22 नवंबर 2023, 03:46 PM IST)
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क्रिकेट भारत में धर्म की तरह माना जाता है, और इसे खेलने वालों को भगवान जैसा. लेकिन एक समय था, जब ये खेल धर्मों के बीच में ही फंसकर रह गया था. करीब 100 साल पहले मजे-मजे में इसे धर्मों के बीच की प्रतिस्पर्धा बना दिया गया. 30 साल तक ऐसा ही चलता रहा. इसने नजरिया ही बदल दिया था, खेल की तरह नहीं, दो धर्मों के बीच की जंग की तरह क्रिकेट को देखा जाने लगा था. जब मुल्क आजादी की दहलीज पर पांव रखने वाला था, तब घुटन महसूस हुई. लगा कि जो कर दिया, वो बहुत गलत था. तब मोहम्मद अली जिन्ना जैसे मुस्लिम लीग के नेता अपने फायदे के लिए क्रिकेट का सहारा लेने लगे थे. बरगलाने लगे थे. सबको गलत होते दिख रहा था, पर कोई खेल बंद करने को तैयार नहीं था. क्योंकि इसके प्रशासकों को तगड़ा पैसा मिल रहा था. साल में महज दो-तीन महीने क्रिकेट में धर्म का ये तड़का उनकी झोली भर देता था, मालामाल कर देता था. फिर पानी सर से ऊपर जाता देख, वो शख्स खड़ा हुआ जिसे उस समय सांप्रदायिकता से सबसे ज्यादा नफरत थी. बोला- ‘बहुत हुआ बंद कीजिए अब इसे.’

तारीख के एपिसोड में आज इसी की बात करेंगे. बताएंगे कैसे एक समय हिंदुस्तान में क्रिकेट हिंदू-मुसलमानों के बीच वर्चस्व और ताकत दिखाने का जरिया बन गया था. बताएंगे ये भी कि कैसे महात्मा गांधी ने जिन्ना की चाल को समझ लिया और फिर जो किया, उससे क्रिकेट को इंडिया में एक सही दिशा मिली.

1721 के आसपास भारत में क्रिकेट ब्रिटिश अफसर लेकर आए थे. इसके करीबी सौ साल बाद भारतीयों ने क्रिकेट खेलना शुरू किया. सबसे पहले पारसियों ने. क्योंकि पारसी समुदाय के लोग बड़े बिजनसेज चलाते थे और अंग्रेजों के करीबी थे. 1861 में हिंदुओं ने क्रिकेट के गुर सीखने शुरू किए. 1911 तक पारसियों, हिन्दुओं और युरोपियन्स के बीच क्रिकेट के टूर्नामेंट्स होते रहे. मुंबई में हर साल एक बड़ा टूर्नामेंट्स होता था. जिसमें तीनों टीमें हिस्सा लेती थीं.

जब मुस्लिम टीम टूर्नामेंट में शामिल हुई

साल 1912 में एक और टीम बनकर तैयार हुई. ये थी मुसलमानों की टीम. मुंबई के टूर्नामेंट में इसने पहली बार इसी साल हिस्सा लिया. अब ये टूर्नामेंट्स एक चतुष्कोणीय प्रतियोगिता हो गई थी. मुसलमानों के आने से इस प्रतियोगिता में दर्शक और बढ़ गए. धीरे-धीरे शहर के लोग इसे 'बंबई क्रिकेट समारोह' कहने लगे. पूरे दो महीने का ये मानो क्रिकेट का जलसा होता. लोग परिवार और दोस्तों के साथ घूमने आते, कुछ लोगों के लिए ये दबी हुई सामाजिक इच्छाओं को बाहर निकालने का साधन भी बन गया था.

इस चौरंगी प्रतियोगिता में शोर का स्तर कमाल का होता था. लोग मैदानों पर चीखते, कोई ड्रम बजाता, कोई ढोलक, तो कोई बिगुल लेकर पहुंच जाता. सबको पता था कि उन्हें मैदान पर किस टीम का समर्थन करना है. जिसका जो धर्म उसकी वही टीम. कोई देश नहीं, कोई राज्य नहीं, कोई क्लब नहीं, इस टूर्नामेंट में टीमों को और उसके सपोर्टर्स को केवल धर्म से पहचाना जाता था. लोग खुलकर अपनी टीम को सपोर्ट करते और दो महीने खूब मौज-मस्ती करते.

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बॉम्बे टूर्नामेंट

इंग्लिश क्रिकेटर और फिर पत्रकार बने ई. एचडी सेवेल लिखते हैं,

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1924 तक मुंबई क्रिकेट की ये चतुष्कोणीय प्रतियोगिता इतनी मशहूर हो गई थी कि जिस धर्म की टीम जीतती उससे जुड़े राजनीतिक लोग खिलाड़ियों का सम्मान करते, उस धर्म से जुडी संस्थाएं खाने पर बुलातीं. इसमें नेता भी शामिल होते. फिर इनके बयान आते, अखबारों में छपते. लेकिन अब तक इस प्रतियोगिता में सबकुछ भाईचारे से चल रहा था. इसकी बानगी 1924 में देखने को मिली, जब पहली बार मुस्लिम टीम प्रतियोगिता जीती.

