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2018 में सरकार गिरने से लेकर 2024 में चुनाव की घोषणा तक, कितना बदल गया जम्मू-कश्मीर?

अनुच्छेद-370 हटाने के बाद केंद्र सरकार ने कई बार वादा किया कि विधानसभा चुनाव होने के बाद जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा वापस मिल जाएगा. ऐसे में चुनाव के बाद घाटी के लोग इस उम्मीद में भी रहेंगे.

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Jammu Kashmir election
तीन चरणों में होंगे जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव. (फाइल फोटो- पीटीआई)
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साकेत आनंद
16 अगस्त 2024 (अपडेटेड: 17 अगस्त 2024, 08:53 AM IST)
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जम्मू-कश्मीर में 10 सालों के अंतराल के बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. चुनाव आयोग ने 16 अगस्त को बताया कि केंद्रशासित प्रदेश में तीन चरणों में विधानसभा के चुनाव होंगे. 18 सितंबर को पहले चरण, 25 सितंबर को दूसरे चरण और 1 अक्टूबर को तीसरे चरण की वोटिंग होंगी. वहीं चुनाव नतीजे 4 अक्टूबर को घोषित होंगे. चूंकि अभी पूर्ण राज्य का दर्जा वापस नहीं मिला है, इसलिए केंद्रशासित प्रदेश रहते हुए जम्मू-कश्मीर के चुनाव होंगे.

चुनाव आयोग के मुताबिक, पहले चरण में 24 सीटों, दूसरे चरण में 26 सीटों और तीसरे चरण में 40 विधानसभा सीटों पर वोटिंग होगी. इससे पहले अभी तक 87 सीटों पर चुनाव होते थे. इनमें चार सीटें लद्दाख की होती थीं. लेकिन अनुच्छेद-370 के हटाए जाने के बाद लद्दाख भी केंद्रशासित प्रदेश बन गया. परिसीमन के बाद अब जम्मू-कश्मीर में विधानसभा सीटों की संख्या बढ़कर 90 हो गई है. यानी कुल 7 सीटें बढ़ी हैं. जम्मू-कश्मीर में पिछले 6 सालों से कोई चुनी हुई सरकार नहीं है. आखिरी बार यहां बीजेपी और पीडीपी गठबंधन की सरकार थी. और आज के राजनीतिक परिदृश्य की पूरी कहानी इसी गठबंधन सरकार के गिरने के बाद शुरू हुई थी. इसलिए, सभी घटनाक्रमों पर एक-एक कर नजर डालते हैं.

बीजेपी-पीडीपी गठबंधन सरकार गिरी

तारीख - 19 जून 2018. तीन साल पुरानी एक "बेमेल गठबंधन" वाली सरकार का मेल खत्म हो गया. बीजेपी ने पीडीपी के साथ गठबंधन तोड़ दिया. कुछ घंटे बाद राज्य की तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इस्तीफा भी दे दिया. ‘बेमेल गठबंधन’ इसलिए क्योंकि कश्मीर के मसले पर धुर विरोधी राय होने के बावजूद दोनों दल साथ आए थे.

नवंबर-दिसंबर 2014 में जम्मू-कश्मीर में आखिरी विधानसभा चुनाव हुए थे. लोकसभा चुनाव में भारी जीत से उत्साहित बीजेपी यहां भी अपने दम पर सरकार बनाना चाहती थी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. जम्मू डिविजन की सारी 25 सीटें बीजेपी को मिली थीं. कश्मीर और लद्दाख में एक भी सीट नहीं मिली थी. दूसरी तरफ, घाटी में बीजेपी की जीत का डर दिखाकर चुनाव लड़ने वाली पीडीपी को 28 सीटें आई थीं. किसी दल को बहुमत नहीं मिला था. नेशनल कॉन्फ्रेंस 15 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर थी. जबकि कांग्रेस 12 सीटों के साथ चौथे स्थान पर रही.

