भीड़ ने ईशनिंदा के आरोपी के साथ जो किया वो डराने वाला है!
पाकिस्तान में ईशनिंदा के आरोपियों की हत्या का लंबा इतिहास रहा है.

हरिशंकर परसाई ने अपने व्यंग्य ‘आवारा भीड़ के ख़तरे’ में लिखा है,
परसाई को ये लिखे 32 बरस बीत गए. ख़ुद परसाई भी गुज़र चुके. मगर उनके लिखे का हक़ीक़त में बदलना बंद नहीं हुआ. ठीक-ठीक कहा जाए तो इसकी संख्या लगातार बढ़ती ही गई है. यूं तो आवारा भीड़ का चलन पूरी दुनिया में रहा है. लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में ये कुकुरमुत्ते की तरह जहां-तहां उग आती है. जैसा कि 11 फ़रवरी को पाकिस्तान के ननकाना साहिब में दिखा. वहां भीड़ ने ईशनिंदा के एक आरोपी को पुलिस स्टेशन से खींचकर बाहर निकाला, पिटाई की और फिर उसके शरीर को आग लगा दी. ये पूरा कांड पुलिस की आंखों के सामने हुआ.
पाकिस्तान में ईशनिंदा के आरोपियों की मॉब लिंचिंग कोई नई बात नहीं है. फिर भी ऐसे दौर में, जब पाकिस्तान भयानक आर्थिक और राजनैतिक संकट से जूझ रहा है, इस किस्म की आवारा भीड़ का पनपना बेहद डरावना है. ये प्रजाति धर्म, खानपान, भाषा, पहनावे जैसे उदार विषयों को अपने अस्तित्व से जोड़ सकती है. और, उसके आधार पर अपने हर कुकृत्य को जायज ठहरा सकती है. आज के शो में हम इसी मुद्दे पर विस्तार से बात करेंगे. समझेंगे कि, पाकिस्तान में ईशनिंदा को लेकर इतनी हिंसा क्यों भड़कती है? और, भीड़ धर्मांधता में अपनी सारी मुसीबतें क्यों भूल जाती है?
तारीख़, 06 अप्रैल 1929. लाहौर के एक घर में 21 साल का इल्मुद्दीन अपनी मां से झगड़ा कर रहा था. उसे बाज़ार जाने के लिए एक रुपया चाहिए था. आजिज आकर मां ने एक रुपया पकड़ा दिया. मां को लगा था कि वो पैसे से कुछ खाने या पहनने का सामान खरीदेगा. लेकिन उसका इरादा कुछ और ही था. इल्मुद्दीन ने उस पैसे से एक धारदार चाकू खरीदा. और, लाहौर के अनारकली बाज़ार में बने एक ऑफ़िस के अंदर घुस गया. वो दफ़्तर महाशय राजपाल का था. राजपाल धर्म से हिंदू और पेशे से प्रकाशक थे. उन्होंने 1924 में पैगंबर मोहम्मद के ऊपर ‘रंगीला रसूल’ नाम से एक किताब छापी थी. इसके ऊपर काफी विवाद हो रहा था. राजपाल पर मुस्लिमों के ख़िलाफ़ घृणा फैलाने के आरोप भी लग रहे थे. कुछ जगहों पर दंगे भी हुए. महाशय राजपाल पर मुकदमा चला. हालांकि, 1927 में हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था. अदालत से बरी होने के बावजूद उन्हें शांति नसीब नहीं हुई. उनके ऊपर तीन हमले हुए. दो में तो वो बच गए. मगर तीसरा हमला जानलेवा साबित हुआ. अप्रैल 1929 में इल्मुद्दीन ने चाकू मारकर राजपाल की हत्या कर दी.
