जम्मू-कश्मीर में चुनाव से पहले कुछ बड़ा हो गया!
अनुच्छेद 370 और 35A के निष्प्रभावी होने का बड़ा प्रभाव चुनाव पर पड़ने वाला है.

''जम्मू कश्मीर'' और ''बड़ा बदलाव'' को साथ सुन सुनकर आप बोर हो गए हैं. आप जानना चाहते होंगे कि भैया जम्मू कश्मीर में छोटा बदलाव कब होता है. लेकिन इस बार वाकई एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है. परिसीमन के बाद जम्मू कश्मीर में चुनाव होंगे, ये सब जानते थे. लेकिन अब चर्चा है कि इन चुनावों में ऐसे लोग भी वोट देंगे, जो आज से पहले पात्र नहीं थे. इतनी जानकारी आई और घाटी के नेताओं ने हायतौबा मचाना शुरू कर दिया. कि भैया केंद्र ने तो कश्मीर की डेमोग्रफी ही बदल दी. वहीं दूसरा पक्ष लकीर पीट रहा है कि जो 75 सालों में नहीं हो पाया, हमने करके दिखा दिया. सच, इन दोनों के बीच में है.
मध्य प्रदेश में कुछ दिन पहले ही नगर पालिका, नगर निकाय और पंचायत के चुनाव हुए. सिलवानी नगर परिषद में एक वोट से बीजेपी चुनाव जीतने में कामयाब रही. सिवनी मालवा में रेणुका मंडलोई सिर्फ एक वोट से अध्यक्ष का चुनाव जीतीं. सोहागपुर पंचायत में बीजेपी प्रत्याशी मात्र 2 वोट से हार गए. ये एक-दो की संख्या इसलिए बताइ, ताकि ये समझाया जा सके कि चुनाव छोटा हो या बड़ा, एक-एक वोट का बड़ा महत्व होता है. हमने अतीत में देखा है कि कैसे राजस्थान में सीपी जोशी एक वोट से चुनाव हारे और मुख्यमंत्री बनने की तमन्ना, तमन्ना ही रह गई. कहते हैं अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार एक सांसद के वोट से गिर गई. ये तमाम उदाहरण एक वोट के महत्व को समझाने के लिए काफी हैं. अब ऐसे में किसी चुनाव में एक मुश्त 20 से 25 लाख वोटर बढ़ जाएं, तो समीकरण आसानी से बन और बिगड़ सकते हैं.
आज यानी 18 अगस्त की सुबह, जम्मू कश्मीर के मुख्य चुनाव अधिकारी हृदेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि जम्मू कश्मीर की नई विधानसभा के लिए जो चुनाव होंगे, उनमें वोटरों की संख्या बढ़ने वाली है. अनुच्छेद 370 और 35A के निष्प्रभावी होने का बड़ा प्रभाव चुनाव पर पड़ने वाला है.
इस तरह 20 से 25 लाख वोटर बढ़ सकते हैं. ये ऐसे वोटर होंगे, जो लंबे समय से जम्मू कश्मीर में रहते तो थे, मगर मूल निवासी ना होने की वजह से उन्हें राज्य के विधानसभा चुनाव में वोटिंग का अधिकार नहीं था. कौन हैं वो, सबसे पहले ये जान लीजिए. इसमें एक बड़ा तबका शरणार्थियों का है. जो विभाजन के वक्त पाकिस्तान के सियालकोट और तमाम इलाकों से आया था. आज उनकी संख्या करीब 30 हजार के आस-पास बताई जाती है. एक बड़ा तबका वाल्मिकी समाज के लोगों का भी है. जो 60 के दशक से जम्मू कश्मीर में रहते हैं.
दरअसल साल 1957 में जम्मू कश्मीर में सफाई कर्मियों की बड़ी हड़ताल हुई थी. राज्य में साफ-सफाई को लेकर अव्यवस्था हुई तो पंजाब से मदद मांगी गई. तब अमृतसर और गुरदासपुर से 272 सफाई कर्मियों को लाया गया. रहने के लिए मकान दिया. परमानेंट रेजीडेंट सर्टिफिकेट यानी पीआरसी का वादा किया गया, लेकिन वो दर्जा कभी मिला ही नहीं. अनुच्छेद 370 और 35A की आड़ लेकर कभी मुख्य धारा से जोड़ने की कोशिश राज्य के किसी राजनीतिक या सामाजिक संगठन ने नहीं की. आज उनकी संख्या हजारों में पहुंच चुकी है. 370 के निष्प्रभावी होने से पहले ये लोग केंद्र सरकार के चुनाव में तो वोट डाल सकते थे, मगर राज्य की वोटिंग में हिस्सा लेने का अधिकार उन्हें नहीं मिला था.
