JF-17 की उड़ान या पाकिस्तानी प्रचार का धुआं? फाइटर जेट बेचने के दावों की पूरी पोल खुली
Pakistan अपने फाइटर जेट JF-17 Thunder को लेकर बड़े-बड़े दावे कर रहा है. लेकिन रक्षा विशेषज्ञ, fighter jet की बिक्री और ग्लोबल हथियार मार्केट में उसकी हकीकत कहीं ज्यादा कमजोर है. आलम ये है कि जिस चीन ने JF-17 को डेवलप करने में पाकिस्तान की मदद की, वो भी इसके इस्तेमाल से कतराता है.

पाकिस्तान इन दिनों अपने JF 17 लड़ाकू विमान को लेकर कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वास में दिख रहा है. बयान ऐसे दिए जा रहे हैं मानो दुनिया की आधी वायु सेनाएं इसी जेट का इंतजार कर रही हों. हर इंटरव्यू और हर प्रेस रिलीज में JF 17 को गेम चेंजर बताया जा रहा है.
लेकिन जब इन दावों को जमीन पर परखा जाता है, तो तस्वीर उतनी चमकदार नहीं दिखती. ज्यादातर बातें बातचीत, रुचि और संभावनाओं तक सीमित हैं. पक्के सौदे कम हैं और डिलीवरी उससे भी कम.
असल में यह शोर सिर्फ एक फाइटर जेट बेचने का नहीं है. यह पाकिस्तान की उस कोशिश का हिस्सा है, जिसमें वह खुद को हथियार खरीदने वाले देश से हथियार बेचने वाले देश के रूप में पेश करना चाहता है.
JF 17 की कहानी कहां से शुरू हुईJF 17 का विचार 1990 के दशक के आखिर में जन्मा. उस वक्त पाकिस्तान की वायुसेना पुराने F 7 और मिराज जैसे विमानों पर निर्भर थी. नए पश्चिमी विमान महंगे थे और प्रतिबंधों का डर अलग.
यहीं से चीन के साथ मिलकर एक सस्ता, हल्का और बहुउद्देश्यीय फाइटर बनाने की सोच बनी. पाकिस्तान एयरोनॉटिकल कॉम्प्लेक्स और चीन की चेंगदू एयरक्राफ्ट इंडस्ट्री को साथ लाया गया.
इस प्रोजेक्ट को चीन में FC 1 और पाकिस्तान में JF 17 कहा गया. मकसद साफ था, ऐसा विमान जो अपनी जरूरतों के हिसाब से हो और जिसे बाहर भी बेचा जा सके.

JF 17 का पहला प्रोटोटाइप 2003 में उड़ान भरा. इसके बाद कई साल तक डिजाइन और सिस्टम में बदलाव चलते रहे. इंजन, रडार और हथियारों को लेकर बार बार सुधार किए गए.
2007 में JF 17 को आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान वायुसेना में शामिल किया गया. शुरुआत में इसे ब्लॉक 1 कहा गया, जो बेसिक क्षमता वाला संस्करण था.
इसके बाद ब्लॉक 2 आया, जिसमें कुछ बेहतर एवियोनिक्स और मल्टी रोल क्षमता जोड़ी गई. ताजा संस्करण ब्लॉक 3 है, जिसे 4.5 जेनरेशन के करीब बताया जा रहा है.
चीन की भूमिका और पाकिस्तान की सीमाएंJF 17 को अक्सर पाकिस्तान का स्वदेशी विमान बताया जाता है, लेकिन सच्चाई थोड़ी अलग है. इसका इंजन, रडार और कई अहम सिस्टम चीन से आते हैं. मतलब साफ है, यह पूरी तरह पाकिस्तान का कंट्रोल्ड प्रोडक्ट नहीं है. किसी भी एक्सपोर्ट डील के लिए चीन की मंजूरी जरूरी होती है.
यही वजह है कि पाकिस्तान की महत्वाकांक्षाएं बीजिंग की राजनीति और प्राथमिकताओं से बंधी रहती हैं. यह बात हर संभावित खरीदार भी जानता है.
एक्सपोर्ट का सपना कब और कैसे शुरू हुआJF 17 को डिजाइन करते वक्त ही एक्सपोर्ट को ध्यान में रखा गया था. पाकिस्तान जानता था कि घरेलू ऑर्डर सीमित हैं और लागत निकालने के लिए विदेश जरूरी है. पहला बड़ा एक्सपोर्ट ऑर्डर म्यांमार से 2015 में आया. यह एक सीमित संख्या का सौदा था, लेकिन पाकिस्तान ने इसे बड़ी कामयाबी बताया.
इसके बाद 2021 में नाइजीरिया ने JF 17 को अपनी वायुसेना में शामिल किया. अज़रबैजान ने 2025 में पहले विमान लेने शुरू किए और वह तीसरा विदेशी ऑपरेटर बना.
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दावों की लंबी लिस्ट और हकीकतपाकिस्तान बांग्लादेश, इंडोनेशिया, इराक और सऊदी अरब जैसे देशों का नाम भी लेता है. कहा जाता है कि बातचीत चल रही है और रुचि दिखाई गई है. सऊदी अरब के मामले में तो यहां तक कहा गया कि पाकिस्तान का कर्ज माफ कर बदले में फाइटर जेट लिए जा सकते हैं. लेकिन यह सब अभी अटकलों के स्तर पर है.
डिफेंस डील सिर्फ विमान बेचने का मामला नहीं होती. ट्रेनिंग, स्पेयर पार्ट्स, मेंटेनेंस और अपग्रेड सालों तक चलते हैं. यहीं पर पाकिस्तान की कहानी कमजोर पड़ती है.
JF 17 की खूबियां क्या हैंJF 17 की सबसे बड़ी खासियत इसकी कीमत बताई जाती है. यह पश्चिमी फाइटर जेट्स के मुकाबले सस्ता है. इसे मल्टी रोल विमान कहा जाता है, यानी यह हवा से हवा और हवा से जमीन दोनों तरह के मिशन कर सकता है.
ब्लॉक 3 में AESA रडार, बेहतर कॉकपिट और आधुनिक मिसाइलों की क्षमता जोड़ने का दावा किया गया है. कागजों पर यह सब आकर्षक लगता है.
लेकिन खामियां भी कम नहींJF 17 की रेंज और पेलोड सीमित है. यह भारी हथियारों के साथ लंबी दूरी तक उड़ान नहीं भर सकता. इसका इंजन चीनी और रूसी तकनीक पर आधारित है, जिसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे हैं. कई देशों के लिए यह बड़ा रिस्क होता है.
सबसे अहम बात यह है कि चीन की अपनी वायुसेना इस विमान का इस्तेमाल नहीं करती. यह तथ्य किसी भी संभावित ग्राहक को सोचने पर मजबूर करता है.

