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इज़रायल में हमले के बाद क्या मोसाद ने ईरान पर हमला किया?

मिडिल-ईस्ट आख़िर किस तरफ़ बढ़ रहा है?

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मिडिल-ईस्ट आख़िर किस तरफ़ बढ़ रहा है? (सांकेतिक फोटो -AFP)
मिडिल-ईस्ट आख़िर किस तरफ़ बढ़ रहा है? (सांकेतिक फोटो -AFP)
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31 जनवरी 2023 (Updated: 31 जनवरी 2023, 13:44 IST)
Updated: 31 जनवरी 2023 13:44 IST
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फ़िलिस्तीन में सेना की छापेमारी, इज़रायल में आतंकी हमला, ईरान में ड्रोन अटैक और ईजिप्ट में अमेरिका के विदेशमंत्री का अचानक आ धमकना. इन घटनाओं का आपस में क्या कनेक्शन है? क्या मिडिल-ईस्ट में कोई चिनगारी सुलग रही है? इन सवालों के जवाब जानने के लिए पहले कुछ घटनाओं पर नज़र डालिए,

पांच दिन. पांच घटनाएं और पांच निहितार्थ.

- नंबर एक. 25 जनवरी 2023 को इज़रायली आर्मी ने वेस्ट बैंक के जेनिन कैंप में रेड की. इसमें 10 लोग मारे गए. इज़रायल का दावा, फ़िलिस्तीन इस्लामिक जिहाद (PIJ) के आतंकी किसी बड़े हमले की साज़िश रच रहे थे. फ़िलिस्तीन का आरोप, मरने वाले आम लोग थे. उनका किसी आतंकी साजिश से कोई लेना-देना नहीं था.

- नंबर दो. 26 जनवरी को शवयात्रा के दौरान प्रोटेस्ट हुआ. इस दौरान एक प्रोटेस्टर ने इज़रायली सैनिकों से उलझने की कोशिश की. उसको वहीं पर गोली मार दी गई. इसके बाद वेस्ट बैंक और गाज़ा में कई जगहों पर हिंसा हुई. उसी शाम गाज़ा पट्टी से इज़रायल पर मिसाइल हमले हुए. गाज़ा पट्टी में हमास का नियंत्रण है. जवाब में इज़रायल ने एयर अटैक किया. हालांकि, इसमें किसी तरह के जानमाल के नुकसान की ख़बर नहीं आई.

- नंबर तीन. 27 जनवरी की रात जेरूसलम के एक यहूदी मंदिर में गोलीबारी हुई. इसमें सात लोग मारे गए, जबकि तीन घायल हो गए. हमलावर फ़िलिस्तीनी था. थोड़ी देर के बाद मुठभेड़ में पुलिस ने उसे मार गिराया. इस घटना ने पूरी दुनिया में हलचल मचाई. इज़रायल ने कार्रवाई करते हुए 42 लोगों को अरेस्ट किया.

- नंबर चार. 28 जनवरी को ईरान में मिलिटरी की फ़ैक्ट्री पर ड्रोन्स से हमला हुआ. इसमें एक वर्कशॉप की छत उड़ गई. एक दूसरी घटना तबरीज़ में सामने आई. वहां तेल की एक रिफ़ाइनरी में अचानक आग लग गई. वॉल स्ट्रीट जर्नल ने लिखा, ये हमला इज़रायल ने किया. ईरान ने किसी का नाम लिए बिना कहा, ये कायराना हमला है. इसका करारा जवाब दिया जाएगा.

- नंबर पांच. 29 जनवरी को अमेरिका के विदेशमंत्री एंटनी ब्लिंकन ईजिप्ट पहुंचे. वो काहिरा के बाद जेरूसलम और रमल्ला का दौरा भी करेंगे. इस दौरे में वो इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और फ़िलिस्तीन अथॉरिटी के प्रेसिडेंट महमूद अब्बास से मुलाक़ात करेंगे. माना जा रहा है कि उनका फ़ोकस हालिया हिंसा पर रहेगा.

ये तो थीं पांच घटनाएं, लेकिन इनका आपस में लेना देना है. तो आइए समझते हैं

 - ये सारी घटनाएं एक-दूसरे से आपस में कैसे जुड़ी हैं? और, मिडिल-ईस्ट आख़िर किस तरफ़ बढ़ रहा है?

