एक कैप्सूल ने ऑस्ट्रेलिया में बवाल कर दिया!
ऑस्ट्रेलिया में गायब एक कैप्सूल ने कैसे हड़कंप मचा दिया?

सबसे पहले ये तस्वीर देखिए.
सिल्वर कलर की एक बोल्ट जैसी कोई चीज है. इसकी लंबाई आठ मिलीमीटर है. यानी, दशमलव 31 इंच. लंबाई में ये पांच रुपये के सिक्के से भी छोटी है. और,
ये किसी फ़िल्म का डायलॉग नहीं है. ये आज के दिन ऑस्ट्रेलिया की सच्चाई है. दरअसल, 16 जनवरी 2023 को एक रेडियोएक्टिव कैप्सूल को ट्रक में लादकर रिपेयर के लिए भेजा गया. पूरी सावधानी के साथ. बढ़िया पैकिंग करके. ताकि कुछ गड़बड़ ना हो. 25 जनवरी को पैकेज खोला गया. पता चला कि उसमें कैप्सूल है ही नहीं. आशंका ये जताई गई कि कैप्सूल रास्ते में गिर गया होगा. जहां से वो आया था, वो जगह 14 सौ किलोमीटर दूर थी. मक्के के दाने के बराबर की एक चीज 14 सौ किलोमीटर के दायरे में कहीं भी हो सकती है. यानी, ये भूसे के ढेर में राई का दाना ढूंढने जैसा है.
जैसे ही ये जानकारी बाहर आई, पूरे देश में हड़कंप मच गया. सरकार तुरंत हरकत में आई. उसने सर्च ऑपरेशन चलाने के लिए पूरी टीम तैनात की. अब इस मिशन में ऑस्ट्रेलिया की न्युक्लियर एजेंसी भी शामिल हुई. इसके अलावा, इमरजेंसी डिपार्टमेंट ने लोगों को सावधान रहने के लिए भी कहा. फिर 01 फ़रवरी को ख़बर आई कि, कैप्सूल का ढूंढ लिया गया है. जब तक ये नहीं मिला था, तब तक पूरे ऑस्ट्रेलिया की सांस अधर में लटकी हुई थी.
तो, आइए जानते हैं,
- ऑस्ट्रेलिया में खोया कैप्सूल आख़िर मिला कैसे?
- इतने छोटे कैप्सूल के पीछे ऑस्ट्रेलिया इतना परेशान क्यों था?
- और, अगर ये कैप्सूल नहीं मिला तो क्या कुछ हो सकता है?
145 बरस पुरानी एक एंग्लो-ऑस्ट्रेलियन कंपनी है, रियो टिन्टो. इसका हेडक़्वार्टर लंदन में है. लेकिन बिजनेस ऑस्ट्रेलिया तक फैला हुआ है. किस चीज का बिजनेस? मेटल और माइनिंग का. इस सेक्टर में ये दुनिया की तीन सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है.
रियो टिन्टो के कुछ माइन्स वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया में भी हैं. वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रेलिया का एक प्रांत है. इसी प्रांत के उत्तर में पिलबरा है. यहां रियो टिन्टो की आयरन ओर की खदाने हैं. आयरन ओर, लोहे का कच्चा माल होता है. पूरी दुनिया के खदानों से कच्चा माल निकालने के लिए रेडियोएक्टिवट मटेरियल्स का इस्तेमाल रोज़ाना होता है. हालांकि, इसमें पूरी सावधानी बरती जाती है. रेडियोएक्टिव मटेरियल्स को रखने में, उसको कैरी करने में या एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में हर तरह के सुरक्षा उपायों का खयाल रखा जाता है. अगर पूरे प्रोसेस में कहीं भी गड़बड़ हुई तो ये ख़तरनाक हो सकता है.
इस ख़तरे का एक रूप 25 जनवरी को समझ में आया. दरअसल, 10 जनवरी को पिलबरा से सीजियम-137 से भरे एक कैप्सूल में गड़बड़ी हुई. तय हुआ कि इसे रिपेयर करने के लिए पर्थ भेजा जाएगा. पर्थ, वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की राजधानी है. पिलबरा से पर्थ का रास्ता लगभग डेढ़ हज़ार किलोमीटर लंबा है. कैप्सूल को स्टील के डब्बे में अच्छे से बंद करके फिर ट्रक में रखा गया. और, 12 जनवरी को ट्रक पर्थ की तरफ़ रवाना हो गया. 16 जनवरी को सामान पर्थ पहुंच गया. 25 जनवरी को पैकेज खोलने की बारी आई. जब ट्रक खुला तो पता चला कि कैप्सूल वाला पैकेज गायब है. ट्रक के कुछ नट-बोल्ट निकले हुए थे. जैसे ही कंपनी को ये पता चला, उसने वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया के सरकारी विभागों को बताया. इसकी गंभीरता का पता लगते ही पूरा डिपार्टमेंट एक्शन में आ गया. इसके बाद लंबा सर्च ऑपरेशन शुरू हुआ.
