वोटर कार्ड को आधार से लिंक कर चुनाव की प्रक्रिया कमज़ोर कर रही मोदी सरकार?
क्या बिना आधार लिंक किए वोट डालना मुश्किल हो जाएगा?
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प्रतीकात्मक तस्वीर.
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उत्तर कोरिया का पूरा नाम Democratic People's Republic of Korea है. नाम में ही डेमोक्रेसी है. लेकिन फिर भी हम उत्तर कोरिया को लोकतंत्र नहीं मानते. क्यों? क्योंकि लोकतंत्र नाम से नहीं, काम से होता है. इसीलिए ज़रूरी है कि जब हम भारत को दुनिया का सबसे विशाल लोकतंत्र कहें, हम इस तरफ भी ध्यान देते रहें कि यहां लोकतंत्र की सेहत कैसी है. लोकतंत्र को चलाते रहने के लिए ज़रूरी हैं चुनाव. और चुनावों को निष्पक्ष रखने के लिए ज़रूरी हैं स्वायत्त संस्थाएं और नियमित चुनाव सुधार. आज भारत की संसद ने The Election Laws (Amendment) Bill 2021को पास कर दिया. हंगामे के बीच लोकसभा में पास हुआ ये कानून वॉकआउट के बीच राज्यसभा से पास हो गया.
देश के लोकतंत्र में आपकी भागीदारी से संबंधित इस कानून पर माननीयों ने कितनी बहस की, और उससे आपका कितना फायदा हुआ, इसका मूल्यांकन आप खुद करें. हम अपने हिस्से की मेहनत आपको ये समझाने में करेंगे कि इस कानून का मकसद क्या था और क्या ये कानून उसे पूरा कर पाएगा. और इस सवाल का जवाब खोजेंगे - कि वोटर कार्ड से आधार कार्ड को लिंक करने से कितना फायदा होगा.
''आधार कार्ड के नाम पर देश में नया संकट लाओगे, इस पर गंभीरता से सोचो''ये विचार मेरा नहीं है. नरेंद्र मोदी का है. प्रधानमंत्री बनने के पहले का है. जब यूपीए सरकार के दौरान देश में आधार कार्ड लाया जा रहा था, तब इसके सबसे मुखर विरोधियों में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी थे. आपको यूट्यूब पर सिर्फ नरेंद्र मोदी ऑन आधार लिखकर सर्च करना है. खूब बयान मिल जाएंगे. कई चुनाव रैलियों में नरेंद्र मोदी ने आधार पर गंभीर सवाल उठाए थे. जनता को बताया था कि आधार खतरनाक है. ये भी कहते थे कि उनके सवालों का सरकार के पास, माने तब की यूपीए सरकार के पास, कोई जवाब नहीं है. लेकिन ये मई 2014 के पहले के बयान हैं. प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके आधार के बारे में क्या विचार बदले, संसद में प्रधानमंत्री ने कहा था कि असल में आधार का आइडिया यूपीए का नहीं था, वाजपेयी सरकार का था. बयान और भी हैं सुनाने को. कई मौकों पर प्रधानमंत्री ने बताया कि वो कैसे आधार का यूज़ करते हैं. और ये भी कहा कि आधार का विरोध करने वाले भ्रष्ट लोगों को बचाना चाहते