अपनी बुक 'ए कॉर्नर ऑफ फॉरेन फील्ड' में इतिहासकार रामचंद्र गुहा लिखते हैं.-

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1924 में मुस्लिम टीम की जीत के बाद भी उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि 'वो इस बात को लेकर पूरी तरह निश्चिन्त हैं कि हिन्दू भाई फाइनल मैच में मुस्लिम टीम को मिली जीत से खुश होंगे. उन्होंने सच्ची खेल भावना के साथ इसे स्वीकार किया होगा.'

हालांकि, तब ऐसा हुआ भी था, बंबई के हिन्दू क्रिकेटरों ने मुस्लिमों की जीत को पॉजिटिव तरीके से लिया था. क्योंकि उस समय वो जानते थे कि मुस्लिम टीम पहली बार प्रतियोगिता जीती है. और उसे पारसी, यूरोपियन और हिन्दुओं से कहीं ज्यादा इस जीत की जरूरत है. इससे मुस्लिम क्रिकेटरों की हिम्मत बढ़ेगी.

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मुस्लिम क्रिकेट टीम
फिर पांच टीमों का टूर्नामेंट क्यों हो गया?

दिसंबर 1928 में भारत में क्रिकेट की औपचारिक संस्था बनी- भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी BCCI. इसके बाद चार टीमों वाले टूर्नामेंट्स में और चार चांद लग गए. बेहतर व्यवस्थाएं हुईं. 1937 में कुछ लोगों को टूर्नामेंट में एक और टीम की जरूरत महसूस हुई. इस टीम का नाम रखा गया 'द रेस्ट' यानी हिंदू, मुस्लिम और पारसियों के बाद जो धर्म बच गए थे, उन सब धर्मों के लिए एक टीम. इस टीम में भारतीय ईसाई, बौद्ध और यहूदियों को शामिल किया गया.

कुल मिलाकर क्रिकेट को धर्म से अलग हटकर देखा ही नहीं जा रहा था. इसे और आगे बढ़ाया तो जा रहा था, लेकिन वो भी धर्म की सोच पर. असल में पांचवीं टीम को लेकर सोच ये थी कि जिन धर्मों के लोग अब तक टूर्नामेंट देखने नहीं आते हैं, उन्हें भी मैदान तक लाया जाए. अब बंबई का ये टूर्नामेंट बन गया था पंचकोणीय क्रिकेट प्रतियोगिता.

आजादी की आहट हुई और जिन्ना बदल गए...

1938 में ये प्रतियोगिता चल रही थी. खूब कामयाबी भी पा रही थी. तभी कांग्रेस और जिन्ना को इस बात की आहट होने लगी कि अंग्रेज कुछ ही सालों में देश छोड़ सकते हैं. अब जिन्ना पूरी तरह बदल चुके थे. जिन्ना का अब सीधा प्लान था कि मुसलमानों को ये विश्वास दिलाओ कि कांग्रेस मुस्लिम विरोधी है. उनकी पार्टी मुस्लिम लीग ने कांग्रेस की प्रांतीय सरकारों के कई फैसलों का विरोध करना शुरू किया. सरकार के शाकाहार को बढ़ावा देने और हिन्दू नायकों को स्कूली किताबों में जगह देने सहित कई फैसलों को मुस्लिम विरोधी बताया जाना लगा. रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि मुस्लिम लीग के शक्ति प्रदर्शनों में 'इस्लाम खतरे में' प्रमुख नारा बन गया था. जिन्ना अब मुस्लिम आबादी के बीच जाकर उनसे अपने हक़ की लड़ाई लड़ने और अधिकार मांगने की अपील करने लगे.

इसी समय द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया. भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने युद्ध में भेजने के भारतीय लोगों और सामग्री की पेशकश कर दी. कांग्रेस का साफ़ कहना था कि भारत की मदद तो ब्रिटेन को मिलेगी, लेकिन शर्त ये है कि युद्ध खत्म होने पर ब्रिटिश भारत को आजाद कर दें. अब आजादी की बात होने लगी थी. और जब ये बात होती मुस्लिम लीग के नेता कहते कि ब्रिटिश सरकार को तभी भारत छोड़ना पड़ेगा, जब तक दो राष्ट्र नहीं बन जाते. एक हिन्दुओं का और दूसरा मुसलमानों का. यानी अब देश के अंदर कांग्रेस-मुस्लिम लीग संघर्ष शुरू हो गया था.

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मोहम्मद अली जिन्ना एक पब्लिक मीटिंग में बोलते हुए
जिन्ना कैसे फायदा उठाने लगे?

