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अरब मुसलमानों की नागरिकता छीनने वाला इज़रायल का नस्लभेदी कानून!

इज़रायल ने नागरिकता छीनने वाला कानून क्यों बनाया?

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इज़रायल ने नागरिकता छीनने वाला कानून क्यों बनाया?
इज़रायल ने नागरिकता छीनने वाला कानून क्यों बनाया?
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साजिद खान
16 फ़रवरी 2023 (अपडेटेड: 16 फ़रवरी 2023, 09:24 PM IST)
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मुल्क़ से बाहर भेज देने की चेतावनी सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है. इसका वैध और अवैध इस्तेमाल और भी कई देशों में होता रहता है. इज़रायल की संसद ने तो इस पर बाकायदा एक कानून बना दिया है. इसके तहत, आतंकी गतिविधियों में शामिल लोगों की नागरिकता छीनी जाएगी. और, उन्हें वेस्ट बैंक और गाज़ा पट्टी में डिपोर्ट कर दिया जाएगा. हालांकि, इस कानून के दायरे में सिर्फ़ अरब नागरिकों को रखा गया है. बाकियों को इससे छूट रहेगी. देश के प्रति वफ़ादारी के आधार पर नागरिकता तय करेगाकानून के जानकारों का कहना है कि, ये इंटरनैशनल लॉ के ख़िलाफ़ है. लेकिन वो इज़रायल ही क्या, जो इसकी परवाह करे!

तो आइए जानते हैं,

इज़रायल ने नागरिकता छीनने वाला कानून क्यों बनाया?
और, इज़रायल-फ़िलिस्तीन विवाद पर इसका क्या असर होगा?

इज़रायल में एक ऐसा कानून लाया गया है, जो देश के प्रति वफ़ादारी के आधार पर नागरिकता तय करेगा. इस कानून के तहत, अगर कोई अरब नागरिक इज़रायल-विरोधी कामों में लिप्त पाया गया, तो उसकी नागरिकता छीन ली जाएगी. इतना ही नहीं, उसे इज़रायल से निर्वासित भी कर दिया जाएगा. ऐसी स्थिति में उसे फ़िलिस्तीनी अथॉरिटी के नियंत्रण वाले वेस्ट बैंक या हमास के कंट्रोल वाले गाज़ा पट्टी में भेज दिया जाएगा. फिलहाल, वेस्ट बैंक के 40 प्रतिशत से अधिक हिस्से पर इज़रायल का नियंत्रण है. डिपोर्ट किए गए लोगों को इस इलाके में रहने का हक़ भी नहीं मिलेगा.

इस बिल को लेकर कुछ सवाल उठते हैं,
मसलन,
इज़रायल की सरकार देश के प्रति वफादारी को किस तरह डिफाइन करेगी?
किन लोगों को नागरिकता छिनने का सबसे ज़्यादा डर है?
और, ये कानून लाने की ज़रूरत क्यों पड़ी?

एक-एक कर समझते हैं.
इज़रायल की आबादी लगभग 95 लाख है. इनमें से लगभग 74 प्रतिशत यहूदी हैं. जबकि 21 प्रतिशत के आसपास अरब हैं. वे इस्लाम के अनुयायी हैं. अधिकतर अरब मुस्लिम ख़ुद को फ़िलिस्तीनी मानते हैं. वे एक देश के तौर पर फ़िलिस्तीन की स्थापना का समर्थन भी करते हैं.

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इज़रायल का झंडा थामे कुछ इज़रायली नागरिक 

नए कानून के तहत, अगर कोई अरब, इज़रायल के ख़िलाफ़ आतंकी गतिविधि में शामिल होता है या फ़िलिस्तीनी अथॉरिटी से फंडिंग लेता है, तो उसे देश-विरोधी माना जाएगा. ऐसे लोगों की नागरिकता छीन ली जाएगी. ये कानून इज़रायल में रहने वाले अरब मुस्लिमों और कब्जे वाले ईस्ट जेरुस्सलम के स्थायी निवासियों दोनों पर लागू होगा. ईस्ट जेरूसलम पर इज़रायल ने 1967 में क़ब्ज़ा किया था. वहां रहने वाले फ़िलिस्तीनियों को परमानेंट रेसीडेंसी का अधिकार मिला हुआ है. लेकिन वे इसका विरोध करते हैं.

इसका विरोध क्यों हो रहा है?

इसकी तीन बड़ी वजहें हैं.

