स्मार्ट लोन या ईजी कैश लेना कितना भारी पड़ सकता है, इन लोगों का रोना बता देगा
RBI से लेकर साइबर एक्सपर्ट तक, क्या कह रहे, क्या कर रहे ? जान लीजिए
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डिजिटल लेंडिंग की सांकेतिक तस्वीर (फोटो साभार: आजतक)
पैसे पेड़ पर नहीं उगते. लेकिन आपके मोबाइल इनबॉक्स और ऐपस्टोर्स में नजर आ सकते हैं. ईजी कैश, टेक मनी, रिच कैश, स्मार्ट लोन, फ्रेश कैश जैसे बेशुमार नामों से. लेकिन इन्हें लपकना महंगा पड़ सकता है. इस समय देश में सैकड़ों 'डिजिटल लेंडिंग ऐप्स' लोगों को एक इशारे पर झटपट लोन देते आ रहे हैं. दो-चार हजार से लेकर दस, बीस और पचास हजार तक. कुछ एक हफ्ते के लिए तो कुछ महीने-पंद्रह दिन के लिए. लेकिन आपने लालच या मजबूरी में लोन ले लिया, तो समझिए आप एक साजिशन बुने गए जाल में फंस गए हैं.
यहां सिवाय छटपटाने के आप कुछ नहीं कर सकते. फिर शुरू होगी धमकी, अपमान, बदनामी और ब्लैकमेलिंग की कभी न खत्म होने वाली दास्तां. जिसे आपने 'ईजी मनी' समझा था, उसके एक हफ्ते का ब्याज ही मूलधन से दोगुना होगा. सालाना 500 से 1000 पर्सेंट या कह लें कुछ भी हो सकता है. हर दिन की देरी के 100-200 नहीं 10-15 हजार रुपये तक पेनल्टी. आपने कहीं से पैसे जुगाड़ कर भुगतान कर भी दिया तो भी शायद छुटकारा न मिले. आप से बार-बार पैसे मांगे जाएंगे. चुप बैठे तो आपके फोन कॉन्टैक्ट वाले सभी रिश्ते-नाते, भाई-दोस्तों को ये खबर हो चुकी होगी. ये शिकायतें भी कि आपकी वजह से उन्हें गालियां सुननी पड़ रही हैं.
अवैध डिजिटल लेंडिंग ऐप्स यानी मोबाइल ऐप के जरिए तुरंत आपके वॉलेट में लोन मुहैया कराने का धंधा. स्मार्टफोन के बढ़ते चलन के साथ ये काला धंधा भी बड़े ही स्मार्ट तरीके से बढ़ा है. भोले-भाले ही नहीं, पढ़े-लिखे लोग भी इसकी गिरफ्त में आ रहे हैं. 'दी लल्लनटॉप' ने अपनी एक मुहिम में डिजिटल लेंडिंग ऐप्स की धोखाधड़ी से पीड़ित लोगों से संपर्क साधने की कोशिश की. जवाब में ठगी, जालसाजी, बेबसी और लाचारी की कई त्रासद कहानियां सुनने को मिलीं. इसकी एक बानगी देखिए-
शिकायतकर्ताओं की ओर से भेजे गए स्क्रीनशॉट.
