2021 को दुनिया कैसे याद रखने वाली है?
साल 2021 में दुनियाभर में ये बड़ी घटनाएं हुईं.
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साल 2021 में दुनियाभर में ये बड़ी घटनाएं हुईं.
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साल 2021 अंतिम सीढ़ियां चढ़ रहा है. एक बार इसने संन्यास लिया तो लौटकर आएगा नहीं. ये कोई शाहिद अफ़रीदी नहीं है. इसका मन नहीं पलटता. पलटते तो हम भी नहीं हैं. पन्ने. रिश्तों के. यादों के. उनकी आहटों के. गुमान कुछ यूं कि हमारे ठहर जाने से वक़्त ठहर जाएगा. ये जानते हुए भी कि आनंद बक्षी लिख गए हैं. किशोर कुमार सुना भी गए हैं. ‘आप की कसम’ फ़िल्म में. क्या?
सुबह आती है, रात जाती है
वक़्त चलता ही रहता है रुकता नहीं
एक पल में ये आगे निकल जाता है
आदमी ठीक से देख पाता नहीं
और परदे पे मंज़र बदल जाता है.
ये मंज़र के साथ-साथ कैलेंडर बदलने का भी मौसम है. आज जानेंगे, साल 2021 के बक्से में क्या जमा हुआ? ये क्या लेकर आया था और क्या देकर जा रहा है? और, दुनिया इसे कैसे याद रखने वाली है?
साल भर पहले की बात है. कुछ-कुछ इसी तरह के दिन थे. रातें भी. उत्तर भारत में इंसानी बदन पर कपड़ों की परत मोटी होने लगीं थी. इसी अनुपात में चर्बी भी. एक नेता की. सात समंदर पार. अमेरिका में. वहां राष्ट्रपति चुनाव के वोटों की गिनती चल रही थी. रुझान बता रहे थे कि डोनाल्ड ट्रंप का जाना तय है.
जनवरी 2017 में अमेरिका में ‘अच्छे दिन’ मोमेंट का अवतरण हुआ था. ट्रंप ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के नारे पर सवार होकर आए थे. चार साल के भीतर साफ़ हो चुका था कि उस्तरा ग़लत इंसान के हाथ लग चुका है.
न्युक्लियर वॉर की धमकी हो या बेतुकी बयानबाजी, ट्रंप ने अमेरिकी लोकतंत्र के उदाहरण को भद्दा मज़ाक बना दिया. एक सर्कस चल रहा था. एक दिन मैनेजर के हाथ रिंगमास्टर का चाबुक लग गया. उसे चलाने का कोई ज्ञान नहीं था. लेकिन हौंकने में उसे मज़ा आने लगा. फिर ऐलान हुआ कि आज से सर्कस मैनेजर साहब चलाएंगे. नतीजा, सर्कस अस्त, मैनेजर मस्त.
हालांकि, द ग्रेट अमेरिकन सर्कस का ग्रेटेस्ट ऐक्ट अभी बाकी था. उसका दिन आया 06 जनवरी 2021 को. जब डोनाल्ड ट्रंप और उनके साथियों ने भीड़ को उकसाया. अंधभक्तों का जमावड़ा हार मानने के लिए तैयार नहीं था. आरोप वोटिंग और काउंटिंग में धांधली का था. सोशल मीडिया पर फ़ेक कैंपेन का सिलसिला चल ही रहा था.
पूरे अमेरिका से ट्रंप समर्थक वॉशिंगटन डीसी पहुंच रहे थे. सूखे भूसे में माचिस मारने की देर थी. आग भड़क गई. भीड़ को पर्याप्त ईंधन मिल चुका था. वे लोग कैपिटल हिल में चढ़ आए. कैपिटल हिल से अमेरिका की संसद चलती है. उस दिन सदन की बैठक चल रही थी. इसी दौरान भीड़ ने हमला कर दिया.
उन्होंने घंटों तक हिंसा और आगजनी की. जब सब थमा तब तक दुनिया सदमे में जा चुकी थी. हिंसा में कई लोग मारे जा चुके थे. बड़ी संख्या में घायल भी हुए थे. उनके साथ ही लहूलुहान था, लोकतंत्र. एक सीख के साथ. भीड़ को सभ्य बनाने में सदियां बीत जातीं है, लेकिन उसी भीड़ को हिंसक और बर्बर बनाने के लिए एक पल ही काफ़ी होता है.
कैपिटल हिल दंगों के बाद क्या हुआ?
