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उद्धव ठाकरे: जिसके बारे में दुनिया कहती थी कि शिवसेना को डुबो देगा, अब CM बन गया

चचेरे भाई, भाभी और एक्स-सीएम के हाथ राजनीति छीनकर पार्टी चलाने वाले नेता.

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शिवसेना के अध्यक्ष और महाराष्ट्र के 19वें मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे.
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सिद्धांत मोहन
27 जुलाई 2020 (अपडेटेड: 27 जुलाई 2020, 05:38 AM IST)
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उद्धव ठाकरे ने 28 नवंबर को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है. महाराष्ट्र में लम्बे समय तक चली उठापटक के बाद.
शिवसेना ने शुरुआत में ही तय कर दिया था. कि मुख्यमंत्री चुनने में उनकी पार्टी की अहम भूमिका होगी. इसलिए मुख्यमंत्री का पद उन्हें दिया जाए. इस बात पर भाजपा और शिवसेना में लम्बी रार हुई. सरकार बनी नहीं और लग गया राष्ट्रपति शासन.
राष्ट्रपति शासन अचानक से ख़त्म हुआ. और देवेन्द्र फडणवीस बन गए मुख्यमंत्री. फिर अचानक से  इस्तीफा. शिवसेना को मिला राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस पार्टी का साथ. मामला हो गया फिट.
कौन हैं उद्धव ठाकरे?
उद्धव ठाकरे की पहचान उनके शिवसेना नेता होने से ज्यादा भी है, अलग भी.
जन्म हुआ 27 जुलाई 1960 को. बाल ठाकरे के सबसे छोटे बेटे. दो बड़े भाई. सबसे बड़े बिंदुमाधव ठाकरे. और उनसे छोटे जयदेव ठाकरे. तीनों में उद्धव ठाकरे सबसे शांत, सबसे चुप.
उद्धव की शुरुआती पढ़ाई मुंबई के बालमोहन विद्यामंदिर से हुई. आगे चलकर उनके चचेरे भाई राज ठाकरे ने भी इसी स्कूल में दाखिला लिया. बालमोहन विद्यामंदिर से पढ़ाई के बाद उद्धव ठाकरे ने दाखिला लिया जेजे स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में. यहां से पढ़ाई हुई. साथ ही कलाओं, ख़ासकर फोटोग्राफी की ओर, उद्धव ठाकरे का झुकाव शुरू हुआ.
ये झुकाव ऐसा हो गया कि उद्धव ठाकरे ने मुंबई की हवाई तस्वीरें खींची. बाक़ायदे प्रदर्शनी लगी जहांगीर आर्ट गैलरी में. साल था 2004. ये फोटोग्राफी का शौक ऐसा कि उद्धव ठाकरे ने 2010 में  'महाराष्ट्र देश' और 2011 में 'पहावा विट्ठल' नाम से फोटोग्राफी की दो किताबें भी छाप दीं.
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युवा राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे. उद्धव ठाकरे की राजनीति में दिलचस्पी थी कम. लेकिन मां की इच्छा रखी और धीरे-धीरे पूरी पार्टी पर कब्जा कर लिया.