इज़रायल और फ़िलिस्तीन का विवाद कम से कम 76 बरस पुराना है. क्योंकि मई 1948 से पहले इज़रायल नाम का कोई मुल्क़ था नहीं. हालांकि, इस झगड़े की बुनियाद उससे भी बहुत पहले रख दी गई थी. इसके मूल में दो धार्मिक समूह थे - पहले थे अरब मुस्लिम और दूसरे थे, यहूदी. उनके बीच 20वीं सदी की शुरुआत से ही दंगे वगैरह हो रहे थे. दोनों ही फ़िलिस्तीन के अंदर अपना मुल्क़ बनाना चाहते थे. और, उसमें दूसरे मत को मानने वालों के लिए कोई जगह नहीं थी. झगड़े से परेशान होकर ब्रिटेन ने फ़िलिस्तीन का ज़िम्मा यूनाइटेड नेशंस को सौंप दिया. यूएन ने 1948 में एक प्रस्ताव पेश किया. इसमें फ़िलिस्तीन के अंदर ही यहूदियों और मुसलमानों के लिए अलग-अलग मुल्क़ की स्थापना का विचार था. 

यहूदी नेता मान गए. उन्हें यूएन ने जितना हिस्सा दिया था, उसमें उन्होंने इज़रायल बना लिया. फ़िलिस्तीन में ऐसा कोई सर्वमान्य नेता नहीं था. और, ना ही कोई ऐसी पार्टी थी, जो यूएन के प्रस्ताव पर फ़िलिस्तीन का प्रतिनिधित्व कर सके. इसकी बजाय आस-पास के इस्लामी मुल्क़ उसकी तरफ़ से बोलते थे. जैसे, सीरिया, लीबिया, ईजिप्ट, जॉर्डन, लेबनान आदि. उन्हें यूएन का प्रस्ताव पसंद नहीं आया. इसलिए, उन्होंने इज़रायल बनने के अगले ही दिन हमला कर दिया. ये युद्ध 09 महीने तक चला. इसमें इज़रायल जीत गया. उसने फ़िलिस्तीन को मिली ज़मीन का 77 फीसदी हिस्सा अपने क़ब्ज़े में ले लिया.

डॉम ऑफ़ दी रॉक की तरफ बढ़ते सैनिक (AFP)

इसके बाद 1967 में सिक्स-डे वॉर हुआ. इसमें इज़रायल ने फ़िलिस्तीन को और छोटा कर दिया. छह साल बाद 1973 में एक और युद्ध हुआ. इसमें इज़रायल ने ईजिप्ट और सीरिया के कुछ हिस्सों को भी जीत लिया. 1978 में ईजिप्ट ने इज़रायल के साथ शांति समझौता कर लिया. तब जाकर इज़रायल पीछे हटा. उस समय तक फ़िलिस्तीन दो छोटे-छोटे टुकड़ों तक सीमित रह गया था. वेस्ट बैंक और गाज़ा. उसमें भी इज़रायल ने अपने लोगों को बसाना शुरू कर दिया था. इन कॉलोनियों को सेटलमेंट्स का नाम दिया गया. उस समय तक फ़िलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (PLO) फ़िलिस्तीनियों का लीडर बन चुका था. PLO इज़रायल के विरोध की बुनियाद पर ही बना था. PLO इज़रायल के लिए बड़ी मुसीबत बन रहा था. उन्हें हराने के लिए इज़रायल ने लेबनान पर भी हमला किया था. लेकिन एक समय बाद दोनों पक्षों को समझ आया कि ये झगड़ा बातचीत से ही सुलझेगा.

इस बातचीत का नतीजा 1993 के ओस्लो अकॉर्ड्स के रूप में सामने आया. इसके तहत फ़िलिस्तीनी अथॉरिटी (PA) की स्थापना हुई. जितना फ़िलिस्तीन बचा था, PA को उतने पर शासन चलाने का अधिकार मिला. इज़रायल ने वादा किया कि वो वेस्ट बैंक और गाज़ा से अपनी सेना निकाल लेगा. इसके बदले PA अपने यहां चल रही हिंसक गतिविधियों पर लगाम लगाने वाला था. ये समझौता सही दिशा में बढ़ रहा था. लेकिन दोनों तरफ़ के कट्टर धड़े को ये रास नहीं आया. इज़रायल में प्रधानमंत्री यित्हाक राबिन की हत्या हो गई. जबकि फ़िलिस्तीन में चरमपंथी संगठनों ने ग़दर काट दिया. ये संगठन इज़रायल के अस्तित्व को नहीं मानते थे. इसमें हमास सबसे आगे था. हमास को ईरान और लेबनान का समर्थन था. इसके दम पर उसने ओस्लो अकॉर्ड्स को भारी नुकसान पहुंचाया. और, एक समय बाद ये तय हो चुका था कि, अब बात से बात नहीं बनेगी.

