सरकारी बैंक निजी हाथों में बिक जाएंगे तो असली फायदा किसे होगा?
सरकारी बैंकों के कर्मचारी हड़ताल पर क्यों हैं?
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सरकारी बैंकों के कर्मचारी हड़ताल पर क्यों हैं?
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देश भर के सरकारी बैंकों के कर्मचारियों द्वारा दो दिन की हड़ताल पर हैं दो दिन हड़ताल होगी. काम नहीं होगा. आधे दिन का काम होगा. फिर एक दिन की छुट्टी पड़ जाएगा. लाज़मी है कि आपके चेक धीमे क्लीयर होंगे. पासबुक एंट्री नहीं हो पाएगी. किसी ज़रूरी काम के लिए अपनी एफडी तुड़वाना चाहते होंगे, वो काम अगले हफ्ते पर चला जाएगा.
लोन की दरख्वास्त और कुछ दिन लटकी रहेगी. तो ये बात किसी भी अगर और मगर के परे है कि इस हड़ताल से आपको दिक्कत होगी. और बहुत होगी. 9 लाख लोग हड़ताल पर जाने को मजबूर हुए हैं. देश के अलग अलग सरकारी बैंकों में कर्मचारियों और अधिकारियों की यूनियनों ने इस हड़ताल को समर्थन दिया है. सभी की मांग है कि मोदी सरकार बैंकों के निजीकरण के अपने फैसले को वापस ले ले.
याद कीजिए इस साल का बजट भाषण. वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि सरकार दो बैंकों का मॉनेटाइज़ेशन करेगी. मॉनेटाइज़ेशन के लिए हिंदी में मौद्रिकरण शब्द इस्तेमाल होता है. लेकिन सादी भाषा में आप इसे प्राइवेटाइज़ेशन भी कह सकते हैं. मतलब सरकार इन बैंकों में अपनी हिस्सेदारी को निजी हाथों में देगी. इसके बदले पैसे लेगी. इसीलिए और सादी भाषा में ये कहा जा सकता है कि सरकार इन बैंकों को बेच रही है.
कौनसे दो बैंक बिकने वाले हैं, इसपर बजट भाषण में कोई जानकारी नहीं थी. लेकिन इस साल नवंबर तक ये बात बाहर आ गई थी कि ये दो बैंक होंगे सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज़ बैंक.
ये काम इतना आसान भी नहीं है कि ठेका खुलवाया और बोलियां मंगवा लीं. इसके लिए विधायी कदम उठाए जा रहे हैं. और ऐसा क्यों है, इसके लिए आपको देश के बैंकिंग इतिहास पर एक छोटू सा क्रैश कोर्स करवाते हैं. -
देश जब आज़ाद हुआ, तब बैंकिंग बहुत बड़ा सेक्टर नहीं था. भारत में कर्ज़ रिश्तेदारों या साहूकारों से ही लेने की परंपरा थी. देश में बैंक थे. लेकिन वो ज़्यादातर बड़े शहरों में ही होते थे.
जहां जहां अंग्रेज़ शासन मज़बूत रहा, वहीं आधुनिक बैंक भी खुले. मिसाल के लिए बॉम्बे, मद्रास और कलकत्ता प्रेसिडेंसी. देहाती इलाकों में बैंक नहीं थे. नियमन के अभाव में निजी बैंक अपने तरीके से बैंकिंग सेवाएं देते थें और एक सिलसिल चल पड़ा था जिसमें बैंक खुलते.
लोग अपने जीवन भर की पूंजी उनमें जमा करवाते. और फिर किसी वजह से बैंक डूब जाता. भारतीय रिज़र्व बैंक की 2006-2008 के बीच आई एक रिपोर्ट बताती है कि 1947 से लेकर 1955 तक 361 बार बैंक डूबे. और इसके साथ लोगों की पूंजी और भरोसा भी.
1955 में जाकर सरकार State Bank of India Act,
1955 लाई, जिसका मकसद था इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया को राष्ट्रीयकृत करना. माने नेशनलाइज़ करना. सरकार चाहती थी कि एक बैंक कस्बाई और ग्रामीण इलाकों में जाकर अपनी शाखाएं खोले ताकि वहां की आबादी को भी आधुनिक बैंकिंग का लाभ मिल सके.
