आने वाले साल 2022 आपको इन चीज़ों पर नज़र रखनी चाहिए
2022 की ये घटनाएं दुनिया बदल देंगी.
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2022 की ये घटनाएं दुनिया बदल देंगी.
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छुट्टी की घंटियों में बेहिसाब आकर्षण होता है. टन, टन, टन… तीन टन के बाद नृत्य शुरू हो जाता है. उसके बाद का प्रोसेस तो जगजाहिर है. एक दिन की बात है. घंटी बजी. हम बस्ते को गर्दन से दबोचे क्लास से बाहर निकले. साइकिल उठाई. भागे. उस दिन पड़ोस के गांव से क्रिकेट का मैच तय हुआ था. जीतने पर 51 रुपये का इनाम मिलने वाला था. ब्रेक में गरमागरम समोसा भी.
पनिया चुकी जीभ और बस्ता भर अरमान लिए पैडल घुमाते हम निकले. मगर रास्ते में हवा निकल गई. साइकिल की. उस ज़माने में ना फ़ोन था, ना इत्ते साधन कि ख़बर ही कर दें. हमारा नाश्ता छेंके रहना. दोस्त लोग गायब हो चुके थे. उस दिन किस्मत पर बहुतै गुस्सा आया. सच्ची बता रहे हैं. लगा कि पूरी दुनिया का दुख हमारे सिर पर गिर पड़ा है.
इत्ते में आई आवाज़. पंचर वाली दुकान से.
बे-कैफ़ था दिसंबर, जज़्बात मर चुके थे
मोसम था सर्द उसमें, अरमां बिखर चुके थे
महीना दिसंबर का ही था. मौसम सर्द था. अरमां भी बिखर चुके थे. हमें लगा ये आदमी हमारा दुख पहचानता है. बड़े समय के बाद पता चला, वो अल्ताफ राजा था. हमारी दबी इच्छाओं का राज़दार भी. वक़्ता भी.
जब वो गाता. कलेजे में 440 वोल्ट का करंट दौड़ने लगता.
लेकिन ये क्या बताऊं, अब हाल दूसरा है
अरे वो साल दूसरा था, ये साल दूसरा है.
ये आहट दूसरे साल की ही है. कल के ऐपिसोड में हमने 2021 का सार सुनाया था. आज हम बताएंगे, आने वाले बरस यानी 2022 में किन चीज़ों पर हमारी नज़र रहेगी?
आगे चलने से पहले एक ज़रूरी सूचना सुन लीजिए.
दुनियादारी के इस ऐपिसोड के पार्टनर हैं, कुकु एफ़एम. यहां आपको इतिहास, राजनीति, साहित्य, दर्शन, सिनेमा समेत कई विधाओं में ऑडियोबुक्स का खज़ाना मिलता है. ऑडियोबुक्स माने बोलने वाली किताबें. नया साल नजदीक है. हम उम्मीद करते हैं कि ये साल आपके ज्ञान के भंडार को और समृद्ध बनाए. नए साल के मौके पर कुकु एफ़एम आपके लिए एक ख़ास ऑफ़र लेकर आए हैं. प्रीमियम सब्सक्रिप्शन पर 50 फीसदी की छूट. करना बस इतना है कि सब्सक्रिप्शन लेते समय NY50 का कोड डालना है. ध्यान रहे, ये ऑफ़र 01 जनवरी 2022 तक के लिए ही है.
इस बारे में और जानकारी चाहिए तो डिस्क्रिप्शन में दिए लिंक पर पहुंचिए.
सूचना समाप्त. अब आगे.
हिब्रू भाषा में एक लोकोक्ति चलती है.
Hope for a miracle, but don’t rely on it.
यानी, चमत्कार की उम्मीद रखो, मगर उसके भरोसे मत बैठो.
जैसा कि कोरोना के मामले में हुआ है. नए साल में कोरोना को हराने का जश्न मनाने की तैयारी चल रही थी. लेकिन ओमिक्रॉन वेरिएंट ने बीच में माहौल बिगाड़ दिया. अब अगले साल की चाबी भी कोरोना की जेब में है. उसे ही सब तय करना है.
ओमिक्रॉन को लेकर हुए शुरुआती रिसर्च उम्मीद जगाते हैं. मसलन, टीकाधारकों पर इसका बहुत असर नहीं होता. संक्रमित होने पर लक्षण सामान्य रहते हैं. अधिकांश लोगों को अस्पताल जाने की ज़रूरत नहीं होती आदि.
ये सुनने-पढ़ने में सुखद है. लेकिन ये पूरी पिक्चर नहीं है. अभी कई सवालों के जवाब आने बाकी हैं.