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कहे से पल्ला झाड़ लिया. हिंसा करने वाले समर्थकों से कन्नी काट ली.
फ़ेसबुक और ट्विटर ने ट्रंप को अपने-अपने प्लेटफ़ॉर्म्स से बर्खास्त कर दिया.
ट्रंप का जाना तय था. वो गए भी. जाते-जाते महाभियोग झेलकर गए. हालांकि, ये प्रस्ताव पास नहीं हो सका.
राष्ट्रपति पद से उतरने के बाद ट्रंप अपने बिजनेस में जुट गए. उनका चाल और चरित्र बरकरार रहा. उन्हें किसी भी तरह की सज़ा भी नहीं हुई. लेकिन उनके इशारे पर कुएं में कूदने वाले फंसकर रह गए. कैपिटल हिल के दंगों में शामिल कई लोगों की नौकरी चली गई. कुछ को सज़ा सुनाई जा चुकी है. कई सज़ा पाने का इंतज़ार कर रहे हैं.
डोनाल्ड ट्रंप गए तो जो बाइडन आए. उम्मीद जताई जा रही थी कि उनके पास हर मर्ज़ का इलाज है. बाइडन को अलादीन का चिराग समझा गया. न्याय का मसीहा टाइप की उपाधियों से नवाजा गया. कहा गया कि अब सब चकाचक हो जाएगा. स्वर्णिम-युग आने ही वाला था. लेकिन फिर काले बादल छा गए. उस कथित सुनहरे युग की आभी छिपी रह गई.
जो बाइडन के कार्यकाल को एक साल पूरा होने वाला है. अफ़ग़ानिस्तान से वापसी में ब्लंडर हुआ. अमेरिका ने निकलते-निकलते ड्रोन हमले में बेगुनाह बच्चों और लोगों को मारा. इस मामले में किसी दोषी पर कार्रवाई नहीं हुई.
हेती और मेक्सिको से आने वाले शरणार्थियों के साथ दुर्व्यवहार जारी है. निजी बंदूकों से होने वाली हिंसा बढ़ रही है. कोरोना फिर से बेकाबू हो रहा है.
जिन वादों और उम्मीदों के साथ बाइडन आए थे, वे एक-एक कर टूट रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ये अमेरिका का ‘जुमला’ मोमेंट है? आपको क्या लगता है?
मोमेंट की बात आई तो एक और मोमेंट याद हो आया. एक फ़रवरी की सुबह. सड़क किनारे फ़िटनेस के गुर सिखाती लड़की. और, बैकग्राउंड में चौकड़ी भरती मिलिटरी की गाड़ियां. कुछ याद आया!
बात म्यांमार की हो रही है. जब सेना ने तड़के सुबह तख़्तापलट कर दिया था. म्यांमार में लोकतंत्र अचानक से आया और चला भी गया. सेना सर्वेसर्वा हो गई. उसने लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार पर धांधली का लांछन लगाकर उसे जेल में बंद कर दिया. फिर आपातकाल लगा दिया. उनके क्रियाकलाप का मज़मून ये था कि लोकतंत्र बहुत अच्छा है. हम बहुत सम्मान करते हैं. लेकिन तभी तक, जब तक कि वो पिंजड़े में बंद रहे.
म्यांमार में तख़्तापलट के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए. अभी भी हो रहे हैं. सेना ने उनको बुरी तरह कुचला है. इस दमन में एक हज़ार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. म्यांमार के अलग-अलग हिस्सों में सामूहिक क़ब्रें मिल रहीं है. पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है.
इसके अलावा, तख़्तापलट से पहले की स्टेट काउंसलर आंग सान सू ची को एक मामले में सज़ा सुनाई जा चुकी है. दूसरे मामले में सज़ा का ऐलान होना बाकी है.
जहां तक भविष्य का सवाल है. सेना ने वादा किया था कि एक साल के भीतर चुनाव कराए जाएंगे. डेडलाइन अब दो साल आगे खिसक चुकी है. ये कभी ठहरेगी भी, इस पर संशय बरकरार है.
बरकरार एक परंपरा भी है. तख़्तापलट की. अफ़्रीकी महाद्वीप में. 2021 में अफ़्रीका के चार देशों में सत्ता पलटी गई.