नौकरी भी केंद्र के विभाग में मिल सकती थी, राज्य में नहीं. जमीन तक नहीं खरीद सकते थे. दुर्दशा की कल्पना इस बात से कर सकते हैं कि अगर वाल्मिकी समाज के किसी बच्चे ने PHD की हो या फिर MBA, IIT या फिर कोई और उच्च शिक्षा ले रखी हो, वो राज्य की नौकरी नहीं ले सकता था, लेकिन सफाई कर्मचारी का पद मिल जाता था. जातिगत भेदभाव भारत में आम है, लेकिन ये उदाहरण विशेष रूप से वीभत्स है.
लेकिन अब हालात बदल गए हैं. दशकों से यहां रहने के बावजूद 'बाहरी' माने जाने वाले लोग भी अब बाकायदा वोटर बनकर घरेलू हो जाएंगे. पहली बार उस वर्ग के लोगों को वोट देने का अधिकार मिलेगा जो जम्मू कश्मीर में समाज का हिस्सा तो हैं लेकिन सरकार का नहीं. इसके अलावा जो लोग वहां लंबे समय से नौकरी रहे हैं, दूसरे राज्यों से आए जो मजदूर हैं, जो बिजनेसमैन हैं, जो स्टूडेंट हैं, वो भी अपना वोटिंग कार्ड बनवा सकते हैं. सुरक्षा बल के जवान भी जम्मू कश्मीर के चुनाव में हिस्सा ले सकेंगे. इसमें सेना के जवानों और अधिकारियों के जीवन साथी को सर्विस वोट का अधिकार होगा. पहले सिर्फ पुरुष सैनिकों और उनकी पत्नी को पोस्टल बैलेट का अधिकार था. लेकिन अब सेना के किसी भी विंग में कार्यरत महिला सैनिक के पति को भी यही अधिकार होगा.
यानी लैंगिक मतभेद खत्म होकर व्यवस्था जेंडर न्यूट्रल हो गई है. लेकिन जवानों की वोटिंग के साथ एक शर्त जोड़ी गई है. चुनाव अधिकारी के मुताबिक सिर्फ पीस स्टेशन में तैनात जवान ही इस तरह मतदान कर पाएंगे. यानी जहां शांति स्थापित हो, एंटी इंसरजेंसी ऑपरेशन यानी आतंक से लड़ाई ना चल रही हो. वैसे ये पीस स्टेशन कौन से होंगे, इसको अभी आधिकारिक रूप से परिभाषित नहीं किया गया है. इसकी व्याख्या अपने तरह से हो सकती है, मगर अंतिम फैसला चुनाव आयोग लेगा.
जम्मू कश्मीर विधान सभा चुनाव कई मायनों में अनूठे होने वाले हैं. पहली बार लद्दाख संभाग का विधान सभा में हिस्सा नहीं होगा लेकिन इसके बावजूद अब तक की सबसे ज्यादा सीटों वाला सदन होगा. नए नियमों के मुताबिक इस बार नवंबर में मतदाता सूची का अंतिम प्रारूप प्रकाशित हो जाना है. अब जब इतना सबकुछ होना है तो इस पर राजनीति भी होना लाजिमी हो गया. पहली प्रतिक्रिया आई PDP की मुखिया महबूबा मुफ्ती की.
महबूबा मुफ्ती का आरोप है कि इस कदम से बीजेपी राज्य की डेमोग्राफी का बदलना चाहती है. वो अपने स्थानीय वोटरों से चुनाव नहीं जीत सकती. इसलिए बाहर के वोटरों को थोपा जा रहा है. वो कानूनी पहलू से ज्यादा इंटेशन पर जोर दे रही है. इसी तरह की प्रतिक्रिया नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला की भी रही. उन्होंने कहा,
"क्या भाजपा जम्मू-कश्मीर के वास्तविक मतदाताओं के समर्थन को लेकर इतनी असुरक्षित है? कि उसे सीटें जीतने के लिए अस्थायी मतदाताओं को आयात करने की जरूरत है?"
चुनाव आयोग के इस फैसले से राजनीतिक तौर पर किसे फायदा होगा ये बहस का विषय हो सकता है, मगर इस बात से कैसे इनकार किया जा सकता है कि जिनको सालों से वोटिंग के अधिकार से वंचित रखा गया. अब उन्हें वो अधिकार मिलने वाला है. 370 के निष्प्रभावी होने के बाद केंद्र के वो सारे कानून अब जम्मू कश्मीर में लागू होंगे, जो बाकी राज्यों में होते हैं. नियम की बात करें तो भारत में चुनाव, REPRESENTATION OF THE PEOPLE ACT, 1951 के तहत कराए जाते हैं. इस अधिनियम में चुनाव संबंधी सभी नियम-कानून समाहित हैं. चुनाव कैसे होगा, कौन व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है, चुनाव लड़ने की पात्रता क्या है, वोट देने का अधिकार किसे हैं, वोटिंग का तरीका क्या है, चुनाव से जुड़े तमाम तरीके सवालों के जवाब यही अधिनियम देता है. जिसे हिंदी में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 कहते हैं.