फोटोग्राफर कैसे बना नेता?
शिवसेना को चलाने में उद्धव ठाकरे की कभी सीधी रुचि नहीं थी. मगर साल आया 1994 तक धीरे-धीरे उद्धव ठाकरे की एंट्री हो चुकी थी. राजनीति में दिलचस्पी न होने के बावजूद आना पड़ा. क्यों?  क्योंकि मां मीनाताई की इच्छा थी.
मां चाहती थीं कि उनका एक लड़का तो कम से कम बाला साहब का साथ दे. उनकी पॉलिटिक्स को आगे बढ़ाए. बड़े बेटे जयदेव से बाल ठाकरे की खटपट थी. मां ने सबसे पहले उद्धव से अपने मन की बात कही  जब वो 34 बरस के थे. कहा कि पार्टी के कार्यक्रमों में जाया करो.
उद्धव ने मां की आज्ञा का पालन किया. पहली बार किसी कार्यक्रम में दिखे. विधानसभा चुनाव का माहौल बना हुआ था. राज के नेतृत्व में 'भारतीय विद्यार्थी सेना' ने नागपुर में एक मोर्चा निकाला था. इसमें उद्धव पहुंचे. एकदम शांति से. लोगों को तब नहीं पता चला होगा कि ये किस तूफान से पहले की शांति थी.
और राज ठाकरे किनारे कर दिए गए 
एकाध साल में उद्धव को भी समझ आ गया कि पार्टी में जमने का यही सही वक्त है. इस समय वे पार्टी के अंदरूनी कामों में अपनी पकड़ बनाने लगे थे. बाल ठाकरे भी तमाम कार्यकर्ताओं को उनके कामों के लिए उद्धव के पास भेजने लगे. कार्यकर्ताओं ने भी उद्धव को अपने कार्यकर्मों में बुलाना शुरू कर दिया.
उद्धव ने पहला दांव चला 1997 के BMC यानी बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन चुनाव में. टिकट बंटवारे में उद्धव की मनमानी हुई. राज ठाकरे कुछ साइड में कर दिए गए. उनके कई लोगों के टिकट काट दिए गए. राज इतना नाराज हुए कि मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में ही बोल गए – 'हां, मैं नाराज हूं'. इस बात के लिए उन्होंने बाल ठाकरे से डांट भी सुनी.
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बाल ठाकरे के साथ उद्धव ठाकरे (बाएं) और राज ठाकरे (दाहिने)

उद्धव धीरे-धीरे महाराष्ट्र की राजनीति का ककहरा रट चुके थे. और शिवसेना पर पूरा कब्जा मजबूत किया. 2002 के BMC चुनाव में भी 1997 दुहराया. इस बार टिकट बंटवारे पर पूरी तरह से उद्धव की चली थी और शिवसेना फिर एक बार जीती. राज ठाकरे के लोगों के फिर एक बार टिकट कटे. राज और नाराज हुए. पार्टी के अंदर कई खेमे बन गए. माने उद्धव अब खुलकर मैदान में आ चुके थे. और साबित  कर चुके थे कि वे शिवसेना का हिसाब किताब समझ रहे हैं. और बढ़िया समझ रहे हैं.
मीनाताई-बिंदुमाधव की मौत और एक अदद वारिस की तलाश
शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे एक अदद वारिस की तलाश कर रहे थे. उनके बड़े बेटे और अग्निसाक्षी जैसी फिल्मों के प्रोड्यूसर बिंदुमाधव ठाकरे और बाल ठाकरे की पत्नी मीनाताई की सड़क दुर्घटना में मौत हो चुकी थी. उनके मंझले बेटे जयदेव ठाकरे की रुचि तो शिवसेना को चलाने में थी, लेकिन बात वही. बाल ठाकरे और जयदेव की खटपट.
जयदेव से ज्यादा रुचि जयदेव की पत्नी स्मिता ठाकरे की थी. स्मिता शिवसेना से जुड़े कुछ निर्णय लेती थीं. लेकिन मीनाताई की मौत के बाद उन्होंने ठाकरे परिवार के बंगले मातोश्री पर पकड़ बना ली. पहले माले पर स्मिता ठाकरे रहती थीं, तो दूसरे माले पर बाल ठाकरे, उद्धव ठाकरे और पूरा परिवार.
इसके अलावा बाल ठाकरे के भाई श्रीकांत ठाकरे के बेटे राज ठाकरे भी तेवर वाले नेता थे. शिवसेना की छवि आक्रामक किस्म की थी. और राज ठाकरे का टेम्प्रेचर बराबर का. वैसी ही तेज़ी और फुर्ती. भाषणों में शिवसेना का एजेंडा मजबूत करते हुए. मीडिया को बाल ठाकरे का उत्तराधिकारी दिखने लगा था.
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अपने बेटे नितेश राणे के साथ नारायण राणे.