जैसे, जिन देशों में वैक्सीनेशन प्रोग्राम शुरुआती चरण में है, वहां ओमिक्रॉन कितना घातक होगा?
अमेरिका और यूरोप में ओमिक्रॉन ड्राइविंग सीट पर बैठ चुका है. क्या हेल्थ सिस्टम इस दबाव को झेलने के लिए तैयार है? खासकर विकासशील और अल्प-विकसित देशों में.
एक सवाल ये भी है कि क्या लॉकडाउन ही बचाव का इकलौता उपाय है?
इन सवालों के अलावा वैक्सीन असमानता का मुद्दा भी ज़ोर पकड़ने वाला है. WHO ने 2021 के अंत तक सभी देशों में कम-से-कम 40 फीसदी आबादी को वैक्सीन लगाने का लक्ष्य तय किया था. 194 सदस्य देशों में से 92 देश इस लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाए. अब WHO ने जून 2022 तक 70 फीसदी आबादी को वैक्सीनेट करने के लिए कहा है. इसका बड़ा दारोमदार विकसित देशों पर है.
अमीर देश वैक्सीन के स्टॉक पर से कुंडली हटाएं तो बात बने. वरना, नए वेरिएंट्स आते रहेंगे. महामारी की उम्र लंबी होती रहेगी.
ये दुखद सत्य है. कोरोना 2022 में भी दुनिया को प्रभावित करने वाला है.
कोरोना के बाद रूस और यूक्रेन का झगड़ा चर्चा में रहने वाला है. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूक्रेन को हथियाने के मूड में हैं. उन्होंने बॉर्डर पर एक लाख से ऊपर की सेना ज़मा कर रखी है. गोला-बारूद के साथ. रूस, यूक्रेन को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है. ये ऐतिहासिक पहलू है. राजनैतिक वजह नाटो और यूरोपियन यूनियन से नजदीकी से जुड़ी है. रूस की शर्त है कि यूक्रेन नाटो से दूर ही रहे. पश्चिमी देशों से लेने वाली सैन्य सहायता बंद करे. तभी वो अपने सैनिक बॉर्डर से हटाएगा.
अगर यूक्रेन पर रूस का नियंत्रण हुआ तो यूरोपीय देशों को ख़तरा होगा. अगर पश्चिमी देशों का सहयोग आया तो रूस को ख़तरा होगा. यूक्रेन इन्हीं दो ख़तरों के बीच में पिस रहा है. सात साल से चल रहे गृहयुद्ध में 14 हज़ार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं.
अमेरिका हालिया विवाद में में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन इस मसले पर पुतिन से बात भी कर चुके हैं. लेकिन पुतिन अपने स्टैंड पर कायम हैं. साल की शुरुआत में अमेरिका और रूस फिर से बैठकर चर्चा करेंगे.
रूस-यूक्रेन का मसला विश्वयुद्ध की वजह भी बन सकता है. नए साल में आशंका बलवती है. युद्ध जितना टाला जाए, उसी में दुनिया की भलाई है.
अगर भलाई का मूड ना हो तो नेताओं को आस-पास का नज़ारा ज़रूर देखना चाहिए. इथियोपिया का सिविल वॉर सजीव उदाहरण है. नवंबर 2020 में शुरू हुआ गृहयुद्ध अभी तक नहीं थमा है. रेप, हत्या, टॉर्चर, पलायन की घटनाएं दिनचर्या का हिस्सा बन चुकीं है. विडंबना ये है कि इस क़यामत का सूत्रधार नोबेल पीस प्राइज़ विनर है. इथियोपिया का प्रधानमंत्री एबी अहमद अली. 2022 में वो अपनी उपलब्धि का मान रख पाएंगे या नहीं, ये देखने वाली बात होगी.
तीसरा बड़ा मुद्दा चुनावों का होगा. 2022 में कई देशों में आम चुनाव होने वाले हैं. जिनमें उन देशों का भविष्य तय होने वाला है.
एक उदाहरण लीबिया का है. लीबिया में 2011 में मुअम्मार गद्दाफ़ी को सत्ता से बेदखल किया गया था. गद्दाफ़ी ने 42 सालों तक तानाशाही चलाई. उसके जाने के बाद लीबिया में सिविल वॉर शुरू हो गया.
फिर यूएन ने सभी पक्षों को बिठाकर बात कराई. मामला शांत हुआ. चुनाव कराने पर सहमति बनी. तमाम टालमटोल के बाद 24 दिसंबर 2021 की तारीख़ तय हुई. राष्ट्रपति चुनाव के लिए. लेकिन ऐन मौके पर चुनाव टाल दिए गए. कहा गया कि तैयारी पूरी नहीं है.