इसी मकसद के साथ इंपीरियल बैंक को भारतीय स्टेट बैंक बना दिया गया. बावजूद इसके 1970 आते आते भी देश के बैंकों में जमा कुल 44 फीसदी पैसा और बैंकों का दिया कुल 60 फीसदी कर्ज़ सिर्फ पांच शहरों से था - बंबई, कलकत्ता, दिल्ली, मद्रास और अहमदाबाद. इसका एक ही मतलब था, कि बैंकिंग भारत जैसे महादेशीय विस्तार वाले देश के बड़े इलाके में नहीं पहुंची थी.
यही सब देखते हुए इंदिरा गांधी सरकार ने जुलाई 1969 में अध्यादेश निकालकर भारत के 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया. इस अध्यादेश को 1970 में कानून की शक्ल दे दी गई. 1980 में छह और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया. इस तरह भारत में एक सरकारी बैंकिंक सेक्टर का निर्माण हुआ.
सरकार ने बैंक अपने पास लिए, तब उनकी शाखाएं देहात में भी खुलने लगीं. ऐसे लोगों को कर्ज़ मिलने लगा, जो पहले उसके बारे में सोच भी नहीं सकते थे. 1967 से 1989 के बीच कुल कर्ज़ में कृषि की हिस्सेदारी 2.2 फीसदी से बढ़कर 15.8 फीसदी पर आ गई. इसका मतलब धीरे धीरे ही सही किसानों को मिलने वाले कर्ज़ में बढ़ोत्तरी हुई.
ये वो दौर था, जब सरकारी संस्थाओं और उपक्रमों के सहारे देश की प्रगति का विचार ताकतवर था. लेकिन 1991 में देश ने उदारीकरण की राह पकड़ी. और इसके बाद धीरे धीरे सार्वजनिक क्षेत्र सिकुड़ने लगा. यही सिकुड़न अब सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों तक भी पहुंच गई है. पहले सरकार ने सरकारी बैंकों का विलय किया. इसके पीछे ये तर्क दिया गया कि सरकार एक ही शहर के एक ही इलाके में अलग अलग नाम से शाखाएं क्यों चलाए. छोटे छोटे बैंकों को जब बड़े बैंकों में मिला दिया गया. तो हर बैंक के लिए अलग अलग प्रबंधक या महाप्रबंधक जैसे ऊंचे पदों की ज़रूरत नहीं रह गई.
अब सरकार एक कदम आगे जाकर बैकों में अपनी हिस्सेदारी ही बेच देना चाहती है. चूंकि बैंकों का राष्ट्रीयकरण एक कानून बनाकर हुआ था. इसलिए पहले कानून को बदलना होगा. जैसे Banking Companies (Acquisition and Transfer of Undertakings) Act, 1970 के तहत ये नियम है कि सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में कम से कम 51 फीसदी हिस्सेदारी अपने पास रखनी होगी.
इसी तरह, निजीकरण के लिए सरकार को एक और कानून में बदलाव लाना होगा - Banking Regulation Act,1949. इसीलिए सरकार The Banking Laws (Amendment) Bill, 2021 लाना चाहती है. इसे शीत सत्र में सदनों के पटल पर रखा जाना था.
जैसे ही ये बात बाहर आई, The United Forum of Bank Unions समेत सार्वजनिक बैंकों की तमाम यूनियनों ने 16 और 17 दिसंबर को हड़ताल का कॉल दे दिया. 13 दिसंबर को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में खड़े होकर कहा, कि सरकार के पैनल ने अभी तक ये तय नहीं किया है कि कौनसे बैंकों को बेचा जाएगा.
बड़े सरकारी बैंकों - मिसाल के लिए भारतीय स्टेट बैंक और पंजाब नेशनल बैंक ने अपने कर्मचारियों से अपील भी की कि हड़ताल पर न जाएं. सरकार ने बैंक यूनियनों से बात करना भी शुरु किया. 14 दिसंबर को सरकार और बैंक यूनियन्स के बीच बैठक हुई.