अप्रैल महीने में चाड में एक अनोखी घटना घटी. तत्कालीन राष्ट्रपति इदरिस डेबी विद्रोहियों के ख़िलाफ़ लड़ाई का मुआयना करने पहुंचे. इसी दौरान गोली लगने से उनकी मौत हो गई. अगर संविधान के आधार पर चला जाता तो संसद के स्पीकर को राष्ट्रपति का पदभार संभालना था. चाड में राजतंत्र भी नहीं है. इसके बावजूद डेबी के बेटे महामत इदरिस डेबी ने कुर्सी पर क़ब्ज़ा कर लिया. उसने संसद और संविधान, दोनों को भंग कर दिया. अब वो अंतरिम सरकार का मुखिया है. उसने 18 महीने में चुनाव कराने का वादा किया है.
चाड की घटना के एक महीने बाद यानी मई 2021 में माली में दोहराव हुआ. वहां सेना ने अपनी ही बनाई सरकार का पत्ता गोल कर दिया. ये सरकार अंतरिम थी. अगस्त 2020 में सैन्य तख़्तापलट के बाद बनाई गई थी. नौ महीने के भीतर माली में हुआ ये दूसरा तख़्तापलट था. लगातार दो साल में दो बार. अगर वार्षिक तख़्तापलट की ये परंपरा टूटी तो तीसरे साल में चुनाव की संभावना है.
माली के बाद मशाल पहुंची गिनी. वहां सितंबर में राष्ट्रपति अल्फ़ा कोंडे को किनारे लगा दिया. एलीट फ़ोर्सेज़ की एक यूनिट ने पहले स्टेट टीवी को कंट्रोल में लिया. फिर राष्ट्रपति को. कोंडे गिनी में लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए पहले राष्ट्रपति थे. हालांकि, उनका कार्यकाल भ्रष्टाचार, टॉर्चर, दमन आदि से भरा रहा.
2020 में कोंडे ने राष्ट्रपति पद की लिमिट बढ़ा ली. बाद में उन्होंने पुलिस और सेना का बजट घटा दिया. लेकिन अपने खर्च का बजट बढ़ा लिया. इसको लेकर लंबे समय से गुस्सा उबल रहा था. सेना ने इस उबाल को साध लिया. नतीजा ये हुआ कि तख़्तापलट के बाद जनता सेना के सपोर्ट में रैली कर रही थी.
जब गिनी का मैटर थमा तो सूडान में खेला हो गया. 25 अक्टूबर को प्रधानमंत्री अब्दुल्ला हमदोक सॉवरेन्टी काउंसिल के मुखिया अब्देल फ़तह अल-बुरहान से मिलने गए. सॉवरेन्टी काउंसिल 2019 में तानाशाह राष्ट्रपति ओमर अल-बशीर को हटाने के बाद बनाई गई थी. इसमें सेना और नागरिक, दोनों तरफ़ के लोग शामिल थे. लेकिन उनके बीच पटरी बैठ नहीं पाई.
अक्टूबर में हमदोक के साथ-साथ कई कैबिनेट मंत्रियों को गिरफ़्तार कर लिया गया. काउंसिल को भंग कर दिया गया. अल-बुरहान ने अपना एकाधिकार स्थापित करने की कोशिश की. जनता ने प्रोटेस्ट किया. विदेश से दबाव भी पड़ा. फिर हमदोक को रिहा कर दिया गया.
अल-बुरहान ने हमदोक को फिर से प्रधानमंत्री बना दिया. सेना कह रही है कि 2023 में चुनाव होंगे, उसके बाद हम राजनीति नहीं करेंगे. जनता कह रही है, काल करै सो आज कर. इसी मतभेद को लेकर सूडान में रार छिड़ी हुई है. लोगों का मरना और सत्ताधारियों की ज़िद जारी है.
ज़िद तो कोरोना महामारी ने भी बांध रखी है. टिके रहने की. 2021 की शुरुआत आशाओं से भरी थी. वैज्ञानिकों ने अभूतपूर्व काम करते हुए कोरोना वैक्सीन्स का ईजाद कर लिया था. उम्मीद यही थी कि इस साल महामारी ख़त्म हो जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अप्रैल-मई में भारत में डेल्टा वेरिएंट का कहर चरम पर था. सरकार की लेटलतीफ़ी और निर्दयता के चलते हज़ारों लोग बेमौत मारे गए. दिल दहलाने वाली तस्वीरें और वीडियोज़ दुनियाभर में छाए रहे.
इसी साल अमेरिका में कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा आठ लाख के पार हो गया. ब्राज़ील में छह लाख और भारत में ये आंकड़ा चार लाख के पार पहुंचा.