अमित ने 'दी लल्लनटॉप को लेंडर्स की ओर से आने वाली एक कॉल का ऑडियो भी शेयर किया. उसकी भाषा इतनी गंदी और अपमानजनक है कि हम यहां शेयर नहीं कर सकते. लेकिन उसके एक हिस्से का ट्रांसक्रिप्शन कुछ यों है- दूसरी कहानी पंजाब के नरेश की है नरेश ने हमें फोन कर आप-बीती सुनाई. उन्होंने 'गोल्डमेन्स' नाम के लेंडिंग ऐप से सात दिन के लिए 22,000 रुपये का लोन लिया. सातवें दिन कुछ पैसे कम पड़ रहे थे. ऐप की तरफ से आई कॉल पर उन्हें पेशकश की गई कि 15,000 रुपये का भुगतान करके लोन कुछ दिनों के लिए एक्सटेंड करा सकते हो. उन्होंने 15,000 रुपये पे कर दिया. पता चला कि इस रकम का ब्याज पहले वाले से कई गुना ज्यादा था. हर आधे-अधूरे भुगतान और और एक्सटेंशन के बाद रेट अलग-अलग. एक हफ्ते की पेनल्टी हजारों में. फिर कॉलर्स के तेवर भी बदलने लगे. हर कॉल्स के साथ गाली और धमकियों का सिलसिला शुरू हो गया.
शिकायतर्ताओं द्वारा भेजे गए स्क्रीनशॉट.
नरेश का दावा है, नरेश ने हमें कुछ फोनकॉल्स की रिकॉर्डिंग मुहैया कराईं. इनमें भी इतनी भद्दी और गंदी गालियां दी गई हैं, जो हम यहां शेयर नहीं कर सकते.
ऐसी ही शिकायतें भभुआ, बिहार के निवासी उज्जवल कुमार ने की हैं. अपने वीडियो मेसेज में उज्जवल ने दावा किया कि उन्होंने कई लेंडिंग ऐप्स से काफी रकम लोन ले रखी थी. लेकिन जैसे ही भुगतान करना शुरू किया, ऐप्स की ओर से अनाप-शनाप रेट मांगे जाने लगे और भुगतान रिसीव नहीं होने की बात कही जाने लगी. तब जाकर उन्हें गलती का अहसास हुआ. बाद में लेंडर्स ने उन्हें धमकाना और परिजनों को गालियां देना शुरू कर दिया. इस बारे में उन्होंने पुलिस में भी एक शिकायत दर्ज कराई है.
हालांकि उज्जल ने ये साफ नहीं किया कि उन्होंने दर्जनों ऐप से लोन लेने के बजाय फॉर्मल सेक्टर या बैंकिंग का रास्ता क्यों नहीं चुना. लेकिन दूसरे कई शिकायतकर्ताओं की बातों से ये भी पता चलता है कि कुछ लोग ऐसे ऐप्स पर मिल रहे ऑफर्स को ईजी मनी मानकर झपट लेना चाहते हैं. कई लोग ये मानकर भी चल रहे थे कि रीपेमेंट नहीं करेंगे. लेकिन उन्हें ये अहसास तक नहीं था कि लेंडर्स ने ना सिर्फ उनके केवाईसी दस्तावेजों से नाम-पता ले लिए, बल्कि उनके कॉन्टैक्ट लिस्ट के लोगों को भी फोनकर डराना धमकाना और अपमानित करना शुरू कर देंगे. आधे से ज्यादा लेंडिंग ऐप अवैध डिजिटल लेंडिंग के नाम पर एक भरापूरा आपराधिक बाजार बीते कुछ वर्षों में लगातार बढ़ता आया है. सरकारी आंकड़ों की ही मान लें तो पिछले साल करीब 1100 डिजिटल लेंडिंग ऐप देश में ऑपरेट कर रहे थे. इनमें से करीब 600 अवैध पाए गए. कुछ की धरपकड़ भी हुई. कुछ को गूगल ने अपने प्ले स्टोर से हटा दिया. लेकिन एक बंद होते तो दूसरे आ जाते हैं.
प्रतिकात्मक तस्वीर (साभार: आजतक)
आप सोच रहे होंगे कि लोग इस तरह के लोन लेते ही क्यों हैं? तो हम थोड़ी देर के लिए आपका ध्यान देश की क्रेडिट व्यवस्था या कह लें कि कर्ज के बाजार की तरफ मोड़ते हैं. कहने को हमारे देश में 80 फीसदी से ज्यादा अडल्ट आबादी के पास अपना बैंक अकाउंट है. लेकिन उनमें से करीब 48 पर्सेंट इनएक्टिव हैं. रही बात कर्ज की तो 90 फीसदी शहरी और ग्रामीण गरीब आबादी इनफॉर्मल सेक्टर से लोन लेती है. यानी साहूकार, अड़ोस-पड़ोस, व्यापारी, एम्प्लॉयर वगैरह से.