सरकार की तरफ से इसमें Additional Chief Labour Commissioner, एस सी जोशी और बैंक ऑफ इंडिया के डिप्टी सीईओ गोपाल भगत शामिल हुए. इस बैठक में सरकार ने कहा कि अभी बिल बस सदन में रखा जा रहा है. इसका मतलब ये नहीं हुआ कि वो पास भी हो जाएगा. इसके जवाब में यूनियनों ने कहा कि अगर बिल सदन में रखा ही इसलिए जाता है, ताकि वो पास हो. आज नहीं कल, सरकार ये बिल पास करा लेना चाहती है. अगर ऐसा नहीं है, तो वो शीत सत्र में बिल लाने पर आमादा है क्यों? यही गतिरोध 15 दिसंबर को भी रहा. और बैठक विफल हो गई.
बैठक विफल होने के नतीजे में आज से हड़ताल शुरू हो गई है. दी लल्लनटॉप ने इस हड़ताल का नेतृत्व कर रहे पदाधिकारियों से विस्तार से बात की. और ये समझा कि हड़ताल के पीछे उनकी क्या चिंताएं हैं और वो मोदी सरकार के इस फैसले का विरोध क्यों कर रहे हैं?
सुनील कुमार जो महासचिव हैं फेडरेशन ऑफ़ बैंक ऑफ़ इंडिया ऑफ़िसर्स एसोसिएशन के उनका कहना है
सरकारी क्षेत्र के बैंकों ने हमारे देश की बहुत बड़ी जनता को एम्पलॉयमेंट दिया हुआ है. यह रोज़गार का डायरेक्ट और इनडायरेक्ट दोनों रूपों में बहुत बड़ा स्रोत है. अगर इसका निजीकरण किया जाए तो बहुत नुक़सान होगा.सौम्य दत्ता जो महासचिव हैं ऑल इंडिया बैंक ऑफ़िसर्स कन्फेडरेशन उन्होंने बताया-
इस शीतकालीन सत्र में सरकार ने जो बैंकिंग अमेंडमेंट बिल सूचित किया है. इससे मुराद है बैंकों के निजीकरण से. हम इसका पुरज़ोर विरोध कर रहे हैं. इसके लिए ही हमने आंदोलन छेड़ा हुआ है. हम बैंक निजी करण का इसलिए विरोध कर रहे हैं. क्योंकि जो आम नागरिकों का जमा राशि की बैंक में है उसकी सुरक्षा इससे घट जाएगी.मॉनेटाइज़ेशन को लेकर सरकार का तर्क यही रहता है कि वो इस पैसे का इस्तेमाल विकास के लिए करना चाहती है. और इस तर्क में भी दम है कि जो उपक्रम घाटे में चल रहा हो, उसमें घाटा उठाते रहने से बेहतर है कि उसे बेचकर कुछ मुनाफा ही कमा लिया जाए. और इस मुनाफे का इस्तेमाल फिर देश की बेहतरी के लिए हो. लेकिन ये सोचने वाली बात है कि जो उपक्रम घाटे में नहीं है. उसे बेचकर किसी को भी क्या हासिल हो सकता है. सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम अगर फायदे में हैं. तो वो फायदा सरकार का ही है. और वो पैसा सरकार चाहे जैसे खर्च कर सकती है. ये तथ्य है कि कुछ सरकारी बैंक घाटा उठा रहे हैं. या फिर वो उतना मुनाफा नहीं कमा पा रहे, कि वो लंबे समय तक चल पाएं. इस घाटे वाली बात पर ही सबसे ज़्यादा बहस है. इसीलिए हमने ये सवाल बैंक यूनियन्स के प्रतिनिधियों से पूछा कि वो सरकार से घाटे वाले बैंक चलाने को क्यों कह रहे हैं. सुनील कुमार जो महासचिव हैं फेडरेशन ऑफ़ बैंक ऑफ़ इंडिया ऑफ़िसर्स एसोसिएशन के उनका कहना है
भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के इतर पूरी दुनिया में किसी भी बैंकिंग व्यवस्था में स्टैंडर्ड ऐसेट में प्रोविजनल नहीं किया जाता है. बड़े कॉरपोरेट को हेयरकट दिया जाता है. जो नुक़सान का सबब है.उन्होंने आगे कहा
