नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा का शी जिनपिंग कैसे बदला लेंगे?
अमेरिका-चीन-ताइवान के उलझाऊ त्रिकोण की पूरी कहानी क्या है?

01 अगस्त 2022 को अमेरिकी वायुसेना का जहाज ‘स्पार-19’ सिंगापुर के पाया लेबार मिलिटरी एयरबेस पर उतरा. इस जहाज को सिंगापुर के बाद मलेशिया, साउथ कोरिया और जापान का चक्कर लगाना था. जब दौरे का शेड्यूल रिलीज़ हुआ तो उसमें चीन या ताइवान का कोई ज़िक्र नहीं था. इसके बावजूद दोनों जगहों पर हंगामा मचा था. ताइवान में स्वागत की तैयारी चल रही थी. जबकि चीन बौखला रहा था. वो धमकियां दे रहा था, अगर जहाज ताइवान में उतरा तो अनर्थ हो जाएगा.
इस धमकी के बावजूद 02 अगस्त की रात जहाज ताइवान पहुंच गया. जैसे ही प्लेन का दरवाज़ा खुला, पूरी दुनिया भौंचक हो गई. अगर इस धरती के पास दिल टाइप की कोई चीज़ होती होगी, तो उसकी धड़कन कई गुणा तेज़ हो गई होगी. दरअसल, उस रात जिस शख़्सियत ने ताइवान के एयरपोर्ट पर कदम रखा था, वैसी हिम्मत पिछले 25 सालों में किसी ने हिम्मत नहीं दिखाई थी.
उस शख़्सियत का नाम है, नैन्सी पेलोसी. अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ़ रेप्रजेंटेटिव्स की स्पीकर. इसको भारत में लोकसभा अध्यक्ष का पद. पेलोसी की ताक़त का अंदाज़ा लगाना हो तो अमेरिका में शक्ति का क्रम देखना होगा.
उनके ताइवान जाने से अमेरिकी सरकार असहज हुई. क्योंकि अमेरिका ताइवान को आधिकारिक देश का दर्ज़ा नहीं देता. चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है. अगर कोई देश ताइवान के साथ डिप्लोमैटिक रिश्ते रखने की कोशिश करता है तो उसे चीन का कोप झेलना पड़ता है. पिछले हफ़्ते ही चीन और अमेरिका के राष्ट्रपति के बीच वर्चुअल मीटिंग हुई थी. इसमें शी जिनपिंग ने साफ़-साफ़ कहा था कि जो कोई आग से खेलेगा, उसका हाथ जल जाएगा. उनका इशारा ताइवान में अमेरिका के बढ़ते दखल की तरफ़ था.
इस चेतावनी के कुछ दिनों बाद ही नैन्सी पेलोसी का दौरा हुआ है. पेलोसी के पहुंचने के तुरंत बाद चीन ने अपने फ़ाइटर जेट्स ताइवान की सीमा में उड़ाए. जेट्स बिना किसी हरक़त के वापस लौट आए. हालांकि, इसे तूफ़ान की आहट का संकेत माना जा रहा है. चीन ने ताइवान के इर्द-गिर्द के इलाकों में मिलिटरी ड्रिल का भी ऐलान किया है. लोहा गर्म हो चुका है, अब सबकुछ हथौड़े की चोट पर टिका है. नतीजा तरतीब या बेतरतीब निकलेगा, ये देखने वाली बात होगी.
जब तक समय का पहिया उस मुकाम तक पहुंचता है, तब तक हम जान लेते हैं,
- अमेरिका-चीन-ताइवान के उलझाऊ त्रिकोण की पूरी कहानी क्या है?
- नैन्सी पेलोसी के ताइवान दौरे का मतलब क्या है?
- चीन ने पेलोसी के दौरे का क्या जवाब दिया है?
- और, क्या एशिया में नया यूक्रेन बनाने की तैयारी हो रही है?