इल्मुद्दीन को जल्दी ही गिरफ़्तार कर लिया गया. उसके ऊपर हत्या का मुकदमा चला. अदालत में उसकी तरफ़ से मोहम्मद अली जिन्ना ने जिरह की. मगर ये किसी काम नहीं आया. इल्मुद्दीन को दोषी पाया गया और उसको मौत की सज़ा सुनाई गई. होने को कहानी यहीं पर खत्म हो जानी थी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. इस्लामी आंदोलन के नेताओं ने इल्मुद्दीन को गाज़ी यानी शहीद करार दिया गया. उसे मुस्लिमों का नायक बनाकर पेश किया जाने लगा. कहा ये गया कि उसने इस्लाम की रक्षा के लिए अपनी जान दी है. अल्लामा इक़बाल ने लिखा कि इल्मुद्दीन ने पढ़े-लिखे लोगों से बढ़कर काम किया है. इसके अलावा, उसके जनाजे में हज़ारों की भीड़ उमड़ी थी. जनाजे में सबसे आगे चलने वालों में वामपंथी कवि मोहम्मद दीन तासीर भी थे. ये नाम याद रखिएगा. इसका ज़िक्र आगे भी आएगा. खैर, इल्मुद्दीन को पूरी शानो शौकत के साथ लाहौर में दफनाया गया. पाकिस्तान बनने के बाद उसकी क़ब्र जगह एक स्मारक बन गई. एक हत्यारे को पाकिस्तान का आदर्श नागरिक माना गया. इस एक घटना ने पाकिस्तान में ईशनिंदा के नाम पर होने वाली हत्याओं को आम बना दिया.
राजपाल-इल्मुद्दीन ऐपिसोड के कारण दो बड़े बदलाव हुए,- पहला, ब्रिटिश सरकार ने इंडियन पीनल कोड (IPC) में एक नई धारा जोड़ी. 295A. इसमें जान-बूझकर किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को भड़काने के लिए किए गए कृत्य को अपराध की श्रेणी में रखा गया. इसके तहत, लिखकर, बोलकर, संकेत के ज़रिए या कुछ दिखाकर या किसी और तरीके से धर्म या धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचाने के लिए सज़ा का प्रावधान किया गया. सज़ा क्या थी? तीन साल तक की जेल की सज़ा या ज़ुर्माना या फिर दोनों. इससे पहले तक सिर्फ ईशनिंदा कानून सिर्फ धार्मिक विद्वेष फैलाने वालों पर लागू होता था.
- दूसरा बदलाव ये हुआ कि, मुस्लिमों के लिए नए मुल्क़ की मांग ज़ोर पकड़ती गई. कई लोग ये भी मानते हैं कि इस घटना ने पाकिस्तान की स्थापना की बुनियाद रख दी थी. दूसरे पक्ष का तर्क है कि, रंगीला रसूल का प्रकाशन इसलिए हुआ था, क्योंकि कुछ कठमुल्लाओं ने उससे पहले एक हिंदू-विरोधी किताब छापी थी. यानी, इस झगड़े का माहौल पहले से तैयार हो रहा था. इल्मुद्दीन वाली घटना ने इस आग में घी डालने काम भर किया था.
ईशनिंदा कानून अंग्रेज़ लेकर आए थे. 1860 के साल में. इसके तहत, दोषी व्यक्ति को एक से दस साल की सज़ा दी जाती थी. कुछ मामलों में ज़ुर्माने की भी व्यवस्था थी. सेंटर फ़ॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज़ (CRSS) की रिपोर्ट के अनुसार, 1860 से 1947 के बीच ईशनिंदा के सिर्फ़ सात केस दर्ज़ हुए. अगस्त 1947 में भारत का विभाजन हो गया. पाकिस्तान ने ब्रिटिश सरकार द्वारा लाए गए पीनल कोड को बरकरार रखा. पाकिस्तान पीनल कोड (PPC) के नाम से. CRSS की ही एक और रिपोर्ट बताती है कि विभाजन के बाद ईशनिंदा के मामलों की संख्या कई गुणा बढ़ गई. इसमें भी बड़ा उछाल 1978 के बाद आया. 1947 से 1978 के बीच पाकिस्तान में ईशनिंदा के सिर्फ 11 मामले सामने आए थे. 1987 से 2021 के बीच ये संख्या बढ़कर 14 सौ के पार पहुंच गई.