तूफ़ान के बाद शांति आई. वैक्सीनेशन की रफ़्तार तेज़ हुई. संक्रमण थमने लगा. गंभीर बीमारियों के मामले कम होने लगे. उत्साह बढ़ा तो सीमाएं खोलीं गई. इंसानी स्पर्श की आज़ादी मिली. दुनिया अपने ढर्रे पर लौटने लगी थी. तभी साउथ अफ़्रीका में ओमिक्रॉन वेरिएंट का पहला मामला पकड़ में आया. और, फिर पूरा क्रम वापस पहली सीढ़ी पर पहुंच गया.
ओमिक्रॉन वेरिएंट तेज़ी से फैलता है. हालांकि, इससे गंभीर बीमारी की आशंका कम है. हमारे पास पहले से बेहतर तैयारी है. कई वैक्सीन्स हैं. दवाएं है. पुराने अनुभव हैं. इनकी बदौलत ओमिक्रॉन से टक्कर ली जा सकती है. ये 2021 की देन है.
लेकिन इसी साल में दो डराने वाले पहलू भी सामने आए.
पहला, वैक्सीन असमानता का मामला. विकसित देशों के पास आबादी से कई गुणा अधिक वैक्सीन्स हैं. इतनी कि वे रखी-रखी बर्बाद हो रहीं है. वहीं, ग़रीब देश दस फीसदी आबादी को भी वैक्सीन नहीं लगा पाए हैं. इसके चलते नए वेरिएंट्स का ख़तरा बरकरार रहेगा. महामारी तो बरकरार रहेगी ही.
दूसरा पहलू, वैक्सीन के विरोध से जुड़ा है. यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में लोग वैक्सीन मैनडेट के विरोध में उतरे. कई जगहों पर दंगे भी हुए. आबादी का ये हिस्सा कोरोना वैक्सीन को अपनी आज़ादी में बाधक मानता है. ये जानते हुए कि एक भी व्यक्ति का छूट जाना महामारी को बने रहने का मौका देता है. इस साल तो उनकी चेतना नहीं जागी. अगले साल क्या कुछ बदलेगा, देखने वाली बात होगी!
देखना अफ़ग़ानिस्तान में भी था. दिखा भी. अफ़ग़ानिस्तान में. अमेरिका ने हड़बड़ी में 20 साल पुराना युद्ध समाप्त किया. उसी ज़ल्दबाजी में वे तैयारी करना भूल गए. फिर जो हुआ, उसे बस एक बुरे अध्याय की तरह याद रखा जा सकता है.
अगर 2021 की सबसे बड़ी वैश्विक घटना के बारे में पूछा जाए तो वो होगी, घर वापसी. अमेरिका अपने घर लौटा. तालिबान काबुल में. 20 साल बाद. तालिबान ने जुलाई में अपना अभियान शुरू किया था. 15 अगस्त तक काबुल पर उसका क़ब्ज़ा हो चुका था. हज़ारों सैनिकों और नागरिकों की मौत और अरबों-ख़रबों रुपया गंवाने के बाद भी अफ़ग़ानिस्तान तालिबान-मुक्त नहीं हो पाया. अफ़ग़ानिस्तान, अमेरिका के लिए 21वीं सदी का वियतनाम साबित हुआ.
फिलहाल, तालिबान सत्ता में है. उसे टक्कर देने वाला कोई नहीं है. अफ़ग़ान जनता क़यामत का इंतज़ार कर रही है. मुल्क़ मानवीय संकट के मुहाने पर खड़ा है. इन सबका सबसे बड़ा दोषी अमेरिका ही मामले में मुंसिफ़ भी है. आप फ़ैसले का अंदाज़ा लगा सकते हैं.
इसी साल इज़रायल और हमास के बीच लंबा युद्ध भी चला. मई महीने में. 11 दिनों तक. इस लड़ाई में लगभग तीन सौ लोग मारे गए. हज़ारों लोग विस्थापित हुए. इज़रायल के हमलों में फ़िलीस्तीन की सैकड़ों इमारतें तबाह हुईं.
चर्चा ये थी कि बेंजामिन नेतन्याहू अपनी कुर्सी बचाने के लिए लड़ाई को खींच रहे हैं. इज़रायल में दो साल में चार चुनाव हुए थे. इसके बावजूद कोई पार्टी या गठबंधन सरकार नहीं चला पा रही थी. चौथे चुनाव के बाद नेतन्याहू की पार्टी को सरकार बनाने का पहला अवसर मिला. वे चूक गए.