शुरुआत श से. यानी इतिहास से.
चैप्टर 1:साल 1927. चीन में सिविल वॉर शुरू हुआ. च्यांग काई-शेक की कुओमिंतांग सरकार और चाइनीज़ कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के बीच. ये लड़ाई दो फ़ेज में चली. पहला फ़ेज 1937 तक चला. इसी दौरान माओ का लॉन्ग मार्च भी हुआ था. 1934 में गोरिल्ला वॉर से तंग आकर कुओमिंतांग सेना ने कम्युनिस्टों पर घेरकर हमला किया. उस समय तक माओ उतना पार्टी में उतना ताक़तवर नहीं हुआ था. वो CCP के कुछ मोर्चों को संभाल रहा था. कुओमिंतांग के हमले ने उसे भागने पर मजबूर कर दिया. 16 अक्टूबर, 1934 से शुरू हुआ सफ़र 20 अक्टूबर, 1935 तक चला. 24 नदियां, 18 पहाड़ और 6000 किलोमीटर. इस दौरान उन्हें कुओमितांग के सैनिकों से जान भी बचाना था. लगभग एक लाख सैनिकों से शुरू हुआ कारवां जब थमा, बस आठ हज़ार ज़िंदा बचे थे. और, ज़िंदा बच गया था माओ. इस मार्च के बाद वो कम्युनिस्ट पार्टी का सबसे बड़ा नेता बन गया. उसने लॉन्ग मार्च की कहानियां सुना-सुनाकर खूब सहानुभूति बटोरी.

कई इतिहासकार माओ के दावे को फर्ज़ी बताते हैं. उनका मानना है कि माओ इस लॉन्ग मार्च में कभी पैदल चला ही नहीं. उसे सैनिक पालकी में बिठा कर ले गए. जुंग चेंग और जॉन हेलीडे ने अपनी किताब ‘Mao: The Unknown Story’ में लिखा,
लॉन्ग मार्च के दौरान माओ एक पालकी पर सोया रहता था. उसने इस दौरान क्या किया? बहुत सारी किताबें पढ़ीं.
खैर, माओ किसी तरह बच गया था. ये घटना आगे चलकर चीन की नियति तय करने वाली थी. जिस समय चीन में सिविल वॉर चल रहा था, उसी दौरान कुओमिंतांग सरकार जापान के हमले से भी जूझ रही थी. लॉन्ग मार्च के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के अस्तित्व पर संकट था. उन्हें जापान के हमले में एक अवसर दिखा. कम्युनिस्ट नेताओं ने कुओमिंतांग के साथ मिलकर जापान से लड़ने की वक़ालत की. उन्होंने एक नया नारा दिया, Chinese don’t fight chinese. यानी, चीन के लोग आपस में नहीं लड़ते. उन्हें इसका फायदा भी मिला. कुओमिंतांग पार्टी के एक धड़े ने कम्युनिस्टों को दिल दे दिया.
च्यांग काई-शेक इसके ख़िलाफ़ थे. वो किसी भी कीमत पर CCP को मिटाना चाहते थे. दिसंबर 1936 में च्यांग हमला बढ़ाने का आदेश देने के लिए शियान प्रांत पहुंचे. लेकिन आदेश मानने की बजाय उनके सिपहसालारों ने उन्हें बंदी बना लिया.
इससे हड़कंप मच गया. फिर सोवियत संघ ने दखल दी. उसने कहा, साथ मिलकर जापान का सामना करो, वरना कोई नामलेवा ना रहेगा. च्यांग को इस शर्त पर रिहा किया गया कि वो सिविल वॉर खत्म कर देंगे और CCP के साथ मिलकर जापान का सामना करेंगे.
