जब ईरान ने अमेरिका को घुटनों पर ला दिया था
अमेरिका को बीच युद्ध अपने कट्टर दुश्मन को 1500 मिसाइलें क्यों भेजनी पड़ीं?

शीत युद्ध अंग्रेजी में कहें तो कोल्ड वॉर. ये मैदान में नहीं लड़ा जाता था. पूरी तरह एक कूटनीतिक और राजनीतिक लड़ाई होती थी, दो धड़ों के बीच. 1945 में दूसरे विश्व युद्ध के बाद यही हालात थे. तकरीबन 45 साल तक कोल्ड वॉर चला, अमेरिका और सोवियत संघ यानी रूस के बीच. लगभग सारे बड़े और अहम देश दो धड़ों में बंट गए थे, जिसे अपने हितों के हिसाब से जो खेमा बेहतर लगा, वो उससे सट गया.
कोल्डवॉर के समय एक पैटर्न देखने को मिलता था. किसी भी देश में अगर सत्ता के लिए संघर्ष शुरू हुआ तो वहां एक पक्ष को अमेरिका तो दूसरे को सोवियत संघ का पूरा समर्थन मिलता था. 1959 में अमेरिका के बगल में स्थित क्यूबा में क्रांति सफल हुई, क्रांति के सबसे बड़े झंडाबरदार थे कम्युनिस्ट नेता फिदेल कास्त्रो, क्रांति के समय उन्हें अमेरिका का पूरा सपोर्ट मिला था. लेकिन, जब वो सत्ता में आए तो सोवियत संघ की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के करीबी हो गए. फिर फिदेल अमेरिका को फूटी आँख नहीं सुहाए. अमेरिका को वो इतना अखरते थे कि 55 साल तक किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने क्यूबा में कदम नहीं रखा.
क्यूबा के बाद सोवियत संघ के सपोर्ट के चलते लैटिन अमेरिका के कई देशों में कम्युनिस्ट उभरने लगे. अमेरिका अपने बगल में ये सब कैसे होने देता. जिस भी मुल्क में कम्युनिस्ट आगे बढ़ते दिखाई देते, अमेरिका दूसरे पक्ष को पूरी मदद देता. पैसों और हथियारों की कोई कमी नहीं होने देता. दूसरी तरफ सोवियत संघ भी ऐसा ही करता.
1970 के बाद अमेरिका में कम्युनिस्टों का विरोध एक बड़ा मुद्दा बन गया था. इतना बड़ा कि वहां सरकारें इस मुद्दे पर बन जाती थीं. रिपब्लिकन पार्टी के रोनाल्ड रीगन ने इस मुद्दे को भुनाया और 1981 में अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए. रीगन ये कहकर चुनाव जीते थे कि दुनिया भर से और खासकर लैटिन अमेरिका से कम्युनिस्टों को बाहर कर देंगे. चुनाव प्रचार में बोला था तो उन्हें ऐसा करना भी था.
उस समय लैटिन अमेरिकी देश 'निकरागुआ' में भी गृहयुद्ध छिड़ा हुआ था. दो गुटों के बीच सत्ता के लिए हिंसक संघर्ष चल रहा था. कम्युनिस्ट ग्रुप 'सैंडिनिस्टा' जिसे क्यूबा और सोवियत संघ का समर्थन हासिल था, उसने महज दो साल पहले ही सत्ता हथियाई थी. 'सैंडिनिस्टा' के खिलाफ लड़ रहा था एंटी कम्युनिस्ट ग्रुप 'कॉन्ट्रास'. कॉन्ट्रास को अमेरिका का काफी समय से सपोर्ट था. कॉन्ट्रास कोकीन बेचकर भी अपने लिए फंड जुटाता था, कहा जाता था कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA कोकीन बिकवाने में भी उसकी मदद करती थी.
अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन कॉन्ट्रास से बहुत प्रभावित थे, उनका कहना था कि इस गुट के लीडर्स की विचार धारा अमेरिकी लोकतंत्र की नींव रखने वाले नेताओं के जैसी है. रीगन ने सत्ता में आते ही कॉन्ट्रास की मदद और बढ़ाने का ऐलान किया. लेकिन, वो उतनी भी मदद नहीं कर पाए, जितनी कॉन्ट्रास को पहले अमेरिका से मिल रही थी.
