चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर जो कानून बनने जा रहा है, उसमें झोल हुआ है?
विपक्ष का आरोप है कि यह बिल सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ है और सरकार चुनाव आयोग पर पूरी तरह नियंत्रण करना चाहती है.

मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए पहली बार कानून बनने जा रहा है. इससे पहले सिर्फ चुनाव आयुक्तों की सर्विस की शर्तों को लेकर कानून था. केंद्र सरकार ने 10 अगस्त को राज्यसभा में एक बिल पेश किया. इसका नाम है- 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, शर्तें और पद अवधि) विधेयक, 2023'. कानून बनने के बाद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक कमिटी बनाई जाएगी. लेकिन उससे पहले इस बिल पर विवाद शुरू हो गया है. विपक्ष का आरोप है कि यह बिल सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ है, मोदी सरकार इसके जरिये चुनाव आयोग पर पूरी तरह नियंत्रण करना चाहती है. इस बिल में क्या प्रावधान हैं, इसको लेकर क्या आपत्तियां हैं और क्या ये सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन है? आपको सब बताते हैं.
हम सभी जानते हैं कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है. चुनाव आयोग ही लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा से लेकर राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए जिम्मेदार संस्था है. इसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और दो चुनाव आयुक्त (ECs) होते हैं. इन्हीं आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बिल पेश हुआ है. बिल के मुताबिक, इस सेलेक्शन कमिटी में प्रधानमंत्री अध्यक्ष होंगे. दो और सदस्य होंगे, एक प्रधानमंत्री की ओर से नॉमिनेटेड कैबिनेट मंत्री और दूसरा लोकसभा में विपक्ष का नेता. पिछले कुछ समय से विपक्षी पार्टियां और सिविल सोसायटी के लोग चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर लगातार सवाल उठा रहे हैं. ऐसे में सरकार का ये बिल काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
विपक्ष का क्या आरोप है?
कैबिनेट मंत्री को इस कमिटी में जोड़े जाने पर ही विपक्ष सवाल उठा रहा है. कांग्रेस सांसद रणदीप सुरजेवाला ने इसे 'मोदी इलेक्शन कमीशन' बता दिया. सुरजेवाला ने भारतीय लोकतंत्र के लिए इसे 'काला दिन' बताते हुए ट्विटर पर लिखा,
"आगामी 5 राज्यों के चुनाव और 2024 लोकसभा चुनाव में हार को देखते हुए ये बिल लोकतंत्र को हाइजैक करने की एक कुटिल चाल है. चुनाव आयोग एक तानाशाही प्रधानमंत्री के हरसंभव तरीके से संस्थानों पर कब्जे की कोशिश वाली आखिरी संवैधानिक संस्था होगी. ये बिल संविधान पर, न्यायपालिका पर और निष्पक्ष तरीके से सरकार चुनने के लोगों के अधिकारों पर हमला है."
इसी तरीके से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री देश के सुप्रीम कोर्ट को नहीं मानते. उनका संदेश साफ है- जो सुप्रीम कोर्ट का आदेश उन्हें पसंद नहीं आएगा, वो संसद में कानून लाकर उसे पलट देंगे. केजरीवाल ने ट्विटर पर लिखा,
"सुप्रीम कोर्ट ने एक निष्पक्ष कमेटी बनाई थी जो निष्पक्ष चुनाव आयुक्तों का चयन करेगी. सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटकर मोदी जी ने ऐसी कमेटी बना दी जो उनके कंट्रोल में होगी और जिससे वो अपने मनपसंद व्यक्ति को चुनाव आयुक्त बना सकेंगे. इससे चुनावों की निष्पक्षता प्रभावित होगी."
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट ने 2 मार्च को एक अहम फैसला दिया था. कोर्ट ने कहा था कि जब तक संसद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ा कानून नहीं बनाती, तब तक प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की सदस्यता वाली समिति की सलाह पर मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की जाएगी. ये फैसला 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने दिया था. हालांकि इन पांच महीनों में इस कमिटी ने कोई नियुक्ति नहीं की, क्योंकि तब से आयुक्त के पद खाली नहीं हुए हैं.
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर कानून बनाने के लिए सबसे पहले 2015 में एक जनहित याचिका दायर की गई थी. इसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी. बाद में दूसरी याचिकाएं भी दाखिल की गई. सुप्रीम कोर्ट ने साल 2018 में इस मामले को संवैधानिक बेंच के पास भेज दिया. इस मामले पर कोर्ट ने अंतिम सुनवाई पिछले साल नवंबर में की थी. लेकिन फैसला आया इस साल मार्च में.
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा था कि कई पार्टियां सत्ता में आईं, लेकिन किसी ने भी चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कोई कानून या प्रक्रिया नहीं बनाई. कोर्ट ने माना था कि संविधान के अनुच्छेद-324 के तहत CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कानून बनाने की जरूरत को अनदेखा नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था,
"चुनाव आयोग को विधायिका की जीत-हार से पूरी तरह अलग रहना चाहिए. एक कमजोर चुनाव आयोग से गंभीर हालात पैदा होंगे और इसके कुशल संचालन में कमी आएगी."
यहां ये साफ करना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने CJI को कमिटी में रखने की अस्थायी व्यवस्था बनाई थी. जब तक कानून न बन जाए. इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अरुण गोयल को चुनाव आयुक्त बनाए जाने के फैसले पर भी सवाल उठाया था. कहा था कि अरुण गोयल को "बिजली की रफ्तार" से चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया गया, जबकि मामले पर कोर्ट में सुनवाई चल रही थी.