आज विजय माल्या भाग गया. क्या इसके लिए बैंकर दोषी हैं? बैंक के बोर्ड में गवर्मेंट और RBI के नॉमिनी बैठते हैं. ये बड़े बड़े लोन इन्हीं बोर्ड के द्वारा पारित किया जाता है. सवाल उठता है कि उस समय सरकार के यह नुमाइंदे ख़ामोश क्यों रहते हैं? और अगर वो ख़ामोश रहते हैं तो उन पर ज़िम्मेदारी तय क्यों नहीं की जाती?यहां ये बात साफ हो जाए कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक या दूसरे किसी उपक्रम में कोई खामी नहीं है, ऐसा हम कतई नहीं कह रहे हैं. हम उस लाइन में खड़े रहे हैं, दो डेढ़ डेढ़ घंटे इसीलिए आगे नहीं बढ़ती क्योंकि लंच हो जाता है. पासबुक इसलिए प्रिंट नहीं होती क्योंकि लिंक फेल हो जाता है. खाता इसलिए नहीं खुल रहा क्योंकि मैनेजर साहब की चिरौरी नहीं की गई. ये सारी खामियां सरकारी बैंकों में थीं. और हैं. लेकिन क्या ये कारण इनके निजीकरण के लिए पर्याप्त हैं? इस बारे में दर्शकों को सोचना चाहिए. आपको सोचने में मदद मिले, इसके लिए हम आपको उन सवालों के जवाब दे देते हैं, जो हमने शो की शुरुआत में पूछे थे. हमने वो सवाल ट्विटर और यूट्यूब कम्यूनिटी पर पूछे. जवाब ये रहा. ट्विटर पर साढ़े नौ हज़ार लोगों के पोल में 69.9 फीसदी लोगों ने कहा कि वो 50 लाख की रकम सरकारी बैंक में रखना चाहेंगे. 30.1 फीसदी लोगों ने प्राइवेट बैंक्स को चुना. ट्विटर पर ही ढाई हज़ार लोगों के पोल में 83.5 फीसदी लोगों ने कहा कि वो सरकारी बैंक में नौकरी करना चाहेंगे. सिर्फ 16.5 फीसदी लोगों ने प्राइवेट बैंक्स को चुना. अब आते हैं यूट्यूब पर. यहां 13 हज़ार लोगों के पोल में 82 फीसदी लोगों ने कहा कि वो सरकारी बैंक में नौकरी करना चाहेंगे. सिर्फ 18 फीसदी लोगों ने प्राइवेट बैंक्स को चुना. छह हज़ार आठ सौ लोगों के पोल में 77 फीसदी लोगों ने कहा कि वो 50 लाख की रकम सरकारी बैंक में रखना चाहेंगे. 23 फीसदी लोगों ने प्राइवेट बैंक्स को चुना. इन आंकड़ों से आपको एक अंदाज़ा लगता है कि जनता अपने पैसे रखने के लिए किस तरह की व्यवस्था पर भरोसा करती है. और अपने लिए कैसा रोज़गार चाहती है. अगर वाकई बैंकों के निजीकरण के बाद नौकरियां जाती हैं, तो फिर सिर्फ वही नौकरियां नहीं जाएंगी जो नौकरियां हैं. इसका असर भविष्य की नौकरियों पर भी पड़ेगा. सरकारी नौकरियों के नाम पर भारत में अब कुछ ही बड़े सेक्टर बाकी हैं. मिसाल के लिए रेलवे, बैंकिंग और फौज. सरकारी स्कूल, कॉलेज और अस्पताल भी हैं. लेकिन वहां भर्ती का आलम क्या है, आप नियमित रूप से दी लल्लनटॉप पर देखते रहते हैं. इसीलिए एक चिंता है कि जब सरकारी संस्थान कम हो जाएंगे, तो भर्तियां भी कम निकलेंगी. जिस सामाजिक न्याय के लिए आरक्षण देने का प्रावधान संविधान में है. वो सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में दिया जाता है. जब वहां नौकरियां कम होंगी, तब सरकार सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धता कैसे निभाएगी, इसका रोडमैप उसने कभी नहीं दिया. न प्राइवेट सेक्टर में कोई खामी है. न ही निजीकरण में. ज़रूरत बस इतनी है, कि सरकार जो कदम उठा रही है, उसके स्पष्ट कारण दे. और जो कारण दिया जाए, उसमें तथ्यों पर आधारित तर्क हों. और ये समझ भी आए कि सरकार किस विचार पर चल रही है. भविष्य को लेकर क्या राय रखती है. जब तक ऐसा नहीं होगा. उसके कदमों पर सवाल उठाए जाते रहेंगे. खासकर तब, जब मामला लोगों के रोज़गार से जुड़ा हो.