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महबूबा मुफ्ती के साथ नरेन्द्र मोदी. (फाइल फोटो)

लंबे मंथन के बाद, मार्च 2015 में भाजपा-पीडीपी की सरकार बनी और मुफ्ती मुहम्मद सईद राज्य के मुख्यमंत्री बने. उपमुख्यमंत्री पद बीजेपी को मिला था. जनवरी 2016 में मुफ्ती मुहम्मद सईद का निधन हो गया. राज्य में राज्यपाल शासन लागू हो गया, जो 88 दिनों तक चला. इसके बाद मुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी महबूबा मुफ्ती लगातार भाजपा के संपर्क में रहीं. बातचीत के बाद अप्रैल में महबूबा मुफ्ती ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. लेकिन कुछ ही दिनों बाद कई मसलों पर दोनों दलों में खटपट शुरू हो गई. इसका परिणाम ये हुआ कि जून 2018 में सरकार खत्म हो गई. जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दल तब से ही राज्य में चुनाव की मांग कर रहे हैं. लेकिन सरकार जाने के बाद वहां राज्यपाल शासन लागू हो गया.

सरकार बनाने की कोशिश के बीच विधानसभा भंग

राज्यपाल शासन के बीच 21 नवंबर, 2018 को तत्कालीन राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा भंग कर दी. ये तब हुआ, जब पीडीपी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) और कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने की कोशिश की थी. 21 नवंबर, 2018 को ही महबूबा मुफ्ती ने एक ट्वीट किया था. बताया था कि वो सरकार बनाने का दावा पेश करने वाली चिट्ठी राज्यपाल तक पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं लेकिन पहुंचा नहीं पा रहीं. उन्होंने ट्वीट में लिखा था, 

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दूसरी तरफ, पीपल्स कॉन्फ्रेंस के प्रमुख सज्जाद लोन ने भी बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश किया था. 21 नवंबर को ही लोन ने वॉट्सऐप मेसेज का स्क्रीनशॉट लगाकर एक ट्वीट किया था, 

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21 नवंबर की रात ही खबर आई कि राज्यपाल ने विधानसभा भंग कर दी है. इसके पीछे उन्होंने कई दलीलें दी थीं. मसलन, अलग-अलग राजनैतिक विचारधारा वाली पार्टियों के साथ मिलने से स्थिर सरकार बनना नामुमकिन है. इनमें से कुछ पार्टियां विधानसभा भंग किए जाने की मांग कर रही थीं. राज्यपाल ने दूसरी दलील ये दी कि विधायकों की खरीद-फरोख्त की खबरें आ रही हैं. ऐसी चीजें लोकतंत्र और राजनैतिक प्रक्रिया के लिहाज से सही नहीं हैं.

एक और दलील में लिखा गया कि जम्मू-कश्मीर की स्थितियां काफी संवेदनशील हैं. यहां सुरक्षा की स्थितियों के मद्देनजर स्थिर सरकार की जरूरत है. इन सबको ध्यान में रखते हुए राज्यपाल इस नतीजे पर पहुंचे कि विधानसभा भंग करना ही सबसे बेहतर विकल्प होगा. ताकि राज्य को स्थिरता और सुरक्षा मुहैया कराई जा सके. सही समय आने पर चुनाव करवाए जा सकें, जिससे कि मजबूत सरकार का गठन हो सकेगा.

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कश्मीर में तैनात सुरक्षाबल. (फाइल फोटो- पीटीआई)

इसके बाद 18 दिसंबर 2018 की तारीख आई. 6 महीने के राज्यपाल शासन का अंत हो गया. इसके बाद जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लग गया. और ये अनुच्छेद-370 के खत्म किए जाने तक प्रभावी रहा. सरकार ने तब भी कहा था कि "सही समय आने पर" विधानसभा चुनाव करवाए जाएंगे.

जब जम्मू-कश्मीर बन गया केंद्रशासित प्रदेश

नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला सबसे बड़ा फैसला जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 को हटाना था. इस अनुच्छेद के तहत ही जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ था. विशेष दर्जे के तहत जम्मू-कश्मीर को अलग से कुछ ताकतें मिली हुई थीं. मसलन, जम्मू-कश्मीर के बारे में संसद सिर्फ रक्षा, विदेश मामले और संचार के मामले में ही कानून बना सकती थी. अगर संसद ने कोई कानून बनाया है और उसे जम्मू-कश्मीर में लागू करना है तो राज्य की विधानसभा को भी इसकी मंजूरी देनी पड़ती थी. जम्मू-कश्मीर में, जम्मू-कश्मीर के अलावा किसी दूसरे राज्य का नागरिक जमीन नहीं खरीद सकता था. यहां की विधानसभा का कार्यकाल 6 साल होता था. राज्य का अपना झंडा भी था.

