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हापुड़ में गोकशी के शक में मारे गए कासिम की इस तस्वीर की कहानी क्या है

जब ये शख्स तड़प-तड़पकर पानी मांग रहा था, तब किसी ने इसे पानी तक नहीं दिया.

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21 जून 2018 (अपडेटेड: 21 जून 2018, 10:37 AM IST)
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हापुड़ के बझौड़ा-खुर्द गांव में गोकशी के शक में कासिम को पीटने के बाद उसे हाथ-पैरों से टांगकर ले जाती भीड़ और पुलिस.
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ये जो तस्वीर आप देख रहे हैं, ये उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले की है. 18 जून को हापुड़ के बझौड़ा-खुर्द गांव में भीड़ ने गोकशी के शक में कासिम नाम के एक शख्स को पीट-पीटकर मार डाला. एक और व्यक्ति समीउद्दीन को भी पीटा गया, जो हॉस्पिटल में भर्ती है. मामले के बाद से कासिम की ये तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. इसके आधार पर पुलिस की आलोचना की जा रही है कि एक घायल व्यक्ति को इस तरह क्यों उठाया गया. पहले इस फोटो के बारे में जानते हैं, फिर आगे बात करेंगे.

इस केस में पिलखुआ थाने की पुलिस ने एक्शन लिया और हाजा थाने में FIR दर्ज कराई गई. पिलखुआ के इंस्पेक्टर अश्विनी खारी ने हमें बताया कि घटना की जानकारी मिलने पर पुलिस घटनास्थल पर पहुंची, तो कासिम खेत के एक गड्ढे में बेहोश पड़ा था. एक स्ट्रेचर समीउद्दीन को ले जा रहा था, तो पुलिस ने मौके पर मौजूद लोगों की मदद से कासिम को खेत से बाहर निकाला. स्ट्रेचर नहीं था, तो लोगों ने ही कासिम को पुलिस की PCR के पास पहुंचाया और पुलिस PCR से उसे हॉस्पिटल ले गई. वहां इलाज के दौरान उसे मृत घोषित कर दिया गया. अश्विनी बताते हैं कि उन्होंने कासिम को चादर पर रखवाया था और फिर हॉस्पिटल ले गए थे.



इस दुनिया में जितने जीव हैं, उन सबमें हिंसा का अंश है. कोई शोध अभी तक ये पता नहीं लगा पाया है कि ये हिंसा कुदरत की दी हुई है या जीवों ने सर्वाइव करने के क्रम में खुद अर्जित की है. पर इतना ज़रूर साफ है कि इंसानों ने अपनी हिंसा को वक्त के साथ और पैना बनाया है. इंसान को कुदरत से न तो शिकार का पीछा करने वाली चीते जैसी तेज़ी मिली, न शिकार करने वाली शेर जैसी ताकत, न बाघ जैसे पंजे, न मगरमच्छ जैसे दांत... फिर भी आज इंसान धरती पर मौजूद सबसे खतरनाक शिकारी है. अपने हथियारों की वजह से. अपने भावों की मदद से.

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मूलत: हिंसक होने के बावजूद इंसानों और जानवरों में एक बुनियादी समानता है कि दोनों अपनी ही ज़मात के खिलाफ हिंसक तो होते हैं, लेकिन एक-दूसरे को मार डालने की हद तक हिंसक नहीं होते. जानवर अपने जैसे ही किसी और को मारकर नहीं खाते. पर इंसान धीरे-धीरे, लगातार ये फर्क खत्म कर रहा है.

इंसान और जानवरों की इस हिंसा का ज़िक्र इसलिए, क्योंकि पिछले कई दिनों से हम अपने देश में भीड़ के हाथों लोगों के पीट-पीटकर मार डाले जाने के मामले देख रहे हैं. ये प्रक्रिया इतनी पुरानी है कि इंसानों के लिए डरावनी नहीं रह गई है, पर आज इसकी आवृत्ति डरावनी है. मॉब लिंचिंग के मामलों में हम इंसानों की जानवरों से तुलना करते हैं. पर जैसा कि विज्ञान बताता है कि हम जो कर रहे हैं, जानवर वो नहीं करते.