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अमेरिकी संसद ने गड़बड़ कर दी!इसके पीछे की वजह थी अमेरिकी संसद, जहां डेमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत था. और रीगन थे रिपब्लिकन. दोनों पार्टियों में 36 का आंकड़ा रहता है. अमेरिकी राष्ट्रपति के मौखिक ऐलान के बाद डेमोक्रेटिक सांसद फटाफट एक बिल ले आए. नाम था 'Boland Amendment'. इसमें कहा गया कि CIA और अमेरिकी रक्षा विभाग 'निकरागुआ' में लड़ रहे 'कॉन्ट्रास' ग्रुप की अब से कोई मदद नहीं करेंगे. अमेरिका उससे बिलकुल पल्ला झाड़ लेगा क्योंकि कॉन्ट्रास के नेता 'कोकीन' बेचते हैं.
अब रीगन क्या करते, माथा पकड़ लिया. आखिर अमेरिकी कानून के खिलाफ कैसे चले जाएं? लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट मैकफर्लेन को बुलाया, बोले- ‘चाहें कोई भी कीमत क्यों ना चुकानी पड़े, लेकिन कॉन्ट्रास की मदद होकर रहेगी.’ रॉबर्ट मैकफर्लेन उसी दिन से कोई रास्ता निकालने में लग गए.
फिर क्या रास्ता निकला और जो रास्ता निकला उसने कैसे दुनियाभर में अमेरिका की किरकिरी करा दी. इस पूरे घटनाक्रम में ईरान की क्या भूमिका रही? आ ये सब जानेंगे.
जब मिडिल ईस्ट में एक बड़ी घटना घटीइस घटना के करीब ढाई साल बाद साल 1985 में मिडिल ईस्ट में एक बड़ी घटना घटी. इसने रोनाल्ड रीगन की सरकार को मुश्किल में डाल दिया. हुआ ये कि ईरान के समर्थन वाले लेबनान के आतंकी गुट हिजबुल्लाह ने सात अमेरिकियों को किडनैप कर लिया. इसमें अमेरिकी अधिकारी और कॉन्ट्रक्टर्स भी शामिल थे. रीगन ने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट मैकफर्लेन से अधिकारियों को छुड़ाने के लिए कोई रास्ता निकालने को कहा.
मैकफर्लेन ने क्या रास्ता निकाला ये जानने से पहले, मिडिल ईस्ट की उस समय की राजनीति को थोड़ा समझ लेते हैं. क्योंकि आगे पूरी स्टोरी उससे जुड़ी है.
तब ईरान और अमेरिका की आपस में तनातनी चल रही थी. दरअसल, 1979 में हुई ईरान की इस्लामिक क्रांति में वहां के शासक शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को जनता ने पद से हटा दिया और आयतुल्लाह रुहोल्लाह ख़ोमैनी के हाथ में सबकुछ सौंप दिया. शाह मोहम्मद रज़ा अमेरिका के लाडले थे, तो अमेरिका ने उन्हें तुरंत अपने यहां शरण दे दी. ईरान के लोग चाहते थे कि अमेरिका शाह को वापस ईरान भेजे, जिससे नई सरकार शाह मोहम्मद को उनके अत्याचारों की सजा दे सके. पर अमेरिका नहीं माना. इससे दोनों देश एक-दूसरे के दुश्मन हो गए.
ईरान से सटा हुआ मुल्क है इराक. 1980 में इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने अचानक ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया, जो 1988 तक चला. अमेरिका का पूरा सपोर्ट सद्दाम को था, खूब हथियार दिए.
कुल मिलाकर उस समय मिडिल ईस्ट का सीन ये था कि इराक, अमेरिका और इजरायल एक साइड दिख रहे थे. दूसरी तरफ थे ईरान और लेबनान का हिजबुल्लाह गुट.
रॉबर्ट मैकफर्लेन ने ईरान से बात कीलेबनान में जब अमेरिकी अधिकारियों को किडनैप कर लिया गया तो राष्ट्रपति रीगन ने ये काम सौंपा था अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट मैकफर्लेन को. मैकफर्लेन ने ईरान से बात की. ईरान ने अमेरिकी अधिकारियों को छोड़ने के बदले अमेरिका से हथियार मांगें. जिससे वो इराक से लड़ सके. अब परेशानी ये थी कि अमेरिका में ईरान को हथियार बेचने पर सालों से पाबंदी लगी हुई थी. साथ ही राष्ट्रपति रीगन ये ऐलान कर चुके थे कि अमेरिका किडनैपर्स के आगे नहीं झुकेगा. ऐसे में ईरान को हथियार बेचने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था.