इज़रायल के पूर्व प्रधानमंत्री यित्हाक राबिन

आज के समय में वेस्ट बैंक के 42 प्रतिशत हिस्से पर इज़रायल का नियंत्रण है. बाकी हिस्से पर PA का शासन चलता है. इज़रायल वेस्ट बैंक में अपने सेटलमेंट्स की संख्या लगातार बढ़ा रहा है. उसका इरादा पूरे वेस्ट बैंक को हथियाने का है. यूएन जैसे संगठन इस कोशिश को अंतरराष्ट्रीय कानूनों के ख़िलाफ़ बताते हैं. मगर इज़रायल का कहना है कि हमको पता है, सही और ग़लत क्या है? फ़िलिस्तीन का दूसरा हिस्सा गाज़ा इज़रायल के दक्षिण की तरफ़ है. गाज़ा पर हमास का क़ब्ज़ा है. इज़रायल, हमास को आतंकी संगठन मानता है. इसलिए, उसने गाज़ा को चारों तरफ़ से ब्लॉक करके रखा है. वहां जाने और वहां से आने वाली हर चीज़ पर इज़रायल का पहरा है.

इज़रायल का नक्शा (गूगल मैप)

अब सवाल आता है कि, इतनी निगरानी के बावजूद हिंसा घटती क्यों नहीं है?

इसकी तीन बड़ी वजहें हैं.

नंबर एक. सेटलमेंट्स का विस्तार. 

इज़रायल वेस्ट बैंक में यहूदियों को बसाना बंद नहीं कर रहा है. दिसंबर 2022 में शपथ लेने से पहले नेतन्याहू ने कहा था कि, सेटलमेंट्स की संख्या बढ़ाना उनकी सरकार की प्राथमिकता होगी. नेतन्याहू की मौजूदा सरकार को इज़रायल के इतिहास का सबसे कट्टर गठबंधन बताया जा रहा है. इसमें कई ऐसे नेता शामिल हैं, जो फ़िलिस्तीन को नक़्शे से मिटाने की बात कहते रहे हैं. इससे फ़िलिस्तीनियों में दहशत बढ़ रही है. उनका आरोप है कि यहूदियों को बसाने के लिए उनके पुश्तैनी घरों को तबाह किया जा रहा है. और, ये सब इज़रायल सरकार की शह पर हो रहा है.

इन सबसे इतर, नेतन्याहू सरकार न्यायिक सुधार के नाम पर सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां घटाने की दिशा में काम कर रही है. इससे फ़िलिस्तीनी नागरिकों के पास बचा अंतिम विकल्प भी खत्म हो सकता है. इसको लेकर डर का माहौल पनप रहा है.

दूसरी वजह का संबंध नेतृत्व से है. 

पूरे फ़िलिस्तीन में एक सर्वमान्य नेता या दल नहीं है. वेस्ट बैंक में PA का शासन चलता है. PA इज़रायल की सरकार के साथ मिलकर समाधान निकालने की वक़ालत करता है. जबकि गाज़ा में हमास का दबदबा है. हमास का कहना है कि इज़रायल होना ही नहीं चाहिए. वो PA को नहीं मानता. ऐसा नहीं है कि दोनों जगह पर बस दो ही पार्टियां हैं. PA और हमास के अलावा भी कई ऐसे संगठन हैं, जिनकी अपनी विचारधारा है. उनकी आपस में नहीं बनती.

तीसरी वजह चरमपंथ में बढ़ोत्तरी से जुड़ी है. 

यूएन की रेफ़्यूजी एजेंसी के मुताबिक, वेस्ट बैंक और गाज़ा में कम से कम 19 रेफ़्यूजी कैंप्स चल रहे हैं. इन कैंप्स में लाखों शरणार्थी रहते हैं. उनमें युद्ध और दूसरी वजहों से विस्थापित फ़िलिस्तीनी रहते हैं. इन कैंप्स में बुनियादी सुविधाएं नहीं के बराबर हैं. शिक्षा-व्यवस्था चरमराई हुई है. वहां प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं है. इस वजह से ये कैंप्स चरमपंथी संगठनों का बेस बनते जा रहे हैं. वहां से उन्हें नए लोगों को रिक्रूट करना आसान होता है. इन संगठनों को पनाह भी मिलती है. और, वे आम लोगों के बीच घुल-मिलकर अपना काम चलाते रहते हैं. 