5 अगस्त 2019 को तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अनुच्छेद-370 (3) का इस्तेमाल किया और आदेश दिया कि जम्मू-कश्मीर में भारतीय संविधान के सभी प्रावधान लागू होंगे. इस अनुच्छेद को खत्म करने के लिए संसद में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल-2019 लाया गया था. 5 अगस्त को ही गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में एलान किया कि अनुच्छेद-370 को खत्म कर दिया गया है. इसके साथ अनुच्छेद 35-ए भी खत्म हो गया, जिससे राज्य के 'स्थायी निवासी' की पहचान होती थी. 370 हटाने के साथ बताया गया कि जम्मू-कश्मीर की जगह अब दो केंद्रशासित प्रदेश होंगे - जम्मू-कश्मीर और लद्दाख. तब से दोनों प्रदेशों का शासन लेफ्टिनेंट गवर्नर के हाथ में है. तब ये भी बताया गया था कि जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस मिल जाएगा.

विशेष दर्जा हटाने के बाद, जम्मू-कश्मीर से बाहर के लोगों को जम्मू-कश्मीर में जमीन खरीदने का अधिकार मिल गया. अक्टूबर 2020 में गृह मंत्रालय ने इसके लिए नोटिफिकेशन जारी किया. जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन कानून के तहत अब देश का कोई भी व्यक्ति जम्मू-कश्मीर में घर, दुकान या फैक्ट्री के लिए जमीन खरीद सकता है. हालांकि, खेती के लिए जमीन खरीदने पर रोक अब भी लगी हुई है. पिछले साल 5 अप्रैल को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने राज्यसभा में बताया कि तीन सालों में जम्मू-कश्मीर में 185 बाहरी लोगों ने जमीन खरीदी है.

370 बहाल करने के लिए साथ आए राजनीतिक दल

जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म किए जाने के एक साल बाद घाटी के राजनीतिक दल साथ आए. एक अलायंस बना था- पीपल्स अलायंस फॉर गुपकार डेक्लेरेशन (PAGD). हालांकि, द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 4 अगस्त 2019 को ही फारूक अब्दुल्ला के आवास 'गुपकार' पर एक बैठक हुई थी. ये बैठक विशेष दर्जे को हटाए जाने की आशंकाओं को लेकर हुई थी. बैठक में फारूक अब्दुल्ला के अलावा महबूबा मुफ्ती, उमर अब्दुल्ला, सज्जाद लोन, यूसुफ तारिगामी सहित कई नेता थे. मीटिंग में 'गुपकार घोषणा पत्र' नाम का एक प्रस्ताव पारित किया. इसमें जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता और विशेष दर्जे को बचाने की बात कही गई थी.

लेकिन चार और पांच अगस्त 2019 की दरमियानी रात ही महबूबा मुफ्ती, उमर अब्दुल्ला सहित कश्मीर के कई नेताओं को नजरबंद कर लिया गया था. महीनों तक ये सभी नेता हाउस अरेस्ट में रहे. कई दिनों से घाटी में सुरक्षाबल बढ़ाए जा रहे थे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक तब घाटी में करीब 50 हजार अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए थे. हालांकि, कहा जा रहा था कि ये सुरक्षा व्यवस्था अमरनाथ यात्रा के लिए मजबूत की जा रही है. इस फैसले के बाद घाटी में महीनों तक इंटरनेट भी बंद रहा था.