चुनाव आयोग ने अगली तारीख़ 24 जनवरी 2022 की सुझाई. संसद ने कहा, नहीं ब्रो. ये संभव नहीं है.
लीबिया में राष्ट्रपति चुनाव के एक महीने बाद संसदीय चुनाव की व्यवस्था की गई है. पार्टियों को डर है कि जो राष्ट्रपति बना, वो संसदीय चुनाव में धांधली करेगा. इसको लेकर टकराव शुरू हो गया है. नई तारीख़ तय नहीं हो पाई है. हालांकि, संभावना है कि अगले साल में चुनाव होकर रहेंगे. सिविल वॉर की विभीषिका से निकलने के लिए लीबिया में चुनाव बेहद ज़रूरी हैं.
अप्रैल महीने में फ़्रांस में राष्ट्रपति चुनाव होना है. दो चरणों में. अगर पहले में किसी कैंडिडेट को बहुमत नहीं मिला तो दूसरे चरण की वोटिंग कराई जाएगी. उसमें पहले चरण के दो टॉपर्स के बीच चुनाव होगा.
इस बार के चुनाव में तीन सबसे बड़े दावेदार हैं. इमैनुएल मैक्रों दूसरा कार्यकाल हासिल करने के लिए उतरेंगे. उनकी अप्रूवल रेटिंग बढ़ी हुई है.
दूसरी दावेदार मरीन ला पेन हैं. 2017 के चुनाव में वो मैक्रों से हार चुकीं है.
तीसरा नाम एरिक ज़िमौर का है. ज़िमौर कट्टर दक्षिणपंथी हैं. उन्हें फ़्रांस का डोनाल्ड ट्रंप कहा जा रहा है. टीवी की दुनिया से राजनीति में कदम रखने वाले ज़िमौर पर इस्लामोफ़ोबिया फैलाने के आरोप भी लगते हैं. उन्होंने चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. ज़िमौर को अच्छा-खासा समर्थन भी मिल रहा है. फ़्रांस पिछले कुछ समय से इस्लामिक आतंकियों के निशाने पर रहा है. ज़िमौर इसका फायदा उठाना चाहते हैं. फ़्रांस का चुनाव शरणार्थियों को लेकर यूरोप की रणनीति तय करने वाला होगा.
अगले साल फ़िलिपींस और ब्राज़ील में भी राष्ट्रपति चुनाव होना है. फ़िलिपींस में मई जबकि, ब्राज़ील में अक्टूबर में. दोनों देशों में बौराये शासकों का राज चल रहा है. फ़िलिपींस में राष्ट्रपति दुतर्ते पर वॉर ऑन ड्रग्स में बेगुनाह बच्चों को मारने का आरोप है. उन पर अदालती कार्रवाई की तलवार लटक रही है. फ़िलिपींस के संविधान के अनुसार, दुतर्ते फिर से चुनाव में खड़े नहीं हो सकते. इसलिए, उन्होंने अपनी बेटी को खड़ा किया है. ताकि वो सज़ा पाने से बचे रहें.
इसी तरह ब्राज़ील में जाएर बोल्सोनारो भी हैं. कोरोना महामारी के दौरान बेतुकेपन में उनका मुक़ाबला ट्रंप से था. बोल्सोनारो महामारी को रोक पाने में बुरी तरह नाकाम रहे. ब्राज़ील में कोरोना से लगभग सात लाख लोग मर चुके हैं. इसके बावूजद बोल्सोनारो अपनी ज़िद पर अड़े रहे. सेनेट की एक कमिटी उन पर कई आपराधिक चार्जेज़ भी लगाए हैं. जनता का एक धड़ा भी उनके ख़िलाफ़ है. उन्होंने बोल्सोनारो के ख़िलाफ़ रैलियां की हैं. अगर अगले साल के चुनाव में बोल्सोनारो हार जाते हैं तो उनका जेल जाना तय माना जा रहा है.
अफ़ग़ानिस्तान का मानवीय संकट भी अगले साल चर्चा में रहने वाला है. तालिबान के क़ब्ज़े के बाद से लोगों का जीना दूभर हो गया है. अफ़ग़ानिस्तान के फ़ॉरेन रिजर्व को फ़्रीज़ कर दिया गया है. विदेश से आने वाली मदद सूख गई है. यूनिसेफ़ की एक रिपोर्ट के अनुसार, अफ़ग़ानिस्तान की आधी आबादी को तत्काल मदद की ज़रूरत है. भुखमरी और कुपोषण से बचाने के लिए.
