किंग बीबी इज़रायल में वापस आ रहे हैं?
इस बार इज़रायल के आम चुनाव में क्या दांव पर लगा है?

इज़रायल की राजनीति में एक सवाल बार-बार पूछा जा रहा है,
“Can King Bibi Rise Again?
क्या किंग बीबी की वापसी संभव है?”
किंग बीबी इज़रायल के पूर्व प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का निकनेम है. उन्हें इज़रायल की राजनीति का जादूगर कहा जाता है. लेकिन पिछले कुछ समय से उनका जादू घटा है. पांच दफा इज़रायल के पीएम की कुर्सी संभाल चुके नेतन्याहू पिछले एक बरस से सत्ता से बाहर हैं. उनके ऊपर करप्शन का केस भी चल रहा है. अगर इस बार उनकी लिकुड पार्टी सरकार बनाने में कामयाब नहीं हुई तो उनका राजनैतिक भविष्य ख़तरे में पड़ सकता है. कहा तो ये भी जा रहा है कि उनकी अपनी ही पार्टी उन्हें किनारे लगा सकती है. वो भी तब जबकि नेतन्याहू पिछले 17 सालों से पार्टी के सुप्रीमो बने हुए हैं.
आज हम इज़रायल और नेतन्याहू की चर्चा क्यों कर रहे हैं?
दरअसल, 01 नवंबर 2022 को इज़रायल में नई क्नेसेट का चुनाव हो रहा है. वोटिंग भारतीय समयानुसार रात डेढ़ बजे तक चलेगी. क्नेसेट, इज़रायल की संसद का नाम है. इसमें 120 सदस्य होते हैं. सरकार बनाने के लिए किसी पार्टी या गठबंधन को कम से कम 61 सीटें चाहिए. इज़रायल के इतिहास में कभी भी किसी पार्टी ने अकेले दम पर सरकार नहीं बनाई. हमेशा दो या दो से अधिक पार्टियों ने मिलकर सरकार बनाई. बेंजामिन नेतन्याहू बरसों तक गठजोड़ के इस गणित के इकलौते बादशाह बने रहे. जब उनके सितारे कमज़ोर पड़े, तब बाकियों को मौका मिला. जून 2021 में पहली बार ऐसा हुआ कि कोई अरब पार्टी सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा बनी. इससे नेतन्याहू के विरोधियों को सरकार बनाने के लिए ज़रूरी आंकड़ा मिल गया. लेकिन इस गठबंधन की नींव हमेशा से खोखली थी. पहली सालगिरह आते-आते दरारें खुलकर सामने आ चुकीं थी. ऐसे में संसद भंग करने का प्रस्ताव लाया गया. नए चुनाव के लिए 01 नवंबर की तारीख़ तय की गई. वोटिंग हो चुकी है. अब नतीजों का इंतज़ार है.
इसी इंतज़ार के बीच हम जान लेते हैं,
- इस बार के इज़रायल के आम चुनाव में क्या दांव पर लगा है?
- और, क्या किंग बीबी की सत्ता में वापसी संभव है?
इजरायल में संसदीय लोकतंत्र वाली व्यवस्था काम करती है. यानी जनता अपनी पसंद की सरकार चुनने के लिए स्वतंत्र है. जैसा कि भारत में होता है. लेकिन वहां वाले सिस्टम में एक बड़ा अंतर है. वहां वोटिंग कैंडिडेट नहीं, बल्कि पार्टी के नाम पर होती है. बैलेट पेपर पर पार्टियों के सिंबल होते हैं. कहीं पर किसी कैंडिडेट का कहीं ज़िक्र नहीं होता.
फिर सांसद कैसे चुने जाते हैं?
ये काम पार्टियों का है. इज़रायल में भारत की तरह ही बहुदलीय व्यवस्था है. यानी, बहुत सारी राजनैतिक पार्टियां हैं. ये पार्टियां वोटिंग से पहले कैंडिडेट्स की लिस्ट इलेक्शन कमीशन के पास जमा कराती हैं. इस लिस्ट का इस्तेमाल वोट्स की गिनती के बाद होता है. वोटिंग में जिस पार्टी को जितने प्रतिशत वोट मिलते हैं, उसे उसी अनुपात में सीटें अलॉट की जाती हैं. क्नेसेट में दाखिल होने के लिए किसी पार्टी को कम से कम 3.25 प्रतिशत वोट्स की प्रतिशत ज़रूरत होती है. ये न्यूनतम अहर्ता है. इससे कम मिला तो पार्टी संसद की रेस से बाहर हो जाती है. ऐसी पार्टियों के वोट बाकियों के बीच बांट दिए जाते हैं. इसके बाद सीटों का बंटवारा होता है.
जब सीटों का नंबर डिसाइड हो जाता है, तब चुनाव आयोग लिस्ट निकालता है. वही लिस्ट, जो पार्टियों ने चुनाव आयोग को सौंपी थी. फिर उसी आधार पर टॉप के नामों को क्नेसेट में दाखिला मिल जाता है. पार्टियां अपने सबसे बड़े नेता को टॉप पर रखती है. नेताओं को उनके रुतबे के हिसाब से नंबर मिलता है. जैसे, लिकुड पार्टी की लिस्ट में नेतन्याहू का नाम पहले नंबर पर होता है.