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गुपकार गठबंधन के नेता. (फाइल फोटो- पीटीआई)

शुरुआत में 'गुपकार घोषणापत्र' पर 7 दलों ने हस्ताक्षर किए थे. नेशनल कॉन्फ़्रेंस, पीडीपी, पीपल्स कॉन्फ़्रेंस, सीपीएम, कांग्रेस, जम्मू कश्मीर पीपल्स मूवमेंट और अवामी नेशनल कॉन्फ़्रेंस. सभी दलों ने अनुच्छेद-370 और 35ए को फिर से बहाल करने की मांग की. राज्य का दर्जा वापस देने की भी मांग की गई. बाद में तीन दल इससे अलग हो गए. नवंबर 2020 में कांग्रेस इस गुट से अलग हो गई. जनवरी 2021 में पीपल्स कॉन्फ़्रेंस अलग हुई और फिर जुलाई 2022 में पीपल्स मूवमेंट भी चली गई.

DDC चुनाव में गुपकार गठबंधन की जीत

अनुच्छेद-370 हटाए जाने के बाद केंद्र सरकार ने डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट काउंसिल (DDC) का गठन किया. जम्मू-कश्मीर जब पूर्ण राज्य था, तो पंचायती राज अधिनियम के तहत सभी जिले में एक जिला योजना और विकास बोर्ड हुआ करता था. इस बोर्ड की अध्यक्षता की जिम्मेदारी राज्य के मंत्रियों को दी जाती थी. जिले से आने वाले सांसद, विधायक, विधान पार्षद आदि बोर्ड के सदस्य होते थे. एडिशनल डिप्टी कमिश्नर रैंक का एक अधिकारी इसका सदस्य-सचिव होता था. इस बोर्ड का काम राज्य की पंचायती राज संस्थाओं जैसे- हलका (सर्किल) या ग्राम पंचायत, ब्लॉक डेवलपमेंट काउंसिल और जिला पंचायत के कार्यों की मॉनिटरिंग करना और उन्हें विकास योजना बनाने में सहायता देना था.

इसी पंचायती राज अधिनियम में संशोधन कर डीडीसी बनाया गया. दिसंबर 2020 में डीडीसी के चुनाव हुए. कुल 278 सीटों में से गुपकार अलायंस को 110 सीटों पर जीत मिली. बीजेपी 75 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी. जम्मू में 72 और कश्मीर में तीन सीटें जीतीं. 50 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों को जीत मिली थी. डीडीसी के गठन से पहले केंद्र सरकार ने कहा था कि जब यहां निर्वाचित सरकार बनेगी तो वहां की सरकार अगर चाहे तो इस DDC को खत्म भी कर सकती है. ऐसा इसलिए क्योंकि यह त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था (संविधान के 73वें संशोधन, 1992) के अधीन नहीं आता है. यानी DDC कोई संवैधानिक संस्था नहीं है.

'स्थानीय निवासी' की परिभाषा में बदलाव

मई 2020 में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत नए नियम लागू किए. इसके तहत जम्मू-कश्मीर में बाहर से आकर बसे लोगों को भी 'स्थानीय निवासी' बनाने का नियम आया. नए नियमों के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में कम से कम पिछले 15 साल से रह रहे किसी भी व्यक्ति को डोमिसाइल सर्टिफिकेट दिया जा सकता है. इसके अलावा, जिन्होंने सात साल तक यहां पढ़ाई की हो और साथ ही यहां के शिक्षण संस्थानों में 10वीं या 12वीं की परीक्षा दी हो, वे भी इसके पात्र होंगे. साथ ही, केंद्र सरकार के अधिकारी, अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों, पीएसयू, सरकारी बैंकों और केंद्र सरकार की स्वायत्त संस्थाओं के अधिकारियों, संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारियों, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और मान्यता प्राप्त केंद्र सरकार की अनुसंधान संस्थाओं के अधिकारी, जो 10 साल जम्मू-कश्मीर में रह चुके हैं, उन्हें डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी किया जा सकेगा जाएगा. यानी स्थानीय निवासी का दर्जा मिलेगा.

इसके अलावा, राहत और पुनर्वास आयुक्त के यहां पंजीकृत प्रवासियों और उनके बच्चों को भी डोमिसाइल सर्टिफिकेट मिलेगा. रोजगार, व्यवसाय, प्रोफेशन या किसी अन्य कारोबारी कारण से जम्मू-कश्मीर से बाहर रह रहे राज्य के लोगों को भी स्थानीय निवासी माना जाएगा. दूसरे राज्यों में शादी करने वाली महिलाओं के बच्चे भी डोमिसाइल के हकदार होंगे. इन सभी के लिए 15 साल तक प्रदेश में रहने समेत अन्य श्रेणी की अनिवार्यता के नियम लागू होंगे.