सितंबर 1937 में दोनों पक्षों में समझौता हो गया. दोनों मिलकर जापान का सामना करने लगे. सितंबर 1939 में विश्वयुद्ध शुरू हो गया. मित्र देशों ने चीन को मदद दी. इस मदद के दम पर उन्होंने जापान को हरा दिया. जापान की हार के तुरंत बाद CCP और कुओमिंतांग ने दोस्ती तोड़ दी. सिविल वॉर का दूसरा फ़ेज शुरू हो चुका था. इस फ़ेज में CCP ने निर्णायक जीत हासिल की. 01 अक्टूबर, 1949 को माओ ज़ेंदोंग ने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की स्थापना की.
च्यांग और उनकी पार्टी का क्या हुआ? उन्हें अपना बोरिया बिस्तर लेकर मेनलैंड चाइना से भागना पड़ा. वे चीन के पूरब में समंदर में बसे फ़ारमोसा द्वीप पर पहुंचे. वहां उन्होंने रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की स्थापना की. इसी को ताइवान के नाम से जाना जाता है.
दूसरे विश्वयुद्ध में अमेरिका और सोवियत संघ, दोनों ने चीन की मदद की थी. चीन के सिविल वॉर को लेकर अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने एक श्वेत-पत्र जारी किया. इसमें कहा गया कि अमेरिका ना तो सिविल वॉर का नतीजा बदल सकता है और ना ही उसे इसकी कोशिश करनी चाहिए. इससे दूर रहने में ही भलाई है.

दूसरे विश्वयुद्ध के तुरंत बाद कोल्ड वॉर शुरू हो गया. दुनिया दो धड़ों में बंट गई. सोवियत संघ और अमेरिका. वैचारिक नज़रिए से चीन सोवियत संघ के क़रीब था. हालांकि, अमेरिका चीन के सिविल वॉर को चुपचाप देख रहा था. पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की स्थापना के बाद कुछ अमेरिकी अधिकारी माओ से मिलने आए. उन्होंने दोस्ती का हाथ बढ़ाया. मगर माओ ने सोवियत संघ को वचन दे रखा था. अमेरिका पीछे हट गया. उसने च्यांग के रिपब्लिक ऑफ़ चाइना यानी ताइवान को आधिकारिक दर्ज़ा दे दिया. यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल की स्थायी सीट भी ताइवान के हिस्से में आई.
चैप्टर 2एक तरफ़ चीन अपना प्रभुत्व बढ़ाने के लिए हाथ-पैर मार रहा था, दूसरी तरफ उत्तर में उसके दो पड़ोसी आपस में सिर फोड़ रहे थे. जून 1950 में नॉर्थ कोरिया ने साउथ कोरिया पर हमला कर दिया. नॉर्थ को सोवियत संघ, जबकि साउथ को अमेरिका का सपोर्ट था. हमले के बाद अमेरिका के नेतृत्व में यूएन की सेना साउथ को बचाने उतरी. जब लड़ाई चीन की सीमा के पास पहुंचने लगी, तब माओ ने हस्तक्षेप करने का मन बनाया. लेकिन उसे सपोर्ट चाहिए था. ऐसे में स्टालिन ने कहा, हम साथ साथ हैं. ये सुनते ही माओ ने पीपुल्स वॉलंटियर्स फ़ोर्स (CPVF) को कहा, गो अहेड.
इसके बाद ही अमेरिका के राष्ट्रपति हेनरी ट्रूमैन ने नौसेना के सातवें बेड़े को ताइवान स्ट्रेट की तरफ़ रवाना किया. इससे पहले उनका इस इलाके में दखल देने का कोई इरादा नहीं था. क्यों नहीं था? इसके पीछे एक दिलचस्प कहानी है.
साल 1947 की बात है. 07 मार्च को अमेरिका में कैबिनेट की एक मीटिंग हुई. इसमें राष्ट्रपति ट्रूमैन ने च्यांग काई-शेक को लेकर एक तीखा बयान दिया था. उन्होंने कहा था कि च्यांग कुओमिंतांग का नेता बनने के लायक नहीं है. उसे किसी तरह की मदद देने का मतलब होगा कि हम अपना पैसा पानी में बहा रहे हैं.
