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खालिदा जिया: सत्ता, संघर्ष और सियासत का वो दौर जो बांग्लादेश ने रोज जिया

Khaleda Zia Death: खालिदा जिया सिर्फ बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री नहीं थीं, वे सत्ता और संघर्ष के बीच झूलती एक पूरी राजनीतिक कहानी थीं. विधवा से प्रधानमंत्री और जेल से इतिहास तक का उनका सफर बांग्लादेश की सियासत का आईना है. उनके जाने के साथ एक दौर खत्म हुआ, लेकिन बहस कभी खत्म नहीं होगी.

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Khaleda Zia
खालिदा जिया के संघर्ष की कहानी दिलचस्प है
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दिग्विजय सिंह
30 दिसंबर 2025 (अपडेटेड: 30 दिसंबर 2025, 08:42 AM IST)
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ढाका की सड़कों पर आज सन्नाटा है. BNP कार्यकर्ताओं की आंखें नम हैं और टीवी स्क्रीन पर एक ही नाम बार-बार लौट रहा है. खालिदा जिया.
वो औरत, जिसने कभी सोचा नहीं था कि राजनीति उसकी पहचान बनेगी. जो फौज की वर्दी पहनने वाले पति की पत्नी थी, फिर अचानक एक तख्तापलट की विधवा बन गई और वहीं से बांग्लादेश की सबसे ताकतवर सियासी आवाज बनकर उभरी. 30 दिसंबर 2025 को जब खालिदा जिया ने आखिरी सांस ली, तो सिर्फ एक पूर्व प्रधानमंत्री नहीं गईं, बल्कि बांग्लादेश की राजनीति का पूरा एक अध्याय बंद हो गया.

डिनाजपुर की खामोश लड़की से ढाका की सत्ता तक

15 अगस्त 1945. जगह डिनाजपुर. तब ये इलाका भारत में आता था. खालिदा मजूमदार एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी. न कोई राजनीतिक विरासत, न कोई क्रांतिकारी सपना. पढ़ाई की, घर संभाला और वही जिंदगी जी रही थीं जो उस दौर में ज्यादातर लड़कियों की होती थी. राजनीति उनकी प्लानिंग में नहीं थी, राजनीति उनके भाग्य में थी.

जब फौजी अफसर बना राष्ट्रपति और पत्नी बनी किस्मत की सवारी

खालिदा की शादी हुई जिया-उर-रहमान से. एक फौजी अफसर, जो बांग्लादेश की आजादी के बाद सत्ता के गलियारों तक पहुंचा. 1977 में जिया-उर-रहमान राष्ट्रपति बने. खालिदा जिया फर्स्ट लेडी बनीं, लेकिन पर्दे में रहीं. सब कुछ ठीक चल रहा था कि 1981 में गोलियों की आवाज ने सब बदल दिया. जिया-उर-रहमान की हत्या कर दी गई.

यहीं से खालिदा जिया की निजी जिंदगी खत्म हुई और राजनीतिक जिंदगी शुरू हुई. 

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बांग्लादेश की सियासत में चुनौती बनीं खालिदा (फोटो- BNP)
विधवा नहीं, चुनौती बनीं खालिदा जिया

पति की मौत के बाद सेना ने सोचा था कि कहानी खत्म हो गई. लेकिन खालिदा जिया ने राजनीति को हथियार बना लिया. 1983 में उन्होंने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की कमान संभाली. सामने थे सैन्य शासक हुसैन मोहम्मद इरशाद. खालिदा जिया सड़कों पर उतरीं, भाषण दिए, गिरफ्तार हुईं, फिर निकलीं. 

1990 में इरशाद की सत्ता गिरी और लोकतंत्र लौटा. इस लड़ाई ने खालिदा जिया को जनता की नेता बना दिया. 1991: जब बांग्लादेश को मिली पहली महिला प्रधानमंत्री. चुनाव हुए. BNP जीती और इतिहास लिखा गया. खालिदा जिया बनीं बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री.

देश को लोकतांत्रिक ढांचे में वापस लाया गया, लेकिन चुनौतियां कम नहीं थीं. गरीबी, प्राकृतिक आपदाएं और कमजोर अर्थव्यवस्था. खालिदा जिया ने शासन चलाया, लेकिन विवाद भी साथ चलते रहे.

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शेख हसीना और खालीदा जिया की अदावत पुरानी है (फोटो- AP)
शेख हसीना बनाम खालिदा जिया: राजनीति की सबसे लंबी दुश्मनी

बांग्लादेश की राजनीति दो नामों के बीच सिमट गई. एक तरफ खालिदा जिया. दूसरी तरफ शेख हसीना. दोनों के पति या पिता आजादी के नायक थे, लेकिन राजनीति में दोनों एक-दूसरे की सबसे बड़ी दुश्मन बनीं. ये दुश्मनी संसद से सड़क तक और अदालत से जेल तक पहुंची.

जेल, निर्वासन और आरोपों का दौर

2007 के बाद खालिदा जिया पर भ्रष्टाचार के मामले दर्ज हुए. जेल हुईं. समर्थकों ने कहा साजिश है, विरोधियों ने कहा कानून अपना काम कर रहा है. लंबा वक्त उन्होंने अस्पताल और जेल के बीच बिताया. उनका बेटा तारीक रहमान निर्वासन में चला गया और पार्टी वहीं से चलने लगी.

 ये भी पढ़ें: बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री खालिदा जिया का निधन, लंबे समय से थीं बीमार

बीमारी, संघर्ष और आखिरी लड़ाई

जेल और उम्र ने सेहत तोड़ दी. किडनी, लिवर और फेफड़ों की बीमारी. अस्पताल, ICU और व्हीलचेयर. राजनीति दूर हो गई, लेकिन नाम कभी दूर नहीं हुआ. और फिर 30 दिसंबर 2025 को खबर आई कि खालिदा जिया नहीं रहीं.

वीडियो: भारत के विदेश मंत्रालय ने बांग्लादेश में हुई हिंदू युवक की हत्या पर क्या बयान जारी किया?

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