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श्रीनगर का प्रसिद्ध लाल चौक. (फोटो- पीटीआई)

पहले अनुच्छेद- 35(ए) के तहत जम्मू-कश्मीर सरकार को राज्य के स्थायी निवासी की परिभाषा तय करने का अधिकार था. स्थानीय नागरिक प्रमाण पत्र (PRC) जारी किया जाता था. इसी की जगह, अब डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी किया जा रहा है. अप्रैल 2020 में सरकार ने अपने फैसले में सिर्फ चतुर्थ श्रेणी की सरकारी नौकरियों को स्थानीय निवासियों के लिए रिजर्व रखा था. लेकिन इस फैसले का जमकर विरोध हुआ. तो फिर नियम बदले गए और जम्मू-कश्मीर के निवासियों के लिए सभी नौकरियां आरक्षित कर दी गईं.

जम्मू-कश्मीर के नेताओं ने इस डोमिसाइल नीति का लगातार विरोध किया है. पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने कहा था कि ये नियम असंवैधानिक और जम्मू-कश्मीर के लोगों को स्वीकार्य नहीं हैं. इस लोकसभा चुनाव से पहले उमर अब्दुल्ला ने भी कहा था कि राज्य का दर्जा मिलने और सत्ता में आने के बाद वे डोमिसाइल कानून को बदल देंगे. कई बार नेताओं ने इस फैसले से कश्मीर की डेमोग्राफी बदलने की कोशिश का आरोप लगाया है.

परिसीमन के बाद विधानसभा की सीटें बढ़ीं

जम्मू-कश्मीर में अंतिम बार 1995 में परिसीमन किया गया था. तब राज्य विधानसभा की कुल 111 सीटें बनाई गई थीं. इसके तहत कश्मीर क्षेत्र के लिए 46 सीटें, जम्मू डिविजन के लिए 37 सीटें और लद्दाख के लिए चार सीटें निर्धारित की गई थीं. 24 सीटें पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) के लिए निर्धारित थीं. PoK की 24 सीटें विधानसभा में खाली रखी जाती हैं. इस प्रकार अभी तक कुल 87 सीटों (46+37+4) के लिए चुनाव होता था. इससे पहले, 2005 में परिसीमन होने की उम्मीद थी. लेकिन 2002 में तत्कालीन फारूक अब्दुल्ला सरकार ने जम्मू-कश्मीर जनप्रतिनिधित्व कानून, 1957 और जम्मू-कश्मीर के संविधान की धारा-47(3) में संशोधन करते हुए 2026 तक परिसीमन पर रोक लगा दी थी. लेकिन राज्य का दर्जा गंवाने के बाद ये शक्ति भी केंद्र के पास आ गई.

विशेष दर्जा खत्म होने और केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद लद्दाख क्षेत्र की चार सीटें अब जम्मू-कश्मीर में नहीं आएंगी. 6 मार्च 2020 को एक परिसीमन आयोग का गठन किया गया. सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में ये आयोग बना. तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा और उप चुनाव आयुक्त चंद्र भूषण कुमार भी इसके सदस्य थे. परिसीमन आयोग की रिपोर्ट के बाद मई 2022 में चुनाव आयोग ने जम्मू-कश्मीर में सीटों को लेकर नोटिफिकेशन जारी किया. इसके तहत जम्मू-कश्मीर में विधानसभा की सीटें बढ़कर 90 हो गईं. जम्मू क्षेत्र की विधानसभा सीटें 37 से बढ़ाकर 43 और कश्मीर की 46 से 47 हो गईं. इन 90 सीटों में से अनुसूचित जाति (SC) के लिए 7 और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए 9 सीटें आरक्षित की गईं.