इजरायल में उपचुनाव की व्यवस्था नहीं है. अगर किसी सांसद की मौत होती है या किसी दूसरी वजह से उनकी सीट खाली होती है तो लिस्ट में शामिल अगले व्यक्ति को वो सीट मिल जाती है. यानी एक बार किसी पार्टी को सीट अलॉट हुई तो अगले चुनाव तक वो बरकरार रहती है. आमतौर पर क्नेसेट का कार्यकाल चार बरस का होता है. लेकिन पिछले चार चुनावों से कोई भी सरकार ये कार्यकाल पूरा करने में नाकाम रही है.
एक नज़र टाइमलाइन पर.अप्रैल 2019. नेतन्याहू पहली बार बहुमत जुटाने में नाकाम साबित हुए. फिर विपक्ष को मौका मिला. लेकिन उनके पास भी ज़रूरी आंकड़ा नहीं था.
फिर सितंबर 2019 में दूसरा चुनाव कराया गया. इस बार भी वही स्थिति बनी. सरकार नहीं बनी. अगला चुनाव मार्च 2020 में हुआ. इसमें भी हालात नहीं बदले. तब नेतन्याहू ने ब्लू एंड वाइट अलायंस के नेता बेनी गेंज़ के साथ हाथ मिलाया. समझौता हुआ कि दोनों नेता कुछ-कुछ महीनों के लिए प्रधानमंत्री बनेंगे. लेकिन दिसंबर 2020 आते-आते साथ छूट चुका था.
इसके बाद चौथे चुनाव के लिए मार्च 2021 की तारीख़ तय हुई. इसमें नेतन्याहू सरकार बनाने में नाकाम रहे. तब राष्ट्रपति ने दूसरे नंबर की पार्टी येश अतिद के लीडर याया लापिड को मौका दिया. लापिड ने डेडलाइन से आधे घंटे पहले बहुमत जुटा लिया. इस गठबंधन सरकार में आठ पार्टियां शामिल हुईं. इनमें लेफ़्ट, राइट, सेंटर, हर किस्म की विचारधाराओं का मेल था. इस समझौते में एक शर्त प्रधानमंत्री पद के बंटवारे से जुड़ी थी. तय ये हुआ कि याया लापिड और नफ़्ताली बेनेट आधे-आधे समय तक पीएम बनेंगे. पहले हिस्से में बेनेट और दूसरे हिस्से में लापिड.
सरकार तो बन गई. लेकिन इसमें शुरुआत से ही कई पेच थे. मसलन, सरकार में शामिल पार्टियां सेम पेज पर नहीं पहुंच पा रहीं थी. जिसके कारण संसद से ज़रूरी कानून पास कराने में मुश्किल आने लगी. इसको लेकर गठबंधन के अंदर विद्रोह पैदा हुआ. आख़िरकार, जून 2022 में बेनेट और लापिड को ऐलान करना पड़ा कि अब साथ रहना मुश्किल है. उन्होंने संसद भंग करने का फ़ैसला किया. किसी भी पार्टी के पास ज़रूरी बहुमत नहीं था. इसके बाद राष्ट्रपति ने नए चुनाव के लिए एक नवंबर की तारीख़ तय की.
वोटिंग भारतीय समय के अनुसार सुबह साढ़े दस बजे शुरू हुई थी और रात डेढ़ बजे तक चलेगी. उस समय इज़रायल में रात के दस बज रहे होंगे. चूंकि वोटिंग बैलेट पेपर से होती है. इसलिए गिनती करने में थोड़ा अधिक टाइम लगता है. अंतिम नतीजा घोषित करने के लिए 09 नवंबर की डेडलाइन दी गई है. हालांकि, उससे पहले ही शुरुआती रुझान मिलने लगेंगे.
इस बार के चुनाव में क्या दांव पर लगा है?- पहली बात, इज़रायली वोटर्स पिछले चार बरस में पांचवी बार वोट डाल रहे हैं. लोग राजनैतिक अस्थिरता से परेशान हैं. इतने चुनावों के बाद भी उन्हें एक स्थायी सरकार हासिल नहीं हो पाई है. इस वजह से लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया में उनकी आस्था कम हो रही है.
- दूसरी बात, पिछले कुछ समय में इज़रायल में अति-राष्ट्रवादी और कट्टर धड़ा पनपा है. ज्युइश पार्टी के बेन-ग्विर किंगमेकर बनकर उभरे हैं. बेन-ग्विर इज़रायल के क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में रहते हैं. वो नस्लभेद को बढ़ावा देने, प्रॉपर्टीज़ को तबाह करने, प्रतिबंधित साहित्य रखने के आरोप में दोषी साबित हो चुके हैं. वो इज़रायल-विरोधी अरब नागरिकों को निर्वासित करने की मांग करते रहे हैं. अगस्त 2022 में एक रेडियो स्टेशन के सर्वे में सामने आया था कि दो-तिहाई इज़रायली नागरिक इस मांग का समर्थन करते हैं. इस चुनाव में इस समर्थन का असर दिखेगा.