इस अधिनियम के 62वें बिंदु पर वोट देने के अधिकार के बारे में लिखा गया है.
1. हर व्यक्ति को वोटिंग का अधिकार है. कोई भी व्यक्ति जिसका नाम किसी भी निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचन नामावली में प्रविष्ट है, मतलब मौजूद है, तो उस व्यक्ति को निर्वाचन क्षेत्र में मत देने का अधिकार है.
2. कोई भी व्यक्ति एक निर्वाचन क्षेत्र में एक ही वोट दे सकता है, अगर एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्र में मत देता है तो उसके सभी मत शून्य हो जाएंगे. मतलब ये कि कोई व्यक्ति दो जगह वोट नहीं डाल सकता है.
3. वो व्यक्ति वोट नहीं डाल सकता है, जिसे जेल हुई हो या फिर किसी गुनाह के आरोप में पुलिस की कस्टडी में हो.
इसी अधिनियम के मुताबिक दूसरी जगहों पर काम करने वाले लोग रेंट एग्रिमेंट या फिर दूसरे प्रमाण के जरिए स्थानीय वोटर आईडी बनवा सकते हैं. जैसे कोई यूपी के उरई-जालौन का निवासी हो मगर फिलहाल दिल्ली में रहता हो. अगर वो चाहे तो जालौन की वोटर आईडी सरेंडर कर, दिल्ली में वोटर आईडी बनवा सकता है. आप में से कई लोगों ने ऐसा किया भी होगा. जो जहां रहने लगता है, वो वहां की वोटर आईडी बनवा लेता है. अनुच्छेद 370 की वजह से जम्मू कश्मीर को मिले स्पेशल स्टेटस की वजह से पिछले चुनाव तक ऐसा संभव नहीं हो पाता था. मगर अब होगा. रहा सवाल बाहर से मतदाता लाने का? तो बाहर का मतलब क्या है? क्या दूसरे देशों से लोगों को लाया जा रहा है? जवाब है नहीं. वोट देने वाले लोग हमारे ही देश के होंगे और हमारे ही देश में वोट देंगे. ऐसा बाकी राज्यों में होता है तो जम्मू कश्मीर पर भी वही नियम लागू होगा.
बीते 4 साल से जम्मू कश्मीर में चुनाव नहीं हुए हैं. लंबे अंतराल के बाद अब चुनाव की सुगबुगाहट है. जम्मू-कश्मीर की विधानसभा और लोकसभा सीटों के परिसीमन को लेकर केंद्र द्वारा गठित आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप दी है. इन प्रस्तावों पर आखिरी फैसला केंद्र सरकार को लेना है. इससे जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराने का रास्ता साफ हो गया है. परिसीमन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में जम्मू में 6 और कश्मीर में 1 विधानसभा सीट समेत कुल 7 विधानसभा सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है. इन प्रस्तावों के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में अब विधानसभा सीटें 83 से बढ़कर 90 हो जाएंगी, जबकि लोकसभा सीटें 5 ही रहेंगी. राज्य की मौजूदा विधानसभा सीटों की संरचना में भी बड़ा बदलाव किया गया है. प्रस्तावों के मुताबिक, जम्मू की विधानसभा सीटें 37 से बढ़ाकर 43 और कश्मीर की 46 से 47 की जाएंगी.
2019 में अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी होने से पहले जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 87 विधानसभा सीटें थीं, लेकिन अब 4 सीटें लद्दाख में चली गई हैं. यानी अब जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 83 सीटें रह गईं. जिसे अब बढ़ाकर 90 किया जाना है. जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के अनुसार जम्मू-कश्मीर की विधानसभा सीटों की कुल संख्या 107 से बढ़ाकर 114 किए जाने का प्रस्ताव है. इन 114 में से 24 सीटें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर यानी PoK के लिए आरक्षित हैं, जो खाली रहेंगी.
अब इन सारी कड़ियों को जोड़कर देखा जाए तो इससे बीजेपी को फायदा हो सकता है. मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर में सीटें ज्यादा होने की वजह से अब तक मुख्यमंत्री कश्मीर घाटी से ही बनता रहता है. जम्मू की भागीदारी बढ़ने और 25 लाख नए वोटरों के जुड़ने से बीजेपी अपनी संभावनाएं तलाश रही है. जहां हुए बलिदान मुखर्जी का नारा लगाने वाली बीजेपी की चाहत किसी से छिपी नहीं है. राजनीतिक पार्टी होने के नाते हर पार्टी की कोशिश सरकार बनाने की होती है. बीजेपी भी ये कोशिश करेगी. मगर राजनीतिक पार्टी की कोशिशों के आगे स्थानीय लोगों को अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता.
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