मीटिंग के पांच दिन बाद ट्रूमैन ने एक भाषण दिया. ट्रूमैन ने ऐलान किया कि जहां कहीं भी निरंकुश ताक़तों का खतरा होगा, वहां अमेरिका मदद का हाथ बढ़ाएगा. उनका इशारा कम्युनिस्टों की तरफ था. इसे ‘ट्रूमैन सिद्धांत’ के नाम से जाना गया.
इस सिद्धांत पर एक बहस शुरू हुई. क्या ट्रूमैन का मतलब पूरी दुनिया से था? क्या इसमें चीन भी शामिल है? बहस के बाद ‘हर जगह’ शब्द हटा लिया गया. यानी, ट्रूमैन सिद्धांत चीन में नहीं लागू होने वाला था.
फिर आया साल 1949 का. डीन एचिसन अमेरिका के विदेशमंत्री बने. उनका आकलन था कि ताइवान द्वीप का कोई सामरिक महत्व नहीं है. उस समय अमेरिका की सेना और सरकार इस बात पर एकमत थी कि ताइवान को बचाने की कोशिश करने से समय और पैसे की बर्बादी होगी. उस समय अमेरिका मार्शल प्लान पर काम करने में व्यस्त था. उसका पूरा फ़ोकस यूरोप पर था. इसलिए, उसने चीन में दिमाग खपाने की ज़रूरत नहीं समझी. जानकारों का दावा है कि अमेरिका चीन के साथ व्यापारिक रिश्ते भी कायम रखना चाहता था. ताकि वो सोवियत संघ के पाले में ना चला जाए.
ये सब चल ही रहा था कि एक डील की ख़बर आ गई. फ़रवरी 1950 में माओ के चीन ने स्टालिन के सोवियत संघ के साथ मैत्री की संधि कर ली थी. संधि से पहले ही इसकी एक कॉपी अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के हाथ लग चुकी थी. इसमें एक सीक्रेट दर्ज़ था. इसके मुताबिक, 1950 के बसंत में चीन ताइवान के ऊपर हमला करने वाला था. और, अगर अमेरिका उसे बचाने आता तो सोवियत संघ भी अपनी सेना उतार देता.
उसी समय च्यांग काई-शेक के मंसूबे भी बढ़ रहे थे. च्यांग तीसरा विश्वयुद्ध करवाना चाहते थे. उनको भरोसा था कि अगर चीन ने उनपर हमला किया तो अमेरिका बचाने आएगा. इसलिए, वो चीन को लगातार उकसा रहे थे.
ट्रूमैन सरकार किसी भी हालत में इस टकराव से बचना चाहती थी. उनका मानना था कि ताइवान स्ट्रेट का न्यूट्रल बने रहना ही सबके हित में होगा. जब कोरिया वॉर शुरू हुआ, तब टकराव की आशंका और बढ़ गई. ऐसी स्थिति में ट्रूमैन ने नौसेना की एक फ़्लीट ताइवान स्ट्रेट में तैनात कर दी. इसका मकसद दोनों पक्षों को एक-दूसरे पर हमला करने से रोकना था.
चैप्टर 31953 में कोरिया वॉर पर विराम लग गया. याद रहे ये युद्ध अभी तक आधिकारिक तौर पर खत्म नहीं हुआ है. इसके बाद यूएस नेवी ने ब्लॉकेड हटा लिया.