हम धीरे-धीरे मानसिक तौर पर मॉब लिंचिंग को स्वीकार्यता देते जा रहे हैं. दीमापुर लिंचिंग (बाएं), दादरी में मारा गया अखलाक (बीच में) और अलवर लिंचिंग की तस्वीर (दाएं).
हम धीरे-धीरे मानसिक तौर पर मॉब लिंचिंग को स्वीकार्यता देते जा रहे हैं. दीमापुर लिंचिंग (बाएं), दादरी में मारा गया अखलाक (बीच में) और अलवर लिंचिंग की तस्वीर (दाएं).

ताज़ा मामला उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के बझैड़ा-खुर्द गांव का है, जहां भीड़ ने गोकशी के शक में कासिम नाम के शख्स को पीट-पीटकर मार डाला. भीड़ ने इसी शक में समीउद्दीन नाम के एक और शख्स को भी बुरी तरह पीटा, जिसका इलाज चल रहा है.

पिटाई के बाद खेत में तड़पता कासिम
पिटाई के बाद खेत में तड़पता कासिम

इस घटना की सबसे ऊपर लगी तस्वीर देखिए. आपने कई तस्वीरें देखी होंगी कि गांव-कस्बे में घुस आए जंगली जानवर को लोग लाठी-डंडों-पत्थरों से पीटकर मार डालते हैं और फिर उसकी लाश का जुलूस निकालते हैं. कई बार उसे पेड़ से टांगकर प्रदर्शनी लगाई जाती है. इसके पीछे विजेता और ताकतवर होने का वो हिंसक भाव है, जो खुद को बचा लेने के नैसर्गिक भाव से पैदा होता है. पर कासिम की ये तस्वीर हिंसक और अहिंसक होने की बहस खत्म कर देती है. जानवरों के बाद अब हम अपने जैसे दो हाथ-दो पैरों और एक दिमाग वाले वाले इंसानों के साथ भी वही सलूक कर रहे हैं.


पुरुलिया में गांववालों ने तेंदुओ को मारकर उसकी लाश पेड़ से लटका दी थी.
पुरुलिया में गांववालों ने तेंदुओ को मारकर उसकी लाश पेड़ से लटका दी थी.

पिछले कुछ सालों में जब-जब मॉब लिंचिंग की खबरें आईं, तब हमने सुविधानुसार सरकार, संगठनों और मुद्दों को कोसा. भीड़तंत्र पर भी बात हुई, पर शायद उतनी नहीं हुई जितनी होनी चाहिए थी. पर इस पर जमकर ज़बानें मथ लेने से क्या होता? आप हापुड़ का पूरा मामला पढ़िए, फिर सोचिए कि इसका क्या इलाज हो सकता है.

क्या हुआ हापुड़ में?

किसानी करने वाला समीउद्दीन मदापुर गांव का है और पेशे से कसाई कासिम सद्दीकपुरा गांव का रहने वाला था. ये दोनों 18 जून को समीउद्दीन के खेत में बैठे थे, जो बझैड़ा-खुर्द गांव से लगा हुआ है. दोपहर में एक आवारा गाय बछड़े के साथ समीउद्दीन के खेत में घुस आई, तो दोनों उसे खेत से बाहर निकालने लगे. तभी वहां मौजूद किसी शख्स ने गांव में फोन करके कहा कि दो लोग एक गाय काटने के लिए ले जा रहे हैं.


कासिम जब तड़पते हुए पानी मांग रहा था, तब लोग मना कर रहे थे कि उसे पानी न दिया जाए.
कासिम जब तड़पते हुए पानी मांग रहा था, तब लोग मना कर रहे थे कि उसे पानी न दिया जाए.

आनन-फानन में लोग समीउद्दीन के खेत पहुंचे और दोनों को पीटने लगे. कासिम को इतना पीटा गया कि उसकी मौत हो गई. पिटाई के दौरान जब कुछ लोग बीच-बचाव कर रहे थे, तब कड़ी धूप में खेत में पड़ा कासिम तड़पते हुए पानी मांग रहा था, लेकिन किसी ने उसे पानी नहीं दिया. उसने उसी हालत में दम तोड़ दिया, जिसके बाद उसे हाथ-पैरों से टांगकर खेत के बाहर लाया गया. समयुद्दीन बुरी तरह घायल हुआ, जिसका हॉस्पिटल में इलाज चल रहा है.