कैप्सूल की तलाश में पूरी सरकार जुटी हुई थी. लेकिन एक हफ़्ते तक इसकी कोई खोज-ख़बर नहीं मिली. इसकी दो बड़ी वजहें थीं.
- पहली. कैप्सूल का आकारा. कैप्सूल आकार में इतना छोटा था कि उसे नज़रों से तलाशना मुश्किल था. और तो और, पिलबरा से पर्थ तक का रास्ता इतना लंबा था कि, एक-एक कोने को नहीं छाना जा सकता था.
- दूसरी वजह देरी से जुड़ी थी. कैप्सूल 12 से 16 जनवरी के बीच ट्रक से गिरा था. जबकि इस गुमशुदगी का पता चलने में 10 दिन लग गए. आशंका ये जताई गई कि, हो सकता है कैप्सूल किसी गाड़ी के टायर में चिपक कर रिहाइशी इलाके में पहुंच गया हो. अगर ऐसा होता तो आम लोग सीधे इसके दायर में आ सकते थे. इस वजह से दहशत का माहौल पनप रहा था.
वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया के फ़ायर और इमरजेंसी डिपार्टमेंट ने बयान जारी कर लोगों को चेतावनी दी. इसमें बताया गया कि, अगर कैप्सूल दिखे तो क्या करना है और क्या नहीं करना है? बकौल चेतावनी,
- अगर कैप्सूल दिखे तो उससे पांच मीटर दूर रहना है.
- किसी भी हालत में उसको छूना नहीं है.
- कैप्सूल को उठाकर बैग या जेब या कार में नहीं रखना है.
- और, पहली फुर्सत में इमरजेंसी डिपार्टमेंट को फ़ोन करना है.
अगर किसी ने ग़लती से छू लिया या कैप्सूल के संपर्क में आ गया तो? वैसी स्थिति में तुरंत अस्पताल जाना है और डॉक्टर को पूरी जानकारी देनी है और इलाज शुरू कराना है. हेल्थ डिपार्टमेंट का कहना था कि, इसके संपर्क में आने से स्किन में जलन और शरीर में कमज़ोरी आ सकती है. मीडिया रपटों में ये भी कहा गया कि इसको छूने भर से गंभीर बीमारी हो सकती है. और, इसका असर तीन सौ बरसों तक रह सकता है. हमने एक्सपर्ट से पूछा कि, इन रपटों में कितनी सच्चाई है? और, ये कितना ख़तरनाक है? एक्सपर्ट ने बताया कि
अगला सवाल हमने ये पूछा कि, इस कैप्सूल का इस्तेमाल कहां होता है?
एक्सपर्ट ने इसपर हमें बताया
अब सवाल ये कि, ऑस्ट्रेलिया में खोया कैप्सूल इकलौता था या इस तरह के और भी हैं? मामले के जानकार ने हमें बताया कि
आपने सीसियम कैप्सूल का पूरा तिया-पांचा समझा. अब ये जान लेते हैं कि, इस मामले में अपडेट क्या है?
- 01 फ़रवरी को अधिकारियों ने जानकारी दी कि, खोया हुआ कैप्सूल तलाश लिया गया है. सर्च ऑपरेशन में लगी एक गाड़ी को ये कैप्सूल रास्ते के किनारे पर मिला. इसके बाद आस-पास के 20 मीटर के रेडियस को हॉट ज़ोन घोषित कर दिया गया है. अब एक स्पेशल टीम उस कैप्सूल को सुरक्षित जगह पर ले जाएगी. जानकारों का कहना है कि एक बड़ा ख़तरा टल गया है.
- ऑस्ट्रेलिया सरकार ने रेडियोएक्टिव मटेरियल्स से जुड़े कानूनों में बदलाव का वादा किया है. फिलहाल, इस तरह के मटेरियल्स को लाने-ले जाने में गड़बड़ी के लिए सिर्फ 80 हज़ार रुपये का ज़ुर्माना है. प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने कहा है कि ये ज़ुर्माना पर्याप्त नहीं है.
ऑस्ट्रेलिया ने तो रेडियोएक्टिव कैप्सूल समय रहते ढूंढ लिया. ये सुखद है. लेकिन इस घटना ने पूरी दुनिया को सतर्कता बरतने की सलाह ज़रूर दी है. देखना दिलचस्प होगा कि, ज़िम्मेदार संस्थाएं और सरकारें इस तरक के ख़तरे को कितनी गंभीरता से लेती हैं!
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