नेतन्याहू चाह रहे थे कि किसी तरह पांचवे चुनाव का रास्ता तैयार कर दिया जाए. ताकि वो कुर्सी पर बने रहें. उनकी चाल नाकाम रही. इज़रायल के इतिहासम में पहली बार एक अरब पार्टी सरकार में शामिल हुई. मंसूर अब्बास की राम पार्टी ने अंतिम समय पर नफ़्ताली बेनेट को समर्थन दिया. बेनेट प्रधानमंत्री बन गए. इसने इज़रायल में नेतन्याहू-युग के अवसान पर मुहर लगा दी.
2021 का साल भयावह प्राकृतिक आपदाओं के लिए भी याद रखा जाएगा.
अमेरिका में तूफ़ान, टोरनेडो और बुशफ़ायर ने पूरे साल तबाही मचाई.
इटली, ग्रीस, तुर्की, रूस, ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों में आगजनी की वजह से जानमाल का भारी नुकसान हुआ. कनाडा में जून-जुलाई के महीने में हीटवेव का कहर रहा. कनाडा में 1937 के बाद सबसे गर्म तापमान इसी साल था. वहां इसके चलते पांच सौ से अधिक लोगों की जान चली गई. जर्मनी, चीन, फ़िलीपींस, बेल्जियम और मलेशिया में फ़्लैश फ़्लड्स आए.
क्रिश्चियन ऐड ग्रुप की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस साल 10 सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं के चलते दुनिया को लगभग 1100 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.
इन सारी अप्रत्याशित घटनाओं को क्लाइमेट चेंज़ से जोड़कर देखा गया.
इन चिंताओं को दूर करने की उम्मीद ग्लासगो सम्मेलन पर थी. कॉन्फ़्रेंस ऑफ़ द पार्टीज़ यानी कॉप-26 की बैठक नवंबर में ग्लासगो में हुई. इसमें बढ़ते तापमान को काबू करने और असमर्थ देशों की मदद पर चर्चा होनी थी. इसमें पैरिस क्लाइमेट डील की समीक्षा भी की जानी थी. कॉप-26 को दुनिया बचाने की आख़िरी उम्मीद के तौर पर देखा जा रहा था. वैज्ञानिक ये मानकर चल रहे थे कि अब राजनेता सचेत हो जाएंगे, क्योंकि तलवार सिर पर लटक रही है.
ये उम्मीद ग़लत साबित हुई. कॉप-26 कुछ बिंदुओं को छोड़कर पूरी तरह विफ़ल रहा. कार्बन उत्सर्जन कम करने को लेकर आम सहमति नहीं बन सकी. रूस और चीन के राष्ट्रपति इस बैठक में हिस्सा लेने तक नहीं आए. पूरा सम्मेलन एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने और तोहमत मढ़ने का अड्डा बना रहा. ज़िम्मेदारी से भागने की रेस में कोई पीछे नहीं छूटा.
जहां तक खेलों की बात है. इस साल दो बड़े आयोजन हुए. जुलाई-अगस्त में विरोध और आशंकाओं के बीच टोक्यो में ओलंपिक गेम्स खेले गए. 2020 में कोरोना के चलते इसे पोस्टपोन करना पड़ा था. ओलंपिक्स के दौरान कई दुर्लभ पल देखने को मिले.
अमेरिकी एथलीट सिमोन बाइल्स ने मेंटल हेल्थ के आधार पर गेम से नाम वापस ले लिया. उनके इस कदम के बाद खेल में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बहस शुरू हुई. कनाडा की महिला फ़ुटबॉल टीम की खिलाड़ी क़्विन ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली ट्रांसजेंडर बनी. टोक्यो ओलंपिक्स में रेकॉर्ड संख्या में LGBTQ एथलीट्स ने हिस्सा लिया.
ओलंपिक्स के दौरान ही एक बड़ा राजनैतिक बखेड़ा खड़ा हुआ. जब बेलारूस की स्प्रिंटर क्रिस्टीना तिमानोस्काया को अचानक लौटने के लिए कह दिया गया. क्रिस्टीना ने कोच की आलोचना की थी. उन्होंने एयरपोर्ट पर पहुंचकर अधिकारियों से मदद मांगी. उन्हें डर था कि बेलारूस लौटने पर जेल भेजा जा सकता है. बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्ज़ेंडर लुकाशेनको आलोचकों को दबाने के लिए कुख़्यात हैं. क्रिस्टीना को पोलैंड ने उन्हें अपने यहां शरण दी.