इसकी एक वजह ये भी हो सकती है कि लोग बैंकों की कागजी और जटिल प्रक्रिया से नहीं गुजरना चाहते. इनमें बड़े पैमाने पर मिडल क्लास लोग भी हैं. डिजिटल लेंडिंग ने इसी गैप को भुनाने के लिए देश में पांव पसारना शुरू किया था. उसे चाहिए भी क्या था. हर हाथ में मोबाइल. उसमें केवाईसी से लैस पेटीएम, फोनपे, मोबीक्विक जैसे पेमेंट ऐप हैं ही. और सबसे बढ़कर ईजी मनी की इंसानी फितरत तो हर जगह है.
हमारे लिए ये तय करना मुश्किल था कि फर्जी लेंडिंग ऐप्स के शिकार लोगों में से कितनों ने मजबूरी या जरूरतें पूरी करने के लिए लोन लिया और कितनों ने लालच में. लेकिन एक बात साफ है कि सबका अंजाम लगभग एक जैसा हुआ और हो रहा है: धोखा, बेबसी, बदनामी. और पिछले साल छपी खबरों पर भरोसा करें तो करीब 20 लोगों की खुदकुशी भी. बैंक रेग्युलेटर RBI ने क्या कहा? इस बारे में हमने देश के बैंकिंग रेग्युलेटर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी RBI से संपर्क किया. उसके प्रवक्ता ने हमसे कहा,
आरबीआई की प्रतीकात्मक फोटो (साभार: आजतक)
आरबीआई प्रवक्ता ने बताया कि डिजिटल लेंडिंग ऐप्स के खिलाफ बढ़ती शिकायतों के मद्देनजर ही पिछले साल छह विशेषज्ञों का एक कार्यदल (Work Force) गठित किया गया था. उसने बीते दिसंबर में ही अपनी रिपोर्ट दी है. इस वर्कफोर्स की खास सिफारिशें ये रहीं कि- आरबीआई ने गूगल सहित कई पक्षों से कहा है कि वे अपने यहां ऐसे किसी भी ऐप को तुरंत बंद करें, जो बिना लाइसेंस लेंडिंग करता हो या किसी भी तरह की अवैध गतिविधि में लिप्त हो.
चलिए आरबीआई ने तो अपना बचाव कर लिया. लेकिन हाल फिलहाल इन कथित लेंडर्स के जाल में रोजाना फंसते लोग आखिर लुट-पिटकर कहां जाएं? हमें कई पीड़ितों ने बताया कि जब उन्होंने अपने साथ हो रही ज्यादती के खिलाफ पुलिस में शिकायत की तो पुलिस का रवैया ज्यादातर टालमटोल वाला रहा. कई बार उल्टे पीड़ितों से ही सवाल हुए कि तुमने ऐसे ऐप्स से पैसा लिया ही क्यों?
दिल्ली में ऐसे मामलों की जांच कर चुके एक पुलिस अधिकारी ने नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर कहा- पुलिस अधिकारी की बात से हमें आरबीआई वर्कफोर्स की एक और सिफारिश याद आई कि ऐसे मामलों के लिए एक विशेष कानून बनाया जाना चाहिए. फिलहाल देश में पैसे की लेन-देन और वित्तीय धोखाधड़ी से निपटने के लिए बैंकिंग, कोऑपरेटिव्स, चिटफंड, बीमा से जुड़े जितने भी कानून हैं, उनके दायरे में डिजिटल लेंडिंग ऐप्स सीधे तौर पर तो नहीं आते. फिर भी इन लेंडर्स के खिलाफ अब तक कहीं सबसे कारगर पुलिस कार्रवाई दिखी है तो वो है तेलंगाना. हैदराबाद पुलिस ने बीते साल 30 से ज्यादा आरोपियों को गिरफ्तार किया था. इनमें कुछ चीनी नागरिक भी थे.