- नंबर एक. कानून की उलझी व्याख्या. मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि सरकार वफादारी को किसी भी तरह से डिफाइन कर सकती है. और, इसके आधार पर बेकसूर लोगों की नागरिकता छीन सकती है. कानूनी विशेषज्ञों ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताया है.

- नंबर दो. नस्ल के आधार पर भेद. नया कानून सिर्फ अरब मुस्लिमों पर लागू होता है. यहूदियों पर नहीं. इस कानून के आलोचकों का कहना है कि ये नस्लभेदी है. क्योंकि इसमें यहूदियों को शामिल नहीं किया गया है. उन्होंने 1995 में तत्कालीन प्रधानमंत्री यित्हाक राबिन की हत्या की याद भी दिलाई. राबिन की हत्या करने वाला एक यहूदी था. फिर भी ना तो उसकी नागरिकता छीनी गई और ना ही कभी इस पर चर्चा हुई.

- नंबर तीन. फ़ंडिंग. फिलिस्तीनी अथॉरिटी (PA) जेल में बंद कई फ़िलिस्तीनियों के परिवारों को मासिक भत्ता देती है. उनमें से कुछ इज़रायली नागरिकों की हत्या के दोषी भी हैं. PA दावा करती है कि वो ग़लत लोगों को पैसे नहीं देती. उनका कहना है कि हम बस समाजसेवा करते हैं. हम उन परिवारों को मदद देते हैं जिनके यहां के ज़िम्मेदार लोग जेल में बंद हैं. PA इस आरोप से इनकार करता है कि उसने किसी भी तरह की हिंसा भड़काने के लिए पैसे दिए हैं. इसको लेकर भी दोनों पक्षों में तनाव रहता है.

इज़रायल के पास नागरिकता छीनने वाला कानून पहले से मौजूद है. उसने ये कानून 2008 में ही बना लिया था. इसके तहत कुछ लोगों की नागरिकता छीनी भी गई थी. उस समय इज़रायल के सुप्रीम कोर्ट ने इसकी निंदा भी की थी और कहा था कि जिस व्यक्ति की नागरिकता रद्द कर दी गई है, उसे इज़रायल में रहने के लिए स्थायी परमिट दिया जाना चाहिए, ताकि वे स्टेटलेस ना हों.

अब सवाल आता है कि नए कानून की ज़रूरत क्यों पड़ी?

पिछले कई महीनों से इज़रायल और फ़िलिस्तीनी गुटों के बीच हिंसक झड़पें बढ़ी हैं. पिछले साल इज़रायल के अंदर कई आतंकी घटनाएं भी हुईं. अधिकतर हमलावर वेस्ट बैंक में बने रेफ़्यूजी कैंपों से आए थे. वहां पर PA का नियंत्रण है. इज़रायल ने दोषियों को पकड़ने के लिए कार्रवाई की. उन्होंने कैंपों में घुसकर ऑपरेशंस भी चलाए. इसमें कई फ़िलिस्तीनियों की मौत हुई. जिसके कारण तनाव बढ़ता गया. फिर दिसंबर 2022 में बेंजामिन नेतन्याहू सत्ता में वापस लौटे. उनकी सरकार में कई कट्टर पार्टियां शामिल हैं. वे फ़िलिस्तीन को नक़्शे से मिटा देने का दम भरती हैं. नई सरकार ने कार्रवाई तेज़ की. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां कम करने की कोशिश की. इसका जमकर विरोध हो रहा है. नई सरकार पूरे वेस्ट बैंक पर क़ब्ज़ा करने का इरादा भी रखती है. इसके लिए उन्हें अपने यहां के लोगों का समर्थन भी चाहिए. जानकारों का कहना है कि नया कानून इसी दिशा में बढ़ाया गया एक कदम है.

हालिया हिंसा के बाद इस प्रस्ताव को पर्याप्त आधार मिल चुका था. इसलिए, संसद में वोटिंग के दौरान 94 सांसदों ने पक्ष में वोट डाला. जबकि 10 सांसदों ने विरोध में मत दिया. इज़रायल सरकार ने कहा कि ये पीड़ित परिवारों को सुकून देगा. फ़िलिस्तीन अथॉरिटी ने कहा कि ये नस्लभेद का सबसे घटिया उदाहरण है. जानकार कहते हैं कि इसके बाद इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच एक बार फिर हिंसा बढ़ने के चांस हैं. 

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