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  • It's false that Mobile Network can kill the birds as claimed by Akshay Kumar (Pakshiraj) in 2.0

2.0 इस सदी की सबसे झूठी फिल्म है, मोबाइल से पक्षी तो क्या कीड़ा तक नहीं मरता!

डीटेल में जानिए कि मोबाइल नेटवर्क से निकलने वाली तरंगें असल में कितनी हानिकारक होती हैं?

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10 दिसंबर 2018 (अपडेटेड: 10 दिसंबर 2018, 11:19 AM IST)
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सोशल मीडिया पर एक झूठ चला. कि 5जी की टेस्टिंग के दौरान हेग में कई सारे पक्षी मर गए. कई लोग मोबाइल और मोबाइल नेटवर्क की तरंगों से होने वाले नुकसान की बात करते हैं. क्या ये चिंताएं सही हैं? क्या सच में मोबाइल नेटवर्क सेहत के लिए खतरनाक होते हैं?
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हाल ही में रजनीकांत की मूवी '2.0' रिलीज़ हुई. इसका रिलीज़ होना खबर नहीं, क्योंकि बासी हो गई जानकारी न्यूज नहीं होती.  बल्कि ये फिल्म तो अब कमाई में 500 करोड़ रुपये का आंकड़ा भी क्रॉस कर चुकी है. साथ ही ये भी स्थापित को चुका है कि अक्षय कुमार ने मोबाइल नेटवर्क को लेकर जो चिंता जताई थी, वो बिलकुल सही है.




सोशल मीडिया में तो चल ही रहा है, साथ-साथ दुनिया भर के अख़बारों में भी छप रहा है कि हेग में 5G की टेस्टिंग के दौरान 297 पक्षियों की जान चली गई. इन खबरों में ये भी बताया जा रहा है कि आसपास के अन्य जीव-जंतुओं पर भी इसके काफी दुष्परिणाम देखे गए.
देश की कई ट्रस्टेड न्यूज़ एजेंसिज़ भी इन खबरों को प्रकाशित, प्रचारित और प्रसारित कर रही है. लेकिन रुकिए! क्या वाकई अक्षय कुमार या 2.0 के पक्षीराज का भय सच है?
नहीं! जितनी भी खबरें देश-विदेश के अख़बारों और वेबसाइट्स में छप रही हैं, सारी की सारी फेक हैं. और इसकी हम पहले ही पड़ताल कर चुके हैं.
पढ़ें: क्या इन 297 पंछियों की जान 5G नेटवर्क टेस्टिंग की वजह से गई?
तो जब पड़ताल हो चुकी, तो फिर ये स्टोरी लिखने की क्या ज़रूरत पड़ी? इसलिए कि हमें पड़ताल से ये तो पता चल गया कि मोबाइल नेटवर्क के चलते 297 पक्षियों की जान जाना झूठी खबर है. लेकिन अब भी ये जानना बाकी है कि क्या मोबाइल नेटवर्क खतरनाक है? और अगर है, तो कितना खतरनाक है? ये समझाने के लिए आपको इसका पूरा विज्ञान बताते हैं. एकदम सरल भाषा में.


आसान भाषा में

दोस्तों, आपने कभी ठहरे हुए पानी में कंकड़ मारे हैं? कंकड़ मारने से पानी में जो हलचल मचती है न, शास्त्रों में उसे ही तरंग कहा गया है. अंग्रेजी में इसी तरंग को वेव कहते हैं. ये तरंगे उस जगह पर काफी घनी होती हैं जहां पत्थर गिराया गया है. उस जगह से दूरी जितनी बढ़ती जाएगी, तरंगों का घनापन और प्रभाव कम होता जाएगा. फिर एक पॉइंट ऐसा भी आएगा, जब ये खत्म हो जाएगा. इस घनेपन को ही आवृति या ‘फ्रीक्वेंसी’ कहते हैं . दो उभारों/शिखरों के बीच की दूरी को तरंग-दैर्ध्य या वेवलेंथ कहते हैं.