हमारे सहयोगी चैनल आजतक की एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब एक साल पहले तक पुलिस और जांच एजेंसियों ने ऐसे कई ऐप्स पर शिकंजा कसा था. इनमें से कुछ के नाम हैं इनकैश, कैश ऐरा, कैश लॉयन, लकी वॉलेट, कोको कैश, रुपी पुस, इंडियन लोन, क्रेडिट फ्रिंच, टैप क्रेडिट, राथेन लोन, कैश पोर्ट, स्माइल लोन, क्रेडिट डे, कैश टुडे, लकी रुपी, गो कैश, स्नैपिट लोन, लोन जोन, क्विक कैश, पंडा रुपीस, प्ले कैश, धानी, लैजी पे, लोन टैप, आईपीपीबी मोबाइल, माइक्रेडिट, क्विक क्रेडिट, कैशऑन, रुपीस प्लस, रुपी नाउ, एलिफेंट लोन, एंट कैश और क्विक मनी. इनमें से कई ऐप बंद हो गए. लेकिन कई और मिलते जुलते नामों वाले ऐप आ गए हैं. ऐप्स को बैन करना मुश्किल अनरेगुलेटेड लेडिंग ऐप्स की चुनौतियों से निपटने के लिए (RBI) ने एक साइबर एक्सपर्ट को भी अपने पैनल में शामिल किया था. उनका नाम है राहुल ससी. वो बेंगलुरु स्थित साइबर सिक्योरिटी फर्म क्लाउडसेक (CloudSEK) के फाउंडर हैं. उन्होंने आरबीआई को इस समस्या से जुड़े कई तकनीकी पहलुओं पर अपनी राय दी है.
आरबीआई पैनल के सदस्य और साइबर एक्सपर्ट राहुल ससी
राहुल ससी ने दी लल्लन टॉप को बताया, राहुल कहते हैं कि कई बार कंज्यूमर भी इस नीयत से पैसे लेते हैं कि लौटाएंगे ही नहीं. ऐसे में लेंडर्स भी रिकवरी के लिए गलत तौर तरीके अपनाते हैं. लेकिन उनके जाल में ज्यादातर निर्दोष लोग ही फंसते हैं.
राहुल का मानना है कि वर्कफोर्स ने साइबर सिक्योरिटी, प्राइवेसी जैसे मसलों पर जो सिफारिशें सौंपी हैं, उनसे अवैध डिजिटल लेंडिंग को काबू करने में बड़ी मदद मिलेगी. उन्होंने ये भी कहा कि बेहतर हो कि डिजिटल लेंडिंग की इजाजत केवल बैंकों और नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (NBFC) को ही मिले या उनके अंडर में काम करने वाली एंटिटीज को. क्या कहते हैं साइबर एक्सपर्ट? लल्लनटॉप ने देश भर से मिली शिकायतों के आधार पर एक आम आदमी के नजरिए से डिजिटल फॉरेंसिक्स और साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट अदनान पटेल की राय ली. अदनान कहते हैं- चलते-चलते कुछ आंकड़ों पर नजर
भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ता फिनटेक बाजार है. यहां डिजिटल लेंडिंग का आंकड़ा 2023 तक 820 अरब डॉलर यानी 61 हजार 684 अरब रुपये से ज्यादा पहुंचने की उम्मीद है. बेंगलुरु की एक रिसर्च फर्म RedSeer ने अपने एक सर्वे में कहा था कि भारत में हर साल 200 अरब डॉलर (15000 करोड़ रुपये से ज्यादा) के लोन की लेनदेन तो परिवार के भीतर या यार-दोस्तों और परिचितों के बीच हो जाती है.