1940 में ये जंग क्रिकेट के मैदान तक भी पहुंच गई. मुस्लिम टीम के कप्तान सैयद वजीर अली ने कहा कि द्वितीय विश्वयुद्ध में हमें खुलकर ब्रिटेन का साथ देना चाहिए. ब्रिटेन ने हमें क्रिकेट दिया अब वक्त है, जब उन्हें हमारी जरूरत है. ये बयान कांग्रेस के उस बयान से बिलकुल अलग था जिसमें उसने युद्ध में ब्रिटेन का साथ देने पर देश की आजादी की शर्त रखी थी. कांग्रेस ने फिर जब ये मांग दोहराई तो ब्रिटिश सरकार ने जवाहर लाल नेहरू सहित सभी बड़े नेताओं को जेल में ठूस दिया.

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कांग्रेस नेताओं के जेल जाने से बंबई क्रिकेट टूर्नामेंट को लेकर दो राय हो गई. कुछ लोगों का कहना था कि सभी नेता जेल में हैं तो कम से कम एक साल ये टूर्नामेंट न हो. कुछ इसके खिलाफ थे. एक धड़ा ऐसा भी था जो अब खुलकर कहने लगा कि बंबई में होने वाला टूर्नामेंट साम्प्रदायिक है, इसलिए इसे बंद किया जाए. लोग रणजी ट्रॉफी टूर्नामेंट को तरजीह देने की मांग करने लगे, जो प्रांतों के बीच होता था.

उधर, टूनामेंट के आयोजक खेल रोकने के एकदम खिलाफ थे. मुस्लिम टीम के कप्तान वजीर खान का बयान आया कि पंचकोणीय प्रतियोगिता राष्ट्र विरोधी नहीं है. कांग्रेस नेताओं ने इसका जवाब दिया कि ये टूर्नामेंट साम्प्रदायिक भावनाओं का पोषण करता है. और जब मुस्लिम लीग हिन्दू-मुसलमान बंटवारा चाहती है तो इस टूर्नामेंट को बंद कर दिया जाए. इस बात का बंबई सरकार के गृहमंत्री केएम मुंशी ने भी समर्थन किया. कहा कि लोगों को मैच देखने ही नहीं जाना चाहिए.

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वजीर अली अपने टीम के साथियों के साथ सबसे आगे

उधर जिन्ना ने भी क्रिकेट का फायदा उठाना शुरू कर दिया. उन्होंने एक रोज मुस्लिम छात्रों की भीड़ को संबोधित करते हुए बयान दिया कि 'खेल आपको जिस अनुशासन का पाठ पढ़ाता है, उसे आप लोग रोजमर्रा की जिंदगी में पूरे मुस्लिम समुदाय के हित में इस्तेमाल कीजिए.'

ये वही जिन्ना थे जो कुछ समय पहले खेल भावना को हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे का प्रतीक बता रहे थे. लेकिन, अब उन्हें केवल एक धर्म दिख रहा था.

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जब महात्मा गांधी की अदालत में मामला पहुंचा

जिन्ना के ऐसे बयानों के चलते कांग्रेस नेताओं ने बंबई के पंचकोणीय टूर्नामेंट का और विरोध शुरू किया. आखिर में हिन्दू टीम की संरक्षक संस्था - पीजे हिन्दू जिमखाना- ने महात्मा गांधी की अदालत में जाने का निर्णय लिया. तीन अधिकारियों की एक टीम बापू से मिलने पहुंची.

इस मुलाकात में बापू ने कहा-

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गांधी जी ने इस मुश्किल का हल ढूंढ लिया

गांधी जी ने आगे कहा,

'हमारे बीच ऐसे खेल के मैदान होने चाहिए जहां रत्ती भर भी सांप्रदायिकता ना हो...  मैं चाहूंगा कि सभी लोग इस मुद्दे पर अपनी सोच और बड़ी बनाएं, और खेल जगत से सांप्रदायिकता के इस कलंक को हमेशा के लिए दूर कर दें...'

अब जब गांधी जी ने इतनी बात कह दी, तो इसे पत्थर की लकीर मान लिया गया और फिर हिन्दू टीम ने 1940 में बंबई के पंचकोणीय क्रिकेट टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं लिया. हिन्दू टीम ने इसके बाद केवल दो बार ही 1943 में और 1944 में इस टूर्नामेंट में शिरकत की. इसमें से एक बार उसने ऐसा बंगाल में सूखा राहत कोष में पैसा देने के लिए किया. और दूसरी बार गुजरात बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए. फिर साल 1946 में बीसीसीआई ने साफ़ कर दिया कि वो कभी साम्प्रदायिक प्रतियोगिता का समर्थन नहीं करेगा.

और इस तरह गांधी के कहने पर क्रिकेट को एक अलग दिशा मिली, वो दिशा जिसमें खेल भावना के अलावा किसी और भावना की जगह नहीं.

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