इलाकाई लोग क्या बता रहे हैं?

हत्या में शामिल ग्रामीणों का आरोप है कि करीब आधा दर्जन लोग पड़ोसी गांव से खेतों के रास्ते 3 गाएं काटने के लिए ले जा रहे थे. सूचना मिलने पर ग्रामीण पहुंचे, तो उनमें से 4 लोग भाग गए, जबकि दो पकड़ में आ गए, जिन्हें पीटा गया.


समयुद्दीन के खेत से मिली गाय और बछड़ा
समयुद्दीन के खेत से मिली गाय और बछड़ा

दी लल्लनटॉप ने बझैड़ा-खुर्द गांव के कुछ लोगों से बात की. उन्होंने बताया कि गांव में कई आवारा गाय और नीलगाय घूमते रहते हैं. उनका किसी के खेत में घुसना और फिर भगाया जाना आम बात है. वहीं एक शख्स ने आरोप लगाया कि गायों का खेत में घुसना भले आम बात हो, लेकिन कासिम और समीउद्दीन उस गाय को काटने के लिए ही ले जा रहे थे.

पर सच पता लगाना तो पुलिस का काम है, पुलिस क्या कह रही है

पुलिस ने इस मामले में 25 अज्ञात ग्रामीणों के खिलाफ FIR दर्ज की है. FIR में धारा 302 यानी हत्या और धारा 307 यानी हत्या की कोशिश दर्ज की गई हैं. पर पुलिस इसे गोकशी के शक में हत्या का मामला नहीं बता रही है. FIR के मुताबिक खेत के पास दो लोगों की बाइक आपस में टकरा गई, जिससे पहले कहासुनी हुई और फिर मारपीट होने लगी. इसी मारपीट में एक की मौत हो गई.

वहीं गुस्साए गांववाले बताते हैं कि अगर बाइक टकराने का मामला है, तो पुलिस दिखाए कि वो बाइक कहां हैं. अगर लोग गुस्से में किसी को मार डालेंगे, तो क्या वो उसकी बाइक सही-सलामत छोड़ देंगे. इंस्पेक्टर अश्विनी खारी बताते हैं कि पुलिस को मौके पर गोकशी का कोई निशान नहीं मिला, इसलिए पुलिस ने FIR में इसका ज़िक्र नहीं किया है.


घटनास्थल पर जांच करती पुलिस

घटना का वीडियो पुलिस की थ्योरी नकारता है

इस घटना का एक वीडियो वॉट्सऐप पर शेयर हो रहा है. ये उस दौरान का है, जब कासिम को बलभर पीटा जा चुका है और वो खेत में तड़पते हुए पानी मांग रहा है. उस समय वहां खड़े लोग उसे और पीटना चाहते हैं, लेकिन एक शख्स रोकते हुए कह रहा है, 'हो गया... तुमने मार लिया, पीट लिया, बहुत हो गया. लेकिन समझो बात को. आदमी गरमी में कर देता है, लेकिन उसके परिणाम बहुत खतरनाक होते हैं.' वीडियो में एक और आवाज़ आती है, 'गरमी में दो मिनट और न पहुंचते, तो गाय कटी-कटाई मिलती.' एक और भी आवाज़ है, 'ये कसाई है. इसने गाय-बछड़ा सब काट रखे हैं.'

कुछ बतकहियों के बीच बीच-बचाव करने वाले शख्स की फिर से आवाज़ आती है, 'इसे पानी-वानी पिला दो, मर गया तो तुम्हारे ज़िम्मे पड़ जाएगा. मामला उल्टा हो जाएगा. तुम समझते नहीं हो बात को.' पर तभी कोई और बोलता है, 'अरे इसे क्यों पानी पिलवा रहे हो.'