1954 में च्यांग ने अपनी सेना को चीन की सीमा से थोड़ी दूरी पर बसे दो द्वीपों किमेन और मात्सु पर बिठा दिया. उनसे चीन पर हमला करने के लिए कहा गया. चीन ने जवाब दिया. बात इतनी बढ़ी कि ताइवान पर हमले का ख़तरा मंडराने लगा. तब दिसंबर 1954 में अमेरिका और ताइवान ने साइनो-अमेरिकन म्युचुअल डिफ़ेंस ट्रीटी पर दस्तख़त किए. संधि के मुताबिक, अगर एक देश पर कहीं से बाहरी आक्रमण होता है तो दूसरा देश उसकी सैन्य मदद करेगा. इस संधि में किमेन और मात्सु द्वीपों को शामिल नहीं किया गया था. इसका दायरा सिर्फ़ ताइवान द्वीप तक सीमित था.
इस घटना को पहले ताइवान स्ट्रेट क्राइसिस के तौर पर जाना जाता है. 1958 में दूसरा ताइवान स्ट्रेट क्राइसिस हुआ. इस दौरान भी चीन ने ताइवान के द्वीपों पर ख़ूब हमले किए. हालांकि, फिर मामला शांत पड़ गया. निर्णायक युद्ध की नौबत नहीं आई.
क्लासीफ़ाईड डॉक्यूमेंट्स से पता चलता है कि, दोनों क्राइसिस के समय अमेरिका में चीन के ऊपर परमाणु बम गिराने की बात चली थी. लेकिन सोवियत संघ के डर से वो पीछे हट गया.
चीन पर परमाणु हमले का ख़तरा बढ़ रहा था. उसने सोवियत संघ से मदद मांगी. सोवियत राज़ी हो गया. उसने बम बनाने की तकनीक बांच दी. चीन का काम चल ही रहा था कि सोवियत संघ में सरकार बदल गई. निकिता ख्रुश्चेव पश्चिम से संबंध सुधारना चाहते थे. वो हथियारों पर नियंत्रण की बात करने लगे. इस वजह से सोवियत संघ और चीन की दोस्ती में दरारें आने लगीं. फिर चीन ने अपने दम पर न्युक्लियर हथियार हासिल किया. अक्टूबर 1964 में चीन ने शिनजियांग में पहले परमाणु बम का सफ़ल परीक्षण किया.
1969 आते-आते चीन और सोवियत संघ आमने-सामने आ गए. दोनों देशों की सेना सीमाओं के निर्धारण को लेकर आपस में भिड़ने लगी. ये संघर्ष सात महीने तक चला. और, इस घटना ने दो लोकोक्तियों को धरातल पर उतार दिया. नंबर एक. दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है.
नंबर दो. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी दोस्ती या स्थायी दुश्मनी जैसी कोई चीज़ नहीं होती.
चैप्टर चारजैसे ही चीन और सोवियत लड़े, अमेरिका ने अपना दांव चल दिया.
साल 1971. अप्रैल का महीना था. जापान में वर्ल्ड टेबल टेनिस चैंपियनशिप चल रही थी. इसी दौरान अमेरिका और चीन के खिलाड़ियों के बीच मुलाक़ात हुई. उनमें से एक ने चीन आकर खेलने की इच्छा जताई. चीन का विदेश मंत्रालय राज़ी हो गया. उन्होंने अमेरिकी टीम को बीजिंग आकर खेलने का न्यौता दिया. वे मान गए. 1949 में कम्युनिस्ट क्रांति के बाद से पहली बार इस तरह के किसी अमेरिकी गुट को चीन में एंट्री मिली थी. इस घटना को टेबल टेनिस डिप्लोमेसी या पिंग-पोंग डिप्लोमेसी के नाम से भी जाना जाता है.
इस दौरे ने जमी बर्फ़ पिघलने का संकेत दे दिया था. जुलाई 1971 में अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन थे. उन्होंने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर को बुलाकर कहा,
“उनकी आबादी दुनिया की कुल जनसंख्या का लगभग 25 प्रतिशत है. वे अभी सैन्य शक्ति नहीं हैं, लेकिन आज से 25 बरस बाद वे दुनिया की दशा और दिशा तय करेंगे.”