जानकारों का कहना है कि नेतन्याहू ने अपने कट्टर बयान कम किए हैं. उन्होंने इसकी ज़िम्मेदारी बेन-ग्विर को सौंप दी है. नेतन्याहू के कहने पर ही बेन-ग्विर ने नेशनल यूनियन पार्टी के साथ मर्ज़र किया था. 2021 के चुनाव में उनकी पार्टी संसद भी पहुंची. इस बार उनका प्रभाव-क्षेत्र बढ़ा है. कहा जा रहा है कि अगर नेतन्याहू, बेन-ग्विर के साथ सरकार बनाने में सफल हुए तो इसका असर दूसरे देशों के साथ रिश्ते पर पड़ सकता है.
- तीसरी बात, नेतन्याहू पर फ़्रॉड और ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट के कई मुकदमे चल रहे हैं. अगर उन्हें जीत मिली तो वो अपने ऊपर लगे चार्जेज़ हटवाने की पूरी कोशिश करेंगे. आशंका है कि वो न्यायपालिका की शक्तियां कम करने के लिए कानून बनवा सकते हैं.
- चौथी बात, रिपोर्ट्स हैं कि रूस और ईरान के बीच ड्रोन्स को लेकर सीक्रेट डील हुई है. ईरान, इज़रायल के सबसे बड़े दुश्मनों में से है. दूसरी तरफ़, इज़रायल, रूस के साथ युद्ध में यूक्रेन की मदद करने की योजना बना रहा है. अभी तक इज़रायल इससे अलग-थलग रहा है. नई सरकार को इसपर ठोस फ़ैसला लेना होगा. इसी के आधार पर इज़रायल के अंतरराष्ट्रीय हित भी निर्धारित होंगे.
इन सबके अलावा, वेस्ट बैंक और गाज़ा पट्टी में होने वाली हिंसा, अरब देशों के साथ रिश्ते और इज़रायली नागरिकों की सुरक्षा जैसे मुद्दे भी चुनावी नतीजों पर असर डालेंगे.
अब सवाल ये आता है कि नेतन्याहू की वापसी की कितनी संभावना है?
मीडिया रपटों के मुताबिक, अधिकतर पोल्स में नेतन्याहू गठबंधन को बहुमत के करीब दिखाया गया है. आंकड़ों के अनुसार, उनके गठबंधन को लगभग 60 सीटें मिल सकती हैं. उनकी विरोधी पार्टियां को 56 सीटें मिलने की उम्मीद है. बाकी की चार सीटें पर दो अरब पार्टियों का दावा है. दोनों ने किसी भी गठबंधन में शामिल होने से इनकार कर दिया है. अगर नतीजे वैसे ही आए, जैसा कि पोल्स में दिखाया गया है, तब फिर से किसी के लिए सरकार बनाना मुश्किल होगा. जैसा कि हमने बताया, सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की दरकार होती है.
अगर मामला डेडलॉक में फंसा तो फिर अगले चुनाव की तैयारी करनी होगी. तब तक के लिए याया लापिड केयरटेकर प्रधानमंत्री की भूमिका निभाते रहेंगे. और, नेतन्याहू सत्ता से दूर रह जाएंगे.
अब अगले सवाल की तरफ़ चलते हैं.
अगर किंग बीबी नाकाम रहे तो उनका क्या होगा?इज़रायल के अख़बार जेरूसलम पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, इस बार के आम चुनाव में लिकुड पार्टी का सब्र भी दांव पर है. नेतन्याहू 2005 से पार्टी के लीडर हैं. उससे पहले उन्होंने 1990 के दशक में कुछ समय तक पार्टी की कमान संभाली थी. वो 11वीं बार लिकुड पार्टी की लिस्ट में हैं. पांच बार वो सरकार बनाने में कामयाब रहे, जबकि पांच बार उन्हें नाकामी मिली. तीन नाकामियां तो 2019 से अब तक मिल चुकीं है. अगर असफलता का सिलसिला जारी रहा तो पार्टी उन्हें ठिकाने भी लगा सकती है. कहा जा रहा है कि लिकुड पार्टी के अंदर ये धारणा बढ़ती जा रही है कि नेतन्याहू के रहते सत्ता में उनकी वापसी असंभव है. इस धारणा को एक और धक्का लगा तो कुछ भी हो सकता है.
पिछले कुछ चुनावों से जिस तरह की गठबंधन सरकारें बन रहीं हैं, वो बहुत उम्मीद नहीं जगाता. सत्ताधारी गठबंधन 61 से 63 सीटों के बीच झूलता रहा है. ऐसे में एक से दो सांसदों की नाराज़गी भी पूरी सरकार को ख़तरे में डाल देती है. हो सकता है, नेतन्याहू सरकार बना लें, लेकिन उनके लिए इसे लंबे समय तक चलाते रहना मुश्किल होगा. अगर वो इस मुसीबत से भी पार पा लेते हैं तो ये किसी चमत्कार से कम नहीं होगा.
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