थे. प्रधानमंत्री के आधार के बारे में विचार कैसे बदले, इसकी जानकारी हमें बहुत खोजने पर भी नहीं मिली. इंटरनेट से कोई मदद नहीं मिली. बयान सुनकर लगता है मानो पहले का 'आधार' अच्छा नहीं था, 2014 के बाद आधार अच्छा हो गया. कैसे हुआ, ये कोई नहीं जानता. खैर, आधार अच्छा है या खराब है वाली डिबेट अब पुरानी हो गई है. और तमाम विरोधों से आगे बढ़कर लगभग पूरी आबादी का आधार कार्ड बन गया है. जिनका किसी वजह से बनना बाकी है, उनका तेज़ी से बन रहा है. नई डिबेट है आधार कार्ड को वोटर आईडी कार्ड से जोड़ने पर. चुनाव सुधार के नाम पर सरकार एक बिल लेकर आई है... और उसमें एक क्लॉज ये भी है कि आधार कार्ड को वोटर आईडी कार्ड से जोड़ा जाएगा. और जब हम इस बारे में सोचते हैं तो सबसे पहले हमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस बीएन कृष्णा का वो बयान याद आता है. जब उन्होंने कहा था कि ये बहुत ही खतरनाक होगा. 24 अगस्त 2019 को एक सेमीनार में उन्होंने ये बात कही थी. जस्टिस बीएन कृष्णा सरकार की ही उस एक्सपर्ट कमेटी के अध्यक्ष थे जो डेटा प्रोटेक्श पर बिल लाने के लिए बनाई गई थी. तो जस्टिस कृष्णा समेत कई सारे बुद्धिजीवी- विद्वान और राजनीतिक पार्टियां क्यों कह रही हैं कि आधार को वोटर आईडी कार्ड से जोड़ना खतरनाक है. सरकार खतरनाक काम कर रही है. अगर प्रधानमंत्री की भाषा में कहें तो - 'आधार कार्ड के नाम पर क्या देश में नया संकट आ सकता है? आइए जवाब खोजने की कोशिश करें. पहले तो ये समझिए कि बिल में क्या लिखा है. मोदी सरकार में कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कल यानी 20 दिसंबर को लोकसभा में एक बिल पेश किया था- नाम - इलेक्शन लॉज (अमेंडमेंट बिल) 2021. ये बिल रिप्रजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट 1950 के सेक्शन 23 में बदलाव की बात कहता है. इसके दो प्रावधान वाकई बड़े काम के हैं.
- सेना में तैनाती की जगह से वोट देने की सुविधा होती है. इसके लिए जो नियम था, उसमें ''वाइफ'' शब्द का इस्तेमाल हुआ था. ऐसे में पुरुष सैनिकों की पत्नियां तो अपना वोट डाल पाती थीं, लेकिन महिला सैनिकों के पति वोट नहीं डाल पाते थे. अब ''स्पाउस'' शब्द को नियम में लिख दिया गया है. अब पति-पत्नी दोनों अपने साथी की तैनाती की जगह से वोट डाल पाएंगे.
- अब तक वोटर लिस्ट में नाम जोड़ा जाता है 1 जनवरी की तारीख को आधार मानकर. इस तारीख को आपकी उम्र 18 साल हुई, तो आप लिस्ट में शामिल होंगे. वर्ना नहीं. अब सरकार ने चार तारीकें कर दी हैं - 1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्टूबर.