नारायण राणे की भूमिका
स्मिता ठाकरे और राज ठाकरे के अलावा एक और आदमी ने शिवसेना के कोर में भूमिका बनायी. नारायण राणे. शिवसेना के वरिष्ठ नेताओं में से एक. '95 में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन के मुख्यमंत्री बने थे मनोहर जोशी. मगर मनोहर जोशी अपने दामाद के साथ प्रॉपर्टी के घोटाले में फंस गए. उनके फंसने की कहानी लंबी है, कभी और सुनियेगा. तो हुआ ये, कि इससे पहले कोर्ट मनोहर जोशी के दामाद पर फैसला सुनाता, उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया. '99 में इनके इस्तीफे के साथ नए सीएम बने नारायण राणे.
साढ़े आठ महीनों तक मुख्यमंत्री रह चुके राणे बाल ठाकरे के पसंदीदा नेताओं में से एक थे. तो ये वो समय था जब राज ठाकरे, स्मिता ठाकरे और नारायण राणे शिवसेना को आगे लेकर चल रहे थे. और ये भी वही समय था जब इन तीनों के बाहर जाने का समय आ चुका था. क्योंकि '97 तक उद्धव अपनी पकड़ बना चुके थे.
राज ठाकरे के जीवन का सबसे खराब फैसला
कट टू 2003. महाबलेश्वर में पार्टी का अधिवेशन हुआ. यहां ये तय होना था कि पार्टी का अगला अध्यक्ष कौन होगा. बैठक शुरू हुई. एक प्रस्ताव आगे बढ़ाया गया. उद्धव ठाकरे के नाम का प्रस्ताव. ये प्रस्ताव लाए थे राज ठाकरे. वही राज ठाकरे जो खुद इस पद के सबसे बड़े दावेदार माने जाते थे. जनता चौंक गई कि ये कैसे हो गया. पर हुआ तो हुआ. उद्धव ठाकरे के नाम पर सर्वसम्मति से मुहर लग गई. उद्धव शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष बन गए. बाद में एक इंटरव्यू में राज ने बोला भी था, 'ये मेरी जिंदगी का सबसे खराब फैसला था.'
अब उद्धव ठाकरे, नारायण राणे, स्मिता ठाकरे और राज ठाकरे से ऊपर जाकर निर्णय लेने लगे. कहा जाता है कि कार्यकारी अध्यक्ष बनने के पहले ही उद्धव ठाकरे ने राज ठाकरे और नारायण राणे को साइडलाइन करना शुरू कर दिया. नारायन राणे भी मुंह फुला के बैठ गए. वजह थी कि अब बाल ठाकरे से मिलना पहले जैसा नहीं रह गया था. उद्धव के चाहने पर ही कोई बाल ठाकरे से मिल पाता था. इस बात से राणे समेत कई वो नेता नाराज थे जो पहले कभी भी मुंह उठाकर बाल ठाकरे से मिल लेते थे.
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उद्धव ठाकरे और बाल ठाकरे. बाल ठाकरे ने सारे विरोधाभासों से अलग उद्धव ठाकरे को पार्टी की कमान थमाई.

राज ठाकरे से दूरी 
राज ठाकरे नासिक और पुणे जैसे दो बड़े शहरों में शिवसेना का काम देख रहे थे. वहां हो रही कार्रवाईयों के प्रति जवाबदेह थे. शिवसेना का नया-नया हालचाल ले रहे उद्धव ठाकरे ने बिना राज ठाकरे को भरोसे में लिए नासिक और पुणे जैसे शहरों के नेताओं के साथ मीटिंग शुरू कर दी. राज ठाकरे को ये बात नागवार गुज़री. लेकिन चुप रह गए.
साल 2004. स्मिता ठाकरे और जयदेव ठाकरे का तलाक़ हो गया. लेकिन स्मिता ने मातोश्री छोड़ने से इंकार कर दिया.
अगला साल 2005. नारायण राणे शिवसेना से बाहर कर दिए गए. और बचे राज ठाकरे. अपने सिमटते अधिकारों को देखते हुए और शिवसेना में उद्धव ठाकरे की पकड़ मजबूत होते हुए राज ठाकरे ने भी अगले साल 2006 में शिवसेना से बाहर का रास्ता पकड़ लिया. और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNC) का गठन किया. तीन सालों के दरम्यान शिवसेना के तीन पुराने स्तम्भ खेल से बाहर हो गए, और बच गए उद्धव ठाकरे.
फिर आया उद्धव का सबसे खराब टाइम
राज के जाने और तमाम तमाम चुनौतियों के बावजूद शिवसेना ने चुनाव जीत लिए. 2007 में हुए BMC के चुनाव. उद्धव की फिर जय-जय हो गई. सबको ऐसा लगने लगा कि राज ठाकरे खत्म हो जाएंगे. मगर 2008 में राज ने यूपी-बिहारी बनाम मराठी का आंदोलन छेड़कर अपनी दुकान चला ली.
2009 के विधानसभा चुनाव में राज की पार्टी MNC ने 13 सीटें जीत लीं. शिवसेना ने अपने इतिहास का सबसे खराब प्रदर्शन किया. 45 सीटें आईं. नेता विपक्ष का पद भी खो दिया. ये पद मिला बीजेपी को, जिसके हाथ शिवसेना से एक सीट ज्यादा आई थी. तो कुल मिलाकर ये उद्धव का सबसे खराब पीरियड चल रहा था. उनके हार्ट का ऑपरेशन भी इसी दौर में हुआ.
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बाल ठाकरे ने सीधा इशारा किया कि अब उद्धव और आदित्य का ध्यान जनता को रखना होगा.