इस बीच में क्या हुआ था?पाकिस्तान बनने के तुरंत बाद बरेलवी और अहमदी संप्रदायों में झगड़ा शुरू हो गया. उस समय तक अहमदिया समुदाय को गैर-मुस्लिम घोषित नहीं किया गया था. हालांकि, उनके ख़िलाफ़ माहौल बनने लगा था. इसी क्रम में अगस्त 1948 में क़्वेटा में एक पब्लिक रैली के सामने से गुज़र रहे मेजर महमूद की पत्थर मारकर हत्या कर दी गई थी. मेजर महमूद अहमदिया थे. 1950 में दो और अहमदिया लोगों की हत्या हुई. 1953 में पाकिस्तानी पंजाब के कई हिस्सों में दंगे हुए. मांग चली कि अहमदिया को गैर-मुस्लिम घोषित किया जाए. और, उन्हें सरकारी दफ़्तरों से भी हटाया जाए. इस दंगे को काबू में करने के लिए सेना तक उतारनी पड़ी.
फिर आया 1974 का साल. ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो की सरकार ने अहमदिया को आधिकारिक तौर पर गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया. उन्हें अपने हिसाब से प्रार्थना करने, ख़ुद को मुस्लिम कहने, क़ुरान पढ़ने जैसी मौलिक एक्टिविटीज़ का पालन करने से रोका गया. इसके लिए उन्हें सज़ा भी दी जाने लगी.
जुलाई 1977 में भुट्टो को कुर्सी से उतार दिया गया. उन्हें उनके ही भरोसेमंद जनरल ज़िया उल-हक़ ने धोखा दिया था. बाद में भुट्टो को फांसी पर चढ़ा दिया गया. ज़िया उल-हक़ ने हंटर के ज़ोर से शासन चलाया. वो कठमुल्लाओं यानी धर्मांध मौलानाओं को भी साथ लेकर चले. उनको पता था कि पाकिस्तान में शासन चलाने के लिए क्या ज़रूरी है?
जनरल ज़िया ने कट्टर धड़े को खुश करने के लिए ईशनिंदा के कानून में बदलाव जारी रखा. आख़िरकार 1986 में ईशनिंदा के मामले में मौत की सज़ा का प्रावधान भी जोड़ दिया गया. मौत की सज़ा का प्रावधान लागू होने के बाद ईशनिंदा के मामले अचानक से बढ़ने लगे. लोगों ने इसे निजी खुन्नस निकालने का हथियार बना लिया. ऐसे-ऐसे फ़र्ज़ी मामले सामने आने लगे, जिसे देखकर सिर पीटने का मन करे. जैसे, बच्चे के नाम में ग़लती, पानी को लेकर झगड़ा, गैर-धार्मिक किताब जलाना, फ़ेसबुक पर तस्वीर शेयर करना, अख़बार के पन्ने में दवा लपेटकर देना आदि. 1996 में सिंध में एक दर्जी ने बुशरा तासीर नाम की एक महिला पर ईशनिंदा का आरोप लगाया था.
आरोप ये था कि बुशरा ने एक ऐसा कपड़ा सिलने के लिए दिया था, जिस पर धार्मिक आयतें लिखी हुईं थी. 2009 में आसिया बीबी नाम की एक ईसाई महिला को घड़े से पानी पीने के लिए ईशनिंदा का आरोप लगा दिया गया था. निचली अदालत ने उसको मौत की सज़ा सुनाई. सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा तो पलट दी. लेकिन आसिया का पाकिस्तान में रहना नामुमकिन हो चुका था. उसे देश छोड़कर बाहर जाना पड़ा. ये कुछ उदाहरण भर हैं. 1947 से 2021 के बीच पाकिस्तान में ईशनिंदा के लगभग डेढ़ हज़ार मामले सामने आए. किसी भी मामले में किसी भी आरोपी को मौत की सज़ा नहीं हुई है. लेकिन भीड़ के हाथों 89 लोग मारे जा चुके हैं. 2011 में आसिया बीबी का समर्थन करने के लिए पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की उनके ही बॉडीगार्ड ने हत्या कर दी थी. सलमान तासीर के पिता मोहम्मद दीन तासीर थे. वो वही थे, जिन्होंने इल्मुद्दीन के जनाजे को लीड किया था.