मोबाइल के प्रसार ने डिजिटल लेंडिंग को नई दिशा दी है. नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के आंकड़ों के मुताबिक 2021 में करीब 73 लाख करोड़ रुपये के कुल 3800 करोड़ UPI ट्रांजैक्शन हुए. ये आंकड़ा बताता है कि लोग वित्तीय लेन-देन के मामले में मोबाइल का कितना ज्यादा इस्तेमाल करने लगे हैं. फिनटेक कंपनियों की नजर भी इसी आंकड़े पर है.
यहां सिवाय छटपटाने के आप कुछ नहीं कर सकते. फिर शुरू होगी धमकी, अपमान, बदनामी और ब्लैकमेलिंग की कभी न खत्म होने वाली दास्तां. जिसे आपने 'ईजी मनी' समझा था, उसके एक हफ्ते का ब्याज ही मूलधन से दोगुना होगा. सालाना 500 से 1000 पर्सेंट या कह लें कुछ भी हो सकता है. हर दिन की देरी के 100-200 नहीं 10-15 हजार रुपये तक पेनल्टी. आपने कहीं से पैसे जुगाड़ कर भुगतान कर भी दिया तो भी शायद छुटकारा न मिले. आप से बार-बार पैसे मांगे जाएंगे. चुप बैठे तो आपके फोन कॉन्टैक्ट वाले सभी रिश्ते-नाते, भाई-दोस्तों को ये खबर हो चुकी होगी. ये शिकायतें भी कि आपकी वजह से उन्हें गालियां सुननी पड़ रही हैं.
अवैध डिजिटल लेंडिंग ऐप्स यानी मोबाइल ऐप के जरिए तुरंत आपके वॉलेट में लोन मुहैया कराने का धंधा. स्मार्टफोन के बढ़ते चलन के साथ ये काला धंधा भी बड़े ही स्मार्ट तरीके से बढ़ा है. भोले-भाले ही नहीं, पढ़े-लिखे लोग भी इसकी गिरफ्त में आ रहे हैं. 'दी लल्लनटॉप' ने अपनी एक मुहिम में डिजिटल लेंडिंग ऐप्स की धोखाधड़ी से पीड़ित लोगों से संपर्क साधने की कोशिश की. जवाब में ठगी, जालसाजी, बेबसी और लाचारी की कई त्रासद कहानियां सुनने को मिलीं. इसकी एक बानगी देखिए-
शिकायतकर्ताओं की ओर से भेजे गए स्क्रीनशॉट.
अमित ने 'दी लल्लनटॉप को लेंडर्स की ओर से आने वाली एक कॉल का ऑडियो भी शेयर किया. उसकी भाषा इतनी गंदी और अपमानजनक है कि हम यहां शेयर नहीं कर सकते. लेकिन उसके एक हिस्से का ट्रांसक्रिप्शन कुछ यों है- दूसरी कहानी पंजाब के नरेश की है नरेश ने हमें फोन कर आप-बीती सुनाई. उन्होंने 'गोल्डमेन्स' नाम के लेंडिंग ऐप से सात दिन के लिए 22,000 रुपये का लोन लिया. सातवें दिन कुछ पैसे कम पड़ रहे थे. ऐप की तरफ से आई कॉल पर उन्हें पेशकश की गई कि 15,000 रुपये का भुगतान करके लोन कुछ दिनों के लिए एक्सटेंड करा सकते हो. उन्होंने 15,000 रुपये पे कर दिया. पता चला कि इस रकम का ब्याज पहले वाले से कई गुना ज्यादा था. हर आधे-अधूरे भुगतान और और एक्सटेंशन के बाद रेट अलग-अलग. एक हफ्ते की पेनल्टी हजारों में. फिर कॉलर्स के तेवर भी बदलने लगे. हर कॉल्स के साथ गाली और धमकियों का सिलसिला शुरू हो गया.
