ये आर्टिकल हमें हमारी एक रीडर एफ. हुसैन ने लिख भेजा है. पढ़िए, मजे, मस्ती औरसंजीदगी से. और इनको कोई संदेश देना चाहते हैं तो कमेंट करें.--------------------------------------------------------------------------------हर बच्चे का पहला हीरो उसका पिता यूं ही नही बन जाता. पिता को हीरो बनाने की शुरुआतमां तब से करती है, जब बच्चा घुटनों के बल चलकर सरकना सीखता है. बाप घर से निकलताहै, बच्चा पीछे-पीछे दहलीज तक जाता है. मां कहती है पापा हप्पा लेने गए हैं बेटे केलिए. शाम को पिता के घर आने से पहले मां फोन करके उन्हें याद दिलाती है, ध्यान सेफलां चीज लेते आना. अगली सुबह बच्चा उठता है, तो मां उसे समझाती है कि पापा लाएहैं. जबकि पापा को याद भी नहीं था.बच्चा चलना सीखता है, हर चीज छूने की कोशिश करता है. गर्म-ठंडे का फर्क महसूस करताहै. मां समझाती है ऊऊऊ है, हाय हो जाएगी. बच्चा कुत्ते, बिल्लियों, हाउ (अंधेरा) सेडरता है. मां कहती है पापा मार देंगे. पापा से कहेंगे, तो ऐसा हो जाएगा, वैसा होजाएगा. बिल्ली घर में आती है, बच्चा डर से मां के पास भागता है. मां फिर कहती हैपापा मार देंगे उसे. डरते नहीं हैं. बच्चे के नन्हे से ज़ेहन में बैठने लगता है किजितनी भी ताकतवर चीजें हैं, वो पापा करेंगे. फिर कुछ ही दिनों में बच्चा उन्हींकुत्ते, बिल्लियों को देखते ही हिम्मत करके कहता है 'पापा...'. मां खुशी से भर कर,बच्चे को चूमकर कहती है - 'हम्ममम मेरे बेटा के पापा मारेंगे इसे'. मांओं, तुम खुदक्यों नहीं मारोगी? तुम खुद मार दो उस हाउ को, फिर बच्चा उन्हींकुत्ते और बिल्लियों को देखकर हिम्मत करके 'मम्मा...' करकर उन्हें डराएगा. मां,पहले पिता को बच्चे की नजरों मे हीरो बनाती है, फिर उनसे डरना सिखाती है. बच्चाशैतानी करता है, मां कहती है, पापा से कहूंगी. बच्चा पापा के नाम पर धीरे-धीरेसहमना शुरू कर देता है. क्योंकि उसे याद होता है कि पापा सभी को मार सकते हैं. दिनभर मां के सामने खेल-खेल में बच्चा खूब शैतानियां करता है, पिता के आते हीधीरे-धीरे शैतानियों के साथ-साथ उसका खेलना भी कम होता जाता है. बच्चा कब पिता सेदूरी बना लेता है और मां को मामूली मानने लगता है, पता नहीं चलता. इसके लिए कहीं नाकहीं मां खुद भी जिम्मेदार होती है, जिसका उसे कभी अहसास तक नहीं होता.घर के बाहर सामान बेचते लोगों को देखकर बच्चा मां से खिलौने मांगता है. मां फिर उसेयाद दिलाती है, पापा लाएंगे अच्छे-बड़े वाले.... बच्चे को याद होता है पापा हप्पाभी लाते थे. मां अगले दिन पिता से कहती, खिलौने लाना, शाम को फिर उन्हें याद दिलातीहै. बच्चे की नजरों में पिता खिलौना ले आता है, लेकिन कभी उसके साथ खेलता नहीं है.वो दिन भर दौड़-दौड़कर उन खिलौनों से मां के साथ खेलता है और हर बार मां को खिलौनादिखाकर कहता है 'पापा...'. बच्चा धीरे-धीरे समझने लगता है खिलौने, खाने की चीजेंफिर स्कूल, ट्यूशन की फीस, 'सिर्फ पापा ही सब करते हैं.' बच्चे को कहीं जाना हो तोमां कहती है पापा से पूछना. बच्चे को समझ आता है, मां कुछ नहीं है, पापा ही हैं सब,वही सरदार हैं.https://www.youtube.com/watch?v=BpGEeL4la1Uपिता कभी उसे नहीं समझाता, वो खिलौने तब लाता है, जब मां उसे बार-बार कहती है, याददिलाती है. वो हर दिन काम पर तब जा पाते हैं, जब मां दिन भर थकान से चूर होने केबाद भी, उनके पांव दबाती है, खाना देती है, जूतों से लेकर पापा की जेब में रखेरुमाल और दवा की पुड़िया तक मां बना कर देती है. मां का प्यार ही पिता की हर सुबहको जोश से भर देता है. उनके बिना पिता कुछ नहीं है. वो कभी मां को बच्चे की नजरोंमें सुपर वुमन नहीं बनाता, क्योंकि वह खुद कभी उसके काम को काम नहीं समझता. वहबच्चे के सामने गलत एग्जाम्पल सेट किए जाता है और बच्चा उसे फॉलो करके वही बन जाताहै.मां कभी बीमार हो या घर पर ना हो, तो बेटी स्कूल-कॉलेज से छुट्टी लेकर मां केहिस्से का काम करती है. बेटा नहीं करता, क्योंकि ना तो मां ने कभी उसे सिखाया होताऔर वो सीखा हुआ भी वही होता है जो पिता को करते हुए देखकर बड़ा होता है. वो पिता कीतरह सुबह-सुबह अखबार पढ़कर इंटेलेक्चुअल बनने का ढोंग करते हुए मां की जगह बहन सेनाश्ते की फरमाइश करता है. क्यों लड़कियों, कभी तुम्हारा मन नहीं करता, तुम भीसुबह-सुबह बनी बनाई चाय की चुस्कियां लेते हुए अखबार की खबर पढ़कर ऐसे बताओ जैसेतुम ही सब जानती हो? करता हो तो सुबह जब कोई तुमसे चाय मांगे, तो कह देना जाकरबनाओ, अख़बार पढ़ रही हूं मेरे लिए भी जनरल नॉलेज बहुत जरूरी है.कॉलेज, ऑफिस जाने वाली लड़कियां पहले पिता, भाई और फिर पति, बेटे को खुद दफ्तर जानेसे पहले टिफिन पैक करके और नाश्ता बना कर दिए जाती हैं. दफ्तर से आकर जल्दी से खानाबनाने से लेकर घर समेटना उन्हीं की जिम्मेदारी है. बाइचांस अगर मेड हो तो भीक्या... सब देख-रेख तुम्हीं को करनी है. अब क्या तुम पापा-भाई से खाना सर्वकरवाओगी? याद रखो सब तुमको ही करना है, बेटी को भी ऐसा ही सिखाना और अपनी बहू से भीयही एक्सपेक्ट करना. अगर ऐेसा नहीं किया तो मॉरल खांचे के मुताबिक तुम बदतमीज याफिर फेमिनिस्ट कहलाओगी.