इज़रायली सेना के लिए इन इलाकों में ऑपरेशन चलाना काफ़ी मुश्किल होता है. 25 जनवरी को इज़रायली सेना ने जेनिन कैंप में घुसकर इस्लामिक जिहाद के 10 आतंकियों को मार गिराने का दावा किया. PA यानी फ़िलिस्तीन अथॉरिटी ने आरोप लगाया कि मरने वाले आम लोग थे. उनका किसी साज़िश से कोई लेना-देना नहीं था. इज़रायल आर्मी पर रेड के दौरान आम नागरिकों की हत्या के आरोप लगते रहे हैं. मई 2022 में ऐसी ही एक रेड में अल जज़ीरा की पत्रकार शिरीन अबू अक्लेह की हत्या कर दी गई थी. इस पर काफ़ी बवाल मचा. इज़रायल ने अपने बचाव में कहा कि शिरीन क्रॉस-फ़ायरिंग में मारी गईं. जबकि अल जज़ीरा का दावा है कि उन्हें जान-बूझकर निशाना बनाया गया. फिलहाल, अल जज़ीरा इस केस को इंटरनैशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) में लड़ रहा है.

ये तो हुआ इज़रायल-फ़िलिस्तीन के बीच होने वाली हिंसा का बैकग्राउंड. अब समझते हैं कि हालिया झगड़ा कितना गंभीर है?

25 जनवरी को जेनिन कैंप में हुई मुठभेड़ के बाद PA ने इज़रायल के साथ काम करने से मना कर दिया था. PA पहले भी ऐसा करती रही है. 26 जनवरी को हमास और इज़रायल, दोनों ने एक-दूसरे को निशाना बनाकर हवाई हमले किए. हालांकि, इसमें कोई भी हताहत नहीं हुआ. 27 जनवरी की सुबह तक मामला शांत पड़ने लगा था. कुछ जगहों पर प्रोटेस्ट ज़रूर हो रहे थे. लेकिन यही माना जा रहा था कि ये सब कुछ समय में ठीक हो जाएगा.

फिर 27 जनवरी की रात माहौल अचानक बदल गया. रात के 08 बजकर 13 मिनट पर जेरूसलम के एक यहूदी मंदिर के पास एक कार रुकी. उसमें से 21 साल का एक नौजवान बाहर निकला. उसने कार से उतरते ही फ़ायरिंग शुरू कर दी. जो कोई उसके सामने दिखा, उसे गोली मार दी गई. जब तक पुलिस और मेडिकल टीम मौके पर पहुंची, तब तक सात लोगों की जान जा चुकी थी. हमले के बाद आतंकी पैदल ही भागा. पुलिस ने पीछा कर मुठभेड़ में उसे मार गिराया. हालांकि, तब तक नुकसान हो चुका था. ये 2011 के बाद इज़रायल में हुआ सबसे भयानक आतंकी हमला था. पूरी दुनिया ने इसकी निंदा की. इज़रायली पीएम ने रातोंरात कैबिनेट की आपातकालीन बैठक बुलाई. 

इज़रायल के रक्षामंत्री अमेरिका के दौरे पर थे. उन्हें फौरन वापस लौटने के लिए कहा गया. कैबिनेट की बैठक के बाद नेतन्याहू ने कहा कि सरकार सारे ज़रूरी कदम उठा रही है. आम नागरिक कानून अपने हाथों में ना लें. सरकार ने इज़रायली सेटलर्स को बंदूक जारी करने में तेज़ी लाने का वादा किया. कहा कि उन्हें अपनी सुरक्षा का पूरा अधिकार है. हालांकि, आरोप ये भी लगते हैं कि सेटलर्स निजी खुन्नस के लिए बेगुनाह फ़िलिस्तीनी नागरिकों की हत्या करते हैं. जानकारों का कहना है कि बंदूक थमाकर सरकार ग़लती कर रही है. इससे हिंसा और बढ़ेगी.