शिकायतर्ताओं द्वारा भेजे गए स्क्रीनशॉट.
नरेश का दावा है, नरेश ने हमें कुछ फोनकॉल्स की रिकॉर्डिंग मुहैया कराईं. इनमें भी इतनी भद्दी और गंदी गालियां दी गई हैं, जो हम यहां शेयर नहीं कर सकते.
ऐसी ही शिकायतें भभुआ, बिहार के निवासी उज्जवल कुमार ने की हैं. अपने वीडियो मेसेज में उज्जवल ने दावा किया कि उन्होंने कई लेंडिंग ऐप्स से काफी रकम लोन ले रखी थी. लेकिन जैसे ही भुगतान करना शुरू किया, ऐप्स की ओर से अनाप-शनाप रेट मांगे जाने लगे और भुगतान रिसीव नहीं होने की बात कही जाने लगी. तब जाकर उन्हें गलती का अहसास हुआ. बाद में लेंडर्स ने उन्हें धमकाना और परिजनों को गालियां देना शुरू कर दिया. इस बारे में उन्होंने पुलिस में भी एक शिकायत दर्ज कराई है.
हालांकि उज्जल ने ये साफ नहीं किया कि उन्होंने दर्जनों ऐप से लोन लेने के बजाय फॉर्मल सेक्टर या बैंकिंग का रास्ता क्यों नहीं चुना. लेकिन दूसरे कई शिकायतकर्ताओं की बातों से ये भी पता चलता है कि कुछ लोग ऐसे ऐप्स पर मिल रहे ऑफर्स को ईजी मनी मानकर झपट लेना चाहते हैं. कई लोग ये मानकर भी चल रहे थे कि रीपेमेंट नहीं करेंगे. लेकिन उन्हें ये अहसास तक नहीं था कि लेंडर्स ने ना सिर्फ उनके केवाईसी दस्तावेजों से नाम-पता ले लिए, बल्कि उनके कॉन्टैक्ट लिस्ट के लोगों को भी फोनकर डराना धमकाना और अपमानित करना शुरू कर देंगे. आधे से ज्यादा लेंडिंग ऐप अवैध डिजिटल लेंडिंग के नाम पर एक भरापूरा आपराधिक बाजार बीते कुछ वर्षों में लगातार बढ़ता आया है. सरकारी आंकड़ों की ही मान लें तो पिछले साल करीब 1100 डिजिटल लेंडिंग ऐप देश में ऑपरेट कर रहे थे. इनमें से करीब 600 अवैध पाए गए. कुछ की धरपकड़ भी हुई. कुछ को गूगल ने अपने प्ले स्टोर से हटा दिया. लेकिन एक बंद होते तो दूसरे आ जाते हैं.
प्रतिकात्मक तस्वीर (साभार: आजतक)
आप सोच रहे होंगे कि लोग इस तरह के लोन लेते ही क्यों हैं? तो हम थोड़ी देर के लिए आपका ध्यान देश की क्रेडिट व्यवस्था या कह लें कि कर्ज के बाजार की तरफ मोड़ते हैं. कहने को हमारे देश में 80 फीसदी से ज्यादा अडल्ट आबादी के पास अपना बैंक अकाउंट है. लेकिन उनमें से करीब 48 पर्सेंट इनएक्टिव हैं. रही बात कर्ज की तो 90 फीसदी शहरी और ग्रामीण गरीब आबादी इनफॉर्मल सेक्टर से लोन लेती है. यानी साहूकार, अड़ोस-पड़ोस, व्यापारी, एम्प्लॉयर वगैरह से.