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मनोज सिन्हा को अगस्त 2020 में जम्मू-कश्मीर का उपराज्यपाल बनाया गया था. (फोटो- पीटीआई)

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जम्मू में बनाई गई 6 नई सीटों में से चार हिंदू बहुल हैं. वहीं कश्मीर में कुपवाड़ा में एक नई सीट बनाई गई. ये इलाका पीपल्स कॉन्फ्रेंस का गढ़ है, जिसे बीजेपी का करीबी माना जाता है. वहां परिसीमन के बाद पांच संसदीय सीटें बनीं- बारामूला, श्रीनगर, अनंतनाग-राजौरी, उधमपुर और जम्मू. इन क्षेत्रों की सीमाओं में कई बदलाव किए गए हैं. मसलन, जम्मू के पीर पंजाल इलाके को कश्मीर की अनंतनाग लोकसभा सीट में जोड़ दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट ने 370 हटाने के फैसले को सही बताया

पिछले साल, 11 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने 370 हटाने के फैसले को सही ठहराया था. चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने फैसला दिया कि आर्टिकल 370 अस्थायी प्रावधान था, जो युद्ध जैसी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लाया गया था. चीफ जस्टिस ने कहा कि भारत में शामिल होते ही जम्मू-कश्मीर की संप्रभुता खत्म हो गई थी. उन्होंने ये भी कहा कि जम्मू-कश्मीर के पास कोई आंतरिक संप्रभुता भी नहीं थी, जम्मू-कश्मीर का संविधान भारत के संविधान के अधीन था और राष्ट्रपति के पास अनुच्छेद 370 खत्म करने की शक्ति थी.

CJI चंद्रचूड़ ने ये भी कहा था कि कोर्ट चुनाव आयोग को सितंबर 2024 तक जम्मू-कश्मीर में चुनाव सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने का निर्देश देता है. साथ ही, कोर्ट ने कहा कि जम्मू-कश्मीर को दो केंद्रशासित प्रदेशों में पुनर्गठित करने की जरूरत नहीं थी. जल्द से जल्द प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए.

बीजेपी लोकसभा चुनाव में कश्मीर से नहीं लड़ी

कश्मीर में अनुच्छेद-370 हटने के बाद पहली बार लोकसभा चुनाव हुए. लेकिन हालिया लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने कश्मीर की सीटों पर अपने उम्मीदवार नहीं उतारे. बीजेपी सिर्फ जम्मू और उधमपुर में लड़ी और दोनों सीट जीत गई. इसके अलावा चुनाव में एक और बड़ी बात हुई. जम्मू-कश्मीर के दो पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला चुनाव हार गए. महबूबा अनंतनाग-राजौरी सीट से उम्मीदवार थीं. उन्हें नेशनल कॉन्फ़्रेंस के मियां अल्ताफ अहमद ने दो लाख 80 हजार वोटों से हरा दिया. वहीं, बारामुला सीट पर उमर अब्दुल्ला को निर्दलीय उम्मीदवार इंजीनियर रशीद ने 2 लाख से ज्यादा वोटों से हरा दिया. रशीद ने जेल के भीतर रहते ही चुनाव लड़ा. 2019 में NIA ने उन्हें UAPA के एक केस में गिरफ्तार किया था.

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जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती. (फोटो- पीटीआई)

अब 10 साल बाद जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव होने हैं. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट बताती है कि पिछले दो दशक में ऐसा पहली बार हो रहा है कि यहां कम चरणों में चुनाव करवाए जा रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, इससे पहले सुरक्षा कारणों से चुनाव चार या इससे ज्यादा चरणों में होते रहे हैं. साल 2002 में विधानसभा चुनाव चार चरण में हुए थे. वहीं, 2008 में सात चरण और 2014 में पांच चरणों में करवाए गए थे.

पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला ने भी कहा है कि 1987-88 के बाद ये पहली बार है जब जम्मू-कश्मीर में इतने कम चरणों में चुनाव कराए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस इस दिन के लिए तैयार थी, वे जल्द ही अपना चुनाव अभियान शुरू करेंगे.

अनुच्छेद-370 हटाने के बाद केंद्र सरकार ने कई बार वादा किया कि विधानसभा चुनाव होने के बाद जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा वापस मिल जाएगा. ऐसे में चुनाव के बाद घाटी के लोग इस उम्मीद में भी रहेंगे.

वीडियो: कौन हैं नलिन प्रभात, जो जम्मू-कश्मीर पुलिस के नये DGP होंगे

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