निक्सन के आदेश पर किसिंजर ने चीन की गुप्त यात्रा की. वहां उन्होंने चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई से मुलाक़ात की. बात बनने लगी थी.
फ़रवरी 1972 में राष्ट्रपति निक्सन ख़ुद सात दिनों की चीन यात्रा पर गए. इस दौरान उन्होंने चेयरमैन माओ और प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई के अलावा कई दिग्गज नेताओं से बात की. इसी दौरे में अमेरिका-चीन डिप्लोमैटिक संबंधों की नींव रखी गई. इसी दौरान ताइवान का मुद्दा भी उठा. दोनों देश मसले को बैठकर सुलझाने के लिए राज़ी हो गए.
हालांकि, दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध स्थापित होते-होते 1979 का साल आ गया. अमेरिका ने वन-चाइना पॉलिसी को अपना समर्थन दे दिया. लेकिन उसने ताइवान के साथ रिश्ते नहीं तोड़े. अप्रैल 1979 के ताइवान रिलेशंस ऐक्ट के तहत अमेरिका ने संबंध बरकरार रखे.
सब ठीक चल रहा था कि इसी बीच चीन में कम्युनिस्ट सरकार का विरोध शुरू हो गया. 1989 में तियानमेन स्क़्वायर लाखों स्टूडेंट्स ने प्रोटेस्ट किया. डेंग जियाओपिंग के आदेश पर प्रदर्शनकारियों के ऊपर टैंक चलाया गया. अमेरिका पर कार्रवाई करने का दबाव बढ़ा. उसने चीन को बेचे जा रहे हथियारों पर रोक लगा दी और आपसी संबंध भी बिगाड़ लिए.
तब तक 1990 का दशक आ चुका था. चीन कम्युनिस्ट शासन को लेकर सख़्त था. वहीं, ताइवान लोकतंत्र की दिशा में आगे बढ़ रहा था. वहां के लोग ख़ुद को चीन से अलग करके देखने लगे थे. 1995 में ताइवान के राष्ट्रपति ली टेंग-हुई अमेरिका के दौरे पर गए. उन्हें अपनी यूनिवर्सिटी से बुलावा आया था. चीन इस दौरे से इतना नाराज़ हुआ कि उसने ताइवान की समुद्री सीमा में मिसाइल टेस्टिंग शुरू कर दी.
1996 में ताइवान ने राष्ट्रपति चुनाव कराने का फ़ैसला किया. पहली बार जनता को सीधे अपना नेता चुनने का अधिकार मिला था. चीन चुनाव के ख़िलाफ़ था. उसने फिर से मिसाइल टेस्टिंग शुरू की. लेकिन इस बार अमेरिका बीच में आ गया. उसने अपने दो एयरक्राफ़्ट करियर ताइवान की तरफ़ रवाना कर दिए. चीन को पीछे हटना पड़ा. ताइवान में चुनाव हुए और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सिलसिला शुरू हो गया.
उस समय से अब तक चीन और अमेरिका के बीच तनाव घटने की बजाय बढ़ा ही है. शिनजियांग में उइगर मुस्लिमों के नरसंहार का मसला हो या वन बेल्ट वन रोड हो या ताइवान का मसला हो, दोनों देश एक-दूसरे के ख़िलाफ़ ज़हर उगलते रहते हैं.
चीन, ताइवान को लेकर सबसे अधिक सजग है. शी जिनपिंग ने कहा भी है कि जब तक ताइवान को चीन की सीमा में मिला नहीं लिया जाता, तब तक चीन का गौरव नहीं लौट सकता. वो इसे हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जाने की बात करते रहे हैं.
आज हम ये क़िस्सा क्यों सुना रहे हैं?दरअसल, अमेरिका ने एक बार फिर से चीन की उसी दुखती रग पर हाथ रख दिया है. नैन्सी पेलोसी ने ताइवान का दौरा कर चीन को नाराज़ कर दिया है. 02 अगस्त को ताइवान पहुंचने के बाद उन्होंने वहां की राष्ट्रपति साइ वेंग-इन से मुलाक़ात की. पेलोसी ने दोहराया कि अमेरिका ताइवान में लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है.