तो लहरों के घनेपन को इस तरह भी समझाया जा सकता है कि फेंके गए पत्थर से लहर जितनी दूर होती जाती है, उसकी आवृति या फ्रिक्वेंसी घटती जाती है और अंत में शून्य हो जाती है.
ये ऐसा ही है जैसे टॉर्च की रोशनी या दूर होती ट्रेन की सीटी की आवाज़.
अब गौर कीजिए कि जहां पर आपने पत्थर मारा, वहां पर सबसे ज़्यादा ऐनर्जी थी लेकिन दूर होते-होते वो घटती चली गई. मतलब ये हुआ कि ‘आवृति’ घटी तो ऐनर्जी घटी. तो जब कभी कोई आपसे कहे कि इस वेव की फ्रीक्वेंसी ज़्यादा है, तो जान लो कि वो कहना चाह रहा है कि इस वेव में ज़्यादा ताकत, ऊर्जा या ऐनर्जी है.
रंगों की दुनिया के इधर-उधर भी बहुत बड़ी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक दुनिया है.
रंगों की दुनिया के इधर-उधर भी बहुत बड़ी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक दुनिया है.

ये तो थी मेकेनिकल वेव की बात, जिसके लिए पानी की ज़रूरत थी. लेकिन एक वेव ऐसी भी होती है जिसके लिए पानी तो क्या किसी भी चीज़ की ज़रूरत नहीं होती.
यानी ये ‘कुछ नहीं’ या ‘वैक्युम’ या निर्वात में भी गति करती हैं. इन्हें इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें कहते हैं. सूरज की रौशनी भी एक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव है. वैक्युम में चलने के अलावा भी इनमें ढेरों विशेषताएं हैं. लेकिन इन तरंगों में भी फ्रीक्वेंसी और ऐनर्जी का वही हिसाब-किताब होता है. यानी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्ज़ में भी जैसे-जैसे फ्रीक्वेंसी बढ़ी, वैसे-वैसे ऐनर्जी बढ़ी.
सबसे कम ऐनर्जी वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्ज़ में आती हैं रेडियो वेव्स. फिर माइक्रोवेव. फिर जैसे-जैसे ऐनर्जी बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे वेव्स इन्फ्रारेड, कलर स्पेक्ट्रम, अल्ट्रावॉयलट, एक्स रे और गामा रे में बदलती चली जाती हैं.
कलर स्पेक्ट्रम यानी हमें दिखने वाले रंग. इसके अलावा बाकी वेव्ज़ को तो आप देख भी नहीं सकते.
ऐनर्जी बढ़ती है, तो उसका प्रभाव या असर करने की क्षमता भी बढ़ती चली जाती है. फिर चाहे वो प्रभाव फायदेमंद हो या नुकसानदायक.
जैसे ये अपनी रेडियो वेव. ये सबसे कम असर वाली है. फिर आती है माइक्रोवेव, जिसमें थर्मल ऐनर्जी होती है. मतलब गर्मी उत्पन्न करने की क्षमता. फिर वो वेव्स जो हमको दिखती हैं, रंगो के रूप में.
फिर आती हैं एक्स रे और गामा रे. इसका असर और भी ज़्यादा सूक्ष्म, और भी ज़्यादा खतरनाक होता है. ये निर्जीवों में इलेक्ट्रॉन बॉन्ड्स तक को तोड़-मरोड़ सकते हैं और जीवों में डीएनए तक. यानी पदार्थ वही पदार्थ नहीं रहता, इंसान वही इंसान नहीं रहता.
वायरल होती खबर इस तस्वीर के साथ वायरल हो रही है. वायरल होती खबर इस तस्वीर के साथ वायरल हो रही है.