इसकी एक वजह ये भी हो सकती है कि लोग बैंकों की कागजी और जटिल प्रक्रिया से नहीं गुजरना चाहते. इनमें बड़े पैमाने पर मिडल क्लास लोग भी हैं. डिजिटल लेंडिंग ने इसी गैप को भुनाने के लिए देश में पांव पसारना शुरू किया था. उसे चाहिए भी क्या था. हर हाथ में मोबाइल. उसमें केवाईसी से लैस पेटीएम, फोनपे, मोबीक्विक जैसे पेमेंट ऐप हैं ही. और सबसे बढ़कर ईजी मनी की इंसानी फितरत तो हर जगह है.
हमारे लिए ये तय करना मुश्किल था कि फर्जी लेंडिंग ऐप्स के शिकार लोगों में से कितनों ने मजबूरी या जरूरतें पूरी करने के लिए लोन लिया और कितनों ने लालच में. लेकिन एक बात साफ है कि सबका अंजाम लगभग एक जैसा हुआ और हो रहा है: धोखा, बेबसी, बदनामी. और पिछले साल छपी खबरों पर भरोसा करें तो करीब 20 लोगों की खुदकुशी भी. बैंक रेग्युलेटर RBI ने क्या कहा? इस बारे में हमने देश के बैंकिंग रेग्युलेटर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी RBI से संपर्क किया. उसके प्रवक्ता ने हमसे कहा,
आरबीआई की प्रतीकात्मक फोटो (साभार: आजतक)
आरबीआई प्रवक्ता ने बताया कि डिजिटल लेंडिंग ऐप्स के खिलाफ बढ़ती शिकायतों के मद्देनजर ही पिछले साल छह विशेषज्ञों का एक कार्यदल (Work Force) गठित किया गया था. उसने बीते दिसंबर में ही अपनी रिपोर्ट दी है. इस वर्कफोर्स की खास सिफारिशें ये रहीं कि- आरबीआई ने गूगल सहित कई पक्षों से कहा है कि वे अपने यहां ऐसे किसी भी ऐप को तुरंत बंद करें, जो बिना लाइसेंस लेंडिंग करता हो या किसी भी तरह की अवैध गतिविधि में लिप्त हो.
चलिए आरबीआई ने तो अपना बचाव कर लिया. लेकिन हाल फिलहाल इन कथित लेंडर्स के जाल में रोजाना फंसते लोग आखिर लुट-पिटकर कहां जाएं? हमें कई पीड़ितों ने बताया कि जब उन्होंने अपने साथ हो रही ज्यादती के खिलाफ पुलिस में शिकायत की तो पुलिस का रवैया ज्यादातर टालमटोल वाला रहा. कई बार उल्टे पीड़ितों से ही सवाल हुए कि तुमने ऐसे ऐप्स से पैसा लिया ही क्यों?
दिल्ली में ऐसे मामलों की जांच कर चुके एक पुलिस अधिकारी ने नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर कहा- पुलिस अधिकारी की बात से हमें आरबीआई वर्कफोर्स की एक और सिफारिश याद आई कि ऐसे मामलों के लिए एक विशेष कानून बनाया जाना चाहिए. फिलहाल देश में पैसे की लेन-देन और वित्तीय धोखाधड़ी से निपटने के लिए बैंकिंग, कोऑपरेटिव्स, चिटफंड, बीमा से जुड़े जितने भी कानून हैं, उनके दायरे में डिजिटल लेंडिंग ऐप्स सीधे तौर पर तो नहीं आते. फिर भी इन लेंडर्स के खिलाफ अब तक कहीं सबसे कारगर पुलिस कार्रवाई दिखी है तो वो है तेलंगाना. हैदराबाद पुलिस ने बीते साल 30 से ज्यादा आरोपियों को गिरफ्तार किया था. इनमें कुछ चीनी नागरिक भी थे.