जहां तक पेलोसी की बात है, चीन की आलोचना का उनका लंबा इतिहास रहा है. पेलोसी 1987 में पहली बार सांसद बनीं थी. 1991 में वो अपने दो साथियों के साथ तियानमेन स्क़्वायर पर पहुंच गई. चीन की इजाज़त के बिना उन्होंने चौक पर एक बैनर भी फहराया. उसके ऊपर लिखे थे,चीन में लोकतंत्र के लिए शहीद हुए लोगों के नाम.
बीजिंग पुलिस ने किसी तरह उनको रोका. चीन के विदेश मंत्रालय ने ख़ूब आलोचना भी की थी. उइग़र मुस्लिमों के नरसंहार और आलोचकों की गिरफ़्तारी को लेकर भी पेलोसी काफ़ी मुखर रहीं है. उन्होंने खुलकर इसका विरोध किया है. कई बार अमेरिका की सरकार की नीति से उलट जाकर भी.
जहां तक नैन्सी पेलोसी के कैरियर की बात है, वो पिछले 35 सालों से संसद का हिस्सा हैं. फिलहाल, निचले सदन के स्पीकर के तौर पर चौथा कार्यकाल चल रहा है. 82 बरस की पेलोसी हाउस ऑफ़ रेप्रेजेंटेटिव्स की पहली महिला स्पीकर थीं. उन्होंने अपनी शर्तों पर सदन चलाया है. डोनाल्ड ट्रंप के पूरे कार्यकाल के दौरान उन्होंने उनकी नाक में दम करके रखा था. एक बार तो पेलोसी ने ट्रंप के पीछे बैठे-बैठे उनका भाषण फाड़ दिया था. जब ट्रंप समर्थकों ने कैपिटल हिल में दंगा किया था, तब उनके निशाने पर पेलोसी भी थीं. दंगाइयों ने उनके दफ़्तर में काफी तोड़-फोड़ मचाई थी और उनके ऊपर हमला करने के लिए ढूंढ़ रहे थे.

जानकारों की मानें तो पेलोसी के ताइवान दौरे ने अमेरिका को असहज कर दिया है. यूक्रेन संकट से परेशान अमेरिका के लिए ये नई चुनौती परेशान करने वाली है. वाइट हाउस की तरफ़ से माहौल को ठंडा करने की कोशिशें चल रहीं है. लेकिन चीन के लिए शांत रह पाना इतना आसान नहीं है. चीन पहले की तुलना में काफ़ी मज़बूत स्थिति में पहुंच चुका है. अगर उसने इस बार कुछ नहीं किया तो ये शी जिनपिंग की सत्ता को कमज़ोर साबित करेगा. चीन के सरकारी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, चीन ताइवान के इर्द-गिर्द 1996 से भी बड़ी मिलिटरी ड्रिल करने जा रहा है. 1996 में मिसाइल टेस्टिंग के बाद ताइवान की सुरक्षा के लिए अमेरिका को बीच में आना पड़ा था.
अब सवाल आता है क्या ताइवान एशिया का यूक्रेन बन सकता है?
इसका सटीक जवाब बस भविष्य के गर्भ में क़ैद है. जानकारों का कहना है कि चीन आंख दिखाकर काम चलाएगा. जिनपिंग फिलहाल के लिए अस्थिरता नहीं चाहते हैं. इसलिए, वो युद्ध शुरू करने से बचेंगे. अभी दोराहे वाली स्थिति बनी हुई है. देखना दिलचस्प होगा कि ये संकट किस दिशा में मुड़ता है.
अमेरिका ने अलकायदा के चीफ अल-ज़वाहिरी को कैसा मारा?