क्लाइमेट चेंज़ अपना रूप दिखाना शुरू कर चुका है. वैज्ञानिकों का कहना है कि नए साल में प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता लगातार बढ़ेगी. यानी, तूफ़ान, बुशफ़ायर, बाढ़ जैसी आपदाओं की संख्या बढ़ती जाएगी. द्वीपीय देशों के लिए अस्तित्व बचाए रखना और मुश्किल होने वाला है.
खेलों की बात करें तो 2022 में विश्व-स्तर के दो बड़े आयोजन होने हैं. फ़रवरी में बीजिंग में विंटर ओलंपिक्स खेले जाएंगे. विंटर ओलंपिक्स शुरू होने से पहले ही बहिष्कार शुरू हो चुका है. इसकी शुरुआत अमेरिका ने की. वो विंटर ओलंपिक्स का डिप्लोमैटिक बहिष्कार कर रहा है. यानी, खिलाड़ी जाएंगे, लेकिन सरकारी अधिकारी नहीं. अमेरिका ने इस फ़ैसले की वजह बताई, शिनजियांग में उइगर मुस्लिमों के नरसंहार को.
अमेरिका के ऐलान के बाद ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जापान ने भी डिप्लोमैटिक बहिष्कार का फ़ैसला किया है. आने वाले समय में देशों की संख्या बढ़ सकती है.
ये बहिष्कार चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए चुनौती बन रहा है. अक्टूबर 2022 में चाइनीज़ कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) का 20वां पीपुल्स कांग्रेस आयोजित होने वाला है. इसमें अगले पांच बरस के लिए पार्टी और देश की लीडरशिप तय की जाएगी. शी जिनपिंग का दूसरा कार्यकाल मार्च 2023 में खत्म हो जाएगा. उनकी उम्र तब तक 68 पार हो जाएगी. CCP ने 68 की उम्र को रिटायरमेंट के लिए तय रखा है. जिनपिंग टर्म लिमिट को पहले ही खत्म कर चुके हैं. उम्र की बाध्यता से उन पर कोई असर पडे़गा, इसकी कम ही संभावना है.
जानकारों की मानें तो विंटर ओलंपिक्स के बहिष्कार से चीन की छवि को नुकसान पहुंच रहा है. इसका सीधा संबंध शी की इमेज से है. अगर वो इसे साधने में नाकाम रहे तो पार्टी के भीतर उनके ख़िलाफ़ विद्रोह खड़ा हो सकता है. ऐसे में उनका तीसरा कार्यकाल ख़तरे में पड़ जाएगा.
अगले बरस का दूसरा बड़ा स्पोर्ट्स टूर्नामेंट फ़ुटबॉल का है. 2022 में फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप क़तर की राजधानी दोहा में खेला जाएगा. 12 नवंबर से 18 दिसंबर तक. पहली बार फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप की मेज़बानी मिडिल-ईस्ट के किसी देश के पास आई है. इसे सफ़ल बनाना क़तर के लिए बड़ी चुनौती है. ये क़तर के साथ-साथ पूरे मिडिल-ईस्ट का भविष्य तय कर सकता है.
विंटर ओलंपिंक्स और फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप के अलावा भी कई बड़े आयोजन अगले साल होंगे. एशियन गेम्स सितंबर में चीन में खेले जाएंगे. कॉमनवेल्थ गेम्स जुलाई-अगस्त महीने में बर्मिंघम में आयोजित किए जाएंगे. पहली बार कॉमनवेल्थ में वीमेंस टी-20 क्रिकेट को शामिल किया गया है. अगले साल ही वीमेंस क्रिकेट वर्ल्ड कप न्यू ज़ीलैंड में जबकि मेंस टी-20 वर्ल्ड कप ऑस्ट्रेलिया में खेला जाना है.
म्यांमार में सैन्य शासन की बात हो या तानाशाहों के सनक की या फिर किसी सुदूर मुल्क़ में इतिहास पलटने की, दुनियाभर की सभी बड़ी ख़बरों पर हमारी नज़र बनी रहेगी. आप बने रहिए लल्लनटॉप के साथ.
अल्ताफ़ राजा से शुरुआत हुई थी. सोनू निगम के साथ गाए उन्हीं के एक गाने की याद आ रही है,
मस्तियां हैं बेखुदी है
चाहतों का जाम है
ना तो कोई बेबसी है
ना तो कोई काम है
दिन है ऐतबार का मज़ा लीजिए
थोड़ा इंतज़ार का मज़ा लीजिए.