साल 2010-11 का समय. शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे की तबीयत खराब रहने लगी थी. बाल ठाकरे उद्धव ठाकरे की बहुत उम्मीद से देख रहे थे. बाल ठाकरे ने एक जनसभा से संकेत दिया कि वे शिवसेना को अब लंबे समय तक नहीं देखने वाले हैं. मुंबई की जनता से कहा कि वे उद्धव और आदित्य (उद्धव के बेटे) का ख़याल रखें.
फिर 2012 में बाल ठाकरे भी नहीं रहे. लगा कि उद्धव के लिए अब आगे की राह आसान नहीं है. मगर 2013 का अंत आते-आते देश मोदीमय हो गया. उद्धव ने भी हवा का रुख भांप लिया. उन्होंने भी 'स्टैंड एंड सी' की पॉलिसी अपनाई. बीजेपी के साथ दोस्ती के राग अलापे.
2014 के लोकसभा चुनाव में इसका फायदा भी मिला. शिवसेना अपने इतिहास में सबसे ज्यादा सीटें जीतकर आईं. 19 सीटें. मगर नरेन्द्र मोदी तो नरेन्द्र मोदी हैं. उन्हें पता था कि उनकी ही हवा का असर है कि शिवसेना के हाथ 19 सीटें आईं.
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नरेंद्र मोदी के साथ उद्धव ठाकरे. उद्धव पर भाजपा ने आरोप लगाया कि शिवसेना ने चुनाव के बाद अपनी रणनीति में परिवर्तन किया.

फिर उद्धव ठाकरे ने 2018 में एक बड़ा शिफ्ट लिया. दिसंबर में चले गए अयोध्या. शिवसैनिकों की भीड़ के साथ. उत्तर भारत से कई शिवसैनिक उनके साथ पहुंचे अयोध्या. कहा गया कि उद्धव अब एक राष्ट्रीय स्तर की नेतागिरी की तैयारी कर रहे हैं.
साल 2019. शिवसेना ने पांच सालों में एक राजनीतिक शिफ्ट लिया. अब भाजपा से अलग. किंगमेकर की भूमिका आई तो कहा कि किंग भी हमारा ही होगा. साथ में खांटी विरोधियों NCP और कांग्रेस तक को मिला लिया.
एक मज़ेदार बात 
उद्धव ठाकरे 'सामना' के एडिटर रहे हैं. लंबे समय तक शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष रहे. फिर अध्यक्ष रहे. मगर इतने लंबे पोलिटिकल करियर में एक भी चुनाव नहीं लड़े. पहली बार सीएम बनने जा रहें है. इसके साथ शिवसेना से महाराष्ट्र को तीसरा सीएम मिल रहा है.
बाल ठाकरे की मौत के बाद एक वक़्त ऐसा भी आया कि लोग दबी जुबान में कहने लगे. कि उद्धव अकेले पार्टी डुबोने के जिम्मेदार होंगे. मगर फ़िलहाल सच तो ये है कि वो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन रहे हैं. विचित्र गठबंधन से ही सही.


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