पाकिस्तान अक्सर दर्जनों देशों में रुचि की बात करता है. लेकिन असल में अब तक गिने चुने सौदे ही हुए हैं. म्यांमार, नाइजीरिया और अज़रबैजान को मिलाकर संख्या बहुत सीमित है. बाकी सब नाम संभावनाओं की लिस्ट में हैं.
इतने बड़े शोर के मुकाबले यह आंकड़ा बहुत छोटा है. खासकर तब, जब इसे आर्थिक राहत का जरिया बताया जा रहा हो.
मई 2025 का टकराव और मार्केटिंग की कोशिशभारत के साथ मई 2025 के टकराव को पाकिस्तान ने JF 17 की मार्केटिंग में बदलने की कोशिश की. दावा किया गया कि इसने भारतीय विमानों को मार गिराया. यह भी कहा गया कि चीनी पाकिस्तानी सिस्टम ने राफेल और S400 जैसे प्लेटफॉर्म को मात दी. भारत ने किसी नुकसान की पुष्टि नहीं की.
फिर भी पाकिस्तान के लिए यह कहानी जरूरी थी. इससे घरेलू राजनीति में भी फायदा मिलता है और बाहर ताकत का संदेश भी जाता है.
कमजोर अर्थव्यवस्था और डिफेंस इंडस्ट्रीपाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लगातार संकट में रही है. विदेशी मुद्रा की कमी और कर्ज का बोझ भारी है. ऐसे में लंबी अवधि की डिफेंस सपोर्ट देना मुश्किल हो जाता है. स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस में जरा सी चूक भरोसा तोड़ देती है.
निजी क्षेत्र की भागीदारी भी बेहद सीमित है. पूरी इंडस्ट्री सरकारी ढांचे पर टिकी हुई है.
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क्यों कमजोर और संघर्षग्रस्त देश टारगेट हैंपाकिस्तान जानता है कि विकसित देश पश्चिमी या घरेलू विकल्प चुनते हैं. वहां JF 17 की ज्यादा गुंजाइश नहीं है. इसलिए फोकस उन देशों पर है जो संघर्ष में फंसे हैं या जिन पर प्रतिबंध लगे हैं. जहां सस्ता और जल्दी मिलने वाला विकल्प चाहिए.
लेकिन ऐसे सौदे न तो स्थिर होते हैं और न ही लंबे समय तक भरोसेमंद. यही वजह है कि यह रणनीति जोखिम भरी है.
भारत के लिए तस्वीर कैसी हैभारत के लिए फिलहाल घबराने की बात नहीं है. जिन देशों के नाम लिए जा रहे हैं, वे भारत की सुरक्षा को सीधे प्रभावित नहीं करते.
हां, बांग्लादेश के साथ पाकिस्तान की बढ़ती बातचीत पर नजर रखी जाएगी. 2024 के बाद वहां हालात बदले हैं.
लेकिन कुल मिलाकर यह संतुलन बदलने वाला खेल नहीं है. यह ज्यादा तर राजनीतिक और प्रतीकात्मक शोर है.
भारत का तेजस और पाकिस्तान का JF 17 अक्सर तुलना में लाए जाते हैं. तेजस का विकास ज्यादा समय लेता रहा, लेकिन तकनीकी नियंत्रण भारत के हाथ में है. तेजस में पश्चिमी और स्वदेशी सिस्टम का संतुलन है. एक्सपोर्ट अभी सीमित है, लेकिन प्लेटफॉर्म पर भारत का पूरा अधिकार है.
JF 17 जल्दी तैयार हुआ, लेकिन चीन पर निर्भरता इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है. विकास और आत्मनिर्भरता के स्तर पर दोनों की राह अलग रही है.
आखिर में दावे और हकीकत का फर्कपाकिस्तान JF 17 को अपनी डिफेंस क्रांति की तरह पेश कर रहा है. लेकिन दावे और जमीन की सच्चाई में बड़ा अंतर है. कुछ सौदे हो भी जाएं, तो वे अर्थव्यवस्था या इंडस्ट्री को संभालने के लिए काफी नहीं होंगे. यह ज्यादा तर छवि बनाने की कोशिश है.
अंतरराष्ट्रीय हथियार बाजार में भरोसा समय और स्थिरता से बनता है. अभी पाकिस्तान के पास बयान ज्यादा हैं और ठोस नतीजे कम.
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