इस बिल से भारत के लोगों का वोट देने का अधिकार छीन रहे हैं. ये आलोकतांत्रिक है.अब बिल के पक्ष में दिए गए तर्कों पर आते हैं. दो बड़े तर्क हैं. पहला. कि वोटर आईडी कार्ड को आधार से लिंक करने पर वोटिंग लिस्ट का फर्जी वाड़ा रुकेगा. बहुत लोगों के दो- दो वोटर आईडी कार्ड हैं. लोग जिंदा भी नहीं हैं उनके भी आधार कार्ड हैं. और उनके आधार पर फर्जी वोट पड़ते हैं. इस तर्क में दम हैं. देश में बहुत लोग होंगे जो मूल रूप से रहने वाले कहीं के होंगे और रोज़गार के सिलसिले में किसी और शहर में रह रहे होंगे. और दोनों जगह वोटर आई-कार्ड बनवा लेते हैं. हम अपने अनुभव ये भी जानते हैं कि वोटर आई-कार्ड बनवाने में धांधली होती है. और ये रुकने चाहिए. इसमें कोई दोराय नहीं है. इस तरफ चुनाव सुधार होना चाहिए. इससे चुनाव में लोगों का सही प्रतिनिधित्व मालूम चलेगा. दूसरा तर्क - हमारे चुनावी लोकतंत्र की एक आलोचना ये होती है कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा तो वोट ही नहीं डालता. ज्यादातर वोटिंग का फीसद 50-60 फीसदी के आसपास ही रहता है. और तब ये तर्क भी दिया जाता है कि एक बड़ी आबादी माइग्रेंट्स की है. करीब 30 करोड़ बताई जाती है. माने बिहार का परिवार रोज़गार के लिए दिल्ली में रहता है, तो उससे ये उम्मीद नहीं की जा सकती कि वो लोकतंत्र की अहमियत समझते हुए, चुनाव में बिहार जाकर वोट डालकर आए. ऐसा नहीं होता है. इसलिए वोटिंग फीसद कम रह जाता है. सुझाव ये दिया जाता है कि आधार कार्ड को वोटर आईडी कार्ड लिंक करवा दिया जाए, तो कहीं से वोट डालने की सहूलियत हो सकती है. प्रवासियों के लिए चीज़ें आसान रहेंगी. हम मानते हैं कि इन दोनों क्षेत्रों में सुधार होना चाहिए. ज़रूरी हैं सुधार. लेकिन क्या उसका तरीका आधार कार्ड को वोटर आईडी कार्ड से लिंक करना ही हो सकता है. ? अब इस सवाल पर आते हैं. चुनाव आयोग ने 2015 में ही मतदाता सूची के शुद्धिकरण के नाम पर मतदाता पहचान पत्र को आधार कार्ड से जोड़ना शुरू कर दिया था. हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी. और ये काम थम गया. और अब सरकार एक कानून की शक्ल में ये काम दोबारा शुरू कर रही है. इंडियन एक्सप्रेस में विभव मारीवाला और प्रखर मिश्रा का एक लेख है. Why linking Aadhaar with voter ID is a dangerous idea. आपको पढ़ना चाहिए, ये लेख. इसमें वोटर कार्ड की आधार कार्ड से लिंकिंग के खतरों के प्रति आगाह किया गया है. हम इन सारी बातों का निचोड़ तीन तर्कों के रूप में आपके सामने पेश कर रहे हैं. 1 - हम आधार कार्ड से लिंक कर फर्जी वोटर आईडी कार्ड रोकने की बात कर रहे हैं. लेकिन सवाल ये है कि क्या फर्जी आधार कार्ड नहीं बन सकते. फर्जी आधार कार्ड बनवाने के दर्जनों मामले आपको मिल जाएंगे. न्यू इंडियन एक्सप्रेस में फरवरी 2020 की एक रिपोर्ट मिलती है. इसमें लिखा है कि यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने हैदराबाद में फर्जी आधार कार्ड बनाने के मामले में 127 लोगों को नोटिस देकर निजी तौर पर जांच में शामिल होने के बुलाया. ये पूछने के लिए फर्जी आधार कैसे बनवाया. UIDAI ने अब