पहले नियुक्ति की क्या प्रक्रिया थी?
संविधान के अनुच्छेद-324 में चुनाव आयोग का जिक्र है. कहा गया है कि संसद से लेकर राज्य विधानसभा, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव कराने, निर्देश देने और चुनावी तैयारियों पर नियंत्रण का काम चुनाव आयोग का होगा. अनुच्छेद-324(2) में मुख्य चुनाव आयुक्त और कुछ चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए संसद से कानून बनाने की बात कही गई. हालांकि अब तक इसे लेकर कोई कानून नहीं बन पाया था. अभी तक केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश पर राष्ट्रपति चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को मंजूरी देते आए हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने कमिटी में CJI को शामिल कर चुनाव आयोग की नियुक्तियों में कार्यपालिका के हस्तक्षेप को रोकने की कोशिश की थी. कोर्ट ने बार-बार इस संस्था की निष्पक्षता का हवाला दिया था. हालांकि मौजूदा बिल में CJI को हटाकर कैबिनेट मंत्री को लाए जाने से आरोप लग रहे हैं कि मामला फिर से पुराना हो गया. वो ये कि इससे कमिटी में हमेशा सरकार की 2-1 से बहुमत बनी रहेगी.
चुनाव आयोग के एक सूत्र ने हमें बताया कि ये पूरी तरह से पुरानी व्यवस्था हो गई जबकि सुप्रीम कोर्ट ने निष्पक्ष बॉडी बनाने की कोशिश की थी. सूत्र के मुताबिक, मौजूदा चुनाव आयुक्तों में से एक अनूप चंद्र पांडेय का कार्यकाल अगले साल फरवरी में खत्म हो रहा है. ऐसे में सरकार नहीं चाहती थी कि CJI की सदस्यता वाली कमिटी आयुक्त के चुनाव को लेकर कोई फैसला करे. इसलिए सरकार जल्दबाजी में इस कानून के जरिये इसे कानून का रूप देना चाहती है. अगले लोकसभा चुनाव से पहले ये कानून का रूप ले सकता है.
रिटायर्ड IAS अधिकारी अनूप चंद्र पांडेय जून 2021 में चुनाव आयुक्त बनाए गए थे. साल 2019 में वे उत्तर प्रदेश के चीफ सेक्रेटरी पद से रिटायर हुए थे. अगले साल फरवरी में उनकी उम्र 65 की हो जाएगी.
कैसे चुने जाएंगे चुनाव आयुक्त?
मौजूदा बिल के तहत, उम्मीदवारों को चुनने के लिए एक सर्च कमिटी भी बनाई जाएगी. इस कमिटी की अध्यक्षता कैबिनेट सचिव करेंगे. इसके अलावा सचिव रैंक के दो और अधिकारी होंगे. ये सर्च कमिटी आयुक्तों की नियुक्ति के लिए सेलेक्शन कमिटी को 5 नाम सुझाएगी.
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की योग्यता क्या होगी?
1. वो व्यक्ति केंद्रीय सचिव रैंक का अधिकारी हो.
2. व्यक्ति ईमानदार हो.
3. उसे चुनाव करवाने और उसके प्रबंधन का अनुभव हो.
हालांकि बाद के दोनों बिंदुओं के लिए विस्तार में नहीं बताया गया है कि अधिकारियों के किस तरह की ईमानदारी चाहिए या कितना अनुभव हो.
बिल में ये भी कहा गया है कि सेलेक्शन कमिटी, सर्च कमिटी की ओर से दिये गए नामों के अलावा दूसरे नाम पर विचार कर सकती है. ये अभी साफ नहीं है कि सेलेक्शन कमिटी चुनाव आयुक्तों को बहुमत के आधार पर या सर्वसम्मति से चुनेगी. बिल के क्लॉज-8(1) में सिर्फ इतना लिखा है कि सेलेक्शन कमिटी आयुक्तों को चुनने के लिए "पारदर्शी तरीके" से अपनी प्रक्रिया अपनाएगी.
नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर पूर्व चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी मानते हैं कि सही तो यही होगा कि नियुक्ति सर्वसम्मति से हो. कुरैशी ने दी लल्लनटॉप से बातचीत में बताया कि ये सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन नहीं है क्योंकि कोर्ट ने वो प्रावधान कानून बनाने तक किया था. कुरैशी ने हमें बताया,
"ये व्यवस्था विश्वसनीय तब बनेगी जब सर्वसम्मति से नियुक्ति होगी. ऐसा नहीं है कि इससे विपक्ष के नेता को कोई वीटो पावर मिल जाएगा. उनके पास सर्च कमिटी के दिए हुए जो 5 नाम होंगे, उनमें से ही उन्हें चुनना होगा. LoP को अगर किसी नाम पर आपत्ति होगी, तो उन्हें दूसरा विकल्प दिया जाएगा."
हालांकि कुरैशी ने चुनाव आयुक्तों को कैबिनेट सचिव रैंक का दर्जा दिए जाने पर आपत्ति जताई है. पहले चुनाव आयुक्त का दर्जा सुप्रीम कोर्ट के जज के रैंक के बराबर होता है. उनकी सैलरी, भत्ते और सुविधाएं उसी हिसाब से होती थीं.
दरअसल, इस बिल के जरिये सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (सेवा शर्तें) कानून, 1991 को खत्म कर दिया है. CEC और दूसरे चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल 6 साल का होगा या उनकी उम्र 65 साल पूरी होने तक, जो भी पहले हो. चुनाव आयुक्त या CEC की दोबारा नियुक्ति नहीं हो पाएगी.
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