ऐसा नहीं है कि ये सब सिर्फ गैर-मुस्लिमों के साथ हो रहा है. ईशनिंदा के नाम पर होने वाली हिंसा के सबसे बड़े शिकार मुस्लिम ही हैं. हिंदू, सिख और ईसाईयों की आबादी कम है. उन्हें सरकारी संरक्षण कम मिलता है आतंकी संगठनों के लिए उन्हें निशाना बनाना भी आसान है.
हर सरकार को पता है कि ग़लत हो रहा है. लेकिन कोई भी इसे बदलने की हिम्मत नहीं दिखाता. दिसंबर 2021 में स्यालकोट में एक श्रीलंकाई व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. उसके ऊपर भी ईशनिंदा का आरोप था. उस समय पाकिस्तान में इमरान ख़ान की सरकार थी. उन्होंने दावा किया कि सरकार गंभीर है. और, दोषियों को सज़ा दी जाएगी. इस मामले में छह दोषियों को मौत की सज़ा सुनाई भी गई. इसके बावजूद अब ननकाना साहिब में मॉब लिंचिंग की घटना सामने आई है.
पाकिस्तान में हर सरकार अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी नाक बचाने के लिए मॉब लिंचिंग का विरोध करती है. वो ये दिखावा भी करती है कि दोषियों को सज़ा दी जाएगी. लेकिन ये आधा सच है. कोई भी समस्या की जड़ में जाने का इच्छुक नहीं है. जो इमरान ख़ान स्यालकोट के दोषियों को सज़ा देने की बात कर रहे थे, उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान साफ़ कर दिया था कि वो हर कीमत पर ईशनिंदा कानून का बचाव करेंगे. इमरान चुनाव जीत गए. उन्होंने बचाव किया भी है. पाकिस्तान की आबादी का बड़ा हिस्सा इस कानून को जायज मानता है. इसलिए, कोई भी सरकार अपने वोटबैंक में सेंध नहीं डालना चाहती है.
अब पाकिस्तान में शहबाज़ शरीफ़ की सरकार है. ननकाना साहिब की घटना के बाद कई पुलिस अधिकारियों को बर्खास्त किया गया है. प्रधानमंत्री ने जांच के आदेश दिए हैं. कहा है कि कड़ी कार्रवाई की जाएगी. जानकार बताते हैं कि ये सब दिखावा है. जब तक सरकार ईशनिंदा के कानून में बदलाव नहीं करेगी, तब तक आवारा भीड़ इसके ज़रिए अपनी निजी खुन्नस निकालती रहेगी और इसे धर्मरक्षा की तरह पेश भी करती रहेगी.
दूसरी चीज ये भी है कि पाकिस्तान ने धर्म का इस्तेमाल विदेशी मामलों में भी किया है. उसने भारत और अफ़ग़ानिस्तान में जिहाद के नाम पर हज़ारों लोगों का ब्रेनवॉश किया है. उन्हें लड़ने और मरने के लिए बॉर्डर पार भेजा है. ये पाकिस्तान की सीक्रेट स्टेट पॉलिसी का हिस्सा रहा है. इसलिए, ईशनिंदा के नाम पर होने वाली हिंसा में पाकिस्तान सरकार बराबर की ज़िम्मेदार है. ये बात हर सरकार पर लागू होती है. अगर कोई सत्ताधीश एक तरफ़ हिंसा की निंदा करता है, और दूसरी तरफ़ ज़िम्मेदार लोगों को शह दे तो उसे दोमुंहापन ही कहा जाएगा.
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