तक लाखों आधारकार्ड्स को फर्जी होने के आधार पर रद्द किया है. पिछले साल ही UIDAI ने 40 हजार आधार कार्ड्स को रद्द किया था. फर्जी थे. UIDAI ने माना भी था कि उनके सिस्टम में फ्रॉड हुआ है. ऐसे दर्जनों उदाहरण और गिनाए जा सकते हैं. कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि आधार का अपना डेटाबेस कितना मौलिक और सुरक्षित है, इसका जवाब अभी हमें नहीं मिला है. इसी तरह. जब PAN को आधार से जोड़ा गया तब ये तर्क दिया गया था इससे लाखों करोड़ की बेनामी संपत्ति पकड़ में आएगी. लेकिन क्या ऐसा हो पाया. नहीं. एक और बात. आधार कार्ड में पहचान के तौर पर आपके आंखों की आइरिस और अगूंठे का निशान लिया जाता है. लेकिन किसी के अंगूठे के निशान से उसके आधार की जानकारी नहीं मिल पाएगी. हम क्या कहना चाह रहे हैं. महाराष्ट्र् के एक उदाहरण से समझिए. बॉम्बे हाईकोर्ट की वेबसाइट पर हमें ये मामला मिला. महाराष्ट्र के औरंगाबाद ज़िले के दौलताबाद पुलिस स्टेशन में IPC 302 का एक केस आया. मानी मर्डर का. लेकिन मृत महिला की पहचान नहीं हो पा रही थी. इसलिए जांच अधिकारी को आधार के फायदों की याद आई. पुलिस ने मृत महिला के फिंगर प्रिंट्स जुटा लिए, और अब UIDAI से मदद मांगी. इस बाबत की फिंगर प्रिट्स के आधार पर उसके आधार की डिटेल निकाली जा सके. लेकिन UIDAI ने कह दिया कि हम ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं. फिर ये मामला बॉम्बे हाईकोर्ट में आया. और बॉम्बे हाईकोर्ट में UIDAI की तरफ से पक्ष रखते हुए वकील ने कुछ तर्क दिए, जिन पर गौर करना जरूरी है. उन्होंने कहा कि अभी UIDAI के पास ऐसा सिस्टम नहीं है कि फिंगर प्रिंटर्स, या आईरिस के आधार पर डेटाबेस से किसी का आधार नंबर सर्च किया जा सके. सिर्फ आधार नंबर होने पर ही डेटा बेस से किसी की डिटेल सर्च की जा सकती है. मतलब किसी को अंगूठे के निशान के हिसाब से नहीं पकड़ा जा सकता. क्योंकि हम डेटा सर्च ही नहीं कर पाएंगे. 2.दूसरा तर्क. राइट टू प्राइवेसी का. आपको याद होगा 2017 में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक बेंच ने पुथास्वामी वर्सेज यूनियन ऑफ इंडिया के केस में फैसला दिया था. देश में 9 जजों की बेंच बहुत कम ही मामलों में बैठती है. और जब बैठती हैं तब मान लीजिए मुद्दा गंभीर है. तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्राइवेसी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित अधिकार है. मतलब किसी नागरिक की निजी जानकारी की हिफाज़त करना बहुत ज़रूरी है. हमारे देश में डेटा प्रोटेक्शन का कानून अभी तक नहीं आया है. जो ज्यादा जरूरी था. देश में डेटा जुटाने के लिए कंपनियां लाखों करोड़ रूपये खर्च करती हैं. ताकि उन्हें मालूम चल सके कि ग्राहक किस तरह बिहेवियर क्या है, वो क्या सामान खरीद रहे हैं, क्या पसंद ना पसंद हैं. और उस हिसाब से मार्केटिंग स्ट्रैटजी बनती हैं. अब वोटिंग के मामले में डेटा की अहमियत समझिए. अगर एक वोटर कि जानकारी, उनके इलाके की जानकारी, इस तरह की जानकारी किसी सत्तारूढ़ पार्टी को मिलती है तो वो उसके काम की हो सकती है. वो उसके हिसाब से अपनी रणनीति बना सकती है. इसके अलावा टारगेटेड सर्विलांस हो सकता है. और इसलिए हमें जस्टिस बीएन कृष्णा चेतावनी याद आती है. जब उन्होंने कहा था कि अगर आधार और वोटर आईडी कार्ट को लिंक किया तो कैम्ब्रिज एनालिटिका की तरह दिल्ली एनालिटिका और मुंबई एनालिटिका बन जाएंगे. 