इसी बरस पांच साल बाद टी-20 क्रिकेट वर्ल्ड कप का आयोजन भी हुआ. इस बार ये टूर्नामेंट भारत में खेला जाना था. लेकिन कोरोना की वजह से यूएई और ओमान में शिफ़्ट करना पड़ा. ऑस्ट्रेलिया ने फ़ाइनल में न्यू ज़ीलैंड को हराकर खिताब अपने नाम किया.
इस बार का टूर्नामेंट एक और वजह से चर्चा में रहा. दक्षिण अफ़्रीका के क़्विंटन डी कॉक ने ब्लैक लाइव्स मैटर के समर्थन में घुटने मोड़ने से मना कर दिया. डी कॉक को टीम से बाहर कर दिया गया. उन पर बैन की चर्चा शुरू हो गई थी. दक्षिण अफ़्रीका में नस्लभेद का लंबा इतिहास रहा है. इसलिए, ये मामला संगीन था. डी कॉक के माफ़ी मांगने के बाद विवाद शांत हुआ.
नस्लभेद के जिन्न ने इंग्लिश क्रिकेट में भी तहलका मचाया. यॉर्कशायर क्रिकेट क्लब के अज़ीम रफ़ीक ने साथी क्रिकेटरों पर नस्लभेद के आरोप लगाए. इनमें माइकल वॉन से लेकर अलेक्स हेल्स तक शामिल थे. इस कांड के कारण काउंटी के कई वरिष्ठ अधिकारियों को इस्तीफ़ा देना पड़ा.
इस समय ऐशेज सीरीज़ चल रही है. सीरीज़ के तीन मैच खेले जा चुके हैं. ऑस्ट्रेलिया 3-0 से आगे है. जिस अंदाज़ में इंग्लैंड खेल रही है, वाइटवॉश कोई बड़ा आश्चर्य नहीं होगा.
सिनेमा की दुनिया में कोरियन टीवी सीरीज़ स्क्विड गेम ने सबसे अधिक सुर्खियां बटोरी.
अब कुछ पॉइंट में कम चर्चित मगर सुखद ख़बरें जान लेते हैं,
- 2021 में दुनिया ने ग्रेट रेज़िग्नेशन देखा. पूरी दुनिया में लोगों ने रेकॉर्ड संख्या में नौकरी बदली या फिर हमेशा के लिए छोड़ दी. इनमें से अधिकांश लोग लंबे समय से दमघोंटू माहौल में काम कर रहे थे. उन्हें लॉकडाउन के दौरान जीवन को नए नज़रिए से देखने का समय और मौका मिला. पिछले साल काम की कमी थी. इस साल काम करने वालों की कमी हो गई. इतनी कमी कि कई देशों में सप्लाई चेन्स पटरी से उतर गए. जानकारों की मानें तो ये एक सुखद संकेत था. अर्थव्यवस्था के उभार का.
- अक्टूबर में WHO ने मलेरिया के पहले टीके के इस्तेमाल को मंज़ूरी दी. ये टीका सदी भर के इंतज़ार और 30 सालों की मेहनत के बाद तैयार हुआ. अफ़्रीका में मलेरिया से हर साल दो लाख से अधिक बच्चों की मौत हो जाती है.
- इस साल दुनिया के कई रुढ़िवादी देश थोड़े उदार हुए. साउथ कोरिया, थाईलैंड, अर्जेंटीना और मेक्सिको में गर्भपात को कानूनी मान्यता मिल गई. इसे महिलाओं की व्यक्तिगत आज़ादी से जोड़कर देखा गया.
- दिसंबर महीने में वैज्ञानिक जेम्स वेब टेलीस्कोप को लॉन्च करने में कामयाब हुए. लगभग 74 हज़ार करोड़ रुपये की ये दूरबीन ब्रह्मांड के नए राज़ खोलने वाली है.
जाते-जाते शेर सुनते जाइए. इस साल के नाम.
इब्ने इंशा कह गए,
उस शाम वो रुख़्सत का समां याद रहेगा
वो शहर वो कूचा वो मकां याद रहेगा
हम भूल सके हैं न तुझे भूल सकेंगे
तू याद रहेगा हमें हां याद रहेगा.