हमारे सहयोगी चैनल आजतक की एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब एक साल पहले तक पुलिस और जांच एजेंसियों ने ऐसे कई ऐप्स पर शिकंजा कसा था. इनमें से कुछ के नाम हैं इनकैश, कैश ऐरा, कैश लॉयन, लकी वॉलेट, कोको कैश, रुपी पुस, इंडियन लोन, क्रेडिट फ्रिंच, टैप क्रेडिट, राथेन लोन, कैश पोर्ट, स्माइल लोन, क्रेडिट डे, कैश टुडे, लकी रुपी, गो कैश, स्नैपिट लोन, लोन जोन, क्विक कैश, पंडा रुपीस, प्ले कैश, धानी, लैजी पे, लोन टैप, आईपीपीबी मोबाइल, माइक्रेडिट, क्विक क्रेडिट, कैशऑन, रुपीस प्लस, रुपी नाउ, एलिफेंट लोन, एंट कैश और क्विक मनी. इनमें से कई ऐप बंद हो गए. लेकिन कई और मिलते जुलते नामों वाले ऐप आ गए हैं. ऐप्स को बैन करना मुश्किल अनरेगुलेटेड लेडिंग ऐप्स की चुनौतियों से निपटने के लिए (RBI) ने एक साइबर एक्सपर्ट को भी अपने पैनल में शामिल किया था. उनका नाम है राहुल ससी. वो बेंगलुरु स्थित साइबर सिक्योरिटी फर्म क्लाउडसेक (CloudSEK) के फाउंडर हैं. उन्होंने आरबीआई को इस समस्या से जुड़े कई तकनीकी पहलुओं पर अपनी राय दी है.
आरबीआई पैनल के सदस्य और साइबर एक्सपर्ट राहुल ससी
राहुल ससी ने दी लल्लन टॉप को बताया, राहुल कहते हैं कि कई बार कंज्यूमर भी इस नीयत से पैसे लेते हैं कि लौटाएंगे ही नहीं. ऐसे में लेंडर्स भी रिकवरी के लिए गलत तौर तरीके अपनाते हैं. लेकिन उनके जाल में ज्यादातर निर्दोष लोग ही फंसते हैं.
राहुल का मानना है कि वर्कफोर्स ने साइबर सिक्योरिटी, प्राइवेसी जैसे मसलों पर जो सिफारिशें सौंपी हैं, उनसे अवैध डिजिटल लेंडिंग को काबू करने में बड़ी मदद मिलेगी. उन्होंने ये भी कहा कि बेहतर हो कि डिजिटल लेंडिंग की इजाजत केवल बैंकों और नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (NBFC) को ही मिले या उनके अंडर में काम करने वाली एंटिटीज को. क्या कहते हैं साइबर एक्सपर्ट? लल्लनटॉप ने देश भर से मिली शिकायतों के आधार पर एक आम आदमी के नजरिए से डिजिटल फॉरेंसिक्स और साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट अदनान पटेल की राय ली. अदनान कहते हैं- चलते-चलते कुछ आंकड़ों पर नजर
भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ता फिनटेक बाजार है. यहां डिजिटल लेंडिंग का आंकड़ा 2023 तक 820 अरब डॉलर यानी 61 हजार 684 अरब रुपये से ज्यादा पहुंचने की उम्मीद है. बेंगलुरु की एक रिसर्च फर्म RedSeer ने अपने एक सर्वे में कहा था कि भारत में हर साल 200 अरब डॉलर (15000 करोड़ रुपये से ज्यादा) के लोन की लेनदेन तो परिवार के भीतर या यार-दोस्तों और परिचितों के बीच हो जाती है.
मोबाइल के प्रसार ने डिजिटल लेंडिंग को नई दिशा दी है. नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के आंकड़ों के मुताबिक 2021 में करीब 73 लाख करोड़ रुपये के कुल 3800 करोड़ UPI ट्रांजैक्शन हुए. ये आंकड़ा बताता है कि लोग वित्तीय लेन-देन के मामले में मोबाइल का कितना ज्यादा इस्तेमाल करने लगे हैं. फिनटेक कंपनियों की नजर भी इसी आंकड़े पर है.

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