3.अब आते हैं तीसरे तर्क पर. कि क्या सिंगल आईडी कार्ड से वोटर टर्नआउट बढ़ता है. दुनिया के बाकी देशों के उदाहरण हमें क्या बताते हैं. अमेरिका की एक नामी संस्था है - द कार्टर सेंटर. ये डेमोक्रेसी की बेहतरी के क्षेत्र में काम करता है. रिसर्च करवाता है, अपने सुझाव देता है. इसका एक रिसर्च पेपर है. वोटर आइडेंटिफिकेशन रिक्वायरमेंट्स एंड पब्लिक इंटरनेशन लॉ नाम से आपको कार्टर सेंटर की वेबसाइट पर मिल जाएगी. इसमें अफ्रीका और लेटिन अमेरिकी देशों में चुनावी पहचान पत्र की ज़रूरतों पर अध्ययन किया है. ये रिपोर्ट बताती है कि जिन देशों में वोटिंग के लिए एक आईडी पर निर्भरता है, वहां वोटर टर्नआउट तुलनात्मक रूप से कम होता है. क्योंकि मुमकिन है कि लोगों के पास वो वोटर आईडीकार्ड ना हो. ये सिस्टम जितना लिबरल होता है वोटर्स के लिए उतनी ही आसानी होती है. मतलब ये है कि आधार पर इतनी निर्भरता बढ़ा दी जाएगी, तो वोटर टर्नआउट बढ़ी ही जाएगा. ये कहना थोड़ा मुश्किल है. तो क्या वाकई आधार को वोटर आईडी कार्ड से लिंक करना कोई सुधार है, रिफॉर्म है. इस क्षेत्र में काम करने वाले विद्वानों की क्या राए है? प्रोफ़ेसर जगदीश छोकर जो एडीआर के को फ़ाउंडर हैं उन्होंने बताया-
वोटर आईडी का आधार से लिंक करना ग़लत है. इससे वोटर या चुनाव की प्रक्रिया को कोई फ़ायदा नहीं होगा. सरकार का तर्क है कि दोनों को लिंक करने से आधार का डेटा वोटर आईडी में चला जाएगा. लेकिन मसला यह है कि आधार में भी ग़लतियां है उसको नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता.ये बात विवाद से परे है कि मतदाता सूचि में सुधार होना चाहिए. लेकिन ये सुधार वैसे होने चाहिए, जिनमें सभी स्टेकहोल्डर्स की चिंताओं का समुचित समाधान किया जाए. हमें एक विशेषज्ञ ने भी बताया कि अगर सरकार इस बात की गैरंटी दे दे, कि किसी का वोटिंग राइट नहीं लिया जाएगा चाहे आधार हो, या न हो. तब आधार लिंकिंग पर ऐसा विवाद नहीं होगा. रही बात चुनाव सुधारों की, तो सरकार को थोड़ा ध्यान इलेक्टोरल बॉन्ड्स पर भी लगाना चाहिए. इन बॉन्ड्स के नाम पर एक ऐसी व्यवस्था बना दी गई है कि हज़ारों करोड़ का बेनामी चंदा राजनैतिक पार्टियों को जा रहा है. सबसे ज़्यादा कहां जा रहा है, ये भी किसी से छुपा नहीं है. लेकिन देश के पास ये जानने का कोई तरीका नहीं है कि ये पैसा दिया किसने है. ये कैसे संभव है कि कोई देश खुद को एक लोकतंत्र भी कहता रहे और उसी देश में बड़े बड़े उद्योगपति अरबों-खरबों का बेनामी चंदा राजनैतिक दलों को देते रहे. अगर सरकार की नीयत साफ है, और उसे चलाने वाली पार्टी भाजपा ने कोई वित्तीय अनियमितता नहीं की, तो फिर ये जानकारी जनता के सामने क्यों नहीं है कि उसे चंदा दे कौन रहा है और कितना दे रहा है. यही बात कांग्रेस और तमाम दूसरे दलों पर भी लागू होती है.