जो कलर स्पेक्ट्रम से कम ऐनर्जी वाली तरंगे होती हैं वो नॉन-आयोनाइजिंग होती हैं. और जो कलर स्पेक्ट्रम से ज़्यादा ऐनर्जी वाली तरंगे होती हैं, वो आयोनाइजिंग होती हैं. आयोनाइजिंग मतलब खतरनाक. कैंसर करने वाली तरंगें. डीएनए का स्वरूप तक बदल देने वाली तरंगें.

इसलिए ही तो जहां एक्स-रे मशीन के आस-पास बहुत सावधानी बरती जाती है, वहीं दूसरी तरफ नॉन-आयोनाइजिंग वेव्ज़ से कोई ऐसा ज्ञात खतरा नहीं पाया गया है. वरना धूप से लेकर रंगो तक, सबसे ही खतरा होता.
इस पूरी साइंस को हम पहले भी रीडर्स को आसान भाषा में समझा चुके हैं. एक्स-रे के डर को रीडर्स के दिमाग से निकालने के लिए –
पढ़ें: मेट्रो और ऑफिस की एक्स-रे मशीन में टिफन डालने पर क्या होता है?
तो इस पूरी साइंस का निष्कर्ष ये कि गुड टेरेरिज्म-बेड टेरेरिज्म (भला आतंकवाद और बुरा आतंकवाद) की तर्ज़ पर ही गुड रेडिएशन और बैड रेडिएशन भी होता है. गुड रेडिएशन को नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन और बेड रेडिएशन को आयोनाइजिंग रेडिएशन कहते हैं. रेडियो वेव, जो कि मोबाइल में इस्तेमाल होती हैं वो गुड रेडिएशन या नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन कहलाती हैं.
वैश्विक मानकों के अनुसार मोबाइल फोन 100 किलोहर्ट्ज़ (0.1 मेगाहर्ट्ज) से 300 गीगाहर्ट्ज (3 लाख मेगाहट्र्ज) तक की रेंज में संचालित होते हैं. भारत में भी यही मानक तय हैं. वैसे तो 5G टेक्नोलॉजी 4G की तुलना में कहीं ज़्यादा ऐनर्जी की रेडियो वेव यूज़ होती हैं, लेकिन फिर भी ये तय मानकों के भीतर ही हैं.
मित्रों अच्छे आतंकवाद और बुरे आतंकवाद जैसी कोई चीज़ नहीं होती. आतंकवाद, आतंकवाद होता है! हां, विकिरण के बारे में बात दूसरी है!
मोदी जी के अंदाज में कहें तो मित्रों, अच्छे आतंकवाद और बुरे आतंकवाद जैसी कोई चीज़ नहीं होती. आतंकवाद, आतंकवाद होता है! हां, रेडिएशन के बारे में बात दूसरी है! उसमें गुड और बैड का पूरा स्कोप है. 

साथ ही दुनिया भर में ऐसे कई डेटा कलेक्ट किए गए हैं, ऐसे कई शोध हुए हैं जिनसे पता चलता है कि विश्व भर में मोबाइल फ़ोन का यूज़ बढ़ने के दौरान किसी ज्ञात बीमारी के आंकड़ों में कोई वृद्धि नहीं हुई. न ही किसी अज्ञात बीमारी या महामारी का रिलेशन मोबाइल या मोबाइल नेटवर्क से पाया गया.

इसीलिए निष्कर्ष यही निकलता है कि हमारे मोबाइल में इस्तेमाल होने वाली तरंगें सुरक्षित हैं. मोबाइल टावरों में इस्तेमाल होने वाली तरंगें भी सेफ हैं. पूरी तरह से सुरक्षित न भी सही, तो कम-से-कम तय मानकों के भीतर सेफ हैं. ये तय मानक इतने सख्त बनाए गए हैं कि उनके पार जाना बेहद मुश्किल है. और याद रखिए कि हम भारतीय स्टैंडर्ड्स की बात नहीं कर रहे. हम पूरी दुनिया में माने जाने वाले मानकों की बात कर रहे हैं.


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नीमच में डांसर्स का यह ग्रुप फेक न्यूज़ के इशारों पर नहीं नाचेगा -

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