हिंसा का तो पता नहीं, लेकिन 28 जनवरी को झगड़े का दायरा ज़रूर बढ़ गया. उस रात ईरान आर्मी की एक वेपंस फ़ैक्ट्री पर ड्रोन से हमला हुआ. दो ड्रोन्स तो मार गिराए गए. लेकिन तीसरे ने एक वर्कशॉप की छत उड़ा दी. उसके कुछ समय बाद ही एक रिफ़ाइनरी में आग लग गई. किसी ने इसकी ज़िम्मेदारी तो नहीं ली और ना ही ईरान ने सीधा आरोप लगाया, मगर गुप्त सूत्रों ने कहा कि ये सिर्फ मोसाद ही कर सकती है. ईरान के विदेश मंत्री ने कहा कि ये हमले कायराना हैं और इसका करारा जवाब दिया जाएगा. उनका इशारा इज़रायल की तरफ़ था. इज़रायल पहले भी इस तरह के हमले करता रहा है. हालांकि, वो बहुत कम मौकों पर ज़िम्मेदारी स्वीकार करता है.

अब सवाल ये बनता है कि, ईरान पर हमला करके इज़रायल को क्या फायदा?

दो फायदे हैं.पहला, मेसेज देने की कोशिश. 

ये बात जगजाहिर है कि, ईरान, फ़िलिस्तीन और लेबनान में इज़रायल-विरोधी संगठनों को कैश और हथियार देता रहा है. इज़रायल मानता है कि उसके यहां होने वाली हिंसा के लिए ईरान भी ज़िम्मेदार है. जानकारों का कहना है कि इज़रायल ने ड्रोन हमला करके ये बताने की कोशिश की है कि, अगर नहीं सुधरे तो बड़ा नुकसान झेलना होगा. एक और इशारा ईरान के न्युक्लियर प्रोग्राम की तरफ़ है. इज़रायल, ईरान के न्युक्लियर प्रोग्राम को हर कीमत पर रोकना चाहता है. 2018 में न्युक्लियर डील से अमेरिका के हटने के बाद से ईरान बेलगाम है. इज़रायल का कहना है कि वो ईरान को रोकने के लिए किसी का इंतज़ार नहीं करेगा. 29 जनवरी को ईजिप्ट पहुंचे अमेरिकी विदेशमंत्री ब्लिंकन ने एक इंटरव्यू में कहा कि, ईरान को रोकने के लिए सारे विकल्प खुले हैं. उनका इशारा इज़रायल को ओपेन हैंड देने की तरफ था.

ईरान पर हुए हमले की दूसरी वजह थोड़ी विचित्र लगी. जिस समय ईरान में आग बुझाई जा रही थी, उस समय ट्विटर पर एक अलग खेल चल रहा था. यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेन्स्की के सलाहकार मिखाइल पोदोलिएक लिख रहे थे,

‘ईरान में विस्फ़ोटक रात - ड्रोन और मिसाइल प्रोडक्शन सेंटर, ऑयल रिफ़ाइनरी निशाने पर.’

दरअसल, ईरान पर रूस को कामिकाज़ी ड्रोन्स की सप्लाई करने के आरोप लगते हैं. इन ड्रोन्स के हमले में सैकड़ों यूक्रेनी सैनिक और आम नागरिकों की मौत हो चुकी है. यूक्रेन का दावा है कि 28 जनवरी की रात हुआ ड्रोन हमला बदले के लिए था. लेकिन इस दावे की पुष्टि नहीं हो सकी है. इज़रायल अभी तक रूस-यूक्रेन युद्ध में न्यूट्रल रहा है. अगर उसने यूक्रेन की तरफ़ से ईरान पर हमले की बात स्वीकारी तो युद्ध का चरित्र बदल जाएगा.

इस पूरे बवाल के बीच अमेरिकी विदेशमंत्री एंटनी ब्लिंकन 29 जनवरी को ईजिप्ट पहुंचे. वहां उन्होंने राष्ट्रपति फतह अल-सीसी से मुलाक़ात की. ईजिप्ट, इज़रायल और फ़िलिस्तीन के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है. कहा जा रहा है कि ब्लिंकन आगामी झगड़े की आशंका को रोकने के लिए ज़मीन तैयार कर रहे हैं. 30 और 31 जनवरी को वो इज़रायल और फ़िलिस्तीन के शीर्ष नेतृत्व से बात करेंगे. उनके दौरे पर पूरे मिडिल-ईस्ट का भविष्य निर्भर करता है.

वीडियो: दुनियादारी: इजरायल में आतंकी हमले के बाद क्या मोसाद ने ईरान पर हमला किया?

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