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गाय के मसले पर हम कितने इंसानों की जानें गंवाते रहेंगे

एक ज़मात की गाय के प्रति इतनी श्रद्धा है कि वो गाय कटते नहीं देख सकता. लेकिन गाय के प्रति उसकी श्रद्धा उसकी सारी संवेदनाओं को ढक ले रही है. वो इंसान को पीट-पीटकर मारने पर आमादा है. एक मर रहे आदमी को पानी तक नहीं पिलाना चाहता है और अपने इस किए पर उसे कोई पछतावा भी नहीं है. गोया हत्या न हुई, किसी को डीला मारना हो गया. इस प्रवृत्ति पर हम यही कह सकते हैं कि मॉब लिंचिंग या भीड़तंत्र के ज़रिए हम ये मसला नहीं सुलझा सकते.

हम उम्मीद करते हैं कि भारत के हर परिवार में लोगों को घर से लेकर पढ़ाई तक यही सीख मिलती है कि आप लोगों को मार-पीटकर, उनसे लड़कर नहीं, बल्कि प्यार से ही उन्हें जीत सकते हैं. अगर आपको किसी चीज़ से दिक्कत है, तो आप उस पर लड़कर नहीं, बात करके ही उसे सुलझा सकते हैं. गाय के प्यार करने वालों को भी ये समझना चाहिए और खुद पर लागू करना चाहिए. इतना गुस्सा करके हम और ज़्यादा  गुस्से को ही जन्म दे रहे हैं.

प्यार न समझ आए, तो तर्क पर बात कर लीजिए

अगर आपको प्यार से जीतने का आसान और सहज तरीका समझ नहीं आता, तो हापुड़ मामले में तर्क के आधार पर बात कर लीजिए.

पहला, कोई शख्स तब तक अपराधी नहीं होता, जब तक उसने अपराध कर न लिया हो. अपराध करने की सज़ा होती है, अपराध सोचने की नहीं. 'दि उत्तर प्रदेश प्रिवेंशन ऑफ काऊ स्लॉटर ऐक्ट, 1955' कहता है कि सूबे में गाय काटना अपराध है, मगर हापुड़ में कोई गाय नहीं काटी गई. ग्रामीण कासिम की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन उसने गाय काटी तो नहीं थी.

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दूसरा, अगर वो गाय काटता, तो वो कानून का दोषी होता. भीड़ का नहीं. उसे सज़ा देने का हक कानून का होता, भीड़ का नहीं. भीड़ सरकार या न्याय व्यवस्था से बड़ी नहीं हो सकती. किसी ने कितना भी गंभीर या घिनौना अपराध किया हो, भीड़ को कोई अधिकार नहीं है कि वो किसी को पीट-पीटकर मार डाले.

तीसरा, अगर इसी तरह शक के आधार पर लोगों को पीट-पीटकर मारा जाने लगे, तो शायद कल को आपके भी साथ यही सलूक हो. जब सब कुछ शक के आधार पर किया जा रहा हो, तो कौन सी बड़ी बात है कि कल को कोई भीड़ आपको किसी अपराध का दोषी मान ले. आपके साथ वही सलूक करने लगे, जो कासिम के साथ किया. क्या तब भी आप इस प्रवृत्ति को सही ठहराएंगे? नहीं. तब तो आपके पास इसे ठहराने का भी मौका नहीं होगा. जैसे कासिम के पास नहीं था.

इसे रोकना होगा, इसे बढ़ने नहीं दे सकते

इंसानों और जानवरों में एक बुनियादी अंतर ये भी है कि इंसान महात्वाकांक्षी होते हैं. उनमें चाहत होती है, हवस होती है. यही तय करता है कि इंसान कितना हिंसक हो सकता है. पर ये तो हर इंडिविजुअल की ज़िम्मेदारी है कि वो अपनी ज़िम्मेदारी ले, खुद को संभाले. बीमार होने से, वहशी होने से. आप गाय से चाहे जितना प्यार कर लीजिए या चाहे जितनी नफरत कर लीजिए, पर ये अतिरेक आपको कहीं नहीं ले जाएगा. ये इंसान से दरिंदा बनने का क्रम है. इसे रोकना होगा. इसे बढ़ने नहीं दे सकते.




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