लेकिन, अमेरिकी सरकार ने दुनिया से छिपाकर ऐसा करने का फैसला ले लिया. न सिर्फ ऐसा किया, बल्कि इस आपदा में उसने एक अवसर भी ढूंढ लिया. वो अवसर था लैटिन अमेरिकी देश 'निकरागुआ' में लड़ रहे कॉन्ट्रास ग्रुप की मदद करने का.
अमेरिका ने 30 मिलियन डॉलर (उस समय करीब 40 करोड़ रुपए) में ईरान को 1500 मिसाइलें बेचीं. (वही ईरान जो उसका दुश्मन था और उस समय उसके ही एक सहयोगी इराक के खिलाफ युद्ध लड़ रहा था). अमेरिकी मिसाइलें मिलने के बाद ईरान के दोस्त हिजबुल्लाह ने अमेरिकी अधिकारियों को छोड़ दिया.
ईरान से अमेरिका को जो 30 मिलियन डॉलर मिले थे, इसमें पैसे को लेकर बड़ा खेल किया गया. खेल ये कि इसमें से 18 मिलियन डॉलर सीधे कॉन्ट्रास ग्रुप के पास पहुंचा दिए गए.
किसी को भनक तक नहीं लगी, फिर एक दिन…अमेरिका और ईरान के बीच चुपके-चुपके बड़ी डील हो चुकी थी. लेकिन अमेरिका में किसी को इसकी भनक तक नहीं थी.
फिर आया साल 1986, लेबनान के एक अखबार अल-शेरा में एक खबर छपी. पूरी दुनिया में तहलका मच गया. खबर में ईरान के साथ हुई पूरी डील की डिटेल थी. ये भी पता लगा कि ये पूरी डील करवाई थी इजरायल ने. इजरायल जो ईरान और हिजबुल्लाह का बड़ा दुश्मन कहा जाता था.
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इजरायल ने ये सब इसलिए करवाया, क्योंकि उसे लगता था कि अगर ईरान को अमेरिकी हथियार मिल गए तो उसका इराक के साथ युद्ध लंबा खिंचेगा. ऐसे में उसका दुश्मन देश ईरान कहीं और बिजी रहेगा और उसकी टेंशन कम रहेगी. इसे पूरे मामले को नाम दिया गया 'ईरान-कॉन्ट्रा स्कैंडल'.
बहरहाल जब मामला खुला तो राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने हाथ खड़े कर दिए. बोले- 'मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानता, मैंने कोई डील नहीं की.' यूएस कांग्रेस ने इस पूरे मामले की जांच शुरू की. जांच के दौरान ही राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के लेफ्टिनेंट कर्नल ओलिवर नॉर्थ सामने आए, स्वीकार किया कि 'निकरागुआ' के कॉन्ट्रास ग्रुप को पैसा उन्होंने ही भेजा था. नॉर्थ बोले- 'इस बारे में राष्ट्रपति रीगन को पूरी जानकरी थी.'
किसे-किसे जेल जाना पड़ा?1987 में जांच पूरी हुई. यूएस कांग्रेस की जांच में कहा गया कि राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के नीचे काम करने वाले अफसरों का दोष था, राष्ट्रपति इस डील से नहीं जुड़े थे, उनकी केवल ये गलती थी कि वो अपने अफसरों पर नजर नहीं रख पाए. इस मामले में रीगन के रक्षा मंत्री कैस्पर डब्लू वीनबर्गेर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट मैकफर्लेन, उप सुरक्षा सलाहकार जॉन पॉइनडेक्चर, कर्नल ओलिवर नॉर्थ को दोषी ठहराया गया. इसके अलावा CIA के चार अफसर और 5 अमेरिकी कॉन्ट्रेक्टर को भी दोषी पाया गया. इस मामले में 7 अप्रैल 1990 में उप सुरक्षा सलाहकार जॉन पॉइनडेक्चर को दो साल की सजा सुनाई गई थी. इतनी ही सजा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट मैकफर्लेन को भी बोली गई.
रोनाल्ड रीगन के डिप्टी यानी उपराष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू एच बुश 1988 में अमेरिका के राष्ट्रपति बने. बुश ने रक्षा मंत्री कैस्पर डब्लू वीनबर्गेर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट मैकफर्लेन को माफी दे दी. कर्नल ओलिवर नॉर्थ और जॉन पॉइनडेक्चर के खिलाफ अपर कोर्ट ने केस खारिज कर दिया.
यानी अंत में नतीजा ये रहा कि जिस स्कैंडल ने दुनियाभर में अमेरिका की थू-थू करवाई, उसमें सजा से सभी बड